गुरुवार, सितंबर 08, 2011

एक महिला की मेहरबानी




एक महिला ने मुझे फेसबुक के माध्यम से सलाह भेजी है और उस पर गौर करने को कहा है। उस स्त्री का नाम है प्रिया हल्दोनी, पति का नाम संदीप हल्दोनी। रहती हैं नयी दिल्ली में। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है। सम्प्रति दिल्ली स्थित ‘नेशनल इन्स्टीच्यूट आॅफ पैथोलॉजी एंड बायोमेडिकल रिसर्च’ में शोध कर रही हैं। अपने बारे में इतनी जानकारी उन्होंने फेसबुक पर दी है।
मैं स्त्री-पुरुष दोनों को प्यार करता हूँ। लेकिन जैविक कारणों से स्त्रियाँ हठात् आकर्षित कर लेती हैं। इसलिए उनकी उपेक्षा नहीं कर पाता हूँ। मैं प्रिया की बातों पर अवश्य गौर करूँगा- गहराई तक उतरने का प्रयास करूँगा। उनकी बातों का अर्थ क्या है, कहाँ से पैदा होती हंै ऐसी बातें, क्यों पैदा होती हैं, सही बात क्या हो सकती है, इन सब पर विचार करूँगा। पहले देख लेते हैं कि उनकी सलाह क्या है-
‘‘आपने अपनी एक्स वाइफ का साथ छोड़ा एक ऐसी उमर में जब उन्हें आपकी बहुत जरूरत थी, क्योंकि अभी तक उन्होंने ही आपका साथ दिया था, तो आपको भी उसके साथ रहना चाहिए। यदि सभी लोग ऐसा ही करेंगे, तो क्या होगा हमारी उम्रदराज माँ और बहनों का। इसलिए इस पर गौर करें। प्यार सब कुछ नहीं होता, कुछ रिश्ते हमें समाज में रहने के लिए निभाने पड़ते हैं। आपका ये कर्म समाज को गलत मैसेज देता है। हो सके तो इसे समझने का प्रयास करें।’’
प्रिया की सबसे बड़ी चिंता है कि मैंने जो किया, उससे समाज को गलत संदेश मिल रहा है। ‘यदि सभी लोग ऐसा ही करेंगे तो क्या होगा हमारी उम्रदराज माँ और बहनों का।’ दरअसल यह अकेले प्रिया हल्दोनी की चिंता नहीं है, भारतवर्ष के लाखों-करोड़ों स्त्री-पुरुषों की चिंता है। इसलिए मामला गंभीरता से विचार करने योग्य है।
एक बात स्पष्ट है कि मैंने जो किया है उससे समाज आंदोलित हुआ है। यह अच्छी बात है, क्योंकि आंदोलन से जड़ता टूटती है। लोग चली आ रही मान्यताओं पर नये सिरे से विचार करते हैं।
मेरे कर्म का प्रभाव एक ही जैसा हर जगह नहीं है। अलग-अलग आदमियों पर अलग-अलग प्रभाव है। व्यक्ति भेद से प्रभाव बदल जाता है। तीन-चार साल पहले की बात है। एक दिन मैंने टीवी खोला तो अचानक देखा कि कवि सम्मेलन चल रहा है और एक कवि मेरे ही ऊपर कविता पढ़ रहा है। कविता में उपमानों की झड़ी थी। मुझे सिर्फ एकाध बात ही याद है। कवि महोदय मंच पर आते हैं। कहते हैं- आपलोगों ने टीवी पर एक प्रेमी जोड़ा देखा होगा। और शुरू हो जाते हैं- ‘जैसे कौवे की चोंच में जलेबी’, इत्यादि।
पूरी कविता कवि की लोलुप दृष्टि को दर्शाती है। कवि को लगता है, हाय रे, मैं कितना हतभाग्य। जलेबी तो मेरी चोंच में होनी चाहिए, कौवे की चोंच में कैसे चली गयी ? अशोभनीय ! निंदनीय !! मनुष्य के हृदय में निवास करने वाली ईष्र्या बहुत ही दमदार भाव है; क्योंकि जरा सा अवसर मिलते ही क्षण मात्र में भड़क जाती है। अगर हम अपने नैतिक मूल्यों पर विचार करें तो पता चलेगा कि उनमें से बहुतों के केन्द्र में ईष्र्या है। जो नैतिकता ईष्र्या के पेट से पैदा होगी, वह न जाने मनुष्य को किस गड्ढे में धकेल देगी !
जुलाई, 2006 में मुझे एक पोस्टकार्ड मिला, जिसमें मेरे और जूली के प्रेम पर दो पंक्तियाँ लिखी थीं-
‘‘पहलु-ए-हूर में लंगूर, खुदा की कुदरत
कौआ के चोंच में अंगूर, खुदा की कुदरत’’
कौवा मुझे बहुत सुंदर पक्षी मालूम पड़ता है, पता नहीं क्यों कविगण कौवों पर इतने खफा रहते हैं ! लंगूर की भी अपनी खूबसूरती होती है, लेकिन केवल हूर पर ही लुब्ध रहने वाले शायर लंगूर के सौन्दर्य से वंचित हो जाते हैं। इसके लिए थोड़ा गहरा सौन्दर्य बोध चाहिए। बहरहाल, कवि ने अपना नाम ‘एक तिड़कमी शायर, फारबिसगंज’ बताकर असली नाम छिपा लिया है। भय के कारण आदमी अपना नाम छिपाता है। वह भय समाज का हो या जिसको लिखा है उसका हो, या पाप बोध का हो, भय किसी का भी हो, इतना स्पष्ट है कि ऐसा लिखते हुए कवि काँप रहा है ! क्या भयभीत व्यक्ति समाज को रास्ता दिखा सकता है ? इस पत्र में भी शायर की ईष्र्या ही मुखर है।
ईष्र्या दो प्रकार की होती है- एक , जो दूसरे को मिला है, वह उसे न मिलकर मुझे मिल जाय। दो, मुझे नहीं मिला तो किसी को न मिले। दूसरी ईष्र्या ज्यादा विनाशकारी है।
इस तरह मेरे कर्म से अनेक प्रकार के लोग अनेक तरह से आंदोलित हुए। किसी की सोयी रसिकता अचानक  जाग गयी! किसी का आया बुढ़ापा भाग गया! किसी को अपने को श्रेष्ठ साबित करने का मौका मिला ! कोई दूसरे को नीचा दिखाने में रस लेने लगा ! किसी का मन मसखरी के लिए मचल उठा ! किसी को उपदेश देने का स्वर्णिम सुयोग मिल गया ! कुछ शिक्षक मन ही मन उत्साहित हो गए ! कुछ शिक्षक स्वयं के बेनकाब होने के भय से अत्यधिक क्षुब्ध और क्रुद्ध हो गए ! कोई पत्नी अपने पति से सशंकित रहने लगी ! कोई पति पत्नी से सावधान हो गया! कहीं  पति पत्नी दोनों प्रसन्न हो गये! एक पति ने मेरे प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा- झेला आपने, फायदा हुआ मुझे। मैंने पूछा- कैसे ? बोले- अब पत्नी पहले से ज्यादा प्रेम देने लगी है ! इस तरह अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाएँ हुईं।  प्रतिक्रियाओं के असंख्य रूपों में एक खास रूप श्रीमती प्रिया हल्दोनी का है। यहाँ वही विचारणीय विषय है।
प्रियाजी समाज पर मेरे गलत प्रभाव पड़ने की आशंका से परेशान हंै। प्रभाव एक प्राकृतिक क्रिया व्यापार है। हर आदमी दूसरे को प्रभावित कर रहा है और स्वयं उससे प्रभावित हो रहा है। इससे तो बचा नहीं जा सकता। प्रिया भी मुझसे प्रभावित हैं और मैं भी उनसे प्रभावित हूँ। यह प्रभावित होने वाले व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह कौन सा प्रभाव लेता है और कौन सा छोड़ देता है। गलत या मूच्र्छित आदमी अच्छे कर्म से भी गलत प्रभाव ले लेता है और अच्छा एवं सजग आदमी गलत काम से भी कुछ अच्छा निकाल लेता है। इसलिए प्रभावित करने वाले को न पकड़कर प्रभावित होने वाले आदमी को पकड़ना चाहिए। वर्षा की बूँदें समुद्र में गिरती हंै तो समुद्र हो जाती हंै, गंगा में गंगा और नाले में नाले का गंदा पानी ! एक दिन मैंने गंदे नाले के पानी को शोर मचाते सुना- ‘वर्षा बंद करो, वर्षा बंद करो। उसके जल ने मुझे गंदा कर दिया है !’ लोग नाले के इस शोर शराबे पर हँसकर कहने लगे- अरे गंदा पानी, वर्षा की बूँदें गंदी नहीं हैं, तुम गंदे हो। तुम्हीं ने अपनी गंदगी मिलाकर उस स्वच्छ जल को गंदा कर दिया है। मेरा भी मन कहता है कि प्रियाजी से पूछूँ- क्या आपने भी प्रेम की निर्मल बूँदों को गंदा नहीं कर दिया है ? प्रिया लिखती हैं- ‘‘प्यार सब कुछ नहीं होता, कुछ रिश्ते हमें समाज में रहने के लिए निभाने पड़ते हैं।’’ अगर आपने प्यार को गंदा न किया होता तो ऐसा कभी नहीं कहतीं। प्यार की पावनता का आपको पता होता तो आप कहतीं- ‘प्यार ही सबकुछ होता है और इसी से समाज के सारे रिश्ते ढंग से निभते हैं।’ पति अथवा पत्नी तिजोरी में बंद कर रखने वाली वस्तु नहीं होते प्रियाजी। जिस कुएँ का पानी नहीं निकाला जाता है, वह सड़ जाता है। तालाब का पानी गंदा हो जाता है, लेकिन बहता पानी निर्मला। पति पत्नी के संबंध पर पहरेदारी मत कीजिए। ईष्र्या और एकाधिकार से संबंध जहरीला हो जाता है। पति को अगर गुलाम बनाइयेगा तो प्रेम खो जायेगा, पत्नी पर कोई सवार रहेगा तो प्रेम मिट जायेगा। हमारे समाज में तो प्रेम की भू्रण हत्या होती है, पैदा होने से पहले ही उसे मार दिया जाता है। मरा हुआ प्रेम ढोने को ही आप निभाना कहती हैं- जैसे बंदरिया मरे हुए बच्चे को ढोती रहती है ! बहुत मुश्किल है ईष्र्या और अधिकार भावना से बाहर होना। यह तपश्चर्या है। इस तपस्या के बिना समाज प्रेमपूर्ण नहीं हो सकता।
मटुक का मतलब है घोर अभाव और कठिनाइयों में भी आनंदित रहने की क्षमता ! मटुक का मतलब है प्रेम के लिए संसार की सारी प्रेम विरोधी शक्तियों से एक साथ टकराने का अदम्य साहस। उनसे लड़ते लड़ते वीरगति पाने की उत्कट लालसा। मटुक का मतलब है अंदर और बाहर की एकता। मटुक का मतलब है सबके प्रति सद्भाव। मटुक का मतलब एक ऐसे समाज का निर्माण है जिसके केन्द्र में प्रेम हो। जहाँ प्रेम होगा, वहाँ शोषण नहीं हो सकता। जहाँ शोषण नहीं होगा वहाँ धन इकट्ठा करने वाला कुबेर न होगा। जहाँ कुबेर न होगा, वहाँ कोई चोर भी न होगा, न भ्रष्टाचार होगा। मटुक का मतलब है एक ऐसी विचारधारा जिसमें अपनत्व हो, मैत्री हो, प्रेम हो, कोई किसी का मालिक न हो। व्यक्ति स्वयं अपना मालिक हो। मटुक का मतलब है स्त्री पुरुष के सहज नैसर्गिक प्रेम की स्वीकृति और उसके फलने फूलने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता। गलत संदेश मेरी तरफ से नहीं जा रहा है। समाज पहले से ही गलत संदेश से ग्रसित है, क्योंकि प्यार से उसे डर लगता है और उससे परहेज करता है। मैं तो तपस्यारत हूँ। मुझसे अगर कोई संदेश निकलेगा तो तप का ही निकलेगा। लेकिन आप तप करने को राजी नहीं हैं। आप पति या पत्नी पर मिलकियत छोड़ने को तैयार नहीं हैं। संदेश न लेना आपकी स्वतंत्रता है। जैसे जीना चाहते हैं, वैसे जीयें। लेकिन गलत जीवन जीने वाला दुख पाता है और अपने दुख की जिम्मेदारी दूसरों को देकर उन्हें भी परेशान करना चाहता है। उन्हें तरह तरह से सलाह देता है और कभी दुश्मन मानकर आक्रमण कर बैठता है।
प्रियाजी लिखती हैं- ‘‘ आपने अपनी एक्स वाइफ का साथ छोड़ा एक ऐसी उमर में जब उन्हें आपकी बहुत जरूरत थी, क्योंकि अभी तक उन्होंने ही आपका साथ दिया था तो आपको भी उनके साथ रहना चाहिए।’’
क्या आप मेरी पत्नी से मिलीं ? मुझसे मिलीं ? मेरे जीवन और पत्नी के जीवन को अंदर बाहर से जाना ? हम दोनों के संबंधों को निकट से देखा, समझा ? जाहिर है, आपने ये सब नहीं किया। फिर भी कितने आत्मविश्वास के साथ आप उपर्युक्त वचन कह गयीं ! अंग्रेजी में एक कहावत है- ‘फरिश्ते जहाँ पाँव रखने में घबड़ाते हैं, मूर्ख वहाँ सरपट दौड़ लगाते हैं !’ आप सरपट दौड़ लगा गयीं ! पता लगाने का विषय है कि मैंने पत्नी को छोड़ा या पत्नी ने मुझे छोड़ा ! पत्नी को मेरी जरूरत थी या किसी और चीज की जरूरत थी ! पत्नी को मैंने सताया या पत्नी ने मुझे ! मेरी संपत्ति पत्नी ने हड़पी या मैंने उसे उससे वंचित किया ! सचाई का पता वह लगाता है जो खोजी वृत्ति का होता है, जिज्ञासु होता है। हमारी शिक्षा ने जिज्ञासा को नष्ट कर दिया है। उसने किसी चीज पर संदेह कर श्रमपूर्वक उसे दूर करने की विद्या नहीं सिखायी- उसने अंधविश्वास सिखा दिया ! इसी खोजी वृत्ति के अभाव में हमारे देश में विज्ञान नहीं पनपा। कहने के लिए तो आप एक रिसर्चर हैं, लेकिन अनुसंधान की वृत्ति आप में होती तो आप बिना पता लगाये वह नहीं लिख जातीं, जो लिख गयीं !
  आप तो जिस भाषा का प्रयोग कर रही हैं उसका भी अर्थ नहीं समझ रही हैं, तो दूर स्थित मटुक का अर्थ कहाँ से समझेंगी ? एक्स वाइफ का माने होता है वह स्त्री जो अब वाइफ नहीं हैं, पहले कभी थी। जो छोड़ी जा चुकी है, जो अतीत हो चुकी है। एक्स वाइफ ( छोड़ी हुए वाइफ ) को छोड़ने का क्या अर्थ होता है ? आप कृपया जान लीजिए- मेरी पत्नी मेरे लिए सदा वर्तमान है, वह भूतपूर्व नहीं है। वह सदा सुहागन है ! न मैंने उसे तलाक दिया है और न दूसरी शादी की है। मेरे मन में उसके लिए जगह है। साथ ही यह भी कह दूँ कि मेरा प्रेम पाने के अधिकारी वे सभी व्यक्ति हैं जो ईष्र्या रहित हैं। ऐसे ही लोगों पर मैं अपने को लुटाता हूँ। आपने मेरी पत्नी को भूतपूर्व बनाने का अपराध किया है। अगर मेरी पत्नी को यह मालूम होगा, तो वह आपका मुँह नोच लेगी !
लोग सिर्फ मेरी पत्नी को ढाल बनाकर उसकी आड़ में अपनी ही व्यथा कहते हैं। आपने भी संभवतः यही किया है। पुरुष की वृत्ति स्वभावतः चलायमान होती है। आपके पति भी संभवतः अपवाद नहीं होंगे। उनकी हरकतों को देखकर भीतर से आपकी आत्मा डाँवाडोल हो गयी होगी ! घबड़ाहट में आप अपने और अपने पति के भीतर नहीं झाँककर हजार किलोमीटर की दूरी पर बैठे मटुक को दोषी ठहरा रही हैं! आपका दाम्पत्य जीवन चाहे जैसा भी हो, उसके लिए जिम्मेदार आप ही दोनों हैं। मैं कैसे हो सकता हूँ ? मान न मान मैं तेरा मेहमान ! मुझे आप मेहमान मत बनाइये। मुझे आपने दिल के किसी कोने में जगह दे दी होगी, इसी से सब उपद्रव हो रहा है। आप एकनिष्ठ होकर अपने पति में चित्त को रमाइये। जब आप पति प्रेम में रसमग्न होंगी तो मेरा प्रभाव वहाँ तक नहीं पहुँचेगा। मेरा प्रभाव उन्हीं पर पड़ता है जिन्होंने अपने दिलों में मुझे जगहें दे रखी हैं।
आप लिखती हैं-‘ यदि सभी लोग ऐसा ही करेंगे, तो क्या होगा हमारी उम्रदराज माँ और बहनों का ?’
मुझे तो अब तक मेरे जैसा एक भी आदमी पूरे देश में नहीं दिखा, आपको कहाँ दिख गया ? जाहिर है, आपको भी नहीं दिख रहा है, आप केवल कल्पना कर रही हैं कि अगर ऐसा होगा तो क्या होगा। आपको वर्तमान की जरा भी फिक्र नहीं है, भविष्य की कल्पना से त्रस्त हैं ! यह एक प्रकार की मानसिक बीमारी है।  वर्तमान में स्थित होकर जीेयें, कभी कोई समस्या नहीं होगी।
आश्चर्य तो मुझे इस बात से हो रहा है कि आपने प्रसंग उठाया पत्नी का और चिंता करने लगीं मां-बहनों की ! मेरी पत्नी भाग्यशालिनी माँ है। उसका बेटा बहुत योग्य, मेधावी, कलाकार और मातृभक्त है। विदेश जाना अभी तक मेरे लिए सपना बना हुआ है ! लेकिन मेरे बेटे ने अपनी माँ को दुनिया के कुछ हिस्सों की सैर करा दी है। भारत के महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थलों का दर्शन हवाई जहाज द्वारा करा दिया है। मेरी पत्नी हर तरह से सशक्त अपने डॉक्टर भाई की दुलारी और प्यारी बहन है। वह ऐसे सामथ्र्यवान भाई की बहन है जो अपनी बहन की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकता है- यहाँ तक कि अपनी नाक भी कटा सकता है! भगवान करे आपको भी ऐसा पुत्र और भाई मिले।
आप पत्नियों की तरफदारी करने चलीं थीं, लेकिन किसी हीन गं्रथि के कारण मां-बहन की तरफदारी करने लग गयीं ! अपने वाक्यार्थ के प्रति भी आप बेखबर हैं, तो मेरी खबर कैसे रखेंगी ? आपको लिखना चाहिए था कि यदि सभी लोग ऐसा ही करेंगे तो क्या होगा इस देश की पत्नियों का ? मैं कहता हूँ, कुछ नहीं होगा; क्योंकि एक तो सभी लोग ऐसा नहीं करेंगे। दूसरे, जो थोड़े से लोग करेंगे, उनकी पत्नियों को कोई चिंता करने की बात नहीं है, क्योंकि पुरुषों को दूसरों की पत्नियाँ, चाहे जैसी भी हों, सदा आकृष्ट करती हैं। स्त्री अगर स्वयं सदा के लिए किसी पुरुष की गुलाम बनी रहने पर अड़ी रहे तो कोई पुरुष उसे मुक्ति नहीं दिला पायेगा। अगर पत्नियों को अपने भीतर आकर्षण पैदा करना है तो जरा सा अपने पति को भी ढील दे दें और स्वयं भी ढील ले लें।
जड़ वैवाहिक संबंध ने मनुष्य को पशु से भी नीचे कर दिया है। विवाह के द्वारा मनुष्य चला था पशु से अच्छा बनने के लिए और उससे भी बदतर जगह पर पहुँच गया! एक जानवर भी स्वतंत्रतापूर्वक यौन संबंध स्थापित कर सकता है, लेकिन मनुष्य इसके लिए तरस रहा है ! मनुष्य ने अपने हाथों से अपने पाँव में जंजीरें लगा ली हैं। इस बंधन की ऐसी भीषण प्रतिक्रिया हुई कि मनुष्य बलात्कारी हो गया ! आप गौर करेंगी कि पशु बलात्कार नहीं करता। मनुष्य सेक्स का क्रेता और विक्रेता हो गया ! वह सेक्स का व्यापार करने लगा ! जो हवा और पानी की तरह मुफ्त में सुलभ था, उसी की वह खरीद बिक्री करने लगा ! पशु ऐसा नहीं करता। मनुष्य अप्राकृतिक यौन संबंध का शिकार हो गया, पशु ऐसा नहीं होता। सेक्स के लिए न जाने मनुष्य कितने तरह से धोखे का जाल रचता है ! दहेज इस विवाह प्रथा का ही विषफल है, जिसके कारण न जाने कितनी स्त्रियाँ प्रतिदिन अपने प्राणों को गँवा रही हैं। पशुओं में कोई ऐसी प्रथा नहीं है। रास्ता यह था कि मनुष्य सेक्स को पशु की तरह सहज रूप में स्वीकार करता और धीरे-धीेरे उसे रूपांतरित कर ब्रह्मचर्य के आनंदलोक में प्रवेश करता। लेकिन इसे न समझ कर उसने दमित और जबरिया ब्रह्मचर्य को अपनाने की कोशिश की और रुग्ण हो गया !  इस रुग्णता से निकलने का रास्ता तो है हल्दोनी जी। लेकिन खोजने वाला चित्त कहाँ हैं ?
जिंदगी भर मनुष्य एक ही स्त्री या पुरुष से बँधा रहे, दूसरे से प्रेम न हो, यह मुझे अस्वाभाविक मालूम पड़ता है। हाँ, जो एक के साथ रहने में स्वाभाविक रूप से आनंदित हो और अन्य की चाहना न करे तो उसके लिए वह बिल्कुल ठीक है, वह उसी तरह रहे। लेकिन मन को मारकर एक को लेकर ही रहे, यह गलत है। और जो उस एक से ही निभाते रहने का फरमान जारी करे, वह दोगुना गलत है। मनोवैज्ञानिक रूप से ऐसी सलाह वही देते हैं जो खुद अपने मन को मारकर जी रहे होते हैं। अधिकांश लोगों के सोचने का ढंग गलत है। हम सबको एक ही टाइप का आदमी बनाना चाहते हैं। सबको एक ही टाइप में ढालना चाहते हैं, जबकि हर व्यक्ति का व्यक्तित्व अलग अलग होता है, उसकी जीवन शैली अलग होती है। हर व्यक्ति अपने ढंग से जीने में ही सुख शांति का अनुभव कर सकता है। जिस दिन मशीन टाइप के लोग मशीनीकरण से बाहर होकर अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व को प्राप्त करेंगे उसी दिन जिंदगी से मुलाकात कर पायेंगे। प्रिया हल्दोनी टाइप के लोगों ने जीना सीखा कहाँ है और जब तक आदमी अपने जीवन को नहीं पा लेता तब तक वह अंदर से एक अभाव और बेचैनी महसूस करता है। इसी दुख और बेचैनी में वह किसी अन्य पुरुष से जा टकराता है-
आँख से छलका आँसू और जा टपका शराब में
मुझे लगता है कि इस सृष्टि में जड़ता और चेतनता के बीच निरंतर संघर्ष चल रहा है; दोनों के अपने गुरुत्वाकर्षण हैं। जड़ता अपनी तरफ खींचना चाहती है और चेतनता अपनी तरफ। जड़ता जड़ता की तरफ आकृष्ट हो जाती है और चेतनता चेतनता से जा मिलती है। जिसकी चेतना के सारे दरवाजे बंद हैं वे हल्दोनी के विचारों में कैद रहेंगे। जिनकी चेतना थोड़ी सी जगी है वे उससे निकल कर बाहर की हवा में साँस लेंगे। जड़ता दुख है, चेतनता आनंद है। मनुष्य की यही स्वतंत्रता है कि वह जिसे चाहे उसे चुन ले।

मटुक नाथ
  8.09.11

बुधवार, अगस्त 17, 2011

एक विचारक की वैचारिक जड़ता


एक विचारक की वैचारिक जड़ता

आज प्रभात खबर में बिहार के विचारक श्री सच्चिदानंद सिन्हा के अन्ना-आंदोलन से संबंधित विचार प्रकाशित हुए हैं जो पत्रकार रवीन्द्र से बातचीत पर आधारित हैं। बातचीत पर आधारित विचारों पर मुझे पूरा भरोसा नहीं होता, क्योंकि कितने विचार विचारक के हैं और कितने पत्रकार के, कहना कठिन है ! पत्रकार की दृष्टि में छनकर जब किसी के विचार आते हैं तो उनकी शुद्धता संदिग्ध रहती है। खैर, विचार विचारक के हों या पत्रकार के यह ज्यादा मूल्यवान है भी नहीं। मूल्यवान है वह विचार जो सामने आ चुका है। इसलिए मैं यहाँ उसी पर विचार कर रहा हूँ। पहले उनका विचार रखूँगा, फिर उन पर अपनी टिप्पणी।
विचार-1 ः हमारा मानना है कि अन्ना के आंदोलन का तरीका सही नहीं है, उनका उद्देश्य सही हो सकता है।

टिप्पणी ः उद्देश्य के सही होने पर भी जब आप निःसंदिग्ध नहीं हैं तो तरीके पर कहाँ से होंगे ? क्योंकि तरीका हर व्यक्ति का अपना होता है। व्यक्ति के बदलने से तरीका बदल जाता है। अन्ना अपने तरीके से काम कर रहे हैं, आपको करना होता तो अपने तरीके से करते, लेकिन इस संबंध में आपको कुछ करना तो है नहीं, सिवा आलोचना के ! आपका तरीका यही है कि स्वयं एक छोटा आंदोलन भी न करो और कोई करे तो उसकी आलोचना शुरू कर देा !
अन्ना के उद्देश्य से तो वे भी पूर्णतः सहमत हैं जिनके विरुद्ध लड़ाई चल रही है, लेकिन आप तो उद्देश्य पर भी पक्के नहीं हैं कि वह सही ही है ! हो सकता है सही हो, हो सकता है सही नहीं हो ! कुछ पक्का नहीं ! इससे मुझे अनुमान होता है कि आप चिंतक नहीं, चिंताग्रस्त व्यक्ति हैं।
विचार-2 ः इसके लिए उन्हें जन लोकपाल विधेयक को लेकर जनता के बीच जाना चाहिए।
टिप्पणी ः आप पुराने जमाने के लोग हैं, इसलिए जनता के बीच जाने का अर्थ आप शायद समझते हैं, गाँव-गाँव पैदल घूमना। तब तो 10 साल में भी यह काम पूरा नहीं होगा और अन्ना बेचारे बीच में ही टन बोल जायेंगे। सारा आंदोलन बिखर जायेगा। हम बैलगाड़ी के युग में नहीं, जेट विमान के युग में जी रहे हैं। सूचना तंत्र इतना फैल चुका है कि विश्व के किसी कोने में आंदोलन छिड़ता है तो पूरी दुनिया में खबर फैल जाती है। अन्ना जो कर रहे हैं, यही है जनता के बीच जाने का तरीका। आप नहीं देख पा रहे हैं। वे जनता के बीच अपने तरीके से जा रहे हैं। जनता का अन्ना के समर्थन में उठ खड़ा होना इस बात का सबूत है कि उन तक जन लोकपाल विधेयक पहुँच चुका है।
विचार-3 ः देश को आजाद करने के लिए कभी किसी ने भूख हड़ताल नहीं की।
टिप्पणी ः श्रीमान् , यह भूख हड़ताल देश को आजाद करने के लिए नहीं, जन लोकपाल विधेयक लागू करने के
  लिए है !
विचार-4 ः अन्ना के अकेले अनशन से संसद के निर्णय को बदल दिया जाए, यह संभव नहीं दिखता।
टिप्पणी ः अगर अन्ना अकेले लड़ते तब तो संभव नहीं था। तब तो उनको जेल में सड़ाकर मार भी दिया जाता। लेकिन आप देख रहे हैं कि जिस दिन अन्ना को जेल में डाला जाता है उसी दिन सरकार उनसे रिहा होकर बाहर आने के लिए खुशामद करने लगती है। जिस सरकार ने रामलीला मैदान या जेपी पार्क में अनशन की इजाजत नहीं दी थी, वही उनके सामने झुक चुकी है। क्या अकेले अन्ना के बल पर यह सब हो रहा है या जनता के जोर से ?
देश की साधारण जनता जिस वास्तविकता को देख रही है उसे ही आप नहीं देख पा रहे हैं ! जब आदमी आँखों पर अपने जड़ विचारों की पट्टी बाँध लेता है तो उन्हें सच नहीं दिखता। जो खुद नहीं देख पा रहे हैं वे जनता को क्या राह दिखायेंगे ? अन्ना को सलाह देने की बात पांडित्य का मिथ्याभिमान है।

मटुक नाथ चैधरी
17.08.11





































एक विचारक की वैचारिक जड़ता

आज प्रभात खबर में बिहार के विचारक श्री सच्चिदानंद सिन्हा के अन्ना-आंदोलन से संबंधित विचार प्रकाशित हुए हैं जो पत्रकार रवीन्द्र से बातचीत पर आधारित हैं। बातचीत पर आधारित विचारों पर मुझे पूरा भरोसा नहीं होता, क्योंकि कितने विचार विचारक के हैं और कितने पत्रकार के, कहना कठिन है ! पत्रकार की दृष्टि में छनकर जब किसी के विचार आते हैं तो उनकी शुद्धता संदिग्ध रहती है। खैर, विचार विचारक के हों या पत्रकार के यह ज्यादा मूल्यवान है भी नहीं। मूल्यवान है वह विचार जो सामने आ चुका है। इसलिए मैं यहाँ उसी पर विचार कर रहा हूँ। पहले उनका विचार रखूँगा, फिर उन पर अपनी टिप्पणी।
विचार-1 ः हमारा मानना है कि अन्ना के आंदोलन का तरीका सही नहीं है, उनका उद्देश्य सही हो सकता है।

टिप्पणी ः उद्देश्य के सही होने पर भी जब आप निःसंदिग्ध नहीं हैं तो तरीके पर कहाँ से होंगे ? क्योंकि तरीका हर व्यक्ति का अपना होता है। व्यक्ति के बदलने से तरीका बदल जाता है। अन्ना अपने तरीके से काम कर रहे हैं, आपको करना होता तो अपने तरीके से करते, लेकिन इस संबंध में आपको कुछ करना तो है नहीं, सिवा आलोचना के ! आपका तरीका यही है कि स्वयं एक छोटा आंदोलन भी न करो और कोई करे तो उसकी आलोचना शुरू कर देा !
अन्ना के उद्देश्य से तो वे भी पूर्णतः सहमत हैं जिनके विरुद्ध लड़ाई चल रही है, लेकिन आप तो उद्देश्य पर भी पक्के नहीं हैं कि वह सही ही है ! हो सकता है सही हो, हो सकता है सही नहीं हो ! कुछ पक्का नहीं ! इससे मुझे अनुमान होता है कि आप चिंतक नहीं, चिंताग्रस्त व्यक्ति हैं।
विचार-2 ः इसके लिए उन्हें जन लोकपाल विधेयक को लेकर जनता के बीच जाना चाहिए।
टिप्पणी ः आप पुराने जमाने के लोग हैं, इसलिए जनता के बीच जाने का अर्थ आप शायद समझते हैं, गाँव-गाँव पैदल घूमना। तब तो 10 साल में भी यह काम पूरा नहीं होगा और अन्ना बेचारे बीच में ही टन बोल जायेंगे। सारा आंदोलन बिखर जायेगा। हम बैलगाड़ी के युग में नहीं, जेट विमान के युग में जी रहे हैं। सूचना तंत्र इतना फैल चुका है कि विश्व के किसी कोने में आंदोलन छिड़ता है तो पूरी दुनिया में खबर फैल जाती है। अन्ना जो कर रहे हैं, यही है जनता के बीच जाने का तरीका। आप नहीं देख पा रहे हैं। वे जनता के बीच अपने तरीके से जा रहे हैं। जनता का अन्ना के समर्थन में उठ खड़ा होना इस बात का सबूत है कि उन तक जन लोकपाल विधेयक पहुँच चुका है।
विचार-3 ः देश को आजाद करने के लिए कभी किसी ने भूख हड़ताल नहीं की।
टिप्पणी ः श्रीमान् , यह भूख हड़ताल देश को आजाद करने के लिए नहीं, जन लोकपाल विधेयक लागू करने के
  लिए है !
विचार-4 ः अन्ना के अकेले अनशन से संसद के निर्णय को बदल दिया जाए, यह संभव नहीं दिखता।
टिप्पणी ः अगर अन्ना अकेले लड़ते तब तो संभव नहीं था। तब तो उनको जेल में सड़ाकर मार भी दिया जाता। लेकिन आप देख रहे हैं कि जिस दिन अन्ना को जेल में डाला जाता है उसी दिन सरकार उनसे रिहा होकर बाहर आने के लिए खुशामद करने लगती है। जिस सरकार ने रामलीला मैदान या जेपी पार्क में अनशन की इजाजत नहीं दी थी, वही उनके सामने झुक चुकी है। क्या अकेले अन्ना के बल पर यह सब हो रहा है या जनता के जोर से ?
देश की साधारण जनता जिस वास्तविकता को देख रही है उसे ही आप नहीं देख पा रहे हैं ! जब आदमी आँखों पर अपने जड़ विचारों की पट्टी बाँध लेता है तो उन्हें सच नहीं दिखता। जो खुद नहीं देख पा रहे हैं वे जनता को क्या राह दिखायेंगे ? अन्ना को सलाह देने की बात पांडित्य का मिथ्याभिमान है।

मटुक नाथ चैधरी
17.08.11



















एक विचारक की वैचारिक जड़ता

आज प्रभात खबर में बिहार के विचारक श्री सच्चिदानंद सिन्हा के अन्ना-आंदोलन से संबंधित विचार प्रकाशित हुए हैं जो पत्रकार रवीन्द्र से बातचीत पर आधारित हैं। बातचीत पर आधारित विचारों पर मुझे पूरा भरोसा नहीं होता, क्योंकि कितने विचार विचारक के हैं और कितने पत्रकार के, कहना कठिन है ! पत्रकार की दृष्टि में छनकर जब किसी के विचार आते हैं तो उनकी शुद्धता संदिग्ध रहती है। खैर, विचार विचारक के हों या पत्रकार के यह ज्यादा मूल्यवान है भी नहीं। मूल्यवान है वह विचार जो सामने आ चुका है। इसलिए मैं यहाँ उसी पर विचार कर रहा हूँ। पहले उनका विचार रखूँगा, फिर उन पर अपनी टिप्पणी।
विचार-1 ः हमारा मानना है कि अन्ना के आंदोलन का तरीका सही नहीं है, उनका उद्देश्य सही हो सकता है।

टिप्पणी ः उद्देश्य के सही होने पर भी जब आप निःसंदिग्ध नहीं हैं तो तरीके पर कहाँ से होंगे ? क्योंकि तरीका हर व्यक्ति का अपना होता है। व्यक्ति के बदलने से तरीका बदल जाता है। अन्ना अपने तरीके से काम कर रहे हैं, आपको करना होता तो अपने तरीके से करते, लेकिन इस संबंध में आपको कुछ करना तो है नहीं, सिवा आलोचना के ! आपका तरीका यही है कि स्वयं एक छोटा आंदोलन भी न करो और कोई करे तो उसकी आलोचना शुरू कर देा !
अन्ना के उद्देश्य से तो वे भी पूर्णतः सहमत हैं जिनके विरुद्ध लड़ाई चल रही है, लेकिन आप तो उद्देश्य पर भी पक्के नहीं हैं कि वह सही ही है ! हो सकता है सही हो, हो सकता है सही नहीं हो ! कुछ पक्का नहीं ! इससे मुझे अनुमान होता है कि आप चिंतक नहीं, चिंताग्रस्त व्यक्ति हैं।
विचार-2 ः इसके लिए उन्हें जन लोकपाल विधेयक को लेकर जनता के बीच जाना चाहिए।
टिप्पणी ः आप पुराने जमाने के लोग हैं, इसलिए जनता के बीच जाने का अर्थ आप शायद समझते हैं, गाँव-गाँव पैदल घूमना। तब तो 10 साल में भी यह काम पूरा नहीं होगा और अन्ना बेचारे बीच में ही टन बोल जायेंगे। सारा आंदोलन बिखर जायेगा। हम बैलगाड़ी के युग में नहीं, जेट विमान के युग में जी रहे हैं। सूचना तंत्र इतना फैल चुका है कि विश्व के किसी कोने में आंदोलन छिड़ता है तो पूरी दुनिया में खबर फैल जाती है। अन्ना जो कर रहे हैं, यही है जनता के बीच जाने का तरीका। आप नहीं देख पा रहे हैं। वे जनता के बीच अपने तरीके से जा रहे हैं। जनता का अन्ना के समर्थन में उठ खड़ा होना इस बात का सबूत है कि उन तक जन लोकपाल विधेयक पहुँच चुका है।
विचार-3 ः देश को आजाद करने के लिए कभी किसी ने भूख हड़ताल नहीं की।
टिप्पणी ः श्रीमान् , यह भूख हड़ताल देश को आजाद करने के लिए नहीं, जन लोकपाल विधेयक लागू करने के
  लिए है !
विचार-4 ः अन्ना के अकेले अनशन से संसद के निर्णय को बदल दिया जाए, यह संभव नहीं दिखता।
टिप्पणी ः अगर अन्ना अकेले लड़ते तब तो संभव नहीं था। तब तो उनको जेल में सड़ाकर मार भी दिया जाता। लेकिन आप देख रहे हैं कि जिस दिन अन्ना को जेल में डाला जाता है उसी दिन सरकार उनसे रिहा होकर बाहर आने के लिए खुशामद करने लगती है। जिस सरकार ने रामलीला मैदान या जेपी पार्क में अनशन की इजाजत नहीं दी थी, वही उनके सामने झुक चुकी है। क्या अकेले अन्ना के बल पर यह सब हो रहा है या जनता के जोर से ?
देश की साधारण जनता जिस वास्तविकता को देख रही है उसे ही आप नहीं देख पा रहे हैं ! जब आदमी आँखों पर अपने जड़ विचारों की पट्टी बाँध लेता है तो उन्हें सच नहीं दिखता। जो खुद नहीं देख पा रहे हैं वे जनता को क्या राह दिखायेंगे ? अन्ना को सलाह देने की बात पांडित्य का मिथ्याभिमान है।

मटुक नाथ चैधरी
17.08.11

























एक विचारक की वैचारिक जड़ता

आज प्रभात खबर में बिहार के विचारक श्री सच्चिदानंद सिन्हा के अन्ना-आंदोलन से संबंधित विचार प्रकाशित हुए हैं जो पत्रकार रवीन्द्र से बातचीत पर आधारित हैं। बातचीत पर आधारित विचारों पर मुझे पूरा भरोसा नहीं होता, क्योंकि कितने विचार विचारक के हैं और कितने पत्रकार के, कहना कठिन है ! पत्रकार की दृष्टि में छनकर जब किसी के विचार आते हैं तो उनकी शुद्धता संदिग्ध रहती है। खैर, विचार विचारक के हों या पत्रकार के यह ज्यादा मूल्यवान है भी नहीं। मूल्यवान है वह विचार जो सामने आ चुका है। इसलिए मैं यहाँ उसी पर विचार कर रहा हूँ। पहले उनका विचार रखूँगा, फिर उन पर अपनी टिप्पणी।
विचार-1 ः हमारा मानना है कि अन्ना के आंदोलन का तरीका सही नहीं है, उनका उद्देश्य सही हो सकता है।

टिप्पणी ः उद्देश्य के सही होने पर भी जब आप निःसंदिग्ध नहीं हैं तो तरीके पर कहाँ से होंगे ? क्योंकि तरीका हर व्यक्ति का अपना होता है। व्यक्ति के बदलने से तरीका बदल जाता है। अन्ना अपने तरीके से काम कर रहे हैं, आपको करना होता तो अपने तरीके से करते, लेकिन इस संबंध में आपको कुछ करना तो है नहीं, सिवा आलोचना के ! आपका तरीका यही है कि स्वयं एक छोटा आंदोलन भी न करो और कोई करे तो उसकी आलोचना शुरू कर देा !
अन्ना के उद्देश्य से तो वे भी पूर्णतः सहमत हैं जिनके विरुद्ध लड़ाई चल रही है, लेकिन आप तो उद्देश्य पर भी पक्के नहीं हैं कि वह सही ही है ! हो सकता है सही हो, हो सकता है सही नहीं हो ! कुछ पक्का नहीं ! इससे मुझे अनुमान होता है कि आप चिंतक नहीं, चिंताग्रस्त व्यक्ति हैं।
विचार-2 ः इसके लिए उन्हें जन लोकपाल विधेयक को लेकर जनता के बीच जाना चाहिए।
टिप्पणी ः आप पुराने जमाने के लोग हैं, इसलिए जनता के बीच जाने का अर्थ आप शायद समझते हैं, गाँव-गाँव पैदल घूमना। तब तो 10 साल में भी यह काम पूरा नहीं होगा और अन्ना बेचारे बीच में ही टन बोल जायेंगे। सारा आंदोलन बिखर जायेगा। हम बैलगाड़ी के युग में नहीं, जेट विमान के युग में जी रहे हैं। सूचना तंत्र इतना फैल चुका है कि विश्व के किसी कोने में आंदोलन छिड़ता है तो पूरी दुनिया में खबर फैल जाती है। अन्ना जो कर रहे हैं, यही है जनता के बीच जाने का तरीका। आप नहीं देख पा रहे हैं। वे जनता के बीच अपने तरीके से जा रहे हैं। जनता का अन्ना के समर्थन में उठ खड़ा होना इस बात का सबूत है कि उन तक जन लोकपाल विधेयक पहुँच चुका है।
विचार-3 ः देश को आजाद करने के लिए कभी किसी ने भूख हड़ताल नहीं की।
टिप्पणी ः श्रीमान् , यह भूख हड़ताल देश को आजाद करने के लिए नहीं, जन लोकपाल विधेयक लागू करने के
  लिए है !
विचार-4 ः अन्ना के अकेले अनशन से संसद के निर्णय को बदल दिया जाए, यह संभव नहीं दिखता।
टिप्पणी ः अगर अन्ना अकेले लड़ते तब तो संभव नहीं था। तब तो उनको जेल में सड़ाकर मार भी दिया जाता। लेकिन आप देख रहे हैं कि जिस दिन अन्ना को जेल में डाला जाता है उसी दिन सरकार उनसे रिहा होकर बाहर आने के लिए खुशामद करने लगती है। जिस सरकार ने रामलीला मैदान या जेपी पार्क में अनशन की इजाजत नहीं दी थी, वही उनके सामने झुक चुकी है। क्या अकेले अन्ना के बल पर यह सब हो रहा है या जनता के जोर से ?
देश की साधारण जनता जिस वास्तविकता को देख रही है उसे ही आप नहीं देख पा रहे हैं ! जब आदमी आँखों पर अपने जड़ विचारों की पट्टी बाँध लेता है तो उन्हें सच नहीं दिखता। जो खुद नहीं देख पा रहे हैं वे जनता को क्या राह दिखायेंगे ? अन्ना को सलाह देने की बात पांडित्य का मिथ्याभिमान है।

मटुक नाथ चैधरी
17.08.11





































एक विचारक की वैचारिक जड़ता

आज प्रभात खबर में बिहार के विचारक श्री सच्चिदानंद सिन्हा के अन्ना-आंदोलन से संबंधित विचार प्रकाशित हुए हैं जो पत्रकार रवीन्द्र से बातचीत पर आधारित हैं। बातचीत पर आधारित विचारों पर मुझे पूरा भरोसा नहीं होता, क्योंकि कितने विचार विचारक के हैं और कितने पत्रकार के, कहना कठिन है ! पत्रकार की दृष्टि में छनकर जब किसी के विचार आते हैं तो उनकी शुद्धता संदिग्ध रहती है। खैर, विचार विचारक के हों या पत्रकार के यह ज्यादा मूल्यवान है भी नहीं। मूल्यवान है वह विचार जो सामने आ चुका है। इसलिए मैं यहाँ उसी पर विचार कर रहा हूँ। पहले उनका विचार रखूँगा, फिर उन पर अपनी टिप्पणी।
विचार-1 ः हमारा मानना है कि अन्ना के आंदोलन का तरीका सही नहीं है, उनका उद्देश्य सही हो सकता है।

टिप्पणी ः उद्देश्य के सही होने पर भी जब आप निःसंदिग्ध नहीं हैं तो तरीके पर कहाँ से होंगे ? क्योंकि तरीका हर व्यक्ति का अपना होता है। व्यक्ति के बदलने से तरीका बदल जाता है। अन्ना अपने तरीके से काम कर रहे हैं, आपको करना होता तो अपने तरीके से करते, लेकिन इस संबंध में आपको कुछ करना तो है नहीं, सिवा आलोचना के ! आपका तरीका यही है कि स्वयं एक छोटा आंदोलन भी न करो और कोई करे तो उसकी आलोचना शुरू कर देा !
अन्ना के उद्देश्य से तो वे भी पूर्णतः सहमत हैं जिनके विरुद्ध लड़ाई चल रही है, लेकिन आप तो उद्देश्य पर भी पक्के नहीं हैं कि वह सही ही है ! हो सकता है सही हो, हो सकता है सही नहीं हो ! कुछ पक्का नहीं ! इससे मुझे अनुमान होता है कि आप चिंतक नहीं, चिंताग्रस्त व्यक्ति हैं।
विचार-2 ः इसके लिए उन्हें जन लोकपाल विधेयक को लेकर जनता के बीच जाना चाहिए।
टिप्पणी ः आप पुराने जमाने के लोग हैं, इसलिए जनता के बीच जाने का अर्थ आप शायद समझते हैं, गाँव-गाँव पैदल घूमना। तब तो 10 साल में भी यह काम पूरा नहीं होगा और अन्ना बेचारे बीच में ही टन बोल जायेंगे। सारा आंदोलन बिखर जायेगा। हम बैलगाड़ी के युग में नहीं, जेट विमान के युग में जी रहे हैं। सूचना तंत्र इतना फैल चुका है कि विश्व के किसी कोने में आंदोलन छिड़ता है तो पूरी दुनिया में खबर फैल जाती है। अन्ना जो कर रहे हैं, यही है जनता के बीच जाने का तरीका। आप नहीं देख पा रहे हैं। वे जनता के बीच अपने तरीके से जा रहे हैं। जनता का अन्ना के समर्थन में उठ खड़ा होना इस बात का सबूत है कि उन तक जन लोकपाल विधेयक पहुँच चुका है।
विचार-3 ः देश को आजाद करने के लिए कभी किसी ने भूख हड़ताल नहीं की।
टिप्पणी ः श्रीमान् , यह भूख हड़ताल देश को आजाद करने के लिए नहीं, जन लोकपाल विधेयक लागू करने के
  लिए है !
विचार-4 ः अन्ना के अकेले अनशन से संसद के निर्णय को बदल दिया जाए, यह संभव नहीं दिखता।
टिप्पणी ः अगर अन्ना अकेले लड़ते तब तो संभव नहीं था। तब तो उनको जेल में सड़ाकर मार भी दिया जाता। लेकिन आप देख रहे हैं कि जिस दिन अन्ना को जेल में डाला जाता है उसी दिन सरकार उनसे रिहा होकर बाहर आने के लिए खुशामद करने लगती है। जिस सरकार ने रामलीला मैदान या जेपी पार्क में अनशन की इजाजत नहीं दी थी, वही उनके सामने झुक चुकी है। क्या अकेले अन्ना के बल पर यह सब हो रहा है या जनता के जोर से ?
देश की साधारण जनता जिस वास्तविकता को देख रही है उसे ही आप नहीं देख पा रहे हैं ! जब आदमी आँखों पर अपने जड़ विचारों की पट्टी बाँध लेता है तो उन्हें सच नहीं दिखता। जो खुद नहीं देख पा रहे हैं वे जनता को क्या राह दिखायेंगे ? अन्ना को सलाह देने की बात पांडित्य का मिथ्याभिमान है।

मटुक नाथ चैधरी
17.08.11

















आज प्रभात खबर में बिहार के विचारक श्री सच्चिदानंद सिन्हा के अन्ना-आंदोलन से संबंधित विचार प्रकाशित हुए हैं जो पत्रकार रवीन्द्र से बातचीत पर आधारित हैं। बातचीत पर आधारित विचारों पर मुझे पूरा भरोसा नहीं होता, क्योंकि कितने विचार विचारक के हैं और कितने पत्रकार के, कहना कठिन है ! पत्रकार की दृष्टि में छनकर जब किसी के विचार आते हैं तो उनकी शुद्धता संदिग्ध रहती है। खैर, विचार विचारक के हों या पत्रकार के यह ज्यादा मूल्यवान है भी नहीं। मूल्यवान है वह विचार जो सामने आ चुका है। इसलिए मैं यहाँ उसी पर विचार कर रहा हूँ। पहले उनका विचार रखूँगा, फिर उन पर अपनी टिप्पणी।
विचार-1 ः हमारा मानना है कि अन्ना के आंदोलन का तरीका सही नहीं है, उनका उद्देश्य सही हो सकता है।


टिप्पणी ः उद्देश्य के सही होने पर भी जब आप निःसंदिग्ध नहीं हैं तो तरीके पर कहाँ से होंगे ? क्योंकि तरीका हर व्यक्ति का अपना होता है। व्यक्ति के बदलने से तरीका बदल जाता है। अन्ना अपने तरीके से काम कर रहे हैं, आपको करना होता तो अपने तरीके से करते, लेकिन इस संबंध में आपको कुछ करना तो है नहीं, सिवा आलोचना के ! आपका तरीका यही है कि स्वयं एक छोटा आंदोलन भी न करो और कोई करे तो उसकी आलोचना शुरू कर देा !
अन्ना के उद्देश्य से तो वे भी पूर्णतः सहमत हैं जिनके विरुद्ध लड़ाई चल रही है, लेकिन आप तो उद्देश्य पर भी पक्के नहीं हैं कि वह सही ही है ! हो सकता है सही हो, हो सकता है सही नहीं हो ! कुछ पक्का नहीं ! इससे मुझे अनुमान होता है कि आप चिंतक नहीं, चिंताग्रस्त व्यक्ति हैं।
विचार-2 ः इसके लिए उन्हें जन लोकपाल विधेयक को लेकर जनता के बीच जाना चाहिए।
टिप्पणी ः आप पुराने जमाने के लोग हैं, इसलिए जनता के बीच जाने का अर्थ आप शायद समझते हैं, गाँव-गाँव पैदल घूमना। तब तो 10 साल में भी यह काम पूरा नहीं होगा और अन्ना बेचारे बीच में ही टन बोल जायेंगे। सारा आंदोलन बिखर जायेगा। हम बैलगाड़ी के युग में नहीं, जेट विमान के युग में जी रहे हैं। सूचना तंत्र इतना फैल चुका है कि विश्व के किसी कोने में आंदोलन छिड़ता है तो पूरी दुनिया में खबर फैल जाती है। अन्ना जो कर रहे हैं, यही है जनता के बीच जाने का तरीका। आप नहीं देख पा रहे हैं। वे जनता के बीच अपने तरीके से जा रहे हैं। जनता का अन्ना के समर्थन में उठ खड़ा होना इस बात का सबूत है कि उन तक जन लोकपाल विधेयक पहुँच चुका है।
विचार-3 ः देश को आजाद करने के लिए कभी किसी ने भूख हड़ताल नहीं की।
टिप्पणी ः श्रीमान् , यह भूख हड़ताल देश को आजाद करने के लिए नहीं, जन लोकपाल विधेयक लागू करने के   लिए है !
विचार-4 ः अन्ना के अकेले अनशन से संसद के निर्णय को बदल दिया जाए, यह संभव नहीं दिखता।
टिप्पणी ः अगर अन्ना अकेले लड़ते तब तो संभव नहीं था। तब तो उनको जेल में सड़ाकर मार भी दिया जाता। लेकिन आप देख रहे हैं कि जिस दिन अन्ना को जेल में डाला जाता है उसी दिन सरकार उनसे रिहा होकर बाहर आने के लिए खुशामद करने लगती है। जिस सरकार ने रामलीला मैदान या जेपी पार्क में अनशन की इजाजत नहीं दी थी, वही उनके सामने झुक चुकी है। क्या अकेले अन्ना के बल पर यह सब हो रहा है या जनता के जोर से ?
देश की साधारण जनता जिस वास्तविकता को देख रही है उसे ही आप नहीं देख पा रहे हैं ! जब आदमी आँखों पर अपने जड़ विचारों की पट्टी बाँध लेता है तो उन्हें सच नहीं दिखता। जो खुद नहीं देख पा रहे हैं वे जनता को क्या राह दिखायेंगे ? अन्ना को सलाह देने की बात पांडित्य का मिथ्याभिमान है।

मटुक नाथ  17.08.11


























मंगलवार, अगस्त 16, 2011

जय भ्रष्टाचार !





अन्ना का भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन शबाब पर है। इसलिए इस आन्दोलन के विरोधी भी फेसबुक पर सक्रिय हो गये हैं और विचारों का धुआँ उगल कर लोगों को भ्रमित करना चाहते हैं। कुछ लोग इस काम को चालाकी से अंजाम दे रहे हैं और कुछ लोग भोलेपन से पेश आ रहे हैं। आज अचानक मेरी नजर कानपुर में पीटीआई के ब्यूरो चीफ जफर इरशाद की टिप्पणी पर पड़ी। उनके तर्क को देखकर मुझे लगा कि ये आदमी ईमानदार मालूम पड़ते हैं, मगर गलतफहमी के शिकार होकर अन्ना के विरोधी दिख रहे हैं। लेकिन दोपहर में जब उनकी दूसरी टिप्पणी सामने आयी तो उनका असली चेहरा प्रकट हो गया ! वे तो खुल्लमखुल्ला आंदोलनकारियों को ललकार रहे हैं ! पत्रकारों से तटस्थ दृष्टि की आशा की जाती है। लेकिन जफर साहब बिके हुए पत्रकार और एक भ्रष्ट कांग्रेेसी नेता की तरह बात कर रहे हैं। वे आंदोलन को फ्लॉप सिद्ध करते हुए आंदोलनकारियों पर व्यंग्य कर रहे हैं ! वॉल पर अंकित उनकी टिप्पणी द्रष्टव्य है-
‘‘ अरे, फेसबुक पर क्रांति का झंडा बुलंद करने वाले ईमानदार लोगो, घर में क्यों बैठे हो, सुबह नाश्ता और चाय तो पी ली। अब तो अन्ना के समर्थन पर सड़कों में निकलो... दिल्ली में कुछ हजार लोग बाहर निकले हैं, लखनऊ में एक दर्जन भी नहीं, चंडीगढ़, भोपाल, इलाहाबाद में कुछ दर्जन लोग बाहर निकले हैं। क्या सिर्फ घर में बैठकर फेसबुक पर सरकार को गालियाँ देने से ही देश भ्रष्टाचार मुक्त हो जायेगा ? वैसे यह भी ठीक है। यहाँ फेसबुक पर क्रांति की बात और है, कौन जाए वहाँ लाठियाँ खाने पुलिस की । जै अन्ना !’’
जफर साहब का क्रोध अहिंसक आंदोलनकारियों पर इतना है कि उन पर लाठी बरसाने की भी लालसा रख रहे हैं ! उन्हें लाठी खाने के लिए भेजने को उत्सुक हैं !
जफर भाई ! जब जन आंदोलन छिड़ता है तो जनता को आंदोलन के विरोधियों का सामना अनेक मोर्चाें पर करना पड़ता है। आप जैसे वैचारिक धुंध फैलाने वाले पत्रकारों की बखिया उधेरने के लिए भी कुछ आदमी चाहिए न फेसबुक पर ? सो वही समझिये। जब हजारों लाखों लोग फेसबुक से जुड़े हैं तो विचार की युद्धभूमि में इसका तब्दील होना स्वाभाविक है। आप जैसे लोगों को माकूल जवाब देने वाला भी कुछ आदमी फेसबुक पर चाहिए।
आप आंदोलनकारियों की फिकर मत कीजिए, अपनी यूपीए सरकार को बचाइये और कान खोलकर सुन लीजिए- या तो जन लोकपाल विधेयक पारित होगा या सरकार जायेगी। तीसरा कोई रास्ता नहीं है, क्योंकि अन्ना ने जनता को जगा दिया है। उसका मनोबल बढ़ा दिया है। जनता अपना सारा हिसाब-किताब चुकता करेगी। 
अब लोगों को भरमाने वाली आपकी जो पहली टिप्पणी है, उस पर विचार कर लेते हैंं.....
‘‘ मैं ईमानदार नहीं हूँ , इसलिए अन्ना के साथ नहीं हूँ । मैंने पत्रकारिता में आने से पहले अपना काम कराने के लिए कई बार घूस दी है, ट्रेन में टिकट बुक करवाने के लिए टीटी को घूस दी। पत्रकारिता में आने के बाद मैंने कई बार सरकारी अधिकारियों के यहाँ चाय पी और खाना खाया, तो मैं ईमानदार कैसे हो गया ? जिन लोगों ने आज तक किसी को एक पैसा घूस न दी हो और न ली हो, किसी के यहाँ मुफ्त खाना या चाय न पी हो वे ईमानदार लोग ही अन्ना के साथ हों, मैं तो नहीं हो सकता, क्योंकि मेरा जमीर गवारा नहीं करता।’’
चूँकि हर आदमी अपने जीवन में कभी न कभी किसी न किसी तरह का छोटा से छोटा भ्रष्टाचार भी करता ही है; इसलिए आपके अनुसार भ्रष्टाचार का विरोध करने का हक किसी को नहीं है ! भ्रष्टाचार को फलते-फूलते रहना चाहिए ! उस पर रोक लगाने के लिए कोई खड़ा न हो, क्योंकि वह इसका अधिकारी नहीं है। वाह !
आप ईमानदार नहीं हैं, इसलिए आपके लिए स्वाभाविक है कि आप न सिर्फ अन्ना के आंदोलन में शामिल न होंगे बल्कि विरोध में भी पूरी ताकत झोंक देंगे। अपना जायज काम कराने के लिए कोई भी आदमी घूस देना नहीं चाहता, लेकिन भ्रष्ट व्यवस्था ने आदमी को इतना विवश कर दिया है कि अपनी जीविका के लिए या अपरिहार्य काम के लिए उसे घूस देना ही पड़ता है। घूस देते वक्त उसकी आत्मा रोती है। उसका वश चले तो वह घूसखोर को ऐसा पटका मारे कि वह धूल चाटने लग जाय।
          आपने अपने काम कराने के लिए कई बार घूस दी है, लेकिन यह नहीं कहा कि आपके काम जायज थे या नाजायज ? अगर नाजायज थे तो आप भ्रष्ट हैं। अगर जायज थे तो क्या आप इस व्यवस्था को चलने देना चाहते हैं ? क्या इसके प्रति क्षोभ नहीं है आपके मन में ? आपने ट्रेन में वेंटिग लिस्ट में लगे लाचार यात्रियों का हक मारकर पैसे के जोर से उनकी सुविधा नहीं छीन ली ? आप इसी को ईमानदारी कह रहे हैं ? आप पत्रकार हैं। बिके हुए पत्रकारों की भ्रष्ट नेताओं और सरकारी अधिकारियों से बड़ी साँठ-गाँठ रहती है। वे उनके यहाँ चाय ही नहीं पीते, खूब मुर्गी-मसल्लम उड़ाते हैं, शराब पीते हैं, गिफ्ट लेते हैं और अनेक तरह की सुख-सुविधाएँ प्राप्त करते हैं। सरकारी अधिकारियों के यहाँ आपका खाना साधारण खाना नहीं रहा होगा। ध्यान रखिये, जो देश को खा रहे हैं, उनका खाना आपने खाया है, इसलिए आपको उनका गाना ही पड़ेगा। नमक हराम होने से बचने का सुंदर सुयोग हाथ आया है। खूब जमकर भ्रष्टाचार का साथ दीजिए। जय भ्रष्टाचार ! 

रविवार, अगस्त 14, 2011

किताब, कलम, कम्प्यूटर और कुदाल





इनमें पहला तीन मानसिक श्रम का सूचक है और दूसरा शारीरिक श्रम का। दुर्भाग्य है कि कलम के श्रमिक ने कुदाल से मुँह मोड़ लिया है और ऐसा कर अपने को श्रेष्ठ भी समझता है ! यह तो हो सकता है कि किसी के जीवन में शारीरिक श्रम की प्रधानता हो, तो किसी के जीवन में मानसिक श्रम की। लेकिन दूसरे प्रकार के श्रम से अपने को पूर्णतः काट लेने से मानव जीवन पंगु हो जाता है। जीवन को स्वस्थ सुंदर बनाने के लिए दोनों प्रकार के श्रमों के बीच संतुलन आवश्यक है। कलम चलानेवाले अगर कुछ देर के लिए कुदाल भी चलायें तो जीवन में निखार आ जाए। ठीक इसी तरह कुदालवाले कुछ काल के लिए कलम भी हाथ में उठा लें तो चमत्कार हो जाय। इस सामंजस्यपूर्ण जीवन को जो भूलता है, वह निर्वासित अनुभव करता है। कलम में अगर विचार का रस है तो कुदाल में भोजन का। एक से मन तृप्त होता है तो दूसरे से शरीर। जिसका सिर्फ एकांग तृप्त होगा, वह विकलांग और दुखी जीवन जीयेगा।
इस दुख से मुक्ति का मार्ग है दोनों श्रमों के बीच संतुलन कायम करना और किसी को भी हेय न समझना। दोनों प्रकार के श्रमिकों को समान दर्जा देना। पुराने जमाने में ऐसी भूलें ब्राह्मणों से हुई थीं। उन्होंने अपने को श्रेष्ठ समझ लिया था। आज के ब्राह्मण भी वही भूल कर रहे हैं। जिनके हाथ में कलम है वही आज का ब्राह्मण हैं। जिनके हाथ में सत्ता है, वही आज के क्षत्रिय हंै। दुर्भाग्य है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का पुराना गठजोड़ आज भी चालू है। मजदूर और छोटे किसान आज के शूद्र हैं। वे इन तीनों से पीड़ित-प्रताड़ित हैं।
लेकिन जीवन का नियम बड़ा विचित्र है। जो दूसरों के शोषण से सुखी होना चाहता है, सुख उसके लिए सदा कल्पना ही बना रहता है। सत्ताधारियों, कलमधारियों और बड़े व्यापारियों के निकट जाकर उनका जीवन देखें। किसान और मजदूरों से वे ज्यादा दुखी मालूम पड़ते हैं। कभी सुख-चैन नहीं। किसान-मजदूर के भी जीवन में तो कभी सुख के क्षण आ भी जाते हैं, लेकिन बेचारे वे तो इसके लिए सदा लालायित ही रहते हैं। शोषण की जगह पोषण शुरू करने पर जीवन का मजा है। जीवन में सबका स्वार्थ एक दूसरे से जुड़ा है। जो किसी के स्वार्थ पर आघात कर आगे निकलना चाहता है, वास्तव में वह फिसल जाता है। इसीलिए वेद हमें परस्पर सामंजस्य स्थापित कर मित्र भाव से जीने की सलाह देता है-


दृते दृँह मा मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे मित्रस्य चक्षुषा। समीक्षामहे।
( यजु. 36-18 )
‘‘हे परमात्मन् ! मेरी दृष्टि दृढ़ कीजिए जिससे सब प्राणी मुझे मित्र-दृष्टि से देखें। इसी तरह मैं भी सब प्राणियों को मित्र-दृष्टि से देखूँ और हम सब प्राणी परस्पर एक दूसरे को मित्र-दृष्टि से देखें।’’

बुधवार, जुलाई 27, 2011

मौन प्रार्थना




27 मई, 2011 को अपराह्न 5 बजे महामहिम कुलाधिपति श्री देवानन्द कुँवर ने मेरी बर्खास्तगी के विरुद्ध दायर अपील की कृपापूर्वक सुनवाई की। उस दौरान मैं उनके व्यापक ज्ञान, गहन सूझ-बूझ और प्रखर प्रतिभा से पहली बार परिचित एवं प्रभावित हुआ। आशा जगी कि सुनवाई के उपरांत आदेश लिखवाया जायेगा। दूसरे दिन फैसला फैक्स से विश्वविद्यालय को भेज दिया जायेगा और मुझे भी उचित माध्यम से सूचना मिल जायेगी। 27 की रात बड़ी मुश्किल भरी थी, क्योंकि उसके जल्द बीत जाने का इंतजार था। लेकिन न रात जा रही थी, न नींद आ रही थी। छत पर कुर्सी पर बैठे आसमान को निहारते ही रात बिता दी। 28 को फैसला नहीं आया। उस दिन शनिवार था। सोचा शायद सोमवार को आये ! सोमवार का इंतजार करने लगा। सोमावार आया और चला गया, लेकिन फैसला न आया। इसी तरह एक-एक दिन गिनते हुए 27 जुलाई को दो महीने पूरे होने जा रहे हंै। दो महीने तक प्रतीक्षारत व्यक्ति को ये दो महीने अगर दो साल जैसे लगने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं !
महामहिम का निर्णय पाने के लिए मैं 28 जुलाई, 1 बजे अपराह्न से 31 जुलाई, 1 बजे अपराह्न तक एक गोपनीय वन्य वातावरण में त्रिदिवसीय मौन प्रार्थना करने जा रहा हूँ। इस प्रार्थना के दो प्रमुख उद्देश्य हैं। इसका बाहरी उद्देश्य है कि महामहिम सुनवाई हो चुके मेरे मुकदमे पर न्यायसंगत निर्णय तत्काल देने की कृपा करें। भीतरी उद्देश्य यह है कि मुझे बेचैनी से मुक्ति मिले और शांति प्राप्त हो। मैं महामौन में उतर कर  अपनी केन्द्रीय सत्ता के निकट पहुँच सकूँ।
          इस मौन-प्रार्थना या मौन-साधना या मौन-व्रत में मन की तमाम गतिविधियों को संकल्पपूर्वक नियंत्रित करने के लिए लगातार तीन दिनों तक अथक और तनावरहित प्रयास किया जायेगा। इसलिए मन से जुड़े सारे क्रियाकलाप बंद कर दिये जायेंगे। बोलना बंद, पढ़ना बंद, लिखना बंद, सोचना बंद। लेकिन शरीर के क्रियाकलाप जारी रहेंगे, जैसे- खाना, पीना, नहाना, टहलना आदि; क्योंकि शरीर की सारी क्रियाएँ मनस शरीर से नहीं, प्राण-शरीर से संबंधित हैं और मौन-व्रत में उपयोगी हैं। टहलने के समय रास्ता देखने भर के लिए आधी आँखें खुली रहेंगी जो केवल राह पर टिकी होंगी।
            सोचने पर नियंत्रण पाने के लिए यह जरूरी है कि मेरा निवास पावन उपवन के शांत एकांत कमरे में हो, जहाँ किसी का आना-जाना न हो। उसके चारों तरफ नीरस वातावरण हो जिससे विचार को किसी तरह की उत्तेजना प्राप्त न हो। इस दौरान संसार से पूर्णतः संपर्क कटा रहेगा। कोई व्यक्ति मुझसे मिलने की कोशिश नहीं करेगा। तीन दिनों तक मेरा सारा ध्यान आती जाती सांसों का अनुभव करने पर केन्द्रित रहेगा। सांसों के प्रति सजगता साधते हुए उस महाशून्य में प्रवेश करने की कोशिश होगी, जहाँ से निर्मल प्रेम पैदा होता है और वही प्रार्थना कहलाता है।
           इस बीच अगर महामहिम का फैसला आता भी है तो कोई भी व्यक्ति मुझे इस बात की जानकारी नहीं देेगा, क्योंकि उस वक्त मुझे इस चीज का इंतजार नहीं रहेगा। मुझे हर हाल में 72 घंटे के व्रत का पालन करना है। इससे आत्मिक शुद्धि और आनन्द की प्राप्ति होगी।
         यहाँ स्पष्ट कर देना जरूरी है कि यह मौन प्रार्थना अनशन नहीं है। अनशन एक प्रकार की आत्महिंसा है। हम अपने को सतायें या दूसरों को, बात बराबर है। दोनों ही हिंसा है। आज अनशन लाचारी का हथियार बन गया है। सही उद्देश्य को लेकर सही तरीके से चलायी जाने वाली सशस्त्र क्रांति को मैं इस अनशन से बेहतर समझता हूँ।
           मेरी दृष्टि में वास्तविक अहिंसक क्रांति वह है जो जिनके विरुद्ध लड़ाई चल रही है, उनके हृदय में भी क्लेश न पहुँचाये। उनके हृदय में शांति और प्रेम पैदा करने की कोशिश करे। अहिंसक क्रांति की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह क्रांति करने वाले को आमूल बदल देती है और दूसरों को बदलने की परिस्थिति पैदा करती है। मेरा प्रयास इसी दिशा में है।
आप सबों की शुभकामनायें इस पथ पर चलने में मेरा पाथेय बनेंगी।
कार्यक्रम
28.07.11
प्रेस वार्ता

स्थल- 303, सरस्वती निवास अपार्टमेन्ट, रोड नं.-12,
   राजेन्द्रनगर, पटना-16

समय-  पूर्वाह्न 10.45 से 11.45 तक मीडियाकर्मियों से  बातचीत।
उसके बाद गोपनीय स्थान की ओर प्रस्थान और 72 घंटे के लिए मौन में प्रवेश


31.07.11

समय-  72 घंटे के बाद मौन व्रत समाप्त और उपर्युक्त स्थल पर
यानी मेरे आवास पर मीडियाकर्मियों से पुनः 4 बजे अपराह्न बातचीत। 72 घंटे के अंदर मेरे भीतर जो घटित होगा, उसे उनके बीच बाँटा जाएगा।



    व्रती

मटुक नाथ चैधरी
हिन्दी उपाचार्य (बर्खास्त)
बी. एन. कॉलेज
पटना विश्वविद्यालय
आवास- 303, सरस्वती निवास, रोड नं. 12
  राजेन्द्रनगर, पटना-16
  दिनांक- 26.07.2011, फोन- 9031227181

सोमवार, अप्रैल 11, 2011

साष्टांग मार्च



पटना उच्च न्यायालय से राजभवन
दिनांक- 14.04.11, समय- 10.30 बजेे

मित्रवर
31.07.2009 से अब तक यानी 622 दिनों से मेरी बर्खास्तगी के विरुद्ध दायर अपील राजभवन सचिवालय में सुनवाई के लिए तड़प रही है। उस पर अपना विधि सम्मत निर्णय देने में महामहिम मौन हैं। मेरे द्वारा अनेक बार की गयी प्रार्थनाओं से उनका महामौन भंग न हुआ। माननीय उच्च न्यायालय के दिनांक 24.01.11 के आदेष का भी असर नहीं हुआ। यह तो बर्खास्त करने वाले अधिकारी भी अच्छी तरह जानते हैं कि पटना विष्वविद्यालय से मेरी बर्खास्तगी गैरकानूनी है। राजभवन में मेरी बर्खास्तगी की अपील का लावारिस पड़ा रहना आष्चर्यजनक है ! अतः सुनवाई की तिथि निर्धारित करने की माँग को लेकर साष्टांग मार्च का आयोजन किया जा रहा है।
संविधान निर्माता डॉ. अम्बेदकर के प्रति अपना सम्मान जाहिर करने के लिए भी उनके जन्मदिन को ‘साष्टांग मार्च’ के लिए चुना है। 14 तारीख को 10.30 बजे हमलोग हाईकोर्ट के गेट के पास स्थित अंबेदकर की प्रतिमा के निकट इकट्ठे होंगे। मूर्ति पर माल्यार्पण के बाद 11.00 बजे मार्च आरंभ होगा।
साष्टांग मार्च का मतलब है अपने आठों अंगों को एक लय में संयोजित कर भूमि पर दंडवत लेटकर परम सत्य के प्रति अपने को अर्पित करना और इस क्रिया को बार-बार दुहराना। बहुत सारे लोग सुल्तानगंज से लेकर देवघर तक अपने आराध्य देवता की कृपा पाने के लिए साष्टांग मार्च करते हैं। छठ के अवसर पर या अनेक धार्मिक स्थलों पर पीड़ित लोग पीड़ा से मुक्ति के लिए इसी तरह से ईष्वर की आराधना करते हैं। कुछ लोग मनोकामना पूरी होने पर इस तरह की पूजा करते हैं। पटना में इसे लोग ‘कष्टी’ कहते हैं, क्योंकि यह कष्टसाध्य कर्म है। हमारी तरफ यानी भागलपुर जिले में इसे ‘डंड देना’ कहा जाता है। डंडे की तरह अपने षरीर को धरती पर लिटा देना, फिर उठ खड़ा होना, फिर लेट जाना- इस तरह षरीर से दूरी को नापते हुए मंदिर तक पहुँचना, वास्तव में यह कठिन आराधना है। मुझे लगा जब तक इस तरह की आराधना न की जायेगी, तब तक लोकतंत्र के मंदिर राजभवन के देवता षायद नहीं पिघलेंगे ।
इस दृढ़ आराधन के बाद भी अगर सुनवाई की तिथि निर्धारित कर न्याय की प्रक्रिया न चलायी गयी तो 24.04.11 से आमरण अनषन षुरू कर दिया जायेगा।
मैं अपने न्यायप्रिय और षांतिप्रिय मित्रों से निवेदन करता हूँ कि वे 14.04.11 को सैकड़ों की संख्या में उपस्थित होकर मुझे समर्थन दें। लेकिन मुझे छोड़कर षेष सभी लोग पैदल ही मार्च करें। कुछ गणमान्य वरिष्ठ नागरिक उस दिन हरी झंडी दिखाकर जत्थे को रवाना करेंगे। इस तरह न्याय पथ पर आगे बढ़ने के लिए हमें बल प्रदान करेंगे।

     निवेदक
मटुक नाथ चौधरी
303, सरस्वती निवास, राजेन्द्रनगर, रोड नं. -12, पटना-16
फोन- 9334149605, 9031227181
sahi converter na milne se kuch galtiyaan rah gayi hain. sorry.

मंगलवार, जनवरी 25, 2011

मटुक जूली का फेविकोल






सहारा चैनल इंदौर, के श्री प्रकाश हिन्दुस्तानी ने अपने फेसबुक के वॉल पर लिखा है-



मटुकनाथ और जूली का फेविकोल !

सब के जोड़ उखड़ गये,

इन दोनों के बचे हैं,

रहस्य क्या है ?

लिज हर्ले का अरुण नायर से

करिश्मा कपूर का संजय कपूर से

रणबीर कपूर का दीपिका पादुकोण से

प्रियंका चोपड़ा का हरमन बावेजा से

सोनाक्षी सिन्हा का आदित्य श्रॉफ से

सलमान का संगीता बिजलानी, ऐश्वर्या राय,

कैटरीना, सोमी अली, जरीन आदि से

सुष्मिता सेन का विक्रम भट्ट, संजय नारंग,

सबीर भाटिया, रणदीप हुड्डा, मानव मेनन,

बंटी सचदेव, वसीम अख्तर वगैरह से

अक्षय कुमार का रवीना टंडन, शिल्पा शेट्टी इत्यादि से

प्रीति जिंटा का नेस वाडिया से

कंगणा राणावत का अध्ययन सुमन से

सबके जोड़ खुल गये

. पर वाह क्या जोड़ है, मटुकनाथ और जूली का !!



प्रकाशजी फेसबुक पर हमारे मित्र हैं। लेकिन इसके पहले मार्च, 2007 में इंदौर-यात्रा के क्रम में ही हमारी मित्रता हो चुकी थी। उनके इस वक्तव्य पर फेसबुक में अनेक टिप्पणियाँ आयीं। सबने अपने-अपने मनोविकार प्रकट किये, विचार कहीं से नहीं आया। मैं सोचने लगा आखिर इसका रहस्य क्या है ? मटुक-जूली के प्रेम के टिकाऊपन का कारण ढूँढ़ने की कोशिश लोगों ने क्यों नहीं की ? अनुमान क्यों नहीं भिड़ाया ? क्या उनलोगों में विचार करने की क्षमता नहीं है ? उल्टा सीधा अनुमान भी नहीं लगा सके ! क्यों हमदोनों का नाम आते ही वे अपनी-अपनी मनोग्रंथियों में सिकुड़ गये ? यह बात तो सच है कि स्कूल-कॉलेजों में मौलिक ढंग से विचार करना नहीं सिखाया जाता। इसलिए वे विचार अगर नहीं कर पाये तो कोई आश्चर्य नहीं। विचार न सही, अगर वे प्रेम कर रहे होते तो दूसरों के प्रेम को समझने की क्षमता उनमें अपने आप आ गयी होती। बेचारे प्रेम करें भी तो कैसे, क्योंकि मुट्ठी भर प्रबुद्ध समाज को छोड़कर शेष विराट समाज तो प्रेम का अंध-शत्रु बना हुआ है ! विश्वविद्यालय इस संबंध में कपटाचार और मिथ्याचार की गिरफ्त में है। जब कहीं से भी प्रेम की रोशनी न आती हो तो स्वाभाविक है फेसबुक पर टिप्पणी के नाम पर अल्ल-बल्ल ही आयेगा।

प्रकाशजी के साथ-साथ आम आदमी की भी चाहत होती है कि प्रेम टिके। उसका आनंद इतना बड़ा है कि कौन उसे गँवाना चाहेगा ! लेकिन प्रेम का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि पकड़ने में ही वह खो जाता है। प्रेम को जितने जोर से हम मुट्ठी में बाँधना चाहते हैं, उतनी ही तेजी से वह मर जाता है। जैसे फूल को कोई मुट्ठी में पूरी ताकत से बंद कर ले तो जो दुर्दशा फूल की होगी वही दशा हमारे प्रेम की हो जाती है।



प्रेम एक फूल है। फूल को हम खिलाते नहीं, वह खिलता है। वह अपनी आंतरिक ऊर्जा और बाह्य प्रकृति के संयोग से खिलता है। हमारा प्रेम भी अपनी आंतरिक ऊर्जा की खिलावट है। दूसरा केवल सहारा बनता है। जो फूल आज खिला है, वह कल मुरझायेगा, परसों झड़ जायेगा। जीवंत प्रेम फूल की तरह एक दिन खिलता है और दूसरे दिन मुरझा जाता है। हाँ, प्लास्टिक का फूल सदा एक समान रहता है। विवाह एक प्लास्टिक का फूल है। उसमें टिकाऊपन तो है, लेकिन प्राणों की धड़कन नहीं, प्राणों को आप्लावित करने वाली भीनी खुशबू नहीं। प्रेम से हम शाश्वतता की माँग नहीं कर सकते।

प्रेम एक ही स्थिति में शाश्वत हो सकता है, जब वह हमारा स्वभाव बन जाय। जब वह दूसरों की पराश्रयता से मुक्त हो जाय। दूसरों की अधीनता से मुक्त होने का मतलब है कि अब हम इस स्थिति में नहीं हैं कि दूसरा प्रेम करेगा तो हम करेंगे, नहीं करेगा तो नहीं करेंगे। जब प्रेम हमारी प्रकृति बन जाय, तो जो भी हमारे संपर्क में आयेगा उसे हम प्रेम से नहला देंगे। इस अवस्था में स्त्री-पुरुष का भेद भी मिटने लगता है। अब तो स्त्री हो या पुरुष सभी हमारे प्रेम के पात्र होंगे। मनुष्य की तो बात ही क्या पशु-पक्षी भी हमारे प्रेम के अधिकारी होंगे। वनस्पितयों पर हमारा प्रेम बरसेगा। जिस समय कोई सामने न रहेगा, उस समय भी हम उदास नहीं होंगे, अंदर ही अंदर अपने आप में ही मुदित होंगे। जैसा गीता में कहा गया है- ‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः।’ अपने आप में ही संतुष्ट, तृप्त और आनंदित। इसी तरह का प्रेम शाश्वत होता है, लेकिन जो प्रेम लेन-देन पर आधारित होता है, आधार के खिसकने से वह भी खिसक जाता है।

जिस भूमि पर हम सभी प्रेम करते हैं उसमंे एक प्रेमी की चाहत होती है कि प्रेमिका उसकी चाहत से भरी रहे, हमेशा उसकी याद करती रहे, उसी में डूबी रहे, दूसरे की तरफ उनका ध्यान न जाय। प्रेमी के प्रति उसकी ऊष्मा कभी ठंडी न पड़े। प्रेमिका भी प्रेमी से यही चाहती है। एक ही चीज की माँग दोनों करते हैं एक-दूसरे से और देना बंद कर देते हैं। यहीं संघर्ष का बीज पड़ जाता है। अब दोनों प्रेम करने के बजाय लड़ने लगते हैं। अधिकांश लोगों का प्रेम इसी जमीन पर जनमता है और धीरे-धीरे कलह से भर कर क्रोध, हिंसा और बिलगाव में बदल जाता है।

पूर्णतः आवेश युक्त प्रेम प्रायः क्षणिक होता है, क्योंकि दिल हमेशा एक समान रूप से नहीं धड़कता। तथापि प्रेम को टिकाऊ बनाया जा सकता है। इसे टिकाऊ बनाने के लिए बौद्धिक समझदारी आवश्यक है। कुछ थोड़े से समझदार प्रेमी होते हैं जो सोचते हैं कि जिन चीजों की माँग मैं प्रेमिका से करता हूँ क्यों नहीं उसे देना शुरू करूँ। प्रेम हमेशा प्रतिध्वनित होता है। अगर किसी कारण से प्रत्युत्तर न आवे तो वह धैर्य नहीं खोता और अपनी प्रेमिका को लांछित नहीं करता। ऐसा ही प्रेमी धीरे-धीरे अपने भीतर छिपी प्रेम-संपदा से परिचित होने लगता है और ज्यों-ज्यों परिचित होता जाता है, त्यों-त्यों उसका प्रेम पराधीनता से मुक्त होता जाता है। इस अवस्था में पहुँचा हुआ प्रेमी ही अपनी प्रेमिका को हृदय से स्वतंत्रता दे सकता है। ऐसा खिला हुआ मुक्त हृदय ही असली फेविकोल है जो माँग से ज्यादा दान को महत्व देता है, जो अपनी स्वतंत्रता के साथ दूसरों की स्वतंत्रता का उतना ही ख्याल रखता है। मटुक-जूली के प्रेम में कुछ ऐसा ही फेविकोल है जिसकी मजबूती शानदार है। क्रमशः



14.01.11

रविवार, नवंबर 14, 2010

दृष्टि की बात है

जफर इरशाद भाई ने फेसबुक पर एक स्त्री का अत्यंत सुंदर फोटो लगाया है और उस फोटो की तारीफ में अमीर खुसरो की बेहतरीन और विख्यात पंक्तियाँ लगायी हैं-
अपनी छवि बनाइ के जो मैं पी के पास गयी,
जब छवि देखी पीउ की तो अपनी भूल गई।
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइ के
मोहे सुहागन कर दीनी रे मोसे नैना मिलाइ के।


मैं उस फोटो में निहित स्त्री के निर्मल और मोहक सौन्दर्य तथा खुसरो की भाव-विभोर करने वाली पंक्तियों को एक साथ देखकर मंत्र- मुग्ध हो गया। सुंदरी के शरीर को सराहूँ कि सराहूँ खुसरो की शायरी को। कभी इसे देखता हूँ , कभी उसे देखता हूँ और कभी विस्मय से उस अज्ञेय खुदा को देखता हूँ जिन्होंने इन दोनों की रचना की।
 खुदा की इन अनुपम रचनाओं में एक पर किसी बंदे ने सवाल खड़ा कर दिया है। वह बंदा और कोई नहीं प्रदीप श्रीवास्तव हैं । प्रदीप भाई आयकर विभाग, कानपुर के पूर्व प्रशासकीय पदाधिकारी हैं । अच्छे भजन एवं गजल गायक हैं । अदना आदमी इस तरह की टिप्पणी करता तो मैं उपेक्षा कर देता । लेकिन प्रतिभा-प्रदीप की उपेक्षा कैसे करूँ ! प्रदीप भाई की टिप्पणी से पता चलता है कि वे सदियों से चली आ रही गलत सिखावन से बाहर नहीं हो पाये हैं । उनके सरीखे तीक्ष्ण बुद्धि के  व्यक्ति ने भी सदियों से चली आ रही सड़ी-गली परंपरा पर प्रश्न खड़ा नहीं किया। प्रदीप भाई को लगता है कि खुसरो की पंक्तियाँ तो धार्मिक हैं लेकिन स्त्री का फोटो अधार्मिक है। इन दोनों में मेल कैसा ? उन्होंने फेसबुक पर जफर इरशाद की आलोचना करते हुए लिखा है-
‘‘जफर भाई
 आदाब
 ये बहुत पाक लाइनें (छंद ) हैं और इस फोटो के साथ....? मुझे आपसे ऐसी उम्मीद न थी।’’

उनके पत्र से प्रकट होता है कि खुसरो की शायरी तो पाक है लेकिन स्त्री का फोटो नापाक है । ‘नापाक’ शब्द का प्रयोग खुलकर नहीं हुआ है लेकिन वह स्वयंमेव ध्वनित हो रहा है।
फोटो में एक सुंदर स्त्री आईने में अपना रूप निहार रही है। उपरि वस्त्र के रूप में उसके तन पर मात्र ब्रेशियर है। उसका शारीरिक सौन्दर्य निखर उठा है । चारो तरफ सौन्दर्य की किरणें फूट रही हैं । उस चित्र को बार-बार देखकर भी मन नहीं अघाता।
पाखंडी दुनिया उस चित्र को अश्लील कहती आ रही है, नापाक कहती  आ रही है , गंदा और घिनौना कहती आ रही है और प्रदीप भाई ने भी वही कह दिया !
मैं जानना चाहता हूँ कि उस चित्र में क्या खराबी है ? कैसे नापाक और अपावन है वह ?‘शायद कोई कहे कि उस चित्र को देखकर कामोत्तेजना फैलती है, इसलिए वह अपावन है । तो क्या काम अपावन है? तब तो दुनिया में एक भी पावन आदमी खोजना कठिन होगा । दूसरी बात, काम अगर अपावन है तो जिसके पास काम होगा वही अपावन होगा न ? मैं इस बात से सहमत हूँ कि जिस पुरुष की काम-भावना उस फोटो को देखकर भड़क उठती है, वह अवश्य ही अपावन है क्योंकि उस चित्र में और उसके प्रस्तुतीकरण में कहीं भी सेक्स का प्रदर्शन नहीं है, किसी को आकृष्ट करने की कोई चेष्टा नहीं है । फिर भी अगर उसे देखकर किसी का सेक्स प्रज्वलित हो उठे तो इसका एक ही मतलब है कि उनका सेक्स दमित है । दमित सेक्स ही अश्लील रूप में प्रकट होता है। दमित व्यक्ति का सेक्स तो कपड़ों में पूर्णतः लिपटी नारी को देखकर भी भड़क उठेगा । अगर किसी का सेक्स उस चित्र को देखकर भड़कता है तो इसकी सारी जिम्मेदारी उस व्यक्ति पर है न कि फोटो पर । भला फोटो देखने पर जिस पुरुष का हाल बेहाल हो जाता हो , साक्षात् ऐसी स्त्री देख लेगा तो उसका क्या होगा ?
अब एक दूसरी दृष्टि से भी प्रदीप भाई की टिप्पणी पर विचार करते हैं । मान लेते हैं कि यह फोटो काम भड़काऊ नहीं है, लेकिन है तो एक साधारण स्त्री का ही फोटो और उसके साथ खुसरो की उच्चतम भक्तिमय पंक्तियों को सटा देना कहाँ तक उचित है ? यह तो दृष्टि की बात है। किसी को खास खास जगह ही भगवान दिखता है और किसी को सारा जग ही सीयाराममय दिखाई पड़ता है । मैंने मंदिर के सामने माथा झुकाते हुए अनगिनत लोगों को देखा है लेकिन हरे-भरे पेडों़ को प्रणाम करते किसी को नहीं देखा। अगर मुझे झुकना हो तो पहले मैं हरे-भरे पेड़ों के सामने झुकूँगा क्योंकि मंदिर की मृत प्रस्तर प्रतिमा से ज्यादा भगवान उन पेड़ांे में है जो जिंदा हैं और असंख्य प्राणियों को जिंदा रखने में सहायक हंै। यह तो इरशाद भाई की निर्मल दृष्टि का कमाल है कि उन्होंने उस स्त्री के सौन्दर्य में कुछ दिव्यता देखी जिसे देखने में प्रदीप भाई चूक गये।    गीता में कृष्ण कहते हैं - ‘‘ जो कुछ भी गौरव, चारुता और सौन्दर्य से युक्त है , उसे मेरे ही तेज के अंश से उत्पन्न समझो।’’ उस स्त्री के सौन्दर्य में मैं तो ईश्वर का ही अंश देखता हूं।
अब मैं इस फोटो के साथ इरशाद भाई की टिप्पणी पर विचार कर अपनी बात का अंत करूँगा । निश्चय ही खुसरो की पंक्तियों के सौन्दर्य को दिखाने के लिए वह चित्र सटीक नहीं है, लेकिन उस चित्र को देखकर खुसरो की पंक्तियाँ याद आ सकती हैं । खुसरो की पंक्तियों का भाव है-
माशूका कहती है कि मैं बन-ठनकर आशिक के पास गयी । लेकिन आशिक की छवि देखी तो अपनी भूल गयी । आशिक से नजर मिलते ही माशूका का सारा बनाव-शृंगार मिट गया। बात ही बदल गयी। तात्पर्य यह है कि प्रभु के पास कृत्रिम होकर नहीं जाया जा सकता। उनके पास अहंकार लेकर नहीं जाया जा सकता। अहंकार मनुष्य का बनावटी रूप है। जब प्रभु मिलते हैं तो सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन यही होता है कि मनुष्य का अहं समाप्त हो जाता है और उसका वास्तविक रूप सामने आ जाता है। ‘छाप-तिलक’ आदि कृत्रिम प्रसाधन उसी अहंकार की सजावट हैं। परमात्मा को पाया हुआ आदमी सहज, सरल और स्वाभाविक हो जाता है। उस स्त्री के सौन्दर्य में वही सहजता, सरलता और स्वाभाविकता है । आप फोटो को देखें तो एक भी प्रसाधन उनके तन पर नहीं है। न माथे पर बिन्दी है, न गले में हार है, न कान में कर्णफूल है और न नाक में नकबेसर ।‘शरीर के किसी भी अंग में कोई जेवर नहीं है। वह कहीं से रूपगर्विता भी नहीं मालूम पड़ती। इसलिए स्वाभाविक है कि उसके नैसर्गिक सौन्दर्य को देखकर खुसरो की पाक पंक्तियाँ याद आ जायें।
लेकिन दुनिया रंग-रंगीली है। एक आदमी ऐसे भी हैं जिन्हंे उस फोटो को देखकर खुसरो से बिल्कुल भिन्न पंक्तियाँ याद आती हैं। अमित हर्ष की टिप्पणी द्रष्टव्य है-
आईना भी उन पर शैदा हो गया
                   एक दुश्मन और पैदा हो गया

शाय
र कह रहा है कि इस सौन्दर्य को देखने का हक केवल मुझे है। अगर दूसरा देखता है और प्रभावित होता है तो वह मेरा दुश्मन है। यह है सौन्दर्य पर कब्जा ! सौन्दर्य पर कब्जा करने वाला हिंसा को जन्म देता है और आज समाज उसकी आग में झुलस रहा है। मानव का इतिहास इसी प्रकार के दूषित सौन्दर्य बोध से ग्रसित है।
इरशाद की दृष्टि हमें ऊपर उठाती है जबकि अमित हर्र्ष की दृष्टि हमें नीचे ही बने रहने को छोड़ देती है। कब्जा सौन्दर्य का शत्रु है क्योंकि ज्योंही कोई चीज कब्जे में आती है त्योंही उसका सौन्दर्य खत्म हो जाता है । स्त्री इतनी सुंदर इसलिए लग रही है क्योंकि वह मेरी नहीं है। ‘मेरी’ होते ही वह साधारण हो जाती है। अगर अपावन कहना ही हो तो मैं अमित हर्ष की पंक्तियों को कहूँगा क्योंकि उनका जन्म ईष्र्या की कोख से हुआ है।


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शनिवार, सितंबर 04, 2010

वोटकटवा


            क्या हमने कभी विचार किया है किवोटकटवाषब्द तानाषाही मनोवृत्ति की उपज है ? वोटकटवा का अर्थ हैवोट काटने वाला जो वोट किसी बड़ी पार्टी या बड़े राजनेता को मिलने वाले थे, अब वे किसी अन्य उम्मीदवार के खड़े होने से उन्हें नहीं मिल पायेंगे। जीत के प्रबल दावेदारों के सामने हार का खतरा मँडराने लगता है। इसलिए उसे बैठाने के लिए तरह-तरह की साजिषंे रची जाती हैं। कभी उसे भय दिखाया जाता है, कभी उसे लुभाया जाता है। अगर भय और लोभ से रहित कोई जीवट का उम्मीदवार गया तो सरकारी तंत्र का दुरुपयोग कर उसका नामांकन ही रद्द कर दिया जाता है। अगर उसे बैठाने की सारी चालें विफल हो जायँ तो फिर उसे वोटकटवा कहकर उसका वोट हड़पने की कोषिष की जाती है।
            राजनेता अच्छी तरह जानते हैं कि लोगों का वोट उन्हें इसलिए मिलता है कि कोई पसंद का उम्मीदवार जनता के सामने नहीं होता है। ज्योंही जनता के निकट का कोई उम्मीदवार खड़ा होता है त्योंही वोट के लुटेरे राजनेता हायतौबा मचाने लगते हैं कि अब तो मेरी जागीर गयी। ऐसे ही लोग उन्हें वोटकटवा कहते हैं। दरअसल वे यही कहते हैं कि उन्हें छोड़कर किसी दूसरे को वोट पाने का अधिकार नहीं है। उनकी कोषिष होती है कि चाहे जैसे हो जनता को इस तरह मजबूर कर दिया जाय कि उसे छोड़कर किसी अन्य को वोट देने का विकल्प उसके सामने नहीं रह जाय। इससे कुछ विवष लोग अगर खीझेंगे तो ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि वे किसी को वोट नहीं देंगे। उनके वोट नहीं देने से क्या होता है ? क्या उनकी पसंद का कोई उम्मीदवार खड़ा हो जायेगा ? या जो चंद लोग खड़े हैं  उन्हीं में से कोई जीतेगा ?
            यह कैसा लोकतंत्र है जिसमेंलोकतो गुलाम हैं औरतंत्रआजाद ? जिसमेंलोकमुरझा रहा है ओर तंत्र फल-फूल रहा है ? इस तंत्र की जड़ें काटनी होंगी नया तंत्र लाना होगा। वर्तमान चुनाव-प्रणाली बदलनी होगी जिसमें जनता के मनचाहे उम्मीदवार के खड़े होने की सारी संभावना खत्म हो चुकी है। एक ऐसी चुनाव प्रणाली की कल्पना करनी होगी जिसमें ऊपर से थोपे गये उम्मीदवारों के खड़े होने की सारी संभावनायें समाप्त हो जायँ। जनता के बीच से नेता पैदा हो। जनता के हित में उनकी इच्छा से वह काम करे। अगर चुने जाने पर वह मतवाला हो जाय तो उसकी लगाम जनता के पास हो। जनता जब चाहे बड़ी बहुमत से उसे आसानी से वापस बुला ले। 5 सालों तक किसी को लूटने का मौका देना अपने को बदहाल बनाये रखने के सिवा और कुछ नहीं है।
            लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली का मतलब है कि जो चाहे चुनाव लड़ सके और जनता जिसे चाहे वोट दे सके। वर्तमान चुनाव प्रणाली इसकी इजाजत नहीं देती। मान लीजिए किसी विधान सभा से एक हजार लोग चुनाव लड़ना चाहें तो वर्तमान प्रणाली में वे कैसे लड़ पायेंगे ? इसलिए यह पष्चिमी प्रणाली बदलनी चाहिए कहने के लिए लोकतंत्र है लेकिन वास्तव में यह आधुनिक राजतंत्र की जननी है। इस प्रणाली में राजनीति पर चंद घरानों का कब्जा है। ये घराने ही दूसरे छोटे-छोटे उम्मीदवारों को वोटकटवा कहते हैं और हर तरह से उन्हें लड़ने से रोकते हैं।
             कभी-कभी एक ही परिवार से, एक ही गाँव से और एक ही समाज से एक से अधिक उम्मीदवार खड़े हो जाते हैं। इस परिस्थिति में क्या कोई किसी का वोट काटता है ? नहीं, कोई किसी का वोट नहीं काटता है। सभी अपने ही किये कर्मों का फल वोट के रूप में पाते हैं। इस सूरत में अगर कोई किसी को वोटकटवा कहता है तो वह तानाषाह है, क्योंकि वह दूसरे का वोट भी स्वयं गबन करना चाहता है। आज की राजनीति इसी मनोवृत्ति की है और इस राजनीति को जीवन मिलता है वर्तमान चुनाव-प्रणाली से जो अत्यंत दोषपूर्ण है। इसलिए जितने वोटकटवा हैं उन्हें मिल-जुलकर एक नये राजनीतिक दल की परिकल्पना करनी चाहिए लेकिन खेद है वोटकटवाओं में से अधिकांष देष-प्रेम की ऊँची भावना से नहीं, तुच्छ लालच में पड़कर खड़े होते हैं और उसकी पूर्ति होने पर मैदान से भाग खड़े होते हैं
             वोटकटवा के कई अर्थ हैं। उम्मीदवार किस मकसद से चुनाव के मैदान में उतरा है इस पर उसका अर्थ निर्भर करता है। कभी वह धन के लालच में खड़ा होता है और किसी से पैसा लेकर बैठ जाता है या उसका समर्थन करने लगता है। ऐसे लालची उम्मीदवारों को सबक सिखाना चाहिए। कभी कोई राजनीतिक दल फर्जी उम्मीदवार खड़ा कर देता है। इसकी पहचान कर उसे सजा देने का प्रबंध होना चाहिए। कभी किसी को टिकट नहीं मिला तो वह बगावत कर देता है और अपनी ही पार्टी के टिकट पाने में सफल उम्मीदवार को हराने में लग जाता है। ये सारी घटनायंे वर्तमान दोषपूर्ण चुनाव-प्रणाली के कारण ही घटती हैं जहाँ एक अनार और सौ बीमार हैं। अगर सौ बीमार हैं तो सौ अनार होने चाहिए। ऐसी सुंदरतम चुनाव प्रणाली की कल्पना की जा सकती है। मैंने की है। बस उसका प्रयोग करने की जरूरत है उस चुनाव प्रणाली का जिक्र मैंने अपने घोषणा -पत्र में किया था जिसका संकलनमटुक-जूली की डायरीनामक पुस्तक में किया गया है।
            अगर देष की दषा पूरी तरह बदलनी है तो भारतीय लोकतंत्र को ऐसी चुनाव-प्रणाली चाहिए जिसमें कोई वोट का लुटेरा हो, कोई तानाषाह और कोई वोटकटवा हो। जहाँ सारे इच्छुक उम्मीदवारों को अपना हक मिल सके और जनता को मनोवांछित प्रतिनिधि। 


                 krutidev010   font   ka  badhiya  converter  nahi mil pa raha.  isliye  bhasa  ashudhh  ho gayi  hai.  sudhi  pathak maaf  karenge

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