‘‘ मेरे समेत तमाम महिलाओं के होठों पर एक सवाल खौल रहा है.... कि ये कौन बोल रहा है उनकी जुबान से ?’’
जग जानता है, आप भी जानती हैं देवि कि वो मुजरिम मटुक नाथ चैधरी है. वही जूली की जुबान से बोलता है और मटुक की जुबान से जूली बोलती है. इसलिए मुजरिम हाजिर है मुहब्बत की सजा पाने को.
लेकिन मूल्यवान सवाल यह नहीं है कि किसके भीतर से कौन बोल रहा है. मूल्यवान तो यह है कि बोल क्या रहा है. मूल्यवान यह नहीं कि कृष्ण गीता बोले थे या नहीं; कौन जानता है ? कोई प्रमाण नहीं है. कृष्ण की जुबान से गीता निकली है या व्यास की जुबान से कौन जानता है ? व्यास कोई व्यक्ति है या कोई पद है कहना कठिन है. व्यास एक है या अनेक कौन जानता है ? अंधों के लिए यह पता करना जरूरी है कि कौन बोल रहा है, आँख वाला तो देखेगा कि क्या बोल रहा है! अंधा नाम जानकर प्रतिक्रिया देता है, क्योंकि उसके पास कथ्य की पहचान नहीं होती. अगर कोई बात कृष्ण ने कही तो ठीक, ओशो ने कही तो गलत ! गाँधी ने कही तो ठीक, मटुक ने कही तो गलत ! मीरा ने कही तो ठीक, जूली ने कही तो गलत !
हमारे ब्लाॅग पर जूली का एक लेख प्रकाशित हुआ- ‘ महिला संगठन का औचित्य’. जूली ने यह लेख अप्रैल, 2007 में इंदौर यात्रा के समय तब लिखा था, जब वहाँ की एक महिला संगठन की नेताइन ने जूली और मेरे विरोध में सर पर आसमान उठा रखा था. इंदौर के नागरिकों ने उसे एक ‘असामान्य औरत’ बताया था. हम सुनकर मुस्कुराये थे, क्योंकि इधर हमलोग भी तो असामान्य ही थे! दो असामान्य एक शहर में नहीं रह सकते ! उक्त महिला का जब यथार्थ जाना कि शहर में क्या-क्या उपद्रव वो करती रहती हैं, तो मैंने जूली से कहा उस पर तुम्हारा लिखना ही उचित होगा. जैसे पुरुष को पुरुष ही ढंग से पीट सकता है, वैसे ही स्त्री की पिटाई स्त्री से ही हो तो उचित है. जूली ने कहा कि किसी को पीटने की जरूरत नहीं है. सिर्फ सच लिख देना है, इसी में झूठ पिट जाता है. संतुलित विचार रख देना है, इसी में असंतुलित विचलित हो जाता है. स्त्रियोचित विचार रख देने से मर्दनुमा औरतें बौखला जाती हैं. ऐसी स्त्रियाँ खुद अपने को इतना सताती हैं कि अलग से उन्हें सताने की जरूरत नहीं. इसलिए मैं जो भी लिखूँगी, सच-सच लिखूँगी. न नारी की ओर से, न पुरुष की ओर से. बल्कि दोनों की ओर से, प्रकृति की ओर से.
और वास्तव में जूली ने ऐसा ही लेख लिखा. उसका लेख स्त्री और पुरुष के प्रेम को बढ़ाने वाला है. दोनों को अपनी-अपनी गलतियों से सावधान करने वाला है. इस लेख को वहाँ की पत्रिका ‘धर्मयुद्ध’ ने छापा था. इस लेख में निहित विचार हम दोनों के हैं. ऐसा नहीं है कि किसी की जुबान से कोई बोल रहा है. हम दोनों समवेत रूप से बोल रहे हैं, क्योंकि हम दोनों कहने के लिए भिन्न हैं, भिन्न हैं नहीं. मटुक और जूली एक ही जल की दो तरंगें हैं-
गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न
ऐसा कई बार होता है कि किसी विषय पर हम दोनों अलग-अलग लिखते हैं और मिलाकर देखते हैं तो पाते हैं कि दोनों ने एक ही बात लिखी है. अब एक ही लेख को दो बार क्यों छापें ? हाँ, कभी-कभी किसी विन्दु पर मतभेद भी होते हैं. वह मतभेद बड़ा मूल्यवान होता है, क्योंकि उस पर हम दोनों फिर से विचार करते हैं और विचार के बाद सहमति आती है. इस विचार में कभी जूली की समझ का विकास होता है, तो कभी मेरी समझ का. इसलिए मतभेद मूल्यवान होते हैं, लेकिन उन मतभेदों पर ठंडे दिल से विचार न हो तो वही लड़ाई के कारण भी बन सकते हैं. प्रेमी ठंडे दिल से विचार करते हैं और घृणावादी गरम दिमाग से. एक नारीवादी नारी ने खौलते दिमाग से इस लेख पर विचार किया है- ‘‘मेरे समेत तमाम महिलाओं के होठों पर एक सवाल खौल रहा है... कि ये कौन बोल रहा है उनकी जुबान से.’’
मुझे तो वे होंठ बड़े प्यारे लगते हैं जो चुंबन की चाहत में खौलते हैं और वे मस्तिष्क अच्छे लगते हैं जिसमें मौलिक विचार खौलते हैं.
ढाई साल पहले लिखा यह लेख ब्लाॅग पर डाल दिया गया. पता चला कि राष्ट्रीय सहारा ने ब्लाॅग से उठा कर 4 नवंबर को उसे छापा. अखबार इतनी नैतिकता का ख्याल भी नहीं कर रहा है जिसकी सामग्री है, छापने से पहले उसकी अनुमति ले ले. अगर अनुमति न भी ले सके तो कम से कम लेखिका को सूचित कर दे. अगर सूचित न कर सके तो उस लेख को ठीक से पढ़ ले, समझ ले, तब जाकर उस पर बहस चलवाये. लेकिन राष्ट्रीय सहारा की ‘आधी दुनिया’ की संपादिका ने नैतिकता की सारी हदों को पार करते हुए जूली के नाम से उस शब्द को बहस के केन्द्र में रखा जिसका प्रयोग जूली ने किया ही नहीं है ! मैं ‘आधी दुनिया’ फीचर की संपादिका से पूछना चाहता हूँ कि ‘याचक’ शब्द जूली के हैं या गीताश्री के ? जूली ने अपने लेख ‘महिला> संगठन का औचित्य’ में कहीं भी स्त्री के लिए ‘याचक’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है. जूली एक समझदार और जिम्मेदार स्त्री है, वह सोच-समझ कर लिखती है. उसका एक-एक वाक्य सुविचारित और संतुलित होता है. वह अखबार और पत्रिकाओं में लिखने वाली कुछ विक्षिप्त महिलावादियों की तरह उन्माद में नहीं लिखती है.
क्रमशः
नोटः- जूली का लेख ‘महिला संगठन का औचित्य’ इसी ब्लाॅग पर पढ़ें और उसकी प्रतिक्रिया में लिखा गया गीताश्री का लेख पढ़ने के लिए इस लेख के शीर्षक पर क्लिक करें.
Wednesday, November 18, 2009
Monday, November 09, 2009
कुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया पर पुनर्विचार
किसी भी पद के लिए किसी व्यक्ति की नियुक्ति होती है तो उसकी एक प्रक्रिया बनायी जाती है. प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे यह स्पष्ट रूप से जाँच हो सके कि जिस काम के लिए कोई व्यक्ति चुना जा रहा है, वह उस काम के लिए उपलब्ध व्यक्तियों में सर्वाधिक उपयुक्त और फिट है . हमारे देश का दुर्भाग्य है कि किसी पद के लिए जिस प्रकार की योग्यता चाहिए उसके अनुरूप परीक्षण प्रक्रिया नहीं है. जैसे अगर किसी शिक्षक को बहाल करना है तो यह देखना चाहिए कि उन्हें पढ़ाने आता है या नहीं; यह देखना चाहिए कि उन्हें शिक्षा कर्म से गहरा लगाव है या केवल बेरोजगारी दूर कने के लिए इस पेशे में आना चाहता है? उसके पास जरूरत भर ज्ञान है या नहीं इत्यादि. लेकिन वर्तमान शिक्षक बहाली प्रक्रिया का इन चीजों से कुछ लेना देना नहीं है. यही हाल लगभग सभी प्रकार की नियुक्ति प्रक्रियाओं का है.
बिहार के कुछ विश्वविद्यालयों में कुलपतियों और प्रतिकुलपतियों की नियुक्ति होने वाली है. इसलिए सरकार को सजग करने के ख्याल से ‘हिन्दुस्तान’ में संजयजी की रपट छपी है. उनका कहना है कि कुलपतियों की नियुक्ति में सुविधा के लिए पूर्व कुलाधिपति आर. एस. गवई. ने जो सर्च कमिटी बनायी थी उसमें विवादास्पद लोग थे, परिणामतः ऐसे लोग नियुक्त हुए जिनमें बहुतों के दामन में दाग लग गये. उन कुलपतियों के कार्यकाल में प्राचार्य और कर्मचारियों की नियुक्ति विवादास्पद रही. पटना विश्वविद्यालय में बीएड नामांकन घोटाला हुआ. पिछले छह महीनों से विश्वविद्यालय छात्रान्दोलन के कारण अशांत है, इत्यादि.
हे संजय, पत्रकार होने के नाते सरकार को सावधान करना आपका दायित्व है. आपने ठीक लिखा है. लेकिन जितने भी घोटाले आपने गिनाये हैं , वह ‘रघुकुल रीति’ है जो सदा से चली आ रही है. सरकार अपनी चाल में ही चलेगी. वह सदा से चली आ रही रीति का ही पालन करेगी.
कानून कहता है कि राज्यपाल सरकार की सलाह से कुलपति नियुक्त करेंगे. यानी राजनीति का शिक्षा में सीधा हस्तक्षेप रहेगा ! मूल सवाल यह है कि न्यायपालिका की तरह शिक्षा की स्वतंत्र सत्ता होनी चाहिए या उसे राजनीतिज्ञों के अधीन काम करना चाहिए ? असली समस्या यहाँ यही है. अगर राजनीति के अधीन शिक्षा व्यवस्था होगी तो लिखने वाले हजार पृष्ठ लिखें उससे क्या फर्क पड़ता है. जैसा चल रहा है, वैसा बेखटके चलता रहेगा ! अभी शिक्षा का राजनेताओं के द्वारा अपने हित में इस्तेमाल करने वाला कानून विद्यमान है. इसलिए सवालिया निशान कानून पर लगना चाहिए. सर्च कमिटी वफादारों का सर्च करने के लिए बनी है, विख्यात विद्वानांें, शिक्षाविदों और पढ़ाई-लिखाई में गहन रुचि रखने वालों की खोज के लिए नहीं !
वर्तमान कानून के रहते हुए भी शिक्षा में क्रांति हो सकती है, अगर उसका अनुपालन दृढ़ इच्छाशक्ति, विवेक और सद्भाव के साथ किया जाय. थोड़ी देर के लिए मैं अपने को कुलाधिपति मान लेता हूँ. मुझे कुलपति नियुक्त करने हैं. मैं कैसे करूँगा ? मैं आवेदन आमंत्रित करने के लिए एक निश्चित योग्यता निर्धारित करूँगा. विश्वविद्यालय के वे रीडर और प्रोफेसर आवेदन कर सकते हैं जिनका शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान हो. देश के ऐसे चिंतक-विचारक, कवि-कलाकार, साहित्यकार, संत, वैज्ञानिक आदि आवेदन कर सकते हैं जिन्हें शिक्षा का सुंदर माहौल बनाने में गहरी दिलचस्पी हो और वह कला आती हो. संबंधित योग्यता को प्रदर्शित करने के लिए वे अपनी लिखित योजनाएँ जमा करेंगे. उसमें यह साफ-साफ लिखा रहेगा कि वे विश्वविद्यालय में क्या-क्या काम करेंगे और कैसे करेंगे. उन्हें क्रमशः एक महीना, छह महीने और तीन वर्ष की कार्य-योजनाएँ प्रस्तुत करनी पड़ेंगी. उन्हीं के आधार पर उन्हें साक्षात्कार के लिए बुलाया जायेगा. साक्षात्कार के बाद चुनिंदा व्यक्तियों को अगले परीक्षण हेतु एक महीना के लिए कार्यभार सौंपा जायेगा. उन कार्यों के ठीक-ठीक अनुपालन के बाद उन्हें छह महीने का कार्यकाल दिया जायेगा. अगला छह महीना भी योजनानुसार संतोषजनक कार्य करने के बाद उन्हें तीन वर्ष का समय उनकी योजना के आधार पर दिया जायेगा. हर पल वे कसौटी पर रहेंगे. अपनी योजना को पूरा करने में असफल होने पर उन्हें वापस बुला लिया जायेगा.
यह सबकुछ मुझ पर निर्भर होगा. मैं ही उसके लिए जिम्मेदार होऊँगा. अगर वास्तव में शिक्षा में क्रांति लाना मेरा उद्देश्य है तो वह लायी जा सकेगी, अगर सुधार लाना उद्देश्य है तो सुधार होगा. लेकिन अगर मेरा उद्देश्य पैसा कमाना, अपने आदमियों को विश्वविद्यालय में भरना और अपना काम निकालना होगा तो इस दृष्टि से मैं अपने कुछ धूर्त और चालाक शिष्यों को सर्च कमिटी में रख दूँगा और कहूँगा- पट्ठे, उचित व्यक्ति की खोज करो. मेरे मनोभाव तुम्हारे सामने स्पष्ट हैं.
बिहार के कुछ विश्वविद्यालयों में कुलपतियों और प्रतिकुलपतियों की नियुक्ति होने वाली है. इसलिए सरकार को सजग करने के ख्याल से ‘हिन्दुस्तान’ में संजयजी की रपट छपी है. उनका कहना है कि कुलपतियों की नियुक्ति में सुविधा के लिए पूर्व कुलाधिपति आर. एस. गवई. ने जो सर्च कमिटी बनायी थी उसमें विवादास्पद लोग थे, परिणामतः ऐसे लोग नियुक्त हुए जिनमें बहुतों के दामन में दाग लग गये. उन कुलपतियों के कार्यकाल में प्राचार्य और कर्मचारियों की नियुक्ति विवादास्पद रही. पटना विश्वविद्यालय में बीएड नामांकन घोटाला हुआ. पिछले छह महीनों से विश्वविद्यालय छात्रान्दोलन के कारण अशांत है, इत्यादि.
हे संजय, पत्रकार होने के नाते सरकार को सावधान करना आपका दायित्व है. आपने ठीक लिखा है. लेकिन जितने भी घोटाले आपने गिनाये हैं , वह ‘रघुकुल रीति’ है जो सदा से चली आ रही है. सरकार अपनी चाल में ही चलेगी. वह सदा से चली आ रही रीति का ही पालन करेगी.
कानून कहता है कि राज्यपाल सरकार की सलाह से कुलपति नियुक्त करेंगे. यानी राजनीति का शिक्षा में सीधा हस्तक्षेप रहेगा ! मूल सवाल यह है कि न्यायपालिका की तरह शिक्षा की स्वतंत्र सत्ता होनी चाहिए या उसे राजनीतिज्ञों के अधीन काम करना चाहिए ? असली समस्या यहाँ यही है. अगर राजनीति के अधीन शिक्षा व्यवस्था होगी तो लिखने वाले हजार पृष्ठ लिखें उससे क्या फर्क पड़ता है. जैसा चल रहा है, वैसा बेखटके चलता रहेगा ! अभी शिक्षा का राजनेताओं के द्वारा अपने हित में इस्तेमाल करने वाला कानून विद्यमान है. इसलिए सवालिया निशान कानून पर लगना चाहिए. सर्च कमिटी वफादारों का सर्च करने के लिए बनी है, विख्यात विद्वानांें, शिक्षाविदों और पढ़ाई-लिखाई में गहन रुचि रखने वालों की खोज के लिए नहीं !
वर्तमान कानून के रहते हुए भी शिक्षा में क्रांति हो सकती है, अगर उसका अनुपालन दृढ़ इच्छाशक्ति, विवेक और सद्भाव के साथ किया जाय. थोड़ी देर के लिए मैं अपने को कुलाधिपति मान लेता हूँ. मुझे कुलपति नियुक्त करने हैं. मैं कैसे करूँगा ? मैं आवेदन आमंत्रित करने के लिए एक निश्चित योग्यता निर्धारित करूँगा. विश्वविद्यालय के वे रीडर और प्रोफेसर आवेदन कर सकते हैं जिनका शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान हो. देश के ऐसे चिंतक-विचारक, कवि-कलाकार, साहित्यकार, संत, वैज्ञानिक आदि आवेदन कर सकते हैं जिन्हें शिक्षा का सुंदर माहौल बनाने में गहरी दिलचस्पी हो और वह कला आती हो. संबंधित योग्यता को प्रदर्शित करने के लिए वे अपनी लिखित योजनाएँ जमा करेंगे. उसमें यह साफ-साफ लिखा रहेगा कि वे विश्वविद्यालय में क्या-क्या काम करेंगे और कैसे करेंगे. उन्हें क्रमशः एक महीना, छह महीने और तीन वर्ष की कार्य-योजनाएँ प्रस्तुत करनी पड़ेंगी. उन्हीं के आधार पर उन्हें साक्षात्कार के लिए बुलाया जायेगा. साक्षात्कार के बाद चुनिंदा व्यक्तियों को अगले परीक्षण हेतु एक महीना के लिए कार्यभार सौंपा जायेगा. उन कार्यों के ठीक-ठीक अनुपालन के बाद उन्हें छह महीने का कार्यकाल दिया जायेगा. अगला छह महीना भी योजनानुसार संतोषजनक कार्य करने के बाद उन्हें तीन वर्ष का समय उनकी योजना के आधार पर दिया जायेगा. हर पल वे कसौटी पर रहेंगे. अपनी योजना को पूरा करने में असफल होने पर उन्हें वापस बुला लिया जायेगा.
यह सबकुछ मुझ पर निर्भर होगा. मैं ही उसके लिए जिम्मेदार होऊँगा. अगर वास्तव में शिक्षा में क्रांति लाना मेरा उद्देश्य है तो वह लायी जा सकेगी, अगर सुधार लाना उद्देश्य है तो सुधार होगा. लेकिन अगर मेरा उद्देश्य पैसा कमाना, अपने आदमियों को विश्वविद्यालय में भरना और अपना काम निकालना होगा तो इस दृष्टि से मैं अपने कुछ धूर्त और चालाक शिष्यों को सर्च कमिटी में रख दूँगा और कहूँगा- पट्ठे, उचित व्यक्ति की खोज करो. मेरे मनोभाव तुम्हारे सामने स्पष्ट हैं.
Tuesday, November 03, 2009
उत्तमाजी के चित्रों पर एक नजर
जिस तरह का मनुष्य परमात्मा ने बनाकर धरती पर भेजा है उसमें सौन्दर्य है. उस सौन्दर्य में कुछ लोग और निखार ले आते हैं और कुछ अभागे उसे और कुरूप कर देते हैं !
आज तक मैंने नहीं देखा कि परमात्मा ने वस्त्र पहनाकर किसी मनुष्य को धरती पर भेजा हो. वस्त्र मनुष्य पहनाता है. ऐसा भी वस्त्र हो सकता है जिससे सुन्दरता निखरे और ऐसा भी हो सकता है जिससे संुदरता बिखरे और नष्ट हो जाय. लेकिन जिस रूप में परमात्मा के घर से मनुष्य आता है, वह तो सदा सुंदर होता है. इसलिए वस्त्र तो मेरी समझ में आता है, नग्नता नहीं आती. मैं ढूँढ़कर भी इन चित्रों में नग्नता नहीं खोज पाया.
नग्नता और निर्वस्त्रपन में अंतर होता है. इन चित्रों में वस्त्र नहीं हंै, क्योंकि उस समय वस्त्र बने ही नहीं थे, मृगछाल अवश्य लोग पहनते थे अपने कटि प्रदेश को ढँकने के लिए. कामायनी में श्रद्धा निर्वस्त्र नहीं है. परिधान धारण किये हुए है. कामायनीकार उसका मनोरम सौन्दर्य खींचते हैं-
नील परिधान बीच सुकुमार
खिल रहा मृदुल अधखुला अंग;
खिला हो ज्यों बिजली का फूल
मेघ-वन बीच गुलाबी रंग.
गांधार देश के नीले रोम वाले मेषों के मसृण चर्म उनके कांत वपु को ढँक रहे थे. लेकिन उत्तमाजी ने अपने चित्रों में श्रद्धा को वस्त्र नहीं पहनाया. यह उनकी इच्छा! इसलिए हम यह तो कह सकते हैं कि उनके चित्र निर्वस्त्र हैं, आवरणरहित हैं, लेकिन उन्हें हम नग्न नहीं कह सकते. नग्नता की परिभाषा क्या है ? नग्नता का एक लक्षण श्री रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी की टिप्पणी से प्रकट होता है. जिसे आदमी ढँकना चाहता है और ढँके हुए है, वही अगर उघड़ जाय तो उसे नग्न कह सकते हैं. मयंकजी अपनी यौन-कुंठा को ढँके हुए हैं, उनकी टिप्पणी से वह उघड़ गयी और वे नग्न हो गये ! इसकेा नग्नता कहेंगे! जो व्यक्ति नग्न होगा, उसे पूरा संसार नग्न ही दिखायी पड़ेगा. वह तो कपड़े के भीतर भी वही देख लेगा!
निर्वस्त्र होने के बावजूद इन चित्रों में कामोत्तेजना नहीं है. वैसे कामोत्तेजना जगने में बुरा क्या है, यह मैं आज तक नहीं समझ पाया ! चित्रों में स्त्री के सुडौल स्तन खुले है ,ठीक है, लेकिन स्त्री के हाथ कटि प्रदेश के नीचे चिकुर-जाल के पास क्या करने गये हैं ?
मैं कला की बारीकी नहीं समझता हूँ , फिर भी कला मुझे आकृष्ट करती है. उत्तमाजी के ये चित्र सुंदर हैं लेकिन इनमें वह कहीं नहीं दिखायी पड़ा जिसे चित्रित करना उनका उद्देश्य है. उत्तमाजी कहती हैं कि मुझे मनु के माध्यम से मन और श्रद्धा के माध्यम से दिल दिखाना है. मन का स्वभाव क्या है ? मन का लक्षण है चंचलता . जो कभी स्थिर न रहे उसे मन कहते हैं. मुझे मनु के चित्र में कहीं भी कोई चंचलता नहीं दिखाई पड़ती. दिल का अर्थ है भाव विभोर अवस्था. श्रद्धा में थोड़ा-थोड़ा यह उतरा है, लेकिन उल्लेखनीय रूप में नहीं. मेरे पास साधारण आँखें है।. उन आँखों से मुझे ये चित्र साधारण मालूम पड़े. लेकिन इन साधारण आँखों ने राधा-कृष्ण के कई रेखा-चित्रों में गजब की भाव-भंगिमाएँ देखी हैं. स्वभावतः अंदर-अंदर तुलना चलने लगती है.
मुख्य बात यह है कि चित्र हमेशा विशेष का होता है, सामान्य का नहीं. ‘मन’ और ‘दिल’ एक सामान्य अवस्था का नाम है. विशेष अवस्था में मन और दिल की अनेक विशिष्ट भंगिमाएँ होती हैं. उन विशिष्ट भंगिमाओं को चित्रित करना चित्रकार और कवि-कलाकार का काम होता है. कामायनी एक श्रेष्ठ चित्रकाव्य है. कुछ चमकते हुए बिम्बों के कारण ही यह आधुनिक हिन्दी महाकाव्यों में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर है. मुझे इनके चित्र मोहित करते हैं. आरंभ से अंत तक न जाने कितने सुंदर चित्र हैं! अगर उन्हीं चित्रों में से किसी खास भंगिमा को पकड़कर उत्तमाजी कूँची से उसे उकेरतीं तो चित्रों में एक विशिष्टता आ जाती. चित्र देखकर ही कोई कुहुक उटता कि हाँ- कामायनी से है ! तब खासियत की बात है. अभी तो संदर्भ बताना होगा तब जाकर कोई खोजेगा, हो सकता है कोई ठीक पाये , कोई ठीक न पाये. कामायनी का प्रथम छंद ही देखिये, कैसा विशिष्ट और अनुपम है-
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छाँह
एक पुरुष भींगे नयनों से देख रहा था प्रलय-प्रवाह
इस चित्र की मार्मिकता को समझना और फिर उसे चित्र कला में उद्घाटित कर देना एक असाधारण बात है. ‘पुरुष’ के लिए ‘एक’ विशेषण बतलाता कि वह एकाकी है. ‘एक’ शब्द मनु के अकेलेपन की पीड़ा की पूरी टीस है. वह पीड़ा गलकर ‘भींगे नयनों’ से बह रही है. सामने अथाह विनाशकारी समुंदर लहरा रहा है जिसने उसका सबकुछ लील लिया है. स्वयं वह उस प्रलय के गर्भ से बाहर अगर हो पाया है तो हिमगिरि के उत्तुंग शिखर के कारण ही. इसीलिए उसकी छाँह को ‘शीतल’ बताया गया है.
मैं उत्तमाजी से निवेदन करूँगा कि एक बार फिर से जो चित्र उन्हें पसंद आये, उन्हें रेखाओं और रंगों से एक नया रूप देने की कोशिश करें. उसके नीचे संबंधित पंक्तियाँ डाल दें, ताकि दर्शकों को भी पता चले कि जो उन्होंने उतारा है, वह कहाँ से उतारा है. और कितना उतरा है.
चित्र अगर शार्प हो तो पंक्ति कलाकार न भी लिखे तो भी वह भीतर-भीतर गूँजने लगती है. या कहना चाहिए चित्र देखकर अगर कामायनी की कोई पंक्ति याद आ जाय तो समझना चाहिए कला सफल हो गयी. उत्तमाजी के चित्रों के साथ ऐसा नहीं है
कलाकार से निवेदन करना समझपूर्ण नहीं है, क्योंकि वह तो उनके हृदय की उमड़न है. कब किस बात पर मन उमड़ेगा कौन जानता है. लेकिन ज्योंही कला सार्वजनिक होती है लोग अपनी अपेक्षाएँ लादना शुरू करते हैं. मैं कुछ लाद नहीं रहा हूँ. सिर्फ दिशा-संकेत कर रहा हूँ. उत्तमाजी की कूँची से एक से एक श्रेष्ठ चित्र बाहर आये.
मेरी असीम शुभकामनायें.चित्र देखने के लिए शीर्षक के ‘उत्तमाजी’ शब्द पर क्लिक करें.
आज तक मैंने नहीं देखा कि परमात्मा ने वस्त्र पहनाकर किसी मनुष्य को धरती पर भेजा हो. वस्त्र मनुष्य पहनाता है. ऐसा भी वस्त्र हो सकता है जिससे सुन्दरता निखरे और ऐसा भी हो सकता है जिससे संुदरता बिखरे और नष्ट हो जाय. लेकिन जिस रूप में परमात्मा के घर से मनुष्य आता है, वह तो सदा सुंदर होता है. इसलिए वस्त्र तो मेरी समझ में आता है, नग्नता नहीं आती. मैं ढूँढ़कर भी इन चित्रों में नग्नता नहीं खोज पाया.
नग्नता और निर्वस्त्रपन में अंतर होता है. इन चित्रों में वस्त्र नहीं हंै, क्योंकि उस समय वस्त्र बने ही नहीं थे, मृगछाल अवश्य लोग पहनते थे अपने कटि प्रदेश को ढँकने के लिए. कामायनी में श्रद्धा निर्वस्त्र नहीं है. परिधान धारण किये हुए है. कामायनीकार उसका मनोरम सौन्दर्य खींचते हैं-
नील परिधान बीच सुकुमार
खिल रहा मृदुल अधखुला अंग;
खिला हो ज्यों बिजली का फूल
मेघ-वन बीच गुलाबी रंग.
गांधार देश के नीले रोम वाले मेषों के मसृण चर्म उनके कांत वपु को ढँक रहे थे. लेकिन उत्तमाजी ने अपने चित्रों में श्रद्धा को वस्त्र नहीं पहनाया. यह उनकी इच्छा! इसलिए हम यह तो कह सकते हैं कि उनके चित्र निर्वस्त्र हैं, आवरणरहित हैं, लेकिन उन्हें हम नग्न नहीं कह सकते. नग्नता की परिभाषा क्या है ? नग्नता का एक लक्षण श्री रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी की टिप्पणी से प्रकट होता है. जिसे आदमी ढँकना चाहता है और ढँके हुए है, वही अगर उघड़ जाय तो उसे नग्न कह सकते हैं. मयंकजी अपनी यौन-कुंठा को ढँके हुए हैं, उनकी टिप्पणी से वह उघड़ गयी और वे नग्न हो गये ! इसकेा नग्नता कहेंगे! जो व्यक्ति नग्न होगा, उसे पूरा संसार नग्न ही दिखायी पड़ेगा. वह तो कपड़े के भीतर भी वही देख लेगा!
निर्वस्त्र होने के बावजूद इन चित्रों में कामोत्तेजना नहीं है. वैसे कामोत्तेजना जगने में बुरा क्या है, यह मैं आज तक नहीं समझ पाया ! चित्रों में स्त्री के सुडौल स्तन खुले है ,ठीक है, लेकिन स्त्री के हाथ कटि प्रदेश के नीचे चिकुर-जाल के पास क्या करने गये हैं ?
मैं कला की बारीकी नहीं समझता हूँ , फिर भी कला मुझे आकृष्ट करती है. उत्तमाजी के ये चित्र सुंदर हैं लेकिन इनमें वह कहीं नहीं दिखायी पड़ा जिसे चित्रित करना उनका उद्देश्य है. उत्तमाजी कहती हैं कि मुझे मनु के माध्यम से मन और श्रद्धा के माध्यम से दिल दिखाना है. मन का स्वभाव क्या है ? मन का लक्षण है चंचलता . जो कभी स्थिर न रहे उसे मन कहते हैं. मुझे मनु के चित्र में कहीं भी कोई चंचलता नहीं दिखाई पड़ती. दिल का अर्थ है भाव विभोर अवस्था. श्रद्धा में थोड़ा-थोड़ा यह उतरा है, लेकिन उल्लेखनीय रूप में नहीं. मेरे पास साधारण आँखें है।. उन आँखों से मुझे ये चित्र साधारण मालूम पड़े. लेकिन इन साधारण आँखों ने राधा-कृष्ण के कई रेखा-चित्रों में गजब की भाव-भंगिमाएँ देखी हैं. स्वभावतः अंदर-अंदर तुलना चलने लगती है.
मुख्य बात यह है कि चित्र हमेशा विशेष का होता है, सामान्य का नहीं. ‘मन’ और ‘दिल’ एक सामान्य अवस्था का नाम है. विशेष अवस्था में मन और दिल की अनेक विशिष्ट भंगिमाएँ होती हैं. उन विशिष्ट भंगिमाओं को चित्रित करना चित्रकार और कवि-कलाकार का काम होता है. कामायनी एक श्रेष्ठ चित्रकाव्य है. कुछ चमकते हुए बिम्बों के कारण ही यह आधुनिक हिन्दी महाकाव्यों में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर है. मुझे इनके चित्र मोहित करते हैं. आरंभ से अंत तक न जाने कितने सुंदर चित्र हैं! अगर उन्हीं चित्रों में से किसी खास भंगिमा को पकड़कर उत्तमाजी कूँची से उसे उकेरतीं तो चित्रों में एक विशिष्टता आ जाती. चित्र देखकर ही कोई कुहुक उटता कि हाँ- कामायनी से है ! तब खासियत की बात है. अभी तो संदर्भ बताना होगा तब जाकर कोई खोजेगा, हो सकता है कोई ठीक पाये , कोई ठीक न पाये. कामायनी का प्रथम छंद ही देखिये, कैसा विशिष्ट और अनुपम है-
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छाँह
एक पुरुष भींगे नयनों से देख रहा था प्रलय-प्रवाह
इस चित्र की मार्मिकता को समझना और फिर उसे चित्र कला में उद्घाटित कर देना एक असाधारण बात है. ‘पुरुष’ के लिए ‘एक’ विशेषण बतलाता कि वह एकाकी है. ‘एक’ शब्द मनु के अकेलेपन की पीड़ा की पूरी टीस है. वह पीड़ा गलकर ‘भींगे नयनों’ से बह रही है. सामने अथाह विनाशकारी समुंदर लहरा रहा है जिसने उसका सबकुछ लील लिया है. स्वयं वह उस प्रलय के गर्भ से बाहर अगर हो पाया है तो हिमगिरि के उत्तुंग शिखर के कारण ही. इसीलिए उसकी छाँह को ‘शीतल’ बताया गया है.
मैं उत्तमाजी से निवेदन करूँगा कि एक बार फिर से जो चित्र उन्हें पसंद आये, उन्हें रेखाओं और रंगों से एक नया रूप देने की कोशिश करें. उसके नीचे संबंधित पंक्तियाँ डाल दें, ताकि दर्शकों को भी पता चले कि जो उन्होंने उतारा है, वह कहाँ से उतारा है. और कितना उतरा है.
चित्र अगर शार्प हो तो पंक्ति कलाकार न भी लिखे तो भी वह भीतर-भीतर गूँजने लगती है. या कहना चाहिए चित्र देखकर अगर कामायनी की कोई पंक्ति याद आ जाय तो समझना चाहिए कला सफल हो गयी. उत्तमाजी के चित्रों के साथ ऐसा नहीं है
कलाकार से निवेदन करना समझपूर्ण नहीं है, क्योंकि वह तो उनके हृदय की उमड़न है. कब किस बात पर मन उमड़ेगा कौन जानता है. लेकिन ज्योंही कला सार्वजनिक होती है लोग अपनी अपेक्षाएँ लादना शुरू करते हैं. मैं कुछ लाद नहीं रहा हूँ. सिर्फ दिशा-संकेत कर रहा हूँ. उत्तमाजी की कूँची से एक से एक श्रेष्ठ चित्र बाहर आये.
मेरी असीम शुभकामनायें.चित्र देखने के लिए शीर्षक के ‘उत्तमाजी’ शब्द पर क्लिक करें.
Sunday, November 01, 2009
लोग आप पर हँसते हैं !
सन 2006 की बात है. एक क्रांतिकारी सामाजिक कार्यकर्ता और नेता मीडिया से प्राप्त खबरों के आधार पर मेरे विरोधी हो गये थे. संयोगवश एक दिन मेरी पत्रिका ‘होश’ उन्हें हाथ लगी.उसे पढ़कर वे मेरे प्रशंसक हो गये. उन्होंने एक पत्र लिखकर अपने अंदर आये इस परिवर्तन के बारे में जानकारी दी. उस व्यक्ति का नाम है प्रोफेसर प्रेम कुमार. वे ‘प्रेम यूथ फाउंडेशन’ के संस्थापक हैं जिसकी शाखा पूरे बिहार में है. वे विचार और आचार से विद्रोही हैं. इसलिए उनसे मेरी पटरी बैठ गयी. सुर से सुर मिल गया. वे इस देश में पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने खुसरुपुर बुलाकर मुझे एक सभा में सम्मान दिया और मेरा भाषण करवाया. इसके पहले लाउडस्पीकर से पूरे कस्बे में मेरे आने की सूचना लोगों को दी और दीवारों पर मेरा नाम लिखवाया. उस सभा में विशिष्टजनों के साथ थानाध्यक्ष भी उपस्थित थे. उनका भी भाषण हुआ. मेरे भाषण के बाद प्रश्नोत्तर का दौर चला. उसी सभा में एक व्यक्ति ने मुझ पर आरोप लगाने की चेष्टा की. लोगों ने उनका मुँह बंद करना चाहा. लेकिन मैंने कहा- नहीं, उन्हें बोलने दें. अगर उनके पास वास्तव में कोई प्रश्न है तो मैं उसका समाधान करने का प्रयास करूँगा. अगर उन्हें केवल भड़ास निकालनी है तो उसकी भी इजाजत उन्हें मिलनी चाहिए ताकि वे हल्के हो जायँ. मेरे उत्तर की उनको जरूरत नहीं थी. मुझे लज्जित और अपमानित करना उनका ध्येय था. उनके कथन का सार अंत में इस वाक्य में प्रकट हुआ- ‘लोग, आप पर हँसते हैं ं!’ बिल्कुल सही कहा था उन्होंने. मैं अनुभव करता रहा हूँ कि मीडिया में आयी खबरों के आधार पर लोग मुझे देखकर हँसते हैं ! मैंने उन्हें जो जवाब दिया उस बीज वाक्य का पल्लवित रूप यहाँ प्रस्तुत है-
मेरे जीवन के साथ सबसे अच्छी बात यह हुई है कि मेरा नाम आते ही लोग हँस देते हैं. कुछ देर के लिए उनका तनाव दूर हो जाता है. क्षण भर के लिए वे आनंद से भर जाते हैं. कुछ पल के लिए भार मुक्त हो जाते हैं. इसे मैं अपना परम सौभाग्य मानता हूँ. मुझमें ऐसी क्षमता नहीं थी कि लाखों लोगों के जीवन में मुस्कान बिखेर सकूँ ; इसलिए इतनी बड़ी बात का श्रेय मैं अपने ऊपर लेकर अपने अहंकार को बलवान करना नहीं चाहता. यह ईश्वर की कृपा से हो गया है. मैं भी इस आनंद में डूब जाता हूँ-
औरों को हँसते देखो मनु, हँसो और सुख पाओ ;
अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ
सबके सुखी होने में, सबके हँसने में आनंद का विस्तार होता है.
प्रश्न : आप जिस भाव में मगन होकर इसको अच्छी बात समझ रहे हैं, वैसी बात नहीं है. आपकी विडंबना पर लोग हँसते हैं !
उत्तर: चाहे लोग जिस बात पर हँसें, हँसते तो हैं न ? क्रोध तो नहीं करते है न ! ईष्र्या से तो नहीं जलते हैं न ! उनका हँसना महत्वपूर्ण है. उनके भाव को तो मैं बदल नहीं सकता. मैं तो अपने भाव में ही डूब सकता हूँ. मेरे भाव की लपट उन तक पहुँचे तो वे भी मगन हो सकते हैं.
विडंबना तो यही है न कि ‘देखो बूढ़ा होकर कैसे लड़कों की तरह आचरण करता है. बेटी से भी छोटी लड़की से प्यार कर अपना सब कुछ लुटा बैठा है !’ यही तो मेरा सौभाग्य है ! मेरी जवानी गयी ही नहीं. वह समय से पहले आयी और समय पर जाना भूल गयी ! जिस दिल में प्यार की तरंगें न उठती हों, उसे बूढ़ा कहते हैं. वह प्यार क्या जिसका ज्वार जवानी में उठे और बुढ़ापे में विदा हो जाय !
लोगों के घरों से प्रेम विदा हो गया है और वे उसे खोज रहे हैं, भटक रहे हैं. और यहाँ स्वयं प्रेम मुझे खोजते हुए आकर मेरे पिंजर में प्रकाशित हो गया है ! इस प्रकाश में मैं नहला रहा हूँ !
इतना बेवकूफ भी नहीं मैं कि आपकी बात न समझूँ. समझ रहा हूँ अच्छी तरह लेकिन मुझे बात लग नहीं रही है, क्योंकि मैं आपके तल पर नहीं हूँ. आपके तल पर जीता तो छक् से आपकी बात लग जाती. आपका हँसना हमें प्रताड़ित कर देता. कभी खून खौला देता, कभी मुरझा देता, कभी कुंठित कर देता, कभी ग्लानि से भर देता, कभी आत्महत्या के लिए उकसा देता. मेरा सौभाग्य है कि मैं आपके तल पर नहीं हूँ. इसलिए जो आपको मुझमें दिखता है वह अपने में मुझे नहीं दिखता. दिखती है बस इतनी सी बात कि भगवान ने मुझमें क्या जादू कर दिया जो इतने लोगों की मुस्कुराहट का कारण बन गया हूँ ! यह नहीं भी हो सकता था. ऐसा भी हो सकता था कि लोग मुझे देखते ही क्रोध से भड़क उठते, ईष्र्या से जल उठते.
ऐसा हो भी बहुत रहा है. लेकिन क्रोध और ईष्र्या सीधे-सीधे आने में डरती है, क्योंकि वह लोगों को स्वीकार्य नहीं होगी. इसलिए वेश बदल कर कभी मर्यादावाद का लबादा ओढ़कर, कभी नैतिकता की रामनामी चादर लपेट कर प्रकट होती है. ऐसे लोगों की मैं खबर लिया करता हूँ.
हँसने वालों में भी सभी उपहास की हँसी वाले नहीं होते. कुछ निश्छल हँसी वाले लोग भी हैं. इनमें एक नाम है ठाकुरजी का, पटना विश्वविद्यालय के कुलपति के पीए हैं. वे मुझे देखते ही आनंद विभोर हो जाते हैं और आग्रह करते हैं कि मैं दिन में एक बार दर्शन दिया करूँ. वे कहते हैं दिन भर का तनाव दूर हो जाता है. वे मुझे खुशी से पास बैठाते हैं, चाय पिलवाते हैं और कुछ से कुछ बोलकर खूब हँसते हैं. जैसे- वे वहाँ आने वाले लोगों से कहते हैं -अच्छा ये बताइये, पटना विश्वविद्यालय को बाहर कोई जानता था ? बाहर कितने लोग जानते थे ? यह तो मटुक बाबू को धन्यवाद दीजिए कि इनके कारण देश में , विदेश में पटना विश्वविद्यालय का नाम हो गया ! उनकी इस बात से मैं खुश हो जाता हूँ और मेरे विरोधी भी, क्योंकि दोनों को इसमें अपना-अपना अर्थ मिल जाता है !
कभी कहते हैं- सर, चाँद-फिजा ने आपको डिफीट दे दिया ! वे इधर बहुत आये टीवी पर. आपका आना कम हो गया. मैं कहता हूँ- नहीं साहब, आप देखते रहियेगा, वे तो विदा हो जाने वाले चाँद हैं. सदा आकाश में चमकने वाला चाँद तो मैं हूँ. घटती-बढ़ती होती रहती है. लेकिन वजूद मौजूद है.
एक दिन पटना से दिल्ली में नियुक्त हुए एक प्रोफेसर ने कहा था- देखते हैं, मेरा कितना नाम है ? मैंने कहा था- क्या मुझसे भी ज्यादा ? उन्होेंने जवाब दिया- आपका तो स्कैंडल है, 15 दिन से एक महीना में खत्म हो जायेगा.. मैंने कहा था- यह एक महीना में खत्म होेने वाला स्कैंडल नहीं है. यह वैसा स्कैंडल है जो कैंडल की तरह काल के भाल पर जलता रहेगा. भूल और भ्रम में न रहो प्रोफेसर. तुम्हारे जैसे प्रोफेसर हम जैसों का गीत गाकर अमर होते हैं ! तुम्हारा नाम हमारे नाम की छाया है ! और इस पर दोनों ठहाके लगाते हैं.
लेकिन जो कुटिल हँसी हँसते हैं, वे मेरे बड़े काम के हैं. तुलसीदास से कोई बड़ा कवि नहीं हुआ हिन्दी में आज तक. उनकी कविता पर भी लोग हँसते थे. तुलसी ने ऐसे लोगों का स्मरण किया है रामचरितमानस में-
खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा ।।
हंसहिं बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकहीं ।।
कबित रसिक न राम पद नेहू । तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू ।।
भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी ।।
तुलसीदास कहते हैं कि दुष्टों के हँसने से मेरा हित ही होगा, क्योंकि मधुर कंठ वाली कोयल को कौवे तो कठोर ही कहा करते हैं न ! जैसे हंस पर बगुले और पपीहे पर मेढक हँसते हैं, वैसे ही मलिन मन वाले दुष्ट भी मेरी निर्मल वाणी पर हँसते हैं. जो न तो कविता के रसिक हैं और न जिनका राम के चरणों में प्रेम है, उनके लिए यह कविता सुखद हास्य रस का काम देगी. एक तो यह भाषा (लोकभाषा) की रचना है, दूसरे मेरी बुद्धि भोली है, इससे यह हँसने योग्य ही है, हँसने में कोई दोष नहीं.
‘खल परिहास होइ हित मोरा’ वास्तव में खलों के उपहास करने से फायदा होता है. इस रहस्य को मुझसे ज्यादा कौन जानता है ? उपहास करने वालों का स्वागत होना चाहिए. मेरा जो इतना नाम हुआ उसके पीछे यही लोग हैं. ये न होते तो प्रेम करने वाले एक साधारण आदमी को कौन जानता और क्यों जानता ? यद्यपि उनका उद्देश्य कुछ और होता है , लेकिन परिणाम केवल उनके उद्देश्य पर निर्भर होता नहीं, वह हमारे काम पर भी निर्भर होता है !
तुलसीदास ने अपनी कविता को समझने के लिए दो कसौटियाँ रखी हैं, या तो आप कविता की समझ रखते हों या आपका राम के चरणों में प्रेम हो. दोनों हो तो कहना ही क्या ? तब आप उनकी कविता में उसी तरह समग्रता में डूब पायेंगे जैसे स्वयं तुलसीदास, नहीं तो कम से कम एक गुण तो रहना ही चाहिए. दोनों का अभाव हो तो आपके लिए ‘रामचरितमानस’ सुखद हास्य रस है.
मैं कहना चाहता हूँ कि मुझे भी समझने के लिए दो कसौटियाँ हैं - या तो आपने जीवन में सच्चे भाव से प्रेम किया हो या आप ओशो के श्री चरणों में अनुराग रखते हों. एक भी हो तो आप मुझे समझ पायेंगे. दोनों हो तो खूब अच्छी तरह समझ लेंगे. दुर्भाग्य से हँसने वाले लोग इन दोनों में एक भी शर्त पूरी नहीं करते. इसलिए मैं उनके लिए एक ‘सुखद हास्य रस’ हूँ. और मेरे लिए यह आनंद का विषय है.
Sunday, October 18, 2009
महिला संगठन का औचित्य- जूली
महिला संगठन एक अप्राकृतिक घटना है, इसलिए यह कभी सफल नहीं होगा. देश के कोने-कोने में न जाने कितने महिला संगठन हैं, उनसे आज तक कोई बड़ा काम हुआ है ? महिला कोई बड़ा काम तब कर पाती है जब उसके पीछे पुरुष का हाथ होता है और पुरुष भी जीवन में तब सफल होता है जब उसके पीछे महिला का साथ होता है. प्रकृति ने दोनों को अधूरा बनाया है और एक-दूसरे से मिलकर ही दोनों पूरे होते हैं.
प्रकृति ने कुछ खूबियाँ महिलाओं को दी हैं जो पुरुषों को नहीं दी हैं. कुछ खूबियाँ पुरुषों को दी हैं जो महिलाओं को नहीं मिली हैं. महिला शांत और आनंदित तभी होगी जब प्रकृति द्वारा मिले गुणों का विकास करेगी. यही बात पुरुषों के साथ है. स्त्रीत्व और पुरुषत्व अगर आपस में लड़ पड़े तो जीतेगा कोई नहीं. दोनों इस संघर्ष में केवल झुलस कर पस्त हो जायेंगे.
पुरुष और स्त्री में कुछ मूलभूत भेद हैं जिनसे उनके पूरे जीवन में अंतर आता है. आप देखेंगे कि कैसे ये भेद एक को दूसरे से जोड़ने में सहायक हैं. ये भेद ही उन्हें ऋणात्मक और धनात्मक ध्रुवों की तरह एक दूसरे की ओर आकृष्ट करते हैं. अगर ये भेद न होते तो दोनों के रास्ते अलग-अलग होते. पुरुष वीर्यदान करता है, स्त्री उसे ग्रहण करती है. दान और ग्रहण का आनंद दोनों को समान रूप से प्राप्त है. जीवन में अनेक अवसर हैं जो दान और ग्रहण के आनंद से परिपूरित हैं. पुरुष धन अर्जित कर लाता है और स्त्री को दान कर देता है. पुरुष धन देते समय सुख का अनुभव करता है. स्त्री उस धन को ग्रहण कर उसे परिवार के अन्य सदस्यों की सेवा में लगा देती है. अपना तो उसे ध्यान ही नहीं है. उनके सामने तो पति और बच्चे हैं. अपना ख्याल भूलकर ही स्त्री परिवार में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शक्ति हो जाती है. पति उसके अधीन है, बच्चे तो मानो उसी के हैं. परिवार के केन्द्र में माता होती है. मातृत्व स्त्री की सबसे बड़ी ताकत है जिसके सामने पूरा परिवार नतमस्तक है.
स्त्री गर्भ धारण करती है. पुरुष को यह गुण परमात्मा ने नहीं दिया है. गर्भ धारण करने के कारण उसमें स्थिरता है. उसकी रक्षा के लिए प्रकृति ने पुरुष को गतिमान बनाया है. गर्भ धारण करने के कारण प्रकृति ने उसे सहिष्णुता प्रदान की है, पुरुष थोड़ा असहिष्णु होता है. बच्चों के लालन-पालन के लिए प्रकृति ने स्त्री को कोमलता दी है. कोमलता की रक्षा के लिए कठोरता आवश्यक है. इसलिए प्रकृति ने पुरुष को कठोर बनाया है. स्त्री रक्षणीय है और पुरुष रक्षक है. गर्भ धारण करने के समय से लेकर और प्रसव के समय से आगे के कुछ महीनों तक स्त्री को सेवा की जरूरत है. पुरुष उसकी सेवा में तत्पर रहता है. न जाने कितने वर्षाें के बाद सरकार को यह समझ आई कि मातृत्व अवकाश केवल स्त्री को ही नहीं पुरुष को भी चाहिए, क्योंकि दोनों पूरक हैं.
आप देख रहे हैं कि स्थिरता और गत्यात्मकता , सहिष्णुता और असहिष्णुता, कोमलता और कठोरता, रक्षणीयता और रक्षकता आदि गुण कैसे एक दूसरे के पूरक हैं. असहिष्णु पिता बच्चों की बदमाशी से ऊब कर छड़ी उठा लेता है... सहिष्णु माता उन दोनों के बीच आकर खड़ी हो जाती है. बच्चे को कठोरता और कोमलता साथ-साथ मिल जाती है. कठोरता उसे सजग करती है और कोमलता उसकी रक्षा करती है. दोनों चीजें अलग-अलग तरह से सजग भी करती हैं और रक्षा भी करती हैं.
अगर पुरुष अपनी कठोरता का उपयोग स्त्री की सेवा में न कर उसे सताने में करने लग जाए तो परिवार में विप्लव होगा. पुरुष जो रक्षक है, उसका भक्षक हो जाए तो अशांति फैलेगी. पुरुष जो दानी है उसमें कंजूसी कर दे तो अपना ही आनंद खोयेगा. ठीक इसके विपरीत स्त्री अगर अपनी कोमलता और सहिष्णुता छोड़कर रणचंडी हो जाए तो परिवार नष्ट हो जाएगा. पुरुषत्व ग्रहण कर पुरुष को पराजित नहीं किया जा सकता. पुरुषत्व को स्त्रीत्व के द्वारा ही पराजित किया जा सकता है. दुर्भाग्यवश आधुनिक युग के महिला संगठनों ने पुरुषत्व के माध्यम से पुरुष को जवाब देना शुरू किया है. इसमें हे देवि ! निश्चय ही आपकी हार होगी. क्यांेकि पुरुषत्व में आप पुरुषों से आगे नहीं निकल पायेंगी. पुरुषों के अत्याचार से बचने के लिए महिला के पक्ष में कुछ कानून बने हैं. कानून बनते ही कुछ पुरुषार्थी महिलाओं ने उनका दुरुपयोग शुरू कर दिया है. कभी ‘घरेलू हिंसा’ हिंसा में नहीं गिनी जाती थी, आज जब गिनी जाने लगी है तो हिंसा से बचने के लिए नहीं, बल्कि अपनी हिंसा को सहारा देने के लिए कुछ स्त्रियों ने उसे हथियार की तरह उठाना शुरू कर दिया है. परिणाम में शांति नहीं अशांति फैलेगी. मेरा स्पष्ट देखना है कि किसी को प्रताड़ित कर कोई सुखी नहीं हो सकता. पुरुष प्रताड़ना का तो लंबा इतिहास है, लेकिन इधर कुछ वर्षों से स्त्री द्वारा प्रताड़ना का सिलसिला भी शुरू हो चुका है. पटने में पत्नी से प्रताड़ित कुछ लोगों ने महिला संगठन की तर्ज पर पुरुष संगठन बनाया और उसमें मटुकजी को आमंत्रित किया. मटुकजी ने उन मित्रों को पूरी सहानुभूति के साथ समझाया कि इस तरह का संगठन अप्राकृतिक, अवैज्ञानिक और मूढ़तापूर्ण है. दुर्भाग्य से आज भी स्त्रियों का उतना विकास नहीं हुआ है कि वे इस तरह की मूढ़ता से बच सकें. लेकिन पुरुष तो उसकी तुलना में विकसित हैं. इसलिए यह महिला के लिए तो क्षम्य है, लेकिन पुरुष के लिए हास्यास्पद है. आप ध्यान दें तो पायेंगे कि महिला संगठनों को उकसाने में पुरुषों का हाथ हुआ करता है. पुरुषों के बिना तो महिला संगठन पंगु है. महिला फ्रंट पर है, पुरुष नेपथ्य में है. इतना ही अंतर है. चालाक पुरुष पीछे है, मूढ़ महिलाएँ आगे हैं.
मटुकजी ने ‘भारतीय पुरुष परिषद’ के मित्रों से कहा- ‘‘ आप पत्नी प्रताड़ित हैं. पत्नी आपको सिर्फ अपने बल पर प्रताड़ित नहीं कर रही है. वह किन्हीं पुरुषों की गोद में खेल रही है और उनकी मदद से आपकेा प्रताड़ित कर रही है. दूसरी तरफ आप अपने घर में करुणामयी मां को देखें. उनका आशीर्वाद, उनकी सारी ताकत अपने बेटे के पक्ष में है. आपके पीछे भी स्त्री की ताकत है. इसलिए स्त्री संगठन और पुरुष संगठन दोनेां एक धोखा है. इस धोखे में न आप पड़ें और न कोई नया धोखा खड़ा करें. कहीं स्त्री प्रताड़ित हैं , तेा कहीं पुरुष प्रताड़ित हैं. आप प्रताड़ितों का एक संघ बनाएँ जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों शामिल हों, तब यह वैज्ञानिक होगा और कारगर भी. इसके बाद मैं तुरत उसकी सदस्यता ग्रहण कर लूँगा.’’
हमारे इंदौर आगमन के पूर्व पता चला कि यहाँ भी एक महिला संगठन ने बिना जाने-समझे बवाल मचाया. हमें अपमानित करने, जूता-चप्पल से पीटने की धमकियाँ भी दी गयीं. मुझे उन देवियों से इतना ही कहना है कि हे देवि ! जूते-चप्पलों से आपके हाथ की , आपके व्यक्तित्व की शोभा नहीं बढ़ेगी. आपके कोमल हाथों में तो फूल-माला ही शोभेगी. कालिख के बजाय रंग-गुलाल शोभेगा. आपकी मर्जी, आप अपनी शोभा बढ़ायें या अपने को कुरूप कर लें. लेकिन इतना ध्यान रखें देवि कि पुरुष के जूते आपकी जूती से अधिक मजबूत होते हैं. जूतियों से आप पुरुषों केा गुलाम नहीं बना पायेंगी. आपका प्रेम ही उसे गुलाम बनाता है. प्रेम के अलावा शासन करने का दूसरा कोई सुंदर रास्ता नहीं है. आपमें पुरुषेां पर शासन करने की भूख है. शुभ इच्छा है. उनके हृदय पर शासन करें. उन्हें अपनी मुस्कान से जीतें.
प्रकृति ने कुछ खूबियाँ महिलाओं को दी हैं जो पुरुषों को नहीं दी हैं. कुछ खूबियाँ पुरुषों को दी हैं जो महिलाओं को नहीं मिली हैं. महिला शांत और आनंदित तभी होगी जब प्रकृति द्वारा मिले गुणों का विकास करेगी. यही बात पुरुषों के साथ है. स्त्रीत्व और पुरुषत्व अगर आपस में लड़ पड़े तो जीतेगा कोई नहीं. दोनों इस संघर्ष में केवल झुलस कर पस्त हो जायेंगे.
पुरुष और स्त्री में कुछ मूलभूत भेद हैं जिनसे उनके पूरे जीवन में अंतर आता है. आप देखेंगे कि कैसे ये भेद एक को दूसरे से जोड़ने में सहायक हैं. ये भेद ही उन्हें ऋणात्मक और धनात्मक ध्रुवों की तरह एक दूसरे की ओर आकृष्ट करते हैं. अगर ये भेद न होते तो दोनों के रास्ते अलग-अलग होते. पुरुष वीर्यदान करता है, स्त्री उसे ग्रहण करती है. दान और ग्रहण का आनंद दोनों को समान रूप से प्राप्त है. जीवन में अनेक अवसर हैं जो दान और ग्रहण के आनंद से परिपूरित हैं. पुरुष धन अर्जित कर लाता है और स्त्री को दान कर देता है. पुरुष धन देते समय सुख का अनुभव करता है. स्त्री उस धन को ग्रहण कर उसे परिवार के अन्य सदस्यों की सेवा में लगा देती है. अपना तो उसे ध्यान ही नहीं है. उनके सामने तो पति और बच्चे हैं. अपना ख्याल भूलकर ही स्त्री परिवार में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शक्ति हो जाती है. पति उसके अधीन है, बच्चे तो मानो उसी के हैं. परिवार के केन्द्र में माता होती है. मातृत्व स्त्री की सबसे बड़ी ताकत है जिसके सामने पूरा परिवार नतमस्तक है.
स्त्री गर्भ धारण करती है. पुरुष को यह गुण परमात्मा ने नहीं दिया है. गर्भ धारण करने के कारण उसमें स्थिरता है. उसकी रक्षा के लिए प्रकृति ने पुरुष को गतिमान बनाया है. गर्भ धारण करने के कारण प्रकृति ने उसे सहिष्णुता प्रदान की है, पुरुष थोड़ा असहिष्णु होता है. बच्चों के लालन-पालन के लिए प्रकृति ने स्त्री को कोमलता दी है. कोमलता की रक्षा के लिए कठोरता आवश्यक है. इसलिए प्रकृति ने पुरुष को कठोर बनाया है. स्त्री रक्षणीय है और पुरुष रक्षक है. गर्भ धारण करने के समय से लेकर और प्रसव के समय से आगे के कुछ महीनों तक स्त्री को सेवा की जरूरत है. पुरुष उसकी सेवा में तत्पर रहता है. न जाने कितने वर्षाें के बाद सरकार को यह समझ आई कि मातृत्व अवकाश केवल स्त्री को ही नहीं पुरुष को भी चाहिए, क्योंकि दोनों पूरक हैं.
आप देख रहे हैं कि स्थिरता और गत्यात्मकता , सहिष्णुता और असहिष्णुता, कोमलता और कठोरता, रक्षणीयता और रक्षकता आदि गुण कैसे एक दूसरे के पूरक हैं. असहिष्णु पिता बच्चों की बदमाशी से ऊब कर छड़ी उठा लेता है... सहिष्णु माता उन दोनों के बीच आकर खड़ी हो जाती है. बच्चे को कठोरता और कोमलता साथ-साथ मिल जाती है. कठोरता उसे सजग करती है और कोमलता उसकी रक्षा करती है. दोनों चीजें अलग-अलग तरह से सजग भी करती हैं और रक्षा भी करती हैं.
अगर पुरुष अपनी कठोरता का उपयोग स्त्री की सेवा में न कर उसे सताने में करने लग जाए तो परिवार में विप्लव होगा. पुरुष जो रक्षक है, उसका भक्षक हो जाए तो अशांति फैलेगी. पुरुष जो दानी है उसमें कंजूसी कर दे तो अपना ही आनंद खोयेगा. ठीक इसके विपरीत स्त्री अगर अपनी कोमलता और सहिष्णुता छोड़कर रणचंडी हो जाए तो परिवार नष्ट हो जाएगा. पुरुषत्व ग्रहण कर पुरुष को पराजित नहीं किया जा सकता. पुरुषत्व को स्त्रीत्व के द्वारा ही पराजित किया जा सकता है. दुर्भाग्यवश आधुनिक युग के महिला संगठनों ने पुरुषत्व के माध्यम से पुरुष को जवाब देना शुरू किया है. इसमें हे देवि ! निश्चय ही आपकी हार होगी. क्यांेकि पुरुषत्व में आप पुरुषों से आगे नहीं निकल पायेंगी. पुरुषों के अत्याचार से बचने के लिए महिला के पक्ष में कुछ कानून बने हैं. कानून बनते ही कुछ पुरुषार्थी महिलाओं ने उनका दुरुपयोग शुरू कर दिया है. कभी ‘घरेलू हिंसा’ हिंसा में नहीं गिनी जाती थी, आज जब गिनी जाने लगी है तो हिंसा से बचने के लिए नहीं, बल्कि अपनी हिंसा को सहारा देने के लिए कुछ स्त्रियों ने उसे हथियार की तरह उठाना शुरू कर दिया है. परिणाम में शांति नहीं अशांति फैलेगी. मेरा स्पष्ट देखना है कि किसी को प्रताड़ित कर कोई सुखी नहीं हो सकता. पुरुष प्रताड़ना का तो लंबा इतिहास है, लेकिन इधर कुछ वर्षों से स्त्री द्वारा प्रताड़ना का सिलसिला भी शुरू हो चुका है. पटने में पत्नी से प्रताड़ित कुछ लोगों ने महिला संगठन की तर्ज पर पुरुष संगठन बनाया और उसमें मटुकजी को आमंत्रित किया. मटुकजी ने उन मित्रों को पूरी सहानुभूति के साथ समझाया कि इस तरह का संगठन अप्राकृतिक, अवैज्ञानिक और मूढ़तापूर्ण है. दुर्भाग्य से आज भी स्त्रियों का उतना विकास नहीं हुआ है कि वे इस तरह की मूढ़ता से बच सकें. लेकिन पुरुष तो उसकी तुलना में विकसित हैं. इसलिए यह महिला के लिए तो क्षम्य है, लेकिन पुरुष के लिए हास्यास्पद है. आप ध्यान दें तो पायेंगे कि महिला संगठनों को उकसाने में पुरुषों का हाथ हुआ करता है. पुरुषों के बिना तो महिला संगठन पंगु है. महिला फ्रंट पर है, पुरुष नेपथ्य में है. इतना ही अंतर है. चालाक पुरुष पीछे है, मूढ़ महिलाएँ आगे हैं.
मटुकजी ने ‘भारतीय पुरुष परिषद’ के मित्रों से कहा- ‘‘ आप पत्नी प्रताड़ित हैं. पत्नी आपको सिर्फ अपने बल पर प्रताड़ित नहीं कर रही है. वह किन्हीं पुरुषों की गोद में खेल रही है और उनकी मदद से आपकेा प्रताड़ित कर रही है. दूसरी तरफ आप अपने घर में करुणामयी मां को देखें. उनका आशीर्वाद, उनकी सारी ताकत अपने बेटे के पक्ष में है. आपके पीछे भी स्त्री की ताकत है. इसलिए स्त्री संगठन और पुरुष संगठन दोनेां एक धोखा है. इस धोखे में न आप पड़ें और न कोई नया धोखा खड़ा करें. कहीं स्त्री प्रताड़ित हैं , तेा कहीं पुरुष प्रताड़ित हैं. आप प्रताड़ितों का एक संघ बनाएँ जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों शामिल हों, तब यह वैज्ञानिक होगा और कारगर भी. इसके बाद मैं तुरत उसकी सदस्यता ग्रहण कर लूँगा.’’
हमारे इंदौर आगमन के पूर्व पता चला कि यहाँ भी एक महिला संगठन ने बिना जाने-समझे बवाल मचाया. हमें अपमानित करने, जूता-चप्पल से पीटने की धमकियाँ भी दी गयीं. मुझे उन देवियों से इतना ही कहना है कि हे देवि ! जूते-चप्पलों से आपके हाथ की , आपके व्यक्तित्व की शोभा नहीं बढ़ेगी. आपके कोमल हाथों में तो फूल-माला ही शोभेगी. कालिख के बजाय रंग-गुलाल शोभेगा. आपकी मर्जी, आप अपनी शोभा बढ़ायें या अपने को कुरूप कर लें. लेकिन इतना ध्यान रखें देवि कि पुरुष के जूते आपकी जूती से अधिक मजबूत होते हैं. जूतियों से आप पुरुषों केा गुलाम नहीं बना पायेंगी. आपका प्रेम ही उसे गुलाम बनाता है. प्रेम के अलावा शासन करने का दूसरा कोई सुंदर रास्ता नहीं है. आपमें पुरुषेां पर शासन करने की भूख है. शुभ इच्छा है. उनके हृदय पर शासन करें. उन्हें अपनी मुस्कान से जीतें.
Friday, October 16, 2009
बस में संस्कृति
किसी भी शहर में दौड़ने वाली बसें वहाँ की संस्कृतियों की झलक दिखलाती चलती हंै. किसी भी राज्य या शहर की बसों पर सवार होइये, वहाँ की विपन्नता-सम्पन्नता, आचार-व्यवहार, मानसिकता सब कुछ आपके सामने प्रकट हो जायेगा. हाल ही मैंने पुणे की यात्रा की. वहाँ की बसों पर थोड़ा घूमा और मुझे पटना और दिल्ली की बसें याद आ गयीं. पटने में तो सड़क ही नहीं, इसलिए सरकारी बस भी नहीं. यहाँ की खास-खास सड़कों पर प्राइवेट मिनी बसें चलती हैं, जिनमें मनुष्य लदे रहते हैं, लटके रहते हैं. जिस सीट पर एक भी आदमी आराम से न बैठ पाये, उस पर दो बैठाये जाते हैं. ठिगने हैं तो ठीक , लंबे हैं तेा आपकी टाँगंे अगली सीट में अटक जायेंगी. टाँगें तिरछी करके बाहर निकाल लें, तभी किसी तरह बैठा जा सकता है. जिन यात्रियों को सीट नहीं मिल पाती है, उन्हें कंडक्टर-खलासी की कड़क आवाज- आगे बढ़ते जाइये, बढ़ते जाइये- बोरे की तरह एक दिशा में चाँक देती है.
पुणे में बसेां में भीड़-भाड़ नहीं होती. केवल आफिस टाइम में थोड़ी भीड़ देखी जाती है. चूँकि अधिकांश कामकाजी लोगों के पास अपनी गाड़ियाँ होती हैं, इसलिए बसों की संख्या भी वहाँ कम है. बस में दोनों तरफ की सीटों के बीच जहाँ लोग खड़े होते हैं, उनकी सुविधा के लिए ऊपर की पाइप से ‘हथपकड़ा’ लटका रहता है जो देखने में सुंदर और हाथों के लिए आरामदेह है. यात्री आराम से यात्रा करते हैं, कोई धक्का-मुक्की नहीं, बकझक नहीं, गरमागरम बहसें नहीं.
बिहार और पटने की बसेां में टिकट या किराये के पैसे के लिए यात्री और कंडक्टर के बीच जो जद्दोजहद चलती है, वह कभी-कभी जंग में बदल जाती है. यात्री चाहता है पैसा न लगे तो अच्छा . अगर देना ही पड़ जाय तो कम से कम. उधर कंडक्टर मूंछों पर ताव फेरता है कि पैसे तो लेकर रहेंगे. उनकी ‘रफ’ आवाज दहशत पैदा कर पैसे वसूलती है और कभी-कभी अनाड़ी आदमी से ज्यादा भी. किराये को लेकर घोर किचकिच.
पुणे की बसों में इसके ठीक विपरीत माहौल दिखायी पड़ता है. ऐसा तो दिल्ली की बसों में भी नहीं देखा जाता है. वहाँ भी कंडक्टरों को चिल्लाकर टिकट के लिए कहना पड़ता है. लेकिन पुणे की बसों में एक शांति रहती है, कोई चिल्लाहट नहीं. कंडक्टर को टिकट के लिए किसी को कहना नहीं पड़ता है. यात्री स्वंय लेते हैं. जो पास होल्डर हैं, वे यह नहीं कहते कि पास है, बल्कि पास निकालकर दिखला देते हैं. ‘हस्त कम्प्यूटर’ से टिकट देने की व्यवस्था तो मैंने पुणे में ही देखी. ऐसी व्यवस्था दिल्ली में भी नहीं है. पुणे की किराया-दर वैज्ञानिक है, दिल्ली की अवैज्ञानिक और पटने का तो कहना ही क्या ! कभी निश्चित, कभी अनिश्चित. एक साल पूर्व दिल्ली में किराया-दर थीं- 2,5,7 और 10 रूपये. इसका रहस्य मेरी समझ में न आया, क्योंकि कोई दूरी 3 रुपये की भी हो सकती है, कोई 4 की , कोई 6 की , कोई 8 और 9 की भी, फिर ऐसा क्यों ? पुणे में किराया दर 2, 3,4,5 ....15 है. दूरी के अनुसार ‘हस्त कम्प्यूटर’ से टिकट निकल आता है. संभवतः प्रति किलोमीटर किराया एक रुपया है. कोई शिकवा-शिकायत नहीं. जितने किलोमीटर चलिये , उतने का किराया दे दीजिये, हिसाब साफ है. पटने में डी.एम. जो किराया निश्चित कर देते हैं, उसमें भी बसवाला कभी-कभी यात्री का चेहरा देखकर ,उन्हें अनभुआर समझकर घालमेल करता रहता है.
पुणे की बसों में रफ्तार है, जबकि पटने में बसें ठेलों और रिक्शों के पीछे रेंगती चलती हैं. हनुमाननगर से पटना जंक्शन की दूरी लगभग 5 किमी है जिसे तय करने में मिनी बस को 30 से 40 मिनट लगते हैं. यह दूरी एक पदयात्री 45 मिनट में तय कर सकता है. यह तो पुणे में ही देखा गया कि एक मेन रोड पर बस के लिए अलग लेन है. उस पर केवल बसें चल सकती हैं. स्वाभाविक है कि बस में गति होगी.
एक अंतिम बात और जो पटने और दिल्ली की बसेां में दिखाई पड़ती है लेकिन पुणे की बसों में नहीं. वह है स्त्रियों के साथ छेड़छाड़ पटने में बसों से ज्यादा टेम्पुओं में इस तरह की घटनाएँ आहिस्ता से घटती रहती हैं, क्येांकि उनमें स्त्रियेां के लिए अलग सीटें नहीं होतीं. कुछ पुरुषयात्री इस कोशिश में लगे रहते है कि किसी बहाने छू-छा का मौका मिले. अगर न मिल सके तो घूरने से उन्हें कौन रोक सकता है ? अनवरत घूरना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. कोई कैसे टोके ? कोई क्या कहकर रोके ? रोकने वाली जो उनके अंदर हया थी उसका तो पहले ही हरण हो चुका होता है ! कभी-कभी कड़क मिजाज की स्त्रियाँ ऐसे उचक्कों पर इस कदर फुफकारती हैं कि उनकी घिग्घी बँध जाती है. लेकिन जो संकोची, भीरू और भीड़ भरे स्थानेां में नरवस रहती हैं, उन स्त्रियों को तो भुगतना ही पड़ता है.
कटहल की तरह बसों से लटके यात्री बतलाते हैं बिहार की आबादी नियंत्रण से बाहर है. इसे सँभालो, नियंत्रित करो. किरायों को लेकर किचकिच कहती है कि बिहार में गरीबी बेहिसाब है. इसका हल कब निकालोगे ? बिहार के नगरेां में बसों का रेंगना पुकारता है - सत्ताधारियो , अपने दिल की तरह सड़कों को संकीर्ण और ऊबड़-खाबड़ न रहने दो. उदार बनो और सड़कों को उदार बनाओ. स्त्रियों के साथ छेड़छाड़ कानों में कहती है कि कैद में रहते-रहते काम रूग्ण हो गया है. छेड़छाड़ और घूरने की घटनायें उसके लक्षण हैं. इस लक्षण को नैतिकता , उपदेश और शासन से न दबाओ. बीमारी का इलाज करो. काम को आजाद करो. उसे एक सुशिक्षा के साथ बहने दो- बहता पानी निर्मला. जो शिक्षा चल रही है, वह कुशिक्षा है. सुशिक्षा से मेरा तात्पर्य एक ऐसी शिक्षा से है जो जवान होते ही लड़के -लड़कियों को करीब आने दे, एक-दूसरे को पूरी तरह जानने दे. एक-दूसरे को जानने में जो उचित मार्ग-दर्शन करे, वह सुशिक्षा है. सेक्स के तथ्य को ठीक-ठीक जानना ही उसकी बीमारियों से बचने का उपाय है. इसके बगैर सारे उपदेश, सारी नैतिक शिक्षाएँ केवल बीमारी को ढँकेगी. इससे बीमारी और बढ़ेगी.
मित्रो ! बसें केवल यात्रियों को नहीं ढोती हैं, वे आपकी सभ्यता-संस्कृति को भी अपने साथ लिये चलती हैं. उनके आइने में अपने को निहार कर जरा अपना रूप सँवार लें ताकि लोगों को आप सुंदर दिखें. आपका आचार-व्यवहार और बोली ‘औरन को शीतल करै, आपहुं शीतल होय ’.
पुणे में बसेां में भीड़-भाड़ नहीं होती. केवल आफिस टाइम में थोड़ी भीड़ देखी जाती है. चूँकि अधिकांश कामकाजी लोगों के पास अपनी गाड़ियाँ होती हैं, इसलिए बसों की संख्या भी वहाँ कम है. बस में दोनों तरफ की सीटों के बीच जहाँ लोग खड़े होते हैं, उनकी सुविधा के लिए ऊपर की पाइप से ‘हथपकड़ा’ लटका रहता है जो देखने में सुंदर और हाथों के लिए आरामदेह है. यात्री आराम से यात्रा करते हैं, कोई धक्का-मुक्की नहीं, बकझक नहीं, गरमागरम बहसें नहीं.
बिहार और पटने की बसेां में टिकट या किराये के पैसे के लिए यात्री और कंडक्टर के बीच जो जद्दोजहद चलती है, वह कभी-कभी जंग में बदल जाती है. यात्री चाहता है पैसा न लगे तो अच्छा . अगर देना ही पड़ जाय तो कम से कम. उधर कंडक्टर मूंछों पर ताव फेरता है कि पैसे तो लेकर रहेंगे. उनकी ‘रफ’ आवाज दहशत पैदा कर पैसे वसूलती है और कभी-कभी अनाड़ी आदमी से ज्यादा भी. किराये को लेकर घोर किचकिच.
पुणे की बसों में इसके ठीक विपरीत माहौल दिखायी पड़ता है. ऐसा तो दिल्ली की बसों में भी नहीं देखा जाता है. वहाँ भी कंडक्टरों को चिल्लाकर टिकट के लिए कहना पड़ता है. लेकिन पुणे की बसों में एक शांति रहती है, कोई चिल्लाहट नहीं. कंडक्टर को टिकट के लिए किसी को कहना नहीं पड़ता है. यात्री स्वंय लेते हैं. जो पास होल्डर हैं, वे यह नहीं कहते कि पास है, बल्कि पास निकालकर दिखला देते हैं. ‘हस्त कम्प्यूटर’ से टिकट देने की व्यवस्था तो मैंने पुणे में ही देखी. ऐसी व्यवस्था दिल्ली में भी नहीं है. पुणे की किराया-दर वैज्ञानिक है, दिल्ली की अवैज्ञानिक और पटने का तो कहना ही क्या ! कभी निश्चित, कभी अनिश्चित. एक साल पूर्व दिल्ली में किराया-दर थीं- 2,5,7 और 10 रूपये. इसका रहस्य मेरी समझ में न आया, क्योंकि कोई दूरी 3 रुपये की भी हो सकती है, कोई 4 की , कोई 6 की , कोई 8 और 9 की भी, फिर ऐसा क्यों ? पुणे में किराया दर 2, 3,4,5 ....15 है. दूरी के अनुसार ‘हस्त कम्प्यूटर’ से टिकट निकल आता है. संभवतः प्रति किलोमीटर किराया एक रुपया है. कोई शिकवा-शिकायत नहीं. जितने किलोमीटर चलिये , उतने का किराया दे दीजिये, हिसाब साफ है. पटने में डी.एम. जो किराया निश्चित कर देते हैं, उसमें भी बसवाला कभी-कभी यात्री का चेहरा देखकर ,उन्हें अनभुआर समझकर घालमेल करता रहता है.
पुणे की बसों में रफ्तार है, जबकि पटने में बसें ठेलों और रिक्शों के पीछे रेंगती चलती हैं. हनुमाननगर से पटना जंक्शन की दूरी लगभग 5 किमी है जिसे तय करने में मिनी बस को 30 से 40 मिनट लगते हैं. यह दूरी एक पदयात्री 45 मिनट में तय कर सकता है. यह तो पुणे में ही देखा गया कि एक मेन रोड पर बस के लिए अलग लेन है. उस पर केवल बसें चल सकती हैं. स्वाभाविक है कि बस में गति होगी.
एक अंतिम बात और जो पटने और दिल्ली की बसेां में दिखाई पड़ती है लेकिन पुणे की बसों में नहीं. वह है स्त्रियों के साथ छेड़छाड़ पटने में बसों से ज्यादा टेम्पुओं में इस तरह की घटनाएँ आहिस्ता से घटती रहती हैं, क्येांकि उनमें स्त्रियेां के लिए अलग सीटें नहीं होतीं. कुछ पुरुषयात्री इस कोशिश में लगे रहते है कि किसी बहाने छू-छा का मौका मिले. अगर न मिल सके तो घूरने से उन्हें कौन रोक सकता है ? अनवरत घूरना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. कोई कैसे टोके ? कोई क्या कहकर रोके ? रोकने वाली जो उनके अंदर हया थी उसका तो पहले ही हरण हो चुका होता है ! कभी-कभी कड़क मिजाज की स्त्रियाँ ऐसे उचक्कों पर इस कदर फुफकारती हैं कि उनकी घिग्घी बँध जाती है. लेकिन जो संकोची, भीरू और भीड़ भरे स्थानेां में नरवस रहती हैं, उन स्त्रियों को तो भुगतना ही पड़ता है.
कटहल की तरह बसों से लटके यात्री बतलाते हैं बिहार की आबादी नियंत्रण से बाहर है. इसे सँभालो, नियंत्रित करो. किरायों को लेकर किचकिच कहती है कि बिहार में गरीबी बेहिसाब है. इसका हल कब निकालोगे ? बिहार के नगरेां में बसों का रेंगना पुकारता है - सत्ताधारियो , अपने दिल की तरह सड़कों को संकीर्ण और ऊबड़-खाबड़ न रहने दो. उदार बनो और सड़कों को उदार बनाओ. स्त्रियों के साथ छेड़छाड़ कानों में कहती है कि कैद में रहते-रहते काम रूग्ण हो गया है. छेड़छाड़ और घूरने की घटनायें उसके लक्षण हैं. इस लक्षण को नैतिकता , उपदेश और शासन से न दबाओ. बीमारी का इलाज करो. काम को आजाद करो. उसे एक सुशिक्षा के साथ बहने दो- बहता पानी निर्मला. जो शिक्षा चल रही है, वह कुशिक्षा है. सुशिक्षा से मेरा तात्पर्य एक ऐसी शिक्षा से है जो जवान होते ही लड़के -लड़कियों को करीब आने दे, एक-दूसरे को पूरी तरह जानने दे. एक-दूसरे को जानने में जो उचित मार्ग-दर्शन करे, वह सुशिक्षा है. सेक्स के तथ्य को ठीक-ठीक जानना ही उसकी बीमारियों से बचने का उपाय है. इसके बगैर सारे उपदेश, सारी नैतिक शिक्षाएँ केवल बीमारी को ढँकेगी. इससे बीमारी और बढ़ेगी.
मित्रो ! बसें केवल यात्रियों को नहीं ढोती हैं, वे आपकी सभ्यता-संस्कृति को भी अपने साथ लिये चलती हैं. उनके आइने में अपने को निहार कर जरा अपना रूप सँवार लें ताकि लोगों को आप सुंदर दिखें. आपका आचार-व्यवहार और बोली ‘औरन को शीतल करै, आपहुं शीतल होय ’.
Wednesday, October 14, 2009
अच्छे आदमियो, राजनीति में आओ
वैसे तो हर आदमी अपने को अच्छा समझता है लेकिन आदमी का अच्छा होना तब शुरू होता है जब अपनी बुराइयाँ दिखने लगती हैं। जिस दिन बुराइयाँ पूरी तरह दिख जाती है, उस दिन वे विलीन हो जाती हैं, और आदमी अच्छा हो जाता है। यह असंभव है कि आदमी अपनी बुराइयाँ देख ले और वे उसके पास रह जायँ । यह असंभव है कि हम अपनी देह पर रेंगते हुए पिल्लू को देख लें और उसे फूंक भर कर या जैसे हो उसे न हटायें। पिल्लू की भौतिक सत्ता है, इसलिए भौतिक माध्यम से हटाना पड़ता है, लेकिन बुराई एक मानसिक दशा है, वह पहले मन में पैदा होती है, इसलिए उसे भगाने के लिए उसे देख भर लेना काफी होता है। हम दूसरों में बुराई देखते हैं और दूसरे हममें। दूसरों के देखने से बुराई हटती नहीं, छिप जाती है। दूसरों की बुराई देखने का अनिवार्य परिणाम होता है कि दूसरा अब अपनी बुराई छिपायेगा। और वह हममें बुराई देखना शुरू करेगा और हम अपनी बुराई छिपाने में लग जायेंगे। बुराई भगाने का एकमात्र कारगर उपाय है अपनी बुराई देखना। तो निष्कर्ष यह आया कि जो दूसरों में बुराई देखता है, वह बुरा आदमी है और जो अपने में बुराई देखता है वह अच्छा आदमी है। राजनेतागण केवल दूसरों में बुराई देखते हैं, इसलिए वे बुरे हैं। जब राजनीति में आने के लिए अच्छे आदमी का आह्वान मैं कर रहा हूँ, तो मेरा मतलब उन आदमियों से है जो अपनी बुराइयाँ देखने के लिए तैयार हैं, देख रहे हैं और देख लिया है। जिसने देख लिया है वह प्रथम पंक्ति का नेता। जो देख रहा है वह दूसरी पंक्ति का नेता और जो देखने के लिए तैयार है , वह कार्यकर्ता। कल मैं टीवी पर श्रीदेवी का नशीला नृत्य देख रहा था- ‘मेरे हाथों में नौ-नौ चूडियाँ हैं, थोड़ा ठहरो सजन मजबूरियाँ हैं’. उधर विधानसभा में भी कृषि मंत्री रेणु देवी विपक्षियों को चूड़ियाँ दिखा रही थीं। इसे देखकर सहकारिता मंत्री गिरिराज सिंह जोश में आ गये और रेणु देवी से चूड़ियाँ लेकर विपक्ष की ओर फेंक दीं। मैं तो दंग रह गया ! चूड़ियों से कितने काम लिये जा सकते हैं ! लेकिन इसका अर्थ नहीं समझ पाया। देखा-सुना करता था कि कायर पुरुषांें में जोश भरने के लिए व्यंग्य के तौर पर स्त्रियाँ उन्हें चूड़ियों का उपहार भेंट करती थीं- कि तुम अब चूड़ी पहनो और घर में बैठो। मैं रणक्षेत्र में चली। लेकिन वहाँ तो सभी रणक्षेत्र में थे। कोई महत्वपूर्ण मुद्दे पर बहस करने की वीरता नहीं दिखला रहे थे। जिनके पास विचार नहीं होता, वे शरीर से लड़ना शुरू कर देते हैं । विधानसभा में यही हुआ। सर्वत्र तनातनी थी। लोजपा के वीर विधायक महेश्वर सिंह माइक स्टैण्ड से उखाड़ चुके थे। कहीं कायरता नहीं थी ? फिर ये चूड़ियाँ ?
मैं कह रहा था कि जो अपनी बुराई देखे वह अच्छा आदमी और जो दूसरे की बुराई देखे वह बुरा आदमी। कबीर बहुत अच्छे आदमी थे, क्योंकि उन्हें अपनी बुराई पूरी तरह दिख गयी थी-
बुरा जो देखन मैं चला मुझसे बुरा न कोय
जब भी आदमी अपने भीतर समग्रता के साथ झाँकेगा तो यही लगेगा- ‘मुझसे बुरा न कोय।’ तुलसी ने भी अपने भीतर झाँका तो यही पाया- ‘मो सम कौन कुटिल खल कामी।’ यानी मेरे समान भीतर से टेढ़ा कौन है ? मुझसे बड़ा दुष्ट कौन है ? मेरे समान सेक्सी कौन है ? कमोबेश सभी आदमी ऐसे होते हैं। जिस क्षण अपने को ऐसा देख लेते हैं, वैसे नहीं रह जाते। उसी समय संत हो जाते है।
आज ‘सन्मागर्’ में पढ़ा कि बसपा के एक विधायक रामचन्द्र सिंह यादव ने कुछ राजनेताओं एवं कांग्रेस पार्टी का उनके गुणों के अनुसार नामकरण किया है। कोई खिलाड़ी किक्रेट खेलता है, कोई फुटबाॅल, कोई बाॅलीबाॅल , लेकिन राजनेता वोट-बैंक खेलता है। अपने पाले में वोट-बैंक करने का खेल । आजादी के बाद से ही यह खेल चल रहा है। इस कला में सिद्धहस्त कांग्रेस पार्टी ने ब्राह्मण , मुस्लिम, हरिजन आदि के वोट-बैंक पर कब्जा जमा रखा था। उसका पेट बड़ा था। इन सबको निगल गयी थी। इसलिए उसका नाम पड़ा अजगर। लालू प्रसाद ने उसमें थोड़ी-सी सेंध लगायी थी। फोड़ा था मुसलमानों और दलितों को । साँपनाथ नाम पड़ा। ज्यादा खतरनाक नीतीश कुमार हैं, इसलिए नागनाथ नाम पड़ा। साँपनाथ और नागनाथ का अंतर यह है कि पहला साँप जाति का सूचक है। साँपों में कुछ विषैले होते हैं, शेष विषहीन होते हैं। लेकिन लोग साँप मात्र से डरते हैं। और भय के कारण कभी-कभी विषहीन साँप के काटने से भी मरते हैं। मुझे लगता है कि यह नामकरण सही है, क्योंकि लालूजी खुल्लमखुल्ला गलत करते थे- कहते थे कि राज करने के लिए विकास की कोई जरूरत नहीं है। उनको पटकनियाँ देकर विकास-पुरुष सामने आये। ये ज्यादा खतरनाक सिद्ध होंगे, क्योंकि गलत लोगों के साथ रहकर सच्चा विकास संभव नहीं है। वे सिर्फ जनता को भरमाने में सफल होंगे। ज्यादा जहरीला होने के कारण वे नागनाथ कहलाये। रामविलास शर्मा गिरगिट नाथ। शायद बार-बार स्टैण्ड बदलने के कारण। लेकिन विधायकजी को अपनी सुप्रीमो मायावती का भी नामकरण बिच्छूनाथ करना चाहिए जो नहीं किया। कहा न, राजनीति में सारी बुराइयाँ दूसरों में देखी जाती हैं। किन्तु जो इससे अलग राजनीति की धारा मोड़ने के लिए छटपटा रहा है, उसका नाम मटुक नाथ होगा। यानी मुकुट का मालिक उन्हें ही होना चाहिए जो वास्तव में जनता के कल्याण के लिए राजनीति करे। इस धारा के लोग इन राजनेताओं से लड़ने नहीं जायेंगे, बल्कि जिन सोये हुए लोगों का वोट पाने के लिए वे सब उपद्रव करते हैं उन लोगों को सिर्फ जगायेंगे। अच्छी राजनीति का मतलब यह नहीं कि आनन फानन कुछ दिखावटी काम करके चुनाव में खड़े हो जाइये। चुनाव में खड़ा होना बुरा नहीं है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए बुराई से समझौता करना निश्चय ही बुरा है। इसलिए प्रेम पार्टी अगर बनती है तो उसका पहला काम होगा जनता को ज्ञान देना, प्रशिक्षित करना, सावधान करना , लेकिन किसी भी हालत में उसे भुनाना नहीं। यह काम आसान नहीं है- बहुत कठिन है डगर पनघट की।
29.07.09
मैं कह रहा था कि जो अपनी बुराई देखे वह अच्छा आदमी और जो दूसरे की बुराई देखे वह बुरा आदमी। कबीर बहुत अच्छे आदमी थे, क्योंकि उन्हें अपनी बुराई पूरी तरह दिख गयी थी-
बुरा जो देखन मैं चला मुझसे बुरा न कोय
जब भी आदमी अपने भीतर समग्रता के साथ झाँकेगा तो यही लगेगा- ‘मुझसे बुरा न कोय।’ तुलसी ने भी अपने भीतर झाँका तो यही पाया- ‘मो सम कौन कुटिल खल कामी।’ यानी मेरे समान भीतर से टेढ़ा कौन है ? मुझसे बड़ा दुष्ट कौन है ? मेरे समान सेक्सी कौन है ? कमोबेश सभी आदमी ऐसे होते हैं। जिस क्षण अपने को ऐसा देख लेते हैं, वैसे नहीं रह जाते। उसी समय संत हो जाते है।
आज ‘सन्मागर्’ में पढ़ा कि बसपा के एक विधायक रामचन्द्र सिंह यादव ने कुछ राजनेताओं एवं कांग्रेस पार्टी का उनके गुणों के अनुसार नामकरण किया है। कोई खिलाड़ी किक्रेट खेलता है, कोई फुटबाॅल, कोई बाॅलीबाॅल , लेकिन राजनेता वोट-बैंक खेलता है। अपने पाले में वोट-बैंक करने का खेल । आजादी के बाद से ही यह खेल चल रहा है। इस कला में सिद्धहस्त कांग्रेस पार्टी ने ब्राह्मण , मुस्लिम, हरिजन आदि के वोट-बैंक पर कब्जा जमा रखा था। उसका पेट बड़ा था। इन सबको निगल गयी थी। इसलिए उसका नाम पड़ा अजगर। लालू प्रसाद ने उसमें थोड़ी-सी सेंध लगायी थी। फोड़ा था मुसलमानों और दलितों को । साँपनाथ नाम पड़ा। ज्यादा खतरनाक नीतीश कुमार हैं, इसलिए नागनाथ नाम पड़ा। साँपनाथ और नागनाथ का अंतर यह है कि पहला साँप जाति का सूचक है। साँपों में कुछ विषैले होते हैं, शेष विषहीन होते हैं। लेकिन लोग साँप मात्र से डरते हैं। और भय के कारण कभी-कभी विषहीन साँप के काटने से भी मरते हैं। मुझे लगता है कि यह नामकरण सही है, क्योंकि लालूजी खुल्लमखुल्ला गलत करते थे- कहते थे कि राज करने के लिए विकास की कोई जरूरत नहीं है। उनको पटकनियाँ देकर विकास-पुरुष सामने आये। ये ज्यादा खतरनाक सिद्ध होंगे, क्योंकि गलत लोगों के साथ रहकर सच्चा विकास संभव नहीं है। वे सिर्फ जनता को भरमाने में सफल होंगे। ज्यादा जहरीला होने के कारण वे नागनाथ कहलाये। रामविलास शर्मा गिरगिट नाथ। शायद बार-बार स्टैण्ड बदलने के कारण। लेकिन विधायकजी को अपनी सुप्रीमो मायावती का भी नामकरण बिच्छूनाथ करना चाहिए जो नहीं किया। कहा न, राजनीति में सारी बुराइयाँ दूसरों में देखी जाती हैं। किन्तु जो इससे अलग राजनीति की धारा मोड़ने के लिए छटपटा रहा है, उसका नाम मटुक नाथ होगा। यानी मुकुट का मालिक उन्हें ही होना चाहिए जो वास्तव में जनता के कल्याण के लिए राजनीति करे। इस धारा के लोग इन राजनेताओं से लड़ने नहीं जायेंगे, बल्कि जिन सोये हुए लोगों का वोट पाने के लिए वे सब उपद्रव करते हैं उन लोगों को सिर्फ जगायेंगे। अच्छी राजनीति का मतलब यह नहीं कि आनन फानन कुछ दिखावटी काम करके चुनाव में खड़े हो जाइये। चुनाव में खड़ा होना बुरा नहीं है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए बुराई से समझौता करना निश्चय ही बुरा है। इसलिए प्रेम पार्टी अगर बनती है तो उसका पहला काम होगा जनता को ज्ञान देना, प्रशिक्षित करना, सावधान करना , लेकिन किसी भी हालत में उसे भुनाना नहीं। यह काम आसान नहीं है- बहुत कठिन है डगर पनघट की।
29.07.09
Monday, October 12, 2009
प्रेम न चीन्हैं कोय
अनुभव के मूलतः तीन तल होते हैं - काम (सेक्स), प्रेम और परम प्रेम. तीसरे तल को ईश्वरीय प्रेम, भक्ति या आध्यात्मिक प्रेम भी कहा जाता है. इस संबंध में खास बात यह है कि जो आदमी जिस तल पर जीता है, उसी तल की बात समझ पाता है. उससे भिन्न तल की बात ठीक-ठीक समझना लगभग असंभव है. अधिकांश मनुष्य काम-तल पर जीते हैं. इसलिए वे प्रेम नहीं समझ पाते. भक्ति को समझने की स्थिति तो प्रेम को समझने के बाद ही शुरू होती है.
प्रेम का दिव्य रूप तो हमें स्वीकार्य है, किन्तु उसके मानवीय रूप को लेकर असमंजस है. हम कहते हैं ईश्वर से प्रेम करो. लेकिन हम ईश्वर को कहाँ खोजेंगे ? हम कहते हैं देश से प्रेम करो, लेकिन देश हमें कहाँ मिलेगा ? जो भी मिलेंगे वे स्त्री-पुरुष होंगे. जो प्रेम का चरम रूप है, वही से हम आरंभ करना चाहते हैं ! हम एक ही बार सीढ़ी के आखिरी पायदान पर पाँव रखना चाहते है ! क्या यह संभव है ? अगर यह संभव होता तो आज सभी भारतवासी प्रेमपूर्ण हो गये होते. लेकिन वे घृणा , क्रोध, द्वेष, प्रतिस्पद्र्धा, प्रतिशोध, ईष्र्या, हिंसा आदि में डूबे हुए हैं. गलती कहाँ हुई है ? जिस मिट्टी में प्रेम जन्म लेता है, उसे हमने अस्वीकार कर दिया. प्रेम की जन्मभूमि देह के प्रति हमने घृणा पैदा कर दी. शारीरिक प्रेम कहकर हमने उसकी उपेक्षा की. परिणाम हुआ- व्यक्तित्व का विघटन. मनुष्य दो टुकड़ों में बँट गया- भीतर और बाहर. प्रकृति ने स्त्री-पुरुष के प्रति पारस्परिक आकर्षण दिया. संस्कृति ने उस आकर्षण को गलत बताया. फलतः मनुष्य भीतर से प्रकृति और बाहर से संस्कृति है. उसका व्यक्तित्व दुहरा हेा गया. जटिल व्यक्तित्व में प्रेम की संभावना नहीं होती. इसके लिए सरलता चाहिए. सरलता आती है प्रकृति की सहज स्वीकृति से. आज सरल व्यक्ति लुप्तप्राय प्रजाति हो गया ! दुनिया में सारे उपद्रव जटिल व्यक्तियों के द्वारा होते हैं. ये सरल व्यक्तियों का शिकार करते हैं, जैसे जंगल में हिंसक पशु हिरण का शिकार करते हैं. जटिल व्यक्ति यानी अशांत व्यक्ति. अशांत व्यक्ति दूसरे को शांत नहीं होने देता. जटिल व्यक्ति यानी दुखी व्यक्ति. दुखी व्यक्ति संसार को दुख के सिवा और क्या दे सकता है ? सरल व्यक्ति प्रसन्न रहता है. संसार को देने के लिए उनके पास प्रसन्नता है, शांति है, आनंद है.
सरल व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं- एक वे जिन्होंने सेक्स को सहज रूप में स्वीकार किया और उसी को जीवन का सत्य समझकर वहीं ठहर गये. दूसरे वे जिन्होंने काम के ताल-तलैया से प्रेम की नदी में छलांग लगा दी. प्रेम उच्चतर आनंद है. वह काम का ऊपरी तल है. जीवन का नियम है कि जो आदमी जिस तल पर जीता है, उसी तल पर बात समझता है. दूसरे तल की बात वह अपने तल पर लाकर ही समझता है और यहीं पर सब गुड़ गोबर हो जाता है; क्योंकि वह कृष्ण को भी अपने जैसा ही आदमी समझने की भूल कर बैठता है, जबकि कृष्ण मनुष्यता का चरम विकास हैं. मेरे समर्थक मित्र मुझसे कहते हैं - ‘‘ आपने कोई गलत काम नहीं किया है. आपने वही किया है जो सब करते हैं. अंतर सिर्फ इतना है कि दूसरे छिपकर करते हैं और आपने डंके की चोट पर किया. आपने साहस का परिचय दिया. आपने सच कहकर पटना और बिहार का गौरव बढ़ाया.’’ मैं ऐसे प्यारे मित्रों की बात सुनकर प्रसन्न होता हूँ. उनके प्रति मन ही मन कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ, यह जानते हुए भी कि मेरे मित्र ने मुझे अभी ठीक से समझा नहीं है. जब वे कहते हैं, आपने जो किया है, वह कौन नहीं करता है तो मेरी उनसे असहमति हो जाती है. मैं मौन रहता हूँ, क्योंकि मेरे तल पर आये बगैर वे मुझे नहीं समझ पायेंगे. मेरा बोलना वृथा होगा. फिर भी कभी-कभी किसी मित्र को कह देता हूँ, मैंने जो किया है, वह कहाँ कोई करता है ? काम-लोलुपता विश्वविद्यालय में व्याप्त है, गंभीर प्रेम कहाँ है ? यह भ्रम न हो कि सभी एक ही क्रिया में संलग्न होते हैं. काम में उतरते हैं सभी, लेकिन कामी और प्रेमी के उतरने में बड़ा भारी गुणात्मक फर्क हो जाता है. प्रेमी काम को गरिमा प्रदान करता है. काम के प्रति उनकी दृष्टि उतनी ही पावन होती है जितनी किसी मंदिर में पूजा के लिए प्रवेश करते हुए किसी सच्चे पुजारी की. उनकी सांसों में एक शांति, एक लय होती है. उनके तन-मन में समर्पण होता है. वह किसी का उपयोग नहीं कर रहा है, परस्पर अपने को लीन कर रहा है. वह कृतज्ञता से भरा होता है. कामियों में ठीक इसके विपरीत स्थिति होती है.
दूसरा बड़ा अंतर एक और है. कामी जितना ही भोगता है, उतना ही अतृप्त होता चला जाता है. प्रेमी तृप्त होता है; क्योंकि प्रेम काम केा गलाता है, मिटाता है. दूसरे शब्दों में कहँू , ज्यों-ज्यों आनंद उच्चतर होता जाता है, त्यों-त्यों निम्नतर सुख छूटता चला जाता है. जैसे दस हजार की नौकरी मिले तो सौ रुपये की नौकरी छूट जाती है.
प्रेम का सुख इतना बड़ा है और उसके अभाव का दुख इतना गहन है कि उसकी रक्षा के लिए साहस स्वयमेव आ जाता है. साहस प्रेम का सहचर है. प्रेमी विद्रेाही होता है, कामी नहीं हो सकता, क्योंकि विशुद्ध काम-सुख इतना बड़ा नहीं होता कि उसके लिए कोई खतरा मोल लिया जाय. धनवान कहेंगे वह तो कुछ पैसों में मिल जाता है, उसके लिए अपनी प्रतिष्ठा, पद, परिवार आदि क्यों गँवाया जाय ? गँवाना तो प्रेमी भी नहीं चाहता है. लेकिन जहाँ चुनाव करना ही पड़ जाय, प्रेम के मुुकाबले कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसको चुना जा सके. इसलिए मैं अपने प्यारे समर्थकों से कहूँगा कि वे समझने की कोशिश करें कि जो मुझसे हुआ है और हो रहा है, वह कहाँ किसी से हो रहा है ? मगर होना चाहिए.
अभी तो जटिल प्रकृति वालों से समाज भरा है. वे काम की निंदा करते हैं. प्रेमियों को देखकर भड़कते हैं; यद्यपि इनके बीच आप अगर रहें तो पता चलेगा कि काम को छोड़कर ये और कोई चर्चा नहीं करते. ये उल्टे ढंग से काम से जुड़े होते हैं. स्वस्थ व्यक्ति किसी की निंदा करते नहंीं देखे जाते. वे अपने में मगन रहते हैं, जबकि रुग्ण व्यक्ति दूसरों के जीवन में रस लेते हैं.
जटिल प्रकृति के लोग भी दो प्रकार के होते हैं- पहला उग्र, अधीर, ईष्र्यालु इत्यादि. इनकेा असभ्य कह सकते हैं. दूसरे उग्र नहीं होते, परहेजी होते हैं और धैर्य बनाये रखते हैं, लेकिन ईष्र्या , द्वेष , अमर्ष उनमें भी उतना ही होता है. इनको सभ्य व्यक्ति कह सकते हैं. जो अधीर और उग्र होते हैं, वे सरल लोगों और खासकर प्रेमियों पर तल्ख टिप्पणियाँ करते हैं, देखकर हँसते हैं और अट्टाहास करते हैं. अगर अधिक असभ्य रहे तो डंडा चला देते हैं. अगर पावर में रहे तो फट से उसका उपयोग कर देते हैं. मुझे ऐसे लोगों को झेलना पड़ा है और आगे भी झेलना पड़ेगा; क्येाकि प्रेम की यात्रा अनंत है, वह रुकने वाली नहीं है. इस मार्ग में गले में हार भी मिलेगा और मुख पर कालिख भी. लोग मार्ग में काँटे भी बिछायेंगे और पलक पाँवड़े भी. मेरी छाती छलनी होती रहेगी- चाहे किसी की मीठी बोली से या किसी की कड़वी बोली से या पीतल की गोली से. मुझे सब स्वीकार्य है, क्योंकि यह मार्ग प्रभु की ओर जाता है.
यह गलत शिक्षा बंद होनी चाहिए कि परमात्मा से प्रेम करो. सही शिक्षा यह है कि जिससे भी आपका प्रेम होता है, वही परमात्मा है. परमात्मा से प्रेम नहीं होता, बल्कि प्रेम से परमात्मा होता है. तुलसी सच कहते हैं- ‘प्रेम तें प्रकट होहिं मैं जाना’.
निष्कर्ष यह कि सरल चित्त शोभन है, जटिल चित्त अशोभन. काम का स्वस्थ रूप शोभन है, रुग्ण रूप अशोभन. प्रेम शोभन है, उसका विरोध अशोभन. और विरोध के लिए तमाम गलत हथकंडे अपनाना परम अशोभन है.
मई, 2008
प्रेम का दिव्य रूप तो हमें स्वीकार्य है, किन्तु उसके मानवीय रूप को लेकर असमंजस है. हम कहते हैं ईश्वर से प्रेम करो. लेकिन हम ईश्वर को कहाँ खोजेंगे ? हम कहते हैं देश से प्रेम करो, लेकिन देश हमें कहाँ मिलेगा ? जो भी मिलेंगे वे स्त्री-पुरुष होंगे. जो प्रेम का चरम रूप है, वही से हम आरंभ करना चाहते हैं ! हम एक ही बार सीढ़ी के आखिरी पायदान पर पाँव रखना चाहते है ! क्या यह संभव है ? अगर यह संभव होता तो आज सभी भारतवासी प्रेमपूर्ण हो गये होते. लेकिन वे घृणा , क्रोध, द्वेष, प्रतिस्पद्र्धा, प्रतिशोध, ईष्र्या, हिंसा आदि में डूबे हुए हैं. गलती कहाँ हुई है ? जिस मिट्टी में प्रेम जन्म लेता है, उसे हमने अस्वीकार कर दिया. प्रेम की जन्मभूमि देह के प्रति हमने घृणा पैदा कर दी. शारीरिक प्रेम कहकर हमने उसकी उपेक्षा की. परिणाम हुआ- व्यक्तित्व का विघटन. मनुष्य दो टुकड़ों में बँट गया- भीतर और बाहर. प्रकृति ने स्त्री-पुरुष के प्रति पारस्परिक आकर्षण दिया. संस्कृति ने उस आकर्षण को गलत बताया. फलतः मनुष्य भीतर से प्रकृति और बाहर से संस्कृति है. उसका व्यक्तित्व दुहरा हेा गया. जटिल व्यक्तित्व में प्रेम की संभावना नहीं होती. इसके लिए सरलता चाहिए. सरलता आती है प्रकृति की सहज स्वीकृति से. आज सरल व्यक्ति लुप्तप्राय प्रजाति हो गया ! दुनिया में सारे उपद्रव जटिल व्यक्तियों के द्वारा होते हैं. ये सरल व्यक्तियों का शिकार करते हैं, जैसे जंगल में हिंसक पशु हिरण का शिकार करते हैं. जटिल व्यक्ति यानी अशांत व्यक्ति. अशांत व्यक्ति दूसरे को शांत नहीं होने देता. जटिल व्यक्ति यानी दुखी व्यक्ति. दुखी व्यक्ति संसार को दुख के सिवा और क्या दे सकता है ? सरल व्यक्ति प्रसन्न रहता है. संसार को देने के लिए उनके पास प्रसन्नता है, शांति है, आनंद है.
सरल व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं- एक वे जिन्होंने सेक्स को सहज रूप में स्वीकार किया और उसी को जीवन का सत्य समझकर वहीं ठहर गये. दूसरे वे जिन्होंने काम के ताल-तलैया से प्रेम की नदी में छलांग लगा दी. प्रेम उच्चतर आनंद है. वह काम का ऊपरी तल है. जीवन का नियम है कि जो आदमी जिस तल पर जीता है, उसी तल पर बात समझता है. दूसरे तल की बात वह अपने तल पर लाकर ही समझता है और यहीं पर सब गुड़ गोबर हो जाता है; क्योंकि वह कृष्ण को भी अपने जैसा ही आदमी समझने की भूल कर बैठता है, जबकि कृष्ण मनुष्यता का चरम विकास हैं. मेरे समर्थक मित्र मुझसे कहते हैं - ‘‘ आपने कोई गलत काम नहीं किया है. आपने वही किया है जो सब करते हैं. अंतर सिर्फ इतना है कि दूसरे छिपकर करते हैं और आपने डंके की चोट पर किया. आपने साहस का परिचय दिया. आपने सच कहकर पटना और बिहार का गौरव बढ़ाया.’’ मैं ऐसे प्यारे मित्रों की बात सुनकर प्रसन्न होता हूँ. उनके प्रति मन ही मन कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ, यह जानते हुए भी कि मेरे मित्र ने मुझे अभी ठीक से समझा नहीं है. जब वे कहते हैं, आपने जो किया है, वह कौन नहीं करता है तो मेरी उनसे असहमति हो जाती है. मैं मौन रहता हूँ, क्योंकि मेरे तल पर आये बगैर वे मुझे नहीं समझ पायेंगे. मेरा बोलना वृथा होगा. फिर भी कभी-कभी किसी मित्र को कह देता हूँ, मैंने जो किया है, वह कहाँ कोई करता है ? काम-लोलुपता विश्वविद्यालय में व्याप्त है, गंभीर प्रेम कहाँ है ? यह भ्रम न हो कि सभी एक ही क्रिया में संलग्न होते हैं. काम में उतरते हैं सभी, लेकिन कामी और प्रेमी के उतरने में बड़ा भारी गुणात्मक फर्क हो जाता है. प्रेमी काम को गरिमा प्रदान करता है. काम के प्रति उनकी दृष्टि उतनी ही पावन होती है जितनी किसी मंदिर में पूजा के लिए प्रवेश करते हुए किसी सच्चे पुजारी की. उनकी सांसों में एक शांति, एक लय होती है. उनके तन-मन में समर्पण होता है. वह किसी का उपयोग नहीं कर रहा है, परस्पर अपने को लीन कर रहा है. वह कृतज्ञता से भरा होता है. कामियों में ठीक इसके विपरीत स्थिति होती है.
दूसरा बड़ा अंतर एक और है. कामी जितना ही भोगता है, उतना ही अतृप्त होता चला जाता है. प्रेमी तृप्त होता है; क्योंकि प्रेम काम केा गलाता है, मिटाता है. दूसरे शब्दों में कहँू , ज्यों-ज्यों आनंद उच्चतर होता जाता है, त्यों-त्यों निम्नतर सुख छूटता चला जाता है. जैसे दस हजार की नौकरी मिले तो सौ रुपये की नौकरी छूट जाती है.
प्रेम का सुख इतना बड़ा है और उसके अभाव का दुख इतना गहन है कि उसकी रक्षा के लिए साहस स्वयमेव आ जाता है. साहस प्रेम का सहचर है. प्रेमी विद्रेाही होता है, कामी नहीं हो सकता, क्योंकि विशुद्ध काम-सुख इतना बड़ा नहीं होता कि उसके लिए कोई खतरा मोल लिया जाय. धनवान कहेंगे वह तो कुछ पैसों में मिल जाता है, उसके लिए अपनी प्रतिष्ठा, पद, परिवार आदि क्यों गँवाया जाय ? गँवाना तो प्रेमी भी नहीं चाहता है. लेकिन जहाँ चुनाव करना ही पड़ जाय, प्रेम के मुुकाबले कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसको चुना जा सके. इसलिए मैं अपने प्यारे समर्थकों से कहूँगा कि वे समझने की कोशिश करें कि जो मुझसे हुआ है और हो रहा है, वह कहाँ किसी से हो रहा है ? मगर होना चाहिए.
अभी तो जटिल प्रकृति वालों से समाज भरा है. वे काम की निंदा करते हैं. प्रेमियों को देखकर भड़कते हैं; यद्यपि इनके बीच आप अगर रहें तो पता चलेगा कि काम को छोड़कर ये और कोई चर्चा नहीं करते. ये उल्टे ढंग से काम से जुड़े होते हैं. स्वस्थ व्यक्ति किसी की निंदा करते नहंीं देखे जाते. वे अपने में मगन रहते हैं, जबकि रुग्ण व्यक्ति दूसरों के जीवन में रस लेते हैं.
जटिल प्रकृति के लोग भी दो प्रकार के होते हैं- पहला उग्र, अधीर, ईष्र्यालु इत्यादि. इनकेा असभ्य कह सकते हैं. दूसरे उग्र नहीं होते, परहेजी होते हैं और धैर्य बनाये रखते हैं, लेकिन ईष्र्या , द्वेष , अमर्ष उनमें भी उतना ही होता है. इनको सभ्य व्यक्ति कह सकते हैं. जो अधीर और उग्र होते हैं, वे सरल लोगों और खासकर प्रेमियों पर तल्ख टिप्पणियाँ करते हैं, देखकर हँसते हैं और अट्टाहास करते हैं. अगर अधिक असभ्य रहे तो डंडा चला देते हैं. अगर पावर में रहे तो फट से उसका उपयोग कर देते हैं. मुझे ऐसे लोगों को झेलना पड़ा है और आगे भी झेलना पड़ेगा; क्येाकि प्रेम की यात्रा अनंत है, वह रुकने वाली नहीं है. इस मार्ग में गले में हार भी मिलेगा और मुख पर कालिख भी. लोग मार्ग में काँटे भी बिछायेंगे और पलक पाँवड़े भी. मेरी छाती छलनी होती रहेगी- चाहे किसी की मीठी बोली से या किसी की कड़वी बोली से या पीतल की गोली से. मुझे सब स्वीकार्य है, क्योंकि यह मार्ग प्रभु की ओर जाता है.
यह गलत शिक्षा बंद होनी चाहिए कि परमात्मा से प्रेम करो. सही शिक्षा यह है कि जिससे भी आपका प्रेम होता है, वही परमात्मा है. परमात्मा से प्रेम नहीं होता, बल्कि प्रेम से परमात्मा होता है. तुलसी सच कहते हैं- ‘प्रेम तें प्रकट होहिं मैं जाना’.
निष्कर्ष यह कि सरल चित्त शोभन है, जटिल चित्त अशोभन. काम का स्वस्थ रूप शोभन है, रुग्ण रूप अशोभन. प्रेम शोभन है, उसका विरोध अशोभन. और विरोध के लिए तमाम गलत हथकंडे अपनाना परम अशोभन है.
मई, 2008
Saturday, October 10, 2009
पीसू इंडिया न्यूज पोर्टल ( www.pisuindia.com) के द्वारा लिया गया साक्षात्कार
प्रिय राकेशजी
अभी-अभी आपकी प्रश्नावली मिली. मैं अपेक्षा कर रहा था कि आप कुछ नये प्रकार के प्रश्न करेंगे. युवावर्गों की कुछ ऐसी समस्याएँ रखेंगे जिनका दैनंदिन जीवन में उन्हें सामना करना पड़ता है. लेकिन ये वही प्रश्न हैं जिनके जवाब हम लंबे समय से देते आ रहे हैं और अब ऊब चुके हैं. इसलिए सहसा मन में आया, इसे छोड़ दूँ और नये प्रश्नों की माँग करूँ ! मगर इससे आपको निराशा हाथ लग सकती थी और यह मेरे लिए असह्य होता. इसलिए जवाब दे रहा हूँ.
1. आपकी और जूली की मुलाकात कैसे हुई थी ? सर्वप्रथम प्यार का इजहार किस तरफ से हुआ ?
मेरी और जूली की मुलाकात बीएन काॅलेज में क्लास में हुई. यह क्लास करने में नियमित नहीं थी. कभी आती थी, कभी नहीं. प्रथम मुलाकात मंें हम दोनों के मन के किसी कोने में यह भाव नहीं था कि कभी हम दोनों प्यार कर सकते हैं. यह अगर प्रतिदिन क्लास आती और परस्पर एक-दूसरे को जानने का मौका मिलता तो शायद जो बाद में घटा वह पहले भी घट सकता था. क्लास नियमित न आने से इन पर मेरा कोई ध्यान नहीं था और न यह मुझे पसंद करती थी.
बीए पार्ट-1 के बाद जब यह नियम से क्लास आने लगी तब पढ़ाई के क्रम में यह मेरे नवीन, बेबाक, ईमानदार, सहज, साहसी विचार और व्यवहार से प्रभावित हुई. मैं इसकी तेजस्विता, सूझ-बूझ, संवेदनशीलता और साहित्य की अचूक समझ से प्रभावित हुआ. हमलोग विचारों का आदान-प्रदान करने लगे. हमारा प्यार विचारों पर सवार होकर आया. धीरे-धीरे हमलोग एक-दूसरे के निजी जीवन की जिज्ञासाएँ करने लगे. ज्यों-ज्यों एक-दूसरे को जानते गये , त्यों-त्यों स्पष्ट होता गया कि हमलोग एक-दूजे के लिए बने हैं और एक दिन जूली ने अचानक प्यार का इजहार कर दिया.
2. जूली के घरवालों की क्या प्रतिक्रिया थी ?
जूली के घरवालों को बहुत दिनों के बाद मालूम हुआ, क्योंकि वे पटने से तीन सौ किलोमीटर दूर एक कस्बे में रहते थे. उन्हें मेरी पत्नी और उनके सहयोगियों की तरफ से जानकारी दी गयी. उनके घरवालों के फूटते आक्रेाश को वे लोग चतुराई से भुनाना चाहते थे. उन लोगों ने जूली को मुझसे अलग करने के लिए अनेक प्रकार की बुद्धिमत्तापूर्ण साजिशें रचीं. लेकिन शायद परमात्मा हमारे पक्ष में था. इसलिए उन्हें विफलता हाथ लगी.
3. क्या आप अपनी पहली पत्नी से खुश नहीं थे, ऐसी क्या वजह थी कि आपने जूली को अपनाया ?
पत्नी और मुझमें तालमेल नहीं था. लेकिन जब हमलोग विवाहित हो ही चुके थे, तो एक समझौता के साथ सामान्य सुखी दाम्पत्य जीवन शायद जी सकते थे. लेकिन पत्नी के मैके वालों के निरंतर मूढ़तापूर्ण हस्तक्षेप ने हमलोगों को मिलने और समझौते के साथ जीने नहीं दिया. उनकी एक ही शर्त थी कि मेरा कहीं प्रेम न हो, चाहे पत्नी से प्रेम न भी हो तो चलेगा. यह मेरे लिए घुटन भरा था. प्रेम-प्यासी मेरी आत्मा चीत्कार कर उठी थी. किसी भी कीमत पर गुलामी मुझे सह्य नहीं थी. आजादी की साँस लेते हुए जिनके साथ समानता और समझदारी के साथ सुन्दर जीवन जी सकूँ, ऐसी स्त्री की तलाश थी. दैवयोग से अंधेरे जीवन में रोशनी बनकर जूली आ गयी. अपने कदम को न्यायोचित ठहराने केे लिए पत्नी की किसी कमी को उघाड़ने में मेरी दिलचस्पी जरा भी नहीं है. कमियाँ दोनों में रही होंगी. कमियाँ मनुष्य में होती ही हैं.
4. क्या आपकेा नहीं लगता है कि ऐसा करके आपने कुछ गलत किया है ?
कुछ कारणवश समाज ने वासना और प्रेम के प्रति गलत दृष्टि अपना ली है. और वही गलत दृष्टि एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को संक्रमित करती आ रही है. गलत धारणा एक अच्छे संस्कार के रूप में सबके भीतर बैठा दी जाती है. फलतः दमित लोग प्रकृति के इस अद्भुत रहस्यमय वरदान से वंचित रह जाते हैं. विरले किसी की दृष्टि खुलती है और वह सचाई को देख लेता है. उन्हें ताकत भी सचाई से ही प्राप्त हो जाती है. फिर इसका अर्थ नहीं रह जाता कि वह अकेला है या उसके साथ भीड़ है. झूठ को और गलत को भीड़ की जरूरत पड़ती है. सोचिये, कोई आदमी कार से जा रहा है और ईंट-पत्थर से आप उसकी कार नहीं तोड़ेंगे, किसी साइकिल वाले की हवा नहीं निकालेंगे. लेकिन ज्योंही भीड़ के द्वारा रोड जाम की घोषणा होती है, सारे गलत काम का लायसेंस आपको मिल जाता है. उस समय आपको नहीं लगता कि गलत कर रहे हैं. जब अकेला व्यक्ति सारे अंधकार से लड़ने के लिए तैयार हो जाय तो समझिये कुछ बात जरूर है. किसी अन्य स्रोत से उन्हें ताकत जरूर मिल रही है. हम दोनों अकेले लड़ रहे हैं , क्योंकि हमें पता है कि जीवन में पहली बार हमलोगों के द्वारा सबसे सही और सबसे जरूरी काम हो रहा है.
5. आपकी शादी के विरोध में छात्रों ने हंगामा किया था, खासकर पटना में क्यों ? क्या प्रतिक्रिया देना चाहेंगे ?
हमलोगों ने शादी नहीं की है. सिर्फ प्रेम किया है और इससे बड़ा कुछ होता नहीं है जिसे किया जा सके.
अनेक प्रकार की प्रताड़नाओं के बाद 7 जुलाई, 2006 को एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत हम पर हमला किया गया था. उसके कई पहलू थे- मुझे पीटना और जूली को मारकर विकलांग करना या भीड़ में जीवन का पत्ता साफ कर देना ताकि जिम्मेदारी भीड़ पर चली जाय. दूसरा पहलू था सारे मीडियाकर्मियों को इकट्ठा कर पूरे देश-दुनिया में मेरे भ्रष्टाचार को उजागर करना, ताकि हमलोग कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रह जायँ. तीसरा जेल भेजवाना और चैथा था नौकरी से निकलवाना. जेल जाना बाकी है, बाकी सब बीध पूरा हो गया है.
कुछ छात्रों का उपयोग पटना विश्वविद्यालय के कुछ शातिर प्रोफेसरों ने मेरे खिलाफ किया था. लेकिन 10-5 बरगलाये गये विद्यार्थियों को छोड़ विशाल छात्र-समुदाय मेरे पक्ष में था. 11 जुलाई, 2006 को विद्यार्थियों ने बी. एन. काॅलेज कैम्पस में स्वतः-स्फूर्त भावावेश में आकर मेरा भव्य स्वागत किया था. मेरे शानदार स्वागत को सहन करने में असमर्थ ईष्र्याग्नि में जलते हुए एक-दो शिक्षक नेताओं और प्राचार्य ने मुझे निलंबित करवा दिया. मेरे निलंबन के बाद मेरे समर्थन में विद्यार्थियों की जो भीड़ उमड़ी, वह ऐतिहासिक थी. जे.पी. आंदोलन के बाद संभवतः वह सबसे बड़ा जुलूस था. छात्रों का विशाल समुदाय उस समय भी मेरे साथ था और आज भी है. लेकिन मैं अपने हित में उनका इस्तेमाल नहीं करना चाहता.
6. आप प्यार को किस तरह परिभाषित करते हैं ? क्या आपके संबंध को प्यार का दर्जा देना चाहिए, क्यों ?
जब दूसरे के लिए जीने में आनंद आने लगे. दूसरा अपना जैसा लगने लगे. उसके सुख में सुख और दुख में दुख का अनुभव होने लगे, तो समझिये प्यार हो गया. यही संबंध जब और गहराई में उतरता है तो प्रेमी मिट जाता है, प्रिय ही बचता है. प्रेम में दो नहीं रहते. इसी को कबीर ने कहा है- ‘प्रेम गली अति साँकरी तामें दो न समाय’.
जनसाधारण में इसका गलत अर्थ प्रचलित है. वहाँ इसका अर्थ है कि एक आदमी से दो आदमी प्यार नहीं कर सकता. जैसे एक म्यान में देा तलवारें नहीं रह सकतीं. एक आदमी एक को ही प्यार कर सकता है. लेकिन यहाँ तो सँकरी प्रेम गली की बात है. एक आदमी एक से भी प्रेम करेंगे, तब भी तो दो रहेंगे न ? लेकिन प्रेम में दो रहता ही नहीं. वे देा हों या दो हजार या दो अरब सब मिलकर एक हो जायँ तो प्यार है. ऐसी घटना तभी घटती है जब प्यार करनेवाला खो जाय. वही मिटेगा तभी कोई नहीं बचेगा - एक रह जायेगा. यह प्रेम की असाधारण अवस्था है और साधारण प्रेम ही इस असाधारण अवस्था में पहँुचाने में समर्थ है. जो मूढ़ साधारण प्रेम की निंदा करता है, वह कभी भी असाधारण प्रेम की ओर प्रयाण नहीं कर पायेगा.
जो व्यक्ति जिस स्तर का होता है, उसी स्तर से हमारे प्रेम को देखता है. किसी के पास देखने का इसके अलावा सामान्यतः कोई रास्ता भी नहीं होता. कोई भी आदमी मेरे प्यार को वही दर्जा देगा जिस दर्जे का आदमी वह है.
हमें व्यक्तिगत तौर पर किसी से कोई दर्जा नहीं लेना है, क्योंकि यह बेवकूफी से भरी बात है. हमारे स्वभाव और जीवन से अनभिज्ञ दूसरा हमारा निर्णायक कैसे हो सकता है ? असली बात यह है कि हम उत्तरोतर अपने प्रेम को गहराई प्रदान करें और हम अपने अहंकार केा मिटायें तो प्रेम का असली स्वाद चखेंगे.
7. जूली को कभी ऐसा महसूस नहीं होता होगा कि आपके साथ शादी करके उसने कुछ गलत किया है ? शायद वो किसी और से शादी करती तो आपसे कहीं ज्यादा स्मार्ट जीवनसाथी मिल सकता था.
जूली नासमझ नहीं है कि बिना विचारे कुछ कर ले और बाद में पछताये. पछताता वह है जो फूल समझकर किसी तरफ लपके और उन्हें काँटा मिल जाय. जिनके प्रेम का आरंभ ही काँटों पर चलने से हुआ हो, उनके जीवन में आगे फूल ही फूल हैं.
समाज में अंधों की भरमार है. बिना विवेक जगाये प्रेम करने चल पड़ते हैं और बाद में सोचते हैं कि गलती हो गयी. जूली अपने मन मुताबिक जीवन जी रही है. जो आज ठीक से जी रही है, वही कल भी ठीक से जीयेगी. सही जीवन का नियम है कि हम साथ चलें, परस्पर सहयोग करें लेकिन पराधीनता को न ओढ़ें. स्वतंत्रता परम सुख है. पराधीनता दुख है. जीवन को गणित समझने वाले लोग जीवन जी नहीं पाते. लाभ-हानि का बही-खाता लेकर चलने वाले लोग प्रेम नहीं कर पाते. प्रेम एक रिस्क है. प्रेम एक दुस्साहस है. ‘चढ़ै तो चाखै प्रेम रस गिरै तो चकनाचूर’. चकनाचूर होने के डर से हर कोई प्रेम-पर्वत पर चढ़ नहीं पाता. इसीलिए सभी आदमी प्रेम नहीं कर पाते. नून तेल लकड़ी वाले सामान्य, मरियल और उबाऊ वैवाहिक जीवन व्यतीत करते हैं. यहाँ यह बता दूँ कि मैं मरियल वैवाहिक जीवन का विरोधी नहीं हूँ. आदमी की स्वतंत्रता है, जो जिस तरह जीना चाहे जीये. किसी को ध्यान इतना ही रखना है कि उसके जीने से दूसरे का जीना हराम न हो.
शारीरिक सौष्ठव और स्मार्टनेस सबको भाता है. देह बड़ी सुंदर और आकर्षक होती है, लेकिन उससे भी अधिक सुंदर मन होता है और सबसे गहरा सौन्दर्य हृदय का होता है. ये सौन्दर्य के तीन सोपान हैं. जो पहली सीढ़ी पर अटका है , वह केवल बाहरी सौन्दर्य को देख पायेगा जो क्षणिक है. हृदय सौन्दर्य का सागर है. आपको एक उदाहरण देता हूँ. मदर टेरेसा के चेहरे पर कितनी झुर्रियाँ हैं ! लेकिन मुझे वह अपूर्व सुन्दर मालूम पड़ती है. लता मंगेशकर के चेहरे को स्क्रीन पर बारीकी से अगर देखा होगा तो अनेक गड्ढे हैं. लेकिन मुझे उससे अधिक सुंदर स्त्री दिखती ही नहीं. वह ऐसा शानदार सौन्दर्य है जिसके चरणों पर लोट-पोट हो जाने में आनंद है. जूली को भी भगवान ने ऐसी ही आँख दी है. इसलिए मेरे सौन्दर्य के आगे सारे स्मार्ट लड़के उन्हें फीके मालूम पड़ते हैं. काश, स्मार्ट लड़के इस बात को समझ पाते ! और स्मार्ट लड़की इस रहस्य को जान पाती !
8. जब आप और जूली घर से बाहर निकलते हैं, तो लोगों की क्या प्रतिक्रिया होती हैै ? कैसा महसूस होता है ?
जब जूली और मैं बाहर निकलता हूँ तो अनेक बार अच्छी प्रतिक्रिया होती है. विरोधी तो भरे पड़े हैं. लेकिन वे टकराते नहंीं हैं. क्या लेना-देना ? कुतूहल से लोग खुद देखते और दिखाते हैं. कानाफूसी करते हैं, मुस्कुराते हैं और आगे बढ़ जाते हैं. अच्छे भाव वाले लोग प्रेम से मिलते हैं, सहानुभूति जताते हैं. मदद करने की इच्छा व्यक्त करते हैं. पता का आदान-प्रदान करते हैं. कुछ लोलुप लोग जूली को देखकर लाड़ टपकाते हैं. एक बार हमलोग मोटरसाइकिल से कहीं जा रहे थे. डाकबंगला चैराहे पर गाड़ी रुकी. उधर से दो लफंगे भी मोटरसाइकिल से गुजर रहे थे. एक ने जूली की तरफ देखने का दूसरे को इशारा किया. दूसरे की आवाज सुनाई पड़ी- तब न ई बुढ़वा पगलैल है ! सड़क पर कभी-कभी मंदबुद्धि के भी कुछ युवा मिलते हैं. वे कुछ ज्यादा नहीं बोल पाते. मेरे कुछ आगे निकल जाने पर जोर से ‘मटुकनाथ’ बोल देंगे, ही-ही करेंगे. कभी-कभी ऐसे लोगों पर बहुत गुस्सा आता है. क्षण भर के लिए मन में आता है कि उठा के पटक दूँ और लगाऊँ जोर से घूँसा. पर दूसरे ही क्षण वह भाव विलीन हो जाता है. उन बेचारों की दीनता सामने आती है. दया उमड़ने लगती है. कभी-कभी यह भी भाव होता है कि कितनों से लड़ोगे मटुक, अनदेखी-अनसुनी करो और आगे बढ़ो. भारतीय नारियों को जैसे सड़कों पर उचक्कों-लफंगों को झेलना पड़ता है, कुछ ऐसा ही मुझे झेलना पड़ता है. ऐसा न होता तो अनुभवात्मक स्तर पर नारी की पीड़ा मैं नहीं समझ पाता.
प्रेम इस अर्थ में साधना है कि हम सबके दुर्भाव का सामना करें, लेकिन उनके प्रति मन में दुर्भावना नहीं आने दें. जितना हम ऐसा कर पाने में समर्थ हो रहे हैं, उतनी ही हमारी चेतना निखर रही है. इसलिए किसी के प्रति हमारे मन में प्रतिशोध का भाव नहीं है. ये पंक्तियाँ हमें याद आती हंै-
दुनिया के रंज सहना और कुछ न मुँह से कहना
सच्चाइयों के बल पर आगे को बढ़ते रहना
9. अच्छा ये बताइये कि आज के युवा कैसा प्यार करते हैं ? तन का या फिर मन का ?
तन और मन का विभाजन गलत है, क्योंकि दोनों दो चीजें नहीं हैं. एक को छोड़कर दूसरे का कोई अस्तित्व ही नहीं होता. दोनों के मिलन से मनुष्य की सत्ता बनती है. आप इस तरह से समझें कि यह जो शरीर है, वह मन का ही स्थूल रूप है, क्योंकि शरीर के पोर-पोर में मन समाया हुआ है और जो मन है वह शरीर का ही सूक्ष्म रूप है. शरीर का सूक्ष्म रूप मन है और मन का स्थूल रूप शरीर.
अगर कोई किसी विवशता में केवल मानसिक प्रेम करेगा तो वह प्रेम पिलपिला होगा. अगर कहीं शरीर ही मिले, मन न मिले तो वह बलात्कार होगा, प्यार नहीं. प्यार मन और शरीर दोनों के मिलने से होता है.
एक प्यार और होता है, जो शरीर और मन से होते हुए ऊपर उठ जाता है. हृदय का या आत्मा का जब पट खुलता है तो उस प्यार का कहना क्या ! चैबीसों घंटे मदिरापान है वह. कबीर, मीरा, चैतन्य, नारद आदि तमाम संतों का प्रेम इसी श्रेणी का है. प्यार अपनी सार्थकता को इसी स्थान पर पहुँच कर प्राप्त करता है. इसके पहले प्यार विषण्ण और दुखी होने को बाध्य है. निश्चय ही उसमें आनंद रहेगा, लेकिन पीड़ा भी रहेगी.
10. हमारा समाज प्यार करने वाले जोड़े के खिलाफ क्यों रहता है?
क्योंकि प्यार के बारे में उसकी समझ गलत है. यद्यपि मैं कहना चाहूँगा कि पूर्णतः गलत भी नहीं है. आंशिक रूप से सही भी है. कारण यह है कि प्यार बहुत खतरनाक चीज है. नासमझ आदमी के हाथों में पड़कर प्यार बहुत बड़ा विध्वंस ले आता है. आप प्यार को परमाणु ऊर्जा समझिये जिससे परमाणु बम बनाकर विनाश किया जा सकता है और जिससे बिजली उत्पादित कर निर्माण भी किया जा सकता है. प्यार के बिना जीवन का निर्माण संभव नहीं है. प्रेम और वासना में गहरा रिश्ता है. इन दोनों के रिश्ते को समझ कर प्रेम को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए. लेकिन अज्ञानतावश समाज इसे समझने की कोशिश नहीं करता, सिर्फ इससे भागता है. समाज साँप से भागता है और साँप को मारता है. ज्ञानी लोग उसे पालते हैं और उसके जहर से दवा बनाकर अमृत का काम लेते हैं. यही हाल प्यार का है, वह जहर भी है और अमृत भी. आपके ज्ञान पर निर्भर करता है कि आप उसका कौन-सा हिस्सा ले पाते हैं. दुनिया की सभी वस्तुओं के दुहरे उपयोग हैं. सब आप पर निर्भर है. साँप बाहर रहता है, कभी आपकी मुलाकात हो सकती है, कभी नहीं भी. लेकिन वासना की साँपिन आपके अंदर पैदा होती है. उससे तो भागने का उपाय ही नहीं. उसे जानना ही होगा. बिना जाने मुक्ति नहीं. और समाज भाग रहा है. कोई माता-पिता अपने बच्चों से सेक्स की बात नहीं करता है. विडंबना यह है कि वह बच्चा सेक्स-कर्म की ही देन है. युवावर्ग को इस तरह का स्वस्थ ज्ञान फैलाने का दायित्व अपने ऊपर लेना होगा, तभी समाज बदल सकता है.
11 पिसु इंडिया के माध्यम से युवा-वर्ग को क्या कहना चाहेंगे?
पिसु इंडिया के माध्यम से मैं युवा-वर्ग को निम्नलिखित बातें कहना चाहूँगा-
क. दूसरों के जीवन में दिलचस्पी लेने से अपने जीवन की समस्या हल नहीं होती. इसके लिए अपने जीवन को गहराई से देखना पड़ता है. जो अपने जीवन की गहराई में जितना प्रवेश करेंगे, वे उतना ही उसे देख पाने में सक्षम होंगे. देखने मात्र से समस्या हल होती है, अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता है.
ख युवा वर्ग किसी का अनुकरण न करे, अपने मूल स्वभाव को पहचाने और उसे विकसित करने का रास्ता ढूँढे़़. जो अपने भूल स्वभाव को पहचान लेगा, वही दूसरों के जीवन से सीख ले पायेगा. वरना वह भटक जायेगा.
ग. युवा वर्ग की सामान्य समस्या प्रेम है. लड़के प्रेम के लिए तड़पते हैं, लेकिन लड़कियाँ नहीं मिलतीं. लड़कियाँ अपने जीवन को अधिकाधिक सुरक्षित रखने के लिए विवाह के भरोसे रहती हैं जो उनके अभिभावकों के माध्यम से उन्हें प्राप्त होते हैं. लड़कियों के साथ समान व्यवहार की जरूरत है. यह जरूरी है कि प्रेम खोजनेवाला प्रत्येक युवा अपने घर की स्त्रियेां को प्रेम की आजादी दे. जो ऐसा करेगा, वह प्यासा नहीं रहेगा. अगर बड़ी संख्या में युवा वर्ग ऐसा करेंगे तो बड़ी संख्या में लोग प्रेम पाने में सफल होंगे. इसके अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है. इक्के-दुक्के लोग तो वर्तमान व्यवस्था में भी प्रेम पा लेते हैं, लेकिन बड़ी संख्या में प्रेम पाने के लिए दकियानूसी विचारों से बाहर आना होगा और अपनी बहनों को प्रेम की आजादी देनी होगी.
घ. पढ़ाई और प्यार में रार नहीं है. इस तरह से भी प्रेम किया जा सकता है जिससे पढ़ाई में और वृद्धि हो, प्रेम-रस के साथ अध्ययन-रस बढ़े.
मटुकजूली
8.10.09
अभी-अभी आपकी प्रश्नावली मिली. मैं अपेक्षा कर रहा था कि आप कुछ नये प्रकार के प्रश्न करेंगे. युवावर्गों की कुछ ऐसी समस्याएँ रखेंगे जिनका दैनंदिन जीवन में उन्हें सामना करना पड़ता है. लेकिन ये वही प्रश्न हैं जिनके जवाब हम लंबे समय से देते आ रहे हैं और अब ऊब चुके हैं. इसलिए सहसा मन में आया, इसे छोड़ दूँ और नये प्रश्नों की माँग करूँ ! मगर इससे आपको निराशा हाथ लग सकती थी और यह मेरे लिए असह्य होता. इसलिए जवाब दे रहा हूँ.
1. आपकी और जूली की मुलाकात कैसे हुई थी ? सर्वप्रथम प्यार का इजहार किस तरफ से हुआ ?
मेरी और जूली की मुलाकात बीएन काॅलेज में क्लास में हुई. यह क्लास करने में नियमित नहीं थी. कभी आती थी, कभी नहीं. प्रथम मुलाकात मंें हम दोनों के मन के किसी कोने में यह भाव नहीं था कि कभी हम दोनों प्यार कर सकते हैं. यह अगर प्रतिदिन क्लास आती और परस्पर एक-दूसरे को जानने का मौका मिलता तो शायद जो बाद में घटा वह पहले भी घट सकता था. क्लास नियमित न आने से इन पर मेरा कोई ध्यान नहीं था और न यह मुझे पसंद करती थी.
बीए पार्ट-1 के बाद जब यह नियम से क्लास आने लगी तब पढ़ाई के क्रम में यह मेरे नवीन, बेबाक, ईमानदार, सहज, साहसी विचार और व्यवहार से प्रभावित हुई. मैं इसकी तेजस्विता, सूझ-बूझ, संवेदनशीलता और साहित्य की अचूक समझ से प्रभावित हुआ. हमलोग विचारों का आदान-प्रदान करने लगे. हमारा प्यार विचारों पर सवार होकर आया. धीरे-धीरे हमलोग एक-दूसरे के निजी जीवन की जिज्ञासाएँ करने लगे. ज्यों-ज्यों एक-दूसरे को जानते गये , त्यों-त्यों स्पष्ट होता गया कि हमलोग एक-दूजे के लिए बने हैं और एक दिन जूली ने अचानक प्यार का इजहार कर दिया.
2. जूली के घरवालों की क्या प्रतिक्रिया थी ?
जूली के घरवालों को बहुत दिनों के बाद मालूम हुआ, क्योंकि वे पटने से तीन सौ किलोमीटर दूर एक कस्बे में रहते थे. उन्हें मेरी पत्नी और उनके सहयोगियों की तरफ से जानकारी दी गयी. उनके घरवालों के फूटते आक्रेाश को वे लोग चतुराई से भुनाना चाहते थे. उन लोगों ने जूली को मुझसे अलग करने के लिए अनेक प्रकार की बुद्धिमत्तापूर्ण साजिशें रचीं. लेकिन शायद परमात्मा हमारे पक्ष में था. इसलिए उन्हें विफलता हाथ लगी.
3. क्या आप अपनी पहली पत्नी से खुश नहीं थे, ऐसी क्या वजह थी कि आपने जूली को अपनाया ?
पत्नी और मुझमें तालमेल नहीं था. लेकिन जब हमलोग विवाहित हो ही चुके थे, तो एक समझौता के साथ सामान्य सुखी दाम्पत्य जीवन शायद जी सकते थे. लेकिन पत्नी के मैके वालों के निरंतर मूढ़तापूर्ण हस्तक्षेप ने हमलोगों को मिलने और समझौते के साथ जीने नहीं दिया. उनकी एक ही शर्त थी कि मेरा कहीं प्रेम न हो, चाहे पत्नी से प्रेम न भी हो तो चलेगा. यह मेरे लिए घुटन भरा था. प्रेम-प्यासी मेरी आत्मा चीत्कार कर उठी थी. किसी भी कीमत पर गुलामी मुझे सह्य नहीं थी. आजादी की साँस लेते हुए जिनके साथ समानता और समझदारी के साथ सुन्दर जीवन जी सकूँ, ऐसी स्त्री की तलाश थी. दैवयोग से अंधेरे जीवन में रोशनी बनकर जूली आ गयी. अपने कदम को न्यायोचित ठहराने केे लिए पत्नी की किसी कमी को उघाड़ने में मेरी दिलचस्पी जरा भी नहीं है. कमियाँ दोनों में रही होंगी. कमियाँ मनुष्य में होती ही हैं.
4. क्या आपकेा नहीं लगता है कि ऐसा करके आपने कुछ गलत किया है ?
कुछ कारणवश समाज ने वासना और प्रेम के प्रति गलत दृष्टि अपना ली है. और वही गलत दृष्टि एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को संक्रमित करती आ रही है. गलत धारणा एक अच्छे संस्कार के रूप में सबके भीतर बैठा दी जाती है. फलतः दमित लोग प्रकृति के इस अद्भुत रहस्यमय वरदान से वंचित रह जाते हैं. विरले किसी की दृष्टि खुलती है और वह सचाई को देख लेता है. उन्हें ताकत भी सचाई से ही प्राप्त हो जाती है. फिर इसका अर्थ नहीं रह जाता कि वह अकेला है या उसके साथ भीड़ है. झूठ को और गलत को भीड़ की जरूरत पड़ती है. सोचिये, कोई आदमी कार से जा रहा है और ईंट-पत्थर से आप उसकी कार नहीं तोड़ेंगे, किसी साइकिल वाले की हवा नहीं निकालेंगे. लेकिन ज्योंही भीड़ के द्वारा रोड जाम की घोषणा होती है, सारे गलत काम का लायसेंस आपको मिल जाता है. उस समय आपको नहीं लगता कि गलत कर रहे हैं. जब अकेला व्यक्ति सारे अंधकार से लड़ने के लिए तैयार हो जाय तो समझिये कुछ बात जरूर है. किसी अन्य स्रोत से उन्हें ताकत जरूर मिल रही है. हम दोनों अकेले लड़ रहे हैं , क्योंकि हमें पता है कि जीवन में पहली बार हमलोगों के द्वारा सबसे सही और सबसे जरूरी काम हो रहा है.
5. आपकी शादी के विरोध में छात्रों ने हंगामा किया था, खासकर पटना में क्यों ? क्या प्रतिक्रिया देना चाहेंगे ?
हमलोगों ने शादी नहीं की है. सिर्फ प्रेम किया है और इससे बड़ा कुछ होता नहीं है जिसे किया जा सके.
अनेक प्रकार की प्रताड़नाओं के बाद 7 जुलाई, 2006 को एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत हम पर हमला किया गया था. उसके कई पहलू थे- मुझे पीटना और जूली को मारकर विकलांग करना या भीड़ में जीवन का पत्ता साफ कर देना ताकि जिम्मेदारी भीड़ पर चली जाय. दूसरा पहलू था सारे मीडियाकर्मियों को इकट्ठा कर पूरे देश-दुनिया में मेरे भ्रष्टाचार को उजागर करना, ताकि हमलोग कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रह जायँ. तीसरा जेल भेजवाना और चैथा था नौकरी से निकलवाना. जेल जाना बाकी है, बाकी सब बीध पूरा हो गया है.
कुछ छात्रों का उपयोग पटना विश्वविद्यालय के कुछ शातिर प्रोफेसरों ने मेरे खिलाफ किया था. लेकिन 10-5 बरगलाये गये विद्यार्थियों को छोड़ विशाल छात्र-समुदाय मेरे पक्ष में था. 11 जुलाई, 2006 को विद्यार्थियों ने बी. एन. काॅलेज कैम्पस में स्वतः-स्फूर्त भावावेश में आकर मेरा भव्य स्वागत किया था. मेरे शानदार स्वागत को सहन करने में असमर्थ ईष्र्याग्नि में जलते हुए एक-दो शिक्षक नेताओं और प्राचार्य ने मुझे निलंबित करवा दिया. मेरे निलंबन के बाद मेरे समर्थन में विद्यार्थियों की जो भीड़ उमड़ी, वह ऐतिहासिक थी. जे.पी. आंदोलन के बाद संभवतः वह सबसे बड़ा जुलूस था. छात्रों का विशाल समुदाय उस समय भी मेरे साथ था और आज भी है. लेकिन मैं अपने हित में उनका इस्तेमाल नहीं करना चाहता.
6. आप प्यार को किस तरह परिभाषित करते हैं ? क्या आपके संबंध को प्यार का दर्जा देना चाहिए, क्यों ?
जब दूसरे के लिए जीने में आनंद आने लगे. दूसरा अपना जैसा लगने लगे. उसके सुख में सुख और दुख में दुख का अनुभव होने लगे, तो समझिये प्यार हो गया. यही संबंध जब और गहराई में उतरता है तो प्रेमी मिट जाता है, प्रिय ही बचता है. प्रेम में दो नहीं रहते. इसी को कबीर ने कहा है- ‘प्रेम गली अति साँकरी तामें दो न समाय’.
जनसाधारण में इसका गलत अर्थ प्रचलित है. वहाँ इसका अर्थ है कि एक आदमी से दो आदमी प्यार नहीं कर सकता. जैसे एक म्यान में देा तलवारें नहीं रह सकतीं. एक आदमी एक को ही प्यार कर सकता है. लेकिन यहाँ तो सँकरी प्रेम गली की बात है. एक आदमी एक से भी प्रेम करेंगे, तब भी तो दो रहेंगे न ? लेकिन प्रेम में दो रहता ही नहीं. वे देा हों या दो हजार या दो अरब सब मिलकर एक हो जायँ तो प्यार है. ऐसी घटना तभी घटती है जब प्यार करनेवाला खो जाय. वही मिटेगा तभी कोई नहीं बचेगा - एक रह जायेगा. यह प्रेम की असाधारण अवस्था है और साधारण प्रेम ही इस असाधारण अवस्था में पहँुचाने में समर्थ है. जो मूढ़ साधारण प्रेम की निंदा करता है, वह कभी भी असाधारण प्रेम की ओर प्रयाण नहीं कर पायेगा.
जो व्यक्ति जिस स्तर का होता है, उसी स्तर से हमारे प्रेम को देखता है. किसी के पास देखने का इसके अलावा सामान्यतः कोई रास्ता भी नहीं होता. कोई भी आदमी मेरे प्यार को वही दर्जा देगा जिस दर्जे का आदमी वह है.
हमें व्यक्तिगत तौर पर किसी से कोई दर्जा नहीं लेना है, क्योंकि यह बेवकूफी से भरी बात है. हमारे स्वभाव और जीवन से अनभिज्ञ दूसरा हमारा निर्णायक कैसे हो सकता है ? असली बात यह है कि हम उत्तरोतर अपने प्रेम को गहराई प्रदान करें और हम अपने अहंकार केा मिटायें तो प्रेम का असली स्वाद चखेंगे.
7. जूली को कभी ऐसा महसूस नहीं होता होगा कि आपके साथ शादी करके उसने कुछ गलत किया है ? शायद वो किसी और से शादी करती तो आपसे कहीं ज्यादा स्मार्ट जीवनसाथी मिल सकता था.
जूली नासमझ नहीं है कि बिना विचारे कुछ कर ले और बाद में पछताये. पछताता वह है जो फूल समझकर किसी तरफ लपके और उन्हें काँटा मिल जाय. जिनके प्रेम का आरंभ ही काँटों पर चलने से हुआ हो, उनके जीवन में आगे फूल ही फूल हैं.
समाज में अंधों की भरमार है. बिना विवेक जगाये प्रेम करने चल पड़ते हैं और बाद में सोचते हैं कि गलती हो गयी. जूली अपने मन मुताबिक जीवन जी रही है. जो आज ठीक से जी रही है, वही कल भी ठीक से जीयेगी. सही जीवन का नियम है कि हम साथ चलें, परस्पर सहयोग करें लेकिन पराधीनता को न ओढ़ें. स्वतंत्रता परम सुख है. पराधीनता दुख है. जीवन को गणित समझने वाले लोग जीवन जी नहीं पाते. लाभ-हानि का बही-खाता लेकर चलने वाले लोग प्रेम नहीं कर पाते. प्रेम एक रिस्क है. प्रेम एक दुस्साहस है. ‘चढ़ै तो चाखै प्रेम रस गिरै तो चकनाचूर’. चकनाचूर होने के डर से हर कोई प्रेम-पर्वत पर चढ़ नहीं पाता. इसीलिए सभी आदमी प्रेम नहीं कर पाते. नून तेल लकड़ी वाले सामान्य, मरियल और उबाऊ वैवाहिक जीवन व्यतीत करते हैं. यहाँ यह बता दूँ कि मैं मरियल वैवाहिक जीवन का विरोधी नहीं हूँ. आदमी की स्वतंत्रता है, जो जिस तरह जीना चाहे जीये. किसी को ध्यान इतना ही रखना है कि उसके जीने से दूसरे का जीना हराम न हो.
शारीरिक सौष्ठव और स्मार्टनेस सबको भाता है. देह बड़ी सुंदर और आकर्षक होती है, लेकिन उससे भी अधिक सुंदर मन होता है और सबसे गहरा सौन्दर्य हृदय का होता है. ये सौन्दर्य के तीन सोपान हैं. जो पहली सीढ़ी पर अटका है , वह केवल बाहरी सौन्दर्य को देख पायेगा जो क्षणिक है. हृदय सौन्दर्य का सागर है. आपको एक उदाहरण देता हूँ. मदर टेरेसा के चेहरे पर कितनी झुर्रियाँ हैं ! लेकिन मुझे वह अपूर्व सुन्दर मालूम पड़ती है. लता मंगेशकर के चेहरे को स्क्रीन पर बारीकी से अगर देखा होगा तो अनेक गड्ढे हैं. लेकिन मुझे उससे अधिक सुंदर स्त्री दिखती ही नहीं. वह ऐसा शानदार सौन्दर्य है जिसके चरणों पर लोट-पोट हो जाने में आनंद है. जूली को भी भगवान ने ऐसी ही आँख दी है. इसलिए मेरे सौन्दर्य के आगे सारे स्मार्ट लड़के उन्हें फीके मालूम पड़ते हैं. काश, स्मार्ट लड़के इस बात को समझ पाते ! और स्मार्ट लड़की इस रहस्य को जान पाती !
8. जब आप और जूली घर से बाहर निकलते हैं, तो लोगों की क्या प्रतिक्रिया होती हैै ? कैसा महसूस होता है ?
जब जूली और मैं बाहर निकलता हूँ तो अनेक बार अच्छी प्रतिक्रिया होती है. विरोधी तो भरे पड़े हैं. लेकिन वे टकराते नहंीं हैं. क्या लेना-देना ? कुतूहल से लोग खुद देखते और दिखाते हैं. कानाफूसी करते हैं, मुस्कुराते हैं और आगे बढ़ जाते हैं. अच्छे भाव वाले लोग प्रेम से मिलते हैं, सहानुभूति जताते हैं. मदद करने की इच्छा व्यक्त करते हैं. पता का आदान-प्रदान करते हैं. कुछ लोलुप लोग जूली को देखकर लाड़ टपकाते हैं. एक बार हमलोग मोटरसाइकिल से कहीं जा रहे थे. डाकबंगला चैराहे पर गाड़ी रुकी. उधर से दो लफंगे भी मोटरसाइकिल से गुजर रहे थे. एक ने जूली की तरफ देखने का दूसरे को इशारा किया. दूसरे की आवाज सुनाई पड़ी- तब न ई बुढ़वा पगलैल है ! सड़क पर कभी-कभी मंदबुद्धि के भी कुछ युवा मिलते हैं. वे कुछ ज्यादा नहीं बोल पाते. मेरे कुछ आगे निकल जाने पर जोर से ‘मटुकनाथ’ बोल देंगे, ही-ही करेंगे. कभी-कभी ऐसे लोगों पर बहुत गुस्सा आता है. क्षण भर के लिए मन में आता है कि उठा के पटक दूँ और लगाऊँ जोर से घूँसा. पर दूसरे ही क्षण वह भाव विलीन हो जाता है. उन बेचारों की दीनता सामने आती है. दया उमड़ने लगती है. कभी-कभी यह भी भाव होता है कि कितनों से लड़ोगे मटुक, अनदेखी-अनसुनी करो और आगे बढ़ो. भारतीय नारियों को जैसे सड़कों पर उचक्कों-लफंगों को झेलना पड़ता है, कुछ ऐसा ही मुझे झेलना पड़ता है. ऐसा न होता तो अनुभवात्मक स्तर पर नारी की पीड़ा मैं नहीं समझ पाता.
प्रेम इस अर्थ में साधना है कि हम सबके दुर्भाव का सामना करें, लेकिन उनके प्रति मन में दुर्भावना नहीं आने दें. जितना हम ऐसा कर पाने में समर्थ हो रहे हैं, उतनी ही हमारी चेतना निखर रही है. इसलिए किसी के प्रति हमारे मन में प्रतिशोध का भाव नहीं है. ये पंक्तियाँ हमें याद आती हंै-
दुनिया के रंज सहना और कुछ न मुँह से कहना
सच्चाइयों के बल पर आगे को बढ़ते रहना
9. अच्छा ये बताइये कि आज के युवा कैसा प्यार करते हैं ? तन का या फिर मन का ?
तन और मन का विभाजन गलत है, क्योंकि दोनों दो चीजें नहीं हैं. एक को छोड़कर दूसरे का कोई अस्तित्व ही नहीं होता. दोनों के मिलन से मनुष्य की सत्ता बनती है. आप इस तरह से समझें कि यह जो शरीर है, वह मन का ही स्थूल रूप है, क्योंकि शरीर के पोर-पोर में मन समाया हुआ है और जो मन है वह शरीर का ही सूक्ष्म रूप है. शरीर का सूक्ष्म रूप मन है और मन का स्थूल रूप शरीर.
अगर कोई किसी विवशता में केवल मानसिक प्रेम करेगा तो वह प्रेम पिलपिला होगा. अगर कहीं शरीर ही मिले, मन न मिले तो वह बलात्कार होगा, प्यार नहीं. प्यार मन और शरीर दोनों के मिलने से होता है.
एक प्यार और होता है, जो शरीर और मन से होते हुए ऊपर उठ जाता है. हृदय का या आत्मा का जब पट खुलता है तो उस प्यार का कहना क्या ! चैबीसों घंटे मदिरापान है वह. कबीर, मीरा, चैतन्य, नारद आदि तमाम संतों का प्रेम इसी श्रेणी का है. प्यार अपनी सार्थकता को इसी स्थान पर पहुँच कर प्राप्त करता है. इसके पहले प्यार विषण्ण और दुखी होने को बाध्य है. निश्चय ही उसमें आनंद रहेगा, लेकिन पीड़ा भी रहेगी.
10. हमारा समाज प्यार करने वाले जोड़े के खिलाफ क्यों रहता है?
क्योंकि प्यार के बारे में उसकी समझ गलत है. यद्यपि मैं कहना चाहूँगा कि पूर्णतः गलत भी नहीं है. आंशिक रूप से सही भी है. कारण यह है कि प्यार बहुत खतरनाक चीज है. नासमझ आदमी के हाथों में पड़कर प्यार बहुत बड़ा विध्वंस ले आता है. आप प्यार को परमाणु ऊर्जा समझिये जिससे परमाणु बम बनाकर विनाश किया जा सकता है और जिससे बिजली उत्पादित कर निर्माण भी किया जा सकता है. प्यार के बिना जीवन का निर्माण संभव नहीं है. प्रेम और वासना में गहरा रिश्ता है. इन दोनों के रिश्ते को समझ कर प्रेम को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए. लेकिन अज्ञानतावश समाज इसे समझने की कोशिश नहीं करता, सिर्फ इससे भागता है. समाज साँप से भागता है और साँप को मारता है. ज्ञानी लोग उसे पालते हैं और उसके जहर से दवा बनाकर अमृत का काम लेते हैं. यही हाल प्यार का है, वह जहर भी है और अमृत भी. आपके ज्ञान पर निर्भर करता है कि आप उसका कौन-सा हिस्सा ले पाते हैं. दुनिया की सभी वस्तुओं के दुहरे उपयोग हैं. सब आप पर निर्भर है. साँप बाहर रहता है, कभी आपकी मुलाकात हो सकती है, कभी नहीं भी. लेकिन वासना की साँपिन आपके अंदर पैदा होती है. उससे तो भागने का उपाय ही नहीं. उसे जानना ही होगा. बिना जाने मुक्ति नहीं. और समाज भाग रहा है. कोई माता-पिता अपने बच्चों से सेक्स की बात नहीं करता है. विडंबना यह है कि वह बच्चा सेक्स-कर्म की ही देन है. युवावर्ग को इस तरह का स्वस्थ ज्ञान फैलाने का दायित्व अपने ऊपर लेना होगा, तभी समाज बदल सकता है.
11 पिसु इंडिया के माध्यम से युवा-वर्ग को क्या कहना चाहेंगे?
पिसु इंडिया के माध्यम से मैं युवा-वर्ग को निम्नलिखित बातें कहना चाहूँगा-
क. दूसरों के जीवन में दिलचस्पी लेने से अपने जीवन की समस्या हल नहीं होती. इसके लिए अपने जीवन को गहराई से देखना पड़ता है. जो अपने जीवन की गहराई में जितना प्रवेश करेंगे, वे उतना ही उसे देख पाने में सक्षम होंगे. देखने मात्र से समस्या हल होती है, अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता है.
ख युवा वर्ग किसी का अनुकरण न करे, अपने मूल स्वभाव को पहचाने और उसे विकसित करने का रास्ता ढूँढे़़. जो अपने भूल स्वभाव को पहचान लेगा, वही दूसरों के जीवन से सीख ले पायेगा. वरना वह भटक जायेगा.
ग. युवा वर्ग की सामान्य समस्या प्रेम है. लड़के प्रेम के लिए तड़पते हैं, लेकिन लड़कियाँ नहीं मिलतीं. लड़कियाँ अपने जीवन को अधिकाधिक सुरक्षित रखने के लिए विवाह के भरोसे रहती हैं जो उनके अभिभावकों के माध्यम से उन्हें प्राप्त होते हैं. लड़कियों के साथ समान व्यवहार की जरूरत है. यह जरूरी है कि प्रेम खोजनेवाला प्रत्येक युवा अपने घर की स्त्रियेां को प्रेम की आजादी दे. जो ऐसा करेगा, वह प्यासा नहीं रहेगा. अगर बड़ी संख्या में युवा वर्ग ऐसा करेंगे तो बड़ी संख्या में लोग प्रेम पाने में सफल होंगे. इसके अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है. इक्के-दुक्के लोग तो वर्तमान व्यवस्था में भी प्रेम पा लेते हैं, लेकिन बड़ी संख्या में प्रेम पाने के लिए दकियानूसी विचारों से बाहर आना होगा और अपनी बहनों को प्रेम की आजादी देनी होगी.
घ. पढ़ाई और प्यार में रार नहीं है. इस तरह से भी प्रेम किया जा सकता है जिससे पढ़ाई में और वृद्धि हो, प्रेम-रस के साथ अध्ययन-रस बढ़े.
मटुकजूली
8.10.09
Wednesday, October 07, 2009
शर्मसार !
भोलाराम एक भ्रमणशील भावुक जीव है. कल वह मगध विश्वविद्यालय के एक हिन्दी प्रोफेसर के घर चला गया था. चर्चा मेरे बारे में भी छिड गयी. उन्होंने कहा- ‘जो हो, मटुकजी के कारण हिन्दी प्रोफेसरों को शर्मसार होना पड़ा है.’’ उनकी यह बात भोलाराम की समझ में न आयी. मुझसे इस टिप्पणी पर प्रकाश डालने को कहा है.
मटुकः- अनुभव की कमी के कारण उन्होंने ऐसा कहा होगा, भोलाराम. दरअसल हिन्दी ही नहीं, सभी विषयों के प्रोफेसरों को शर्मसार होना पड़ा है. मैंने इतिहास की एक नेताइन प्रोफेसर को सार्वजनिक रूप से शर्मसार होने की घोषणा करते हुए सुना है. सभी विषय ही नहीं, सभी विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों को शर्मसार होना पड़ा है. केवल प्रोफेसर ही नहीं, पटना निवासी शर्मसार हुए हैं, क्योंकि टीवी पर ‘पटना के प्रोफेसर मटुकनाथ’ में पटना का नाम बार-बार लिया गया है. पटने तक बात सीमित रहती तो गनीमत थी. पूरे बिहार के शर्मसार होने की बात हुई है. घटना के कुछ ही समय के बाद एक आदमी के घर मैं गया था. औरतों में मुझे देखने की बड़ी उत्सुकता रहती है. लुक-छिप कर कई महिलाओं ने मुझे देखा. कुछ करीब भी आयीं. उनमें से एक प्रौढ़ा ने मुझसे कहा- ‘पहले मैं बिहार से बाहर जाती थी तो लालू के कारण शर्मसार होना पड़ता था, अब आपके कारण होना पड़ता है.’ इसलिए शर्मसार के दायरे को छोटा मत समझो, पूरा बिहार शर्मसार हुआ है. लेकिन इतने भर बात रहती तो भी विशेष चिंता की बात नहीं थी. पूरा भारत और पूर्वी सभ्यता शर्मसार हुई है. मुझे भारत के अनेक लोगों ने पश्चिमी सभ्यता के प्रदूषण का प्रचारक कहा है. इधर के रहने वाले लोग जो पश्चिम में जाकर बस गये हैं और वहाँ के रंग में रँग गये हैं, लेकिन पूजा के लिए गंगाजल लेने के लिए भारत आते हैं, मेरा अनुमान है कि वे भी शर्मसार हुए होंगे. अगर कभी किसी अन्य ग्रह पर मनुष्य जैसे प्राणी का पता चला और उनसे सम्पर्क स्थापित हुआ तो भी मेरे कारण पूरे प्लैनेट (पृथ्वी) को शर्मसार होना पड़ेगा. जब पृथ्वी के आदमी उनसे हाथ मिलायेंगे तो इनके ठंडे हाथों को देखकर वे पूछेंगे - हाथ मिलाते हुए तुम लज्जित क्यों हो रहे हो ? तो ये जवाब देंगे- क्षमा करना मित्र, मेरे ग्रह पर मटुकनाथ नामक जीव रहता है, जिसका स्मरण आते ही मैं शर्मसार हो जाता हूँ !
भोलारामः- आप अति पर चले जाते हैं सर. पूरी दुनिया क्यों शर्मसार होगी, भारत तक जरूर आपकी चर्चा है. दूसरे देश के लोग अगर जानेंगे कि आप पर कुछ लोग शर्मसार हो रहे हैं तो हँस देंगे और उन्हें भारत के अविकसित होने का कारण पता चल जायेगा. जिस देश का आदमी काम-कुंठा में इतना समय देगा, उनको आविष्कार और अनुसंधान के लिए समय कब मिलेगा ? अभी आपने शर्मसार लोगों की विस्तृत संख्या के बारे में बताया. असल में, मैं जानना चाहता हूँ कि ऐसे शर्मसार लोगों की मानसिकता क्या होती है? वे क्यों ऐसा सोचते हैं ? अगर शर्मसार होने वाला काम आपने किया है, तो ग्लानि से गड़ कर मर जाना चाहिए आपको. आपके भीतर शर्म का लेश नहीं है. इसके विपरीत गर्व और आनंद के अनुभव में मगन रहते हैं. और दूसरे लोग परेशान हैं. बात क्या है ?
मटुकः- मनुष्य एक मुखौटा पहनकर जीता है. मुखौटा कभी-कभी धारण करना पड़े तो अपने असली चेहरे का ख्याल बना रहता है. लेकिन जिसे दिन-रात मुखौटा धारण करना पड़ता है, वह अपना चेहरा भूल जाता है. मुखौटे को ही चेहरा मान लेता है. हमारे आस-पास के मनुष्य की स्थिति करीब-करीब इसी तरह हो गयी है. मुखौटा यह है कि मैं एक अच्छा आदमी हूँ. दूसरा बुरा है. तुम ध्यान देना प्रायः हर आदमी अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है. ऐसा ही सुनना उसे प्रिय लगता है. कभी-कभी ऊपरी मन से, किसी स्वार्थवश किसी की तारीफ करनी पड़ती है. अगर किसी से कोई स्वार्थ न सधता हो, तो क्यों किसी की प्रशंसा करेगा ? दूसरों की प्रशंसा सुनना काँटों की तरह गड़ता है. और भी बहुत बातें हैं. लेकिन तुम बताओ कि तुमने उन्हें कोई जवाब दिया या नहीं ?
भोलारामः- हाँ, दिया न ! मैंने कहा कि आपलोग हिन्दी वाले उनकी प्रतिभा के सामने श्रीहीन हो गये हैं. आपलोग रात-दिन नाम के लिए लिखते रहते हैं, लेकिन नाम न हो सका और उन्हें सारा देश जान गया है. बिहार का तो बच्चा-बच्चा जानता है. इसे आप लोग पचा नहीं पा रहे हैं.
मटुकः इस पर वे क्या बोले..?
भोलारामः- यही कहा कि ‘‘बुराई तुरत फैलती है. बुरे आदमी का नाम रातेां-रात हो जाता है. कसाब को देखिये, कौन-सी प्रतिभा है, लेकिन दुनिया में नाम हो गया. महात्मा गाँधी बनने में जीवन लग जाता है, लेकिन एक मिनट में कोई गोडसे बनकर कुख्यात हो जाता है. नाम होने में समय लगता है, बदनाम होने में कोई समय नहीं लगता.’’ उनके इस जवाब पर आपकी राय जानना चाहूँगा, सर ?
मटुकः- मैं उनसे सहमत हूँ, भोलाराम. लेकिन इसके पीछे कुछ और बाते हैं, जिन पर नफरत के परदे के कारण ध्यान नहीं जाता है. कसाब और गोडसे को उन्होंने अपने से बहुत ही तुच्छ प्राणी समझ लिया होगा. कसाब की बुद्धि और साहस के बारे में कभी सोचा ? महज दस आदमी समुद्र के सारे प्रहरियों की आँखों में धूल झोंकर, कुछ लोगों को मौत के घाट उतारकर एक अरब की आबादी वाले भारत की नाक मुंबई में घुसकर पूरे देश को थर्रा देते हैं. उस आदमी ने अपनी जान को हथेली में ले लिया है. हिन्दी के इन तथाकथित अच्छे प्रोफेसरों से पूछो कि आप लोगों में क्या एक भी ऐसे हैं जिन्होंने अपने मिशन को पूरा करने के लिए जान को हथेली पर ले लिया है ? अगर नहीं हैं, तो कृपया कसाब से अपने को अच्छा कहना बंद कीजिये. कसाब अगर बुरा है, तो आप उससे हजार गुना बुरे हैं. पैसे के पीछे पागल आप जैसे लेाग ही पैसा लेकर कसाब को देश में घुसने देते हैं. आप जैसे लोग ही हैं, जो पैसे के लिए देश को बेच दे सकते हैं. जिनको जहाँ मौका लग रहा है, बेच ही रहे हैं. नाम जुनून से होता है भोलाराम; सर पर कफन बाँधकर चलने से होता है. ये दोनों बातें कसाब और गोडसे से ये ‘अच्छे लोग’ सीख लिये होते तो देश की ऐसी दुर्दशा नहीं होती. ये तो प्रेम भी करते हैं तो चोरकट वाला. कोई देख न ले, कोई जान न ले ! मुखौटा !!
जिस दिन जान अंदर से निकल कर हथेली पर आ जाती है, उसी दिन नाम हो जाता है. नाम अच्छे अर्थों में हुआ है या बुरे अर्थों में , यह उसके उद्देश्य पर निर्भर करता है. कसाब और गोडसे का उद्देश्य हत्या करना है, ध्वंस है. इसलिए वे बदनाम हुए. मेरा उद्देश्य इसके ठीक विपरीत प्रेम और निर्माण है. अब जो लोग प्रेम से घृणा करते हैं, उनके लिए मैं कुख्यात हूँ. जो प्रेम से प्रेम करते हैं, उनके लिए मैं सुविख्यात हूँ. असल में ‘सु’ और ‘कु’ प्रयोक्ता के बारे में बताता है. मेरे बारे में नहीं. मेरे बारे में तो इतना ही है कि मैं प्रेम दीवाना हूँ. प्रेम के सामने मुझे किसी चीज की चाह नहीं है. प्रेम के लिए धन गँवाना पड़ता है, तो राजी हूँ. प्रेम के लिए बदनामी मिलती है, तो स्वागत है. और इन लोगेां ने अच्छा आदमी कहलाने के लिए प्रेम का गला काट दिया है. पैसा के लिए प्रेम को बेच दिया है. ऐसे कायर, चालाक और प्रेमहीन लोग ही शर्मसार हुए हैं भोलाराम ! अच्छे लोग क्यों शर्मसार होंगे ! वैसे आदमी शर्मसार हुए हैं जो परदे के अंदर कुछ कर रहे हैं और मेरी आँधी में उनका कपड़ा उघड़ रहा है. लाख समेटते हैं, फिर भी दिख जाता है, इसलिए वे बुरी तरह चिढ़े हुए हैं. मुझ पर उनका गुस्सा उसी तरह है जैसे कोई नंगा करने वालों पर गुस्साता है.
भोलारामः- ई तो बड़का बात बोल दिये सर. कसाब के बारे में जो नयी दृष्टि दी उससे तो मेरा दिमागे पलट गया. ई प्रोफेसर सब इतने डरगुहा हैं कि हमलोग भी धमसा देते हैं तो तुरत समझौता कर लेते हैं. हमलोग परीक्षा में चोरी कर रहे हैं और ये लोग बैठकर टुकुर-टुकुर ताक रहे हैं. बोलते हैं- ‘जो करना है करो- कौन झंझट में पड़े. हम नौकरी करते हैं, बाल-बच्चा है, दरमाहा से काम है.’ इस मानसिकता के हैं ये प्रोफेसर लोग. और एक आप हैं, मुझे याद है कि मेरे सामने बी.एन.काॅलेज के एक प्रिंसिपल साहब से कहा था- अगर चोरी चलने देनी है, तो मुझे इनविजिलेटर बनाने की जरूरत नहीं है. जिस दिन चोरी रोकने के लिए कमर कसियेगा, उस दिन मेरी याद कीजिएगा. और उस प्राचार्य ने परीक्षा में आपको ड्यूटी नहीं दी. इस पर आपके विरोधी प्रोफेसरों ने कहा- ‘ इन्होंने ड्यूटी से मुक्त होने की अच्छी तरकीब सोच ली.’ वे ड्यूटी करना नहीं चाहते थे. उनका उद्देश्य आपसे विपरीत कर्तव्य से पलायन था और आपका निष्ठापूर्वक सही माने में कर्तव्य का पालन करना था. स्वाभाविक है कि ये विपरीत धर्मा आपको पसंद नहीं करेंगे, और इनकी संख्या कम नहीं है. ये कभी अपने कृत्य पर शर्मसार नहीं हुए हंै, आप पर शर्मसार होते हैं ! कुछ अच्छे प्रोफेसरों ने आपको समझाया -‘सिद्धान्त से काम नहीं चलता है, प्रैक्टिकल बनो’. आपने कहा था- ‘‘मैं चोरी के विरोध में नहीं हूँ. मेरी शर्त इतनी है कि सबको चोरी का समान अधिकार मिले. हम निमँुहे और कमजोर छात्रों का चिट-पुर्जा छीन लेते हैं और दबंगों से दूर-दूर रहते हैं. केवल दिखाने के लिए बोल देते हैं कि जिनके पास चिट-पुर्जा है, दे दो, नहीं तो हम तो कुछ नहीं कहेंगे, मजिस्ट्रेट छोड़ेगा नहीं.
मटुकः- अच्छी याद दिलायी भोलाराम, मैंने तो ऐसे प्रोफेसरों केा देखा है जो नकल कर रहे छात्रों की सुरक्षा में गार्डिंग करते थे. वे गेट पर रहते थे. प्राचार्य या मजिस्ट्रेट आ रहे हों तो झट-से विद्यार्थियों को सावधान कर देते थे. क्षण भर के लिए वे धड़ाधड़ चिट-पुर्जा अंदर घुसाकर मजिस्ट्रेट के निकल जाने का इंतजार करते थे. काॅपी पर आँख गड़ाये रहते थे और झूठो कलम लिखे शब्दों पर ही चलाते थे. हाँ, एक प्रिसिंपल जरूर थे , बीएन काॅलेज में बोस साहब, वे दबंगों से भी चिट ले लेते थे. लेकिन दबंग अगर डट जाय तो वे भी टैक्टफुली हट जाते थे. उस समय मुझे उनका झुकना अच्छा नहीं लगा था. लेकिन इतना तो जरूर था कि खूँखार लड़के भी उनका लिहाज करते थे. कारण सिर्फ एक था, वे किसी छात्र का नुकसान नहीं करते थे.
आज के अहंकारी अधिकारी छात्रों को निष्कासित कर समस्याओं के समाधान की बजाय बढ़ाने में विश्वास करते हैं. विद्यार्थियों से ज्यादा उपद्रवी ये अधिकारी हैं. ये कभी शर्मसार नहीं हुए ! सच है, जो अपने कृत्य पर कभी शर्मसार नहीं होता, वही दूसरों के कृत्यों पर शर्मसार होता है, भोलाराम. तुम काहे को ऐसे-ऐसे प्रोफेसर के घर जाते हो ? एक से एक अच्छे प्रोफेसर भी हैं, उनके घर जाओ, थोड़ा सीखोगे.
भोलारामः हवा-पानी लेने जाते हैं सर. आपके सामने तो कोई कुछ बोलता नहीं. आपके प्रति कौन क्या भाव रखता है, यह आपको कैसे मालूम होगा ?
मटुक- नहीं भोलाराम, इस उद्देश्य से किसी के पास मत जाओ. क्या महात्मा गाँधी के निंदक नहीं थे या नहीं हैं ? अरे उनसे ऐसे घृणा करने वाले लोग भी थे कि उन्हें जिन्दा तक नहीं छोड़ा. मैंने अनेक लोगों के मुँह से सुना है - गाँधी ने भारत को बरबाद कर दिया है. इसलिए जो तुम्हें करना है, वह करते जाओ. ऐसे लोगोें के पास जाकर अपना समय नष्ट नहीं करो. सुनो, कबीरदास क्या कह रहे हैं-
हस्ती चढ़िए ग्यान कौ सहज दुलीचा डारि ।
स्वान-रुप संसार है, भूँकन दे झक मारि ।।
मटुकः- अनुभव की कमी के कारण उन्होंने ऐसा कहा होगा, भोलाराम. दरअसल हिन्दी ही नहीं, सभी विषयों के प्रोफेसरों को शर्मसार होना पड़ा है. मैंने इतिहास की एक नेताइन प्रोफेसर को सार्वजनिक रूप से शर्मसार होने की घोषणा करते हुए सुना है. सभी विषय ही नहीं, सभी विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों को शर्मसार होना पड़ा है. केवल प्रोफेसर ही नहीं, पटना निवासी शर्मसार हुए हैं, क्योंकि टीवी पर ‘पटना के प्रोफेसर मटुकनाथ’ में पटना का नाम बार-बार लिया गया है. पटने तक बात सीमित रहती तो गनीमत थी. पूरे बिहार के शर्मसार होने की बात हुई है. घटना के कुछ ही समय के बाद एक आदमी के घर मैं गया था. औरतों में मुझे देखने की बड़ी उत्सुकता रहती है. लुक-छिप कर कई महिलाओं ने मुझे देखा. कुछ करीब भी आयीं. उनमें से एक प्रौढ़ा ने मुझसे कहा- ‘पहले मैं बिहार से बाहर जाती थी तो लालू के कारण शर्मसार होना पड़ता था, अब आपके कारण होना पड़ता है.’ इसलिए शर्मसार के दायरे को छोटा मत समझो, पूरा बिहार शर्मसार हुआ है. लेकिन इतने भर बात रहती तो भी विशेष चिंता की बात नहीं थी. पूरा भारत और पूर्वी सभ्यता शर्मसार हुई है. मुझे भारत के अनेक लोगों ने पश्चिमी सभ्यता के प्रदूषण का प्रचारक कहा है. इधर के रहने वाले लोग जो पश्चिम में जाकर बस गये हैं और वहाँ के रंग में रँग गये हैं, लेकिन पूजा के लिए गंगाजल लेने के लिए भारत आते हैं, मेरा अनुमान है कि वे भी शर्मसार हुए होंगे. अगर कभी किसी अन्य ग्रह पर मनुष्य जैसे प्राणी का पता चला और उनसे सम्पर्क स्थापित हुआ तो भी मेरे कारण पूरे प्लैनेट (पृथ्वी) को शर्मसार होना पड़ेगा. जब पृथ्वी के आदमी उनसे हाथ मिलायेंगे तो इनके ठंडे हाथों को देखकर वे पूछेंगे - हाथ मिलाते हुए तुम लज्जित क्यों हो रहे हो ? तो ये जवाब देंगे- क्षमा करना मित्र, मेरे ग्रह पर मटुकनाथ नामक जीव रहता है, जिसका स्मरण आते ही मैं शर्मसार हो जाता हूँ !
भोलारामः- आप अति पर चले जाते हैं सर. पूरी दुनिया क्यों शर्मसार होगी, भारत तक जरूर आपकी चर्चा है. दूसरे देश के लोग अगर जानेंगे कि आप पर कुछ लोग शर्मसार हो रहे हैं तो हँस देंगे और उन्हें भारत के अविकसित होने का कारण पता चल जायेगा. जिस देश का आदमी काम-कुंठा में इतना समय देगा, उनको आविष्कार और अनुसंधान के लिए समय कब मिलेगा ? अभी आपने शर्मसार लोगों की विस्तृत संख्या के बारे में बताया. असल में, मैं जानना चाहता हूँ कि ऐसे शर्मसार लोगों की मानसिकता क्या होती है? वे क्यों ऐसा सोचते हैं ? अगर शर्मसार होने वाला काम आपने किया है, तो ग्लानि से गड़ कर मर जाना चाहिए आपको. आपके भीतर शर्म का लेश नहीं है. इसके विपरीत गर्व और आनंद के अनुभव में मगन रहते हैं. और दूसरे लोग परेशान हैं. बात क्या है ?
मटुकः- मनुष्य एक मुखौटा पहनकर जीता है. मुखौटा कभी-कभी धारण करना पड़े तो अपने असली चेहरे का ख्याल बना रहता है. लेकिन जिसे दिन-रात मुखौटा धारण करना पड़ता है, वह अपना चेहरा भूल जाता है. मुखौटे को ही चेहरा मान लेता है. हमारे आस-पास के मनुष्य की स्थिति करीब-करीब इसी तरह हो गयी है. मुखौटा यह है कि मैं एक अच्छा आदमी हूँ. दूसरा बुरा है. तुम ध्यान देना प्रायः हर आदमी अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है. ऐसा ही सुनना उसे प्रिय लगता है. कभी-कभी ऊपरी मन से, किसी स्वार्थवश किसी की तारीफ करनी पड़ती है. अगर किसी से कोई स्वार्थ न सधता हो, तो क्यों किसी की प्रशंसा करेगा ? दूसरों की प्रशंसा सुनना काँटों की तरह गड़ता है. और भी बहुत बातें हैं. लेकिन तुम बताओ कि तुमने उन्हें कोई जवाब दिया या नहीं ?
भोलारामः- हाँ, दिया न ! मैंने कहा कि आपलोग हिन्दी वाले उनकी प्रतिभा के सामने श्रीहीन हो गये हैं. आपलोग रात-दिन नाम के लिए लिखते रहते हैं, लेकिन नाम न हो सका और उन्हें सारा देश जान गया है. बिहार का तो बच्चा-बच्चा जानता है. इसे आप लोग पचा नहीं पा रहे हैं.
मटुकः इस पर वे क्या बोले..?
भोलारामः- यही कहा कि ‘‘बुराई तुरत फैलती है. बुरे आदमी का नाम रातेां-रात हो जाता है. कसाब को देखिये, कौन-सी प्रतिभा है, लेकिन दुनिया में नाम हो गया. महात्मा गाँधी बनने में जीवन लग जाता है, लेकिन एक मिनट में कोई गोडसे बनकर कुख्यात हो जाता है. नाम होने में समय लगता है, बदनाम होने में कोई समय नहीं लगता.’’ उनके इस जवाब पर आपकी राय जानना चाहूँगा, सर ?
मटुकः- मैं उनसे सहमत हूँ, भोलाराम. लेकिन इसके पीछे कुछ और बाते हैं, जिन पर नफरत के परदे के कारण ध्यान नहीं जाता है. कसाब और गोडसे को उन्होंने अपने से बहुत ही तुच्छ प्राणी समझ लिया होगा. कसाब की बुद्धि और साहस के बारे में कभी सोचा ? महज दस आदमी समुद्र के सारे प्रहरियों की आँखों में धूल झोंकर, कुछ लोगों को मौत के घाट उतारकर एक अरब की आबादी वाले भारत की नाक मुंबई में घुसकर पूरे देश को थर्रा देते हैं. उस आदमी ने अपनी जान को हथेली में ले लिया है. हिन्दी के इन तथाकथित अच्छे प्रोफेसरों से पूछो कि आप लोगों में क्या एक भी ऐसे हैं जिन्होंने अपने मिशन को पूरा करने के लिए जान को हथेली पर ले लिया है ? अगर नहीं हैं, तो कृपया कसाब से अपने को अच्छा कहना बंद कीजिये. कसाब अगर बुरा है, तो आप उससे हजार गुना बुरे हैं. पैसे के पीछे पागल आप जैसे लेाग ही पैसा लेकर कसाब को देश में घुसने देते हैं. आप जैसे लोग ही हैं, जो पैसे के लिए देश को बेच दे सकते हैं. जिनको जहाँ मौका लग रहा है, बेच ही रहे हैं. नाम जुनून से होता है भोलाराम; सर पर कफन बाँधकर चलने से होता है. ये दोनों बातें कसाब और गोडसे से ये ‘अच्छे लोग’ सीख लिये होते तो देश की ऐसी दुर्दशा नहीं होती. ये तो प्रेम भी करते हैं तो चोरकट वाला. कोई देख न ले, कोई जान न ले ! मुखौटा !!
जिस दिन जान अंदर से निकल कर हथेली पर आ जाती है, उसी दिन नाम हो जाता है. नाम अच्छे अर्थों में हुआ है या बुरे अर्थों में , यह उसके उद्देश्य पर निर्भर करता है. कसाब और गोडसे का उद्देश्य हत्या करना है, ध्वंस है. इसलिए वे बदनाम हुए. मेरा उद्देश्य इसके ठीक विपरीत प्रेम और निर्माण है. अब जो लोग प्रेम से घृणा करते हैं, उनके लिए मैं कुख्यात हूँ. जो प्रेम से प्रेम करते हैं, उनके लिए मैं सुविख्यात हूँ. असल में ‘सु’ और ‘कु’ प्रयोक्ता के बारे में बताता है. मेरे बारे में नहीं. मेरे बारे में तो इतना ही है कि मैं प्रेम दीवाना हूँ. प्रेम के सामने मुझे किसी चीज की चाह नहीं है. प्रेम के लिए धन गँवाना पड़ता है, तो राजी हूँ. प्रेम के लिए बदनामी मिलती है, तो स्वागत है. और इन लोगेां ने अच्छा आदमी कहलाने के लिए प्रेम का गला काट दिया है. पैसा के लिए प्रेम को बेच दिया है. ऐसे कायर, चालाक और प्रेमहीन लोग ही शर्मसार हुए हैं भोलाराम ! अच्छे लोग क्यों शर्मसार होंगे ! वैसे आदमी शर्मसार हुए हैं जो परदे के अंदर कुछ कर रहे हैं और मेरी आँधी में उनका कपड़ा उघड़ रहा है. लाख समेटते हैं, फिर भी दिख जाता है, इसलिए वे बुरी तरह चिढ़े हुए हैं. मुझ पर उनका गुस्सा उसी तरह है जैसे कोई नंगा करने वालों पर गुस्साता है.
भोलारामः- ई तो बड़का बात बोल दिये सर. कसाब के बारे में जो नयी दृष्टि दी उससे तो मेरा दिमागे पलट गया. ई प्रोफेसर सब इतने डरगुहा हैं कि हमलोग भी धमसा देते हैं तो तुरत समझौता कर लेते हैं. हमलोग परीक्षा में चोरी कर रहे हैं और ये लोग बैठकर टुकुर-टुकुर ताक रहे हैं. बोलते हैं- ‘जो करना है करो- कौन झंझट में पड़े. हम नौकरी करते हैं, बाल-बच्चा है, दरमाहा से काम है.’ इस मानसिकता के हैं ये प्रोफेसर लोग. और एक आप हैं, मुझे याद है कि मेरे सामने बी.एन.काॅलेज के एक प्रिंसिपल साहब से कहा था- अगर चोरी चलने देनी है, तो मुझे इनविजिलेटर बनाने की जरूरत नहीं है. जिस दिन चोरी रोकने के लिए कमर कसियेगा, उस दिन मेरी याद कीजिएगा. और उस प्राचार्य ने परीक्षा में आपको ड्यूटी नहीं दी. इस पर आपके विरोधी प्रोफेसरों ने कहा- ‘ इन्होंने ड्यूटी से मुक्त होने की अच्छी तरकीब सोच ली.’ वे ड्यूटी करना नहीं चाहते थे. उनका उद्देश्य आपसे विपरीत कर्तव्य से पलायन था और आपका निष्ठापूर्वक सही माने में कर्तव्य का पालन करना था. स्वाभाविक है कि ये विपरीत धर्मा आपको पसंद नहीं करेंगे, और इनकी संख्या कम नहीं है. ये कभी अपने कृत्य पर शर्मसार नहीं हुए हंै, आप पर शर्मसार होते हैं ! कुछ अच्छे प्रोफेसरों ने आपको समझाया -‘सिद्धान्त से काम नहीं चलता है, प्रैक्टिकल बनो’. आपने कहा था- ‘‘मैं चोरी के विरोध में नहीं हूँ. मेरी शर्त इतनी है कि सबको चोरी का समान अधिकार मिले. हम निमँुहे और कमजोर छात्रों का चिट-पुर्जा छीन लेते हैं और दबंगों से दूर-दूर रहते हैं. केवल दिखाने के लिए बोल देते हैं कि जिनके पास चिट-पुर्जा है, दे दो, नहीं तो हम तो कुछ नहीं कहेंगे, मजिस्ट्रेट छोड़ेगा नहीं.
मटुकः- अच्छी याद दिलायी भोलाराम, मैंने तो ऐसे प्रोफेसरों केा देखा है जो नकल कर रहे छात्रों की सुरक्षा में गार्डिंग करते थे. वे गेट पर रहते थे. प्राचार्य या मजिस्ट्रेट आ रहे हों तो झट-से विद्यार्थियों को सावधान कर देते थे. क्षण भर के लिए वे धड़ाधड़ चिट-पुर्जा अंदर घुसाकर मजिस्ट्रेट के निकल जाने का इंतजार करते थे. काॅपी पर आँख गड़ाये रहते थे और झूठो कलम लिखे शब्दों पर ही चलाते थे. हाँ, एक प्रिसिंपल जरूर थे , बीएन काॅलेज में बोस साहब, वे दबंगों से भी चिट ले लेते थे. लेकिन दबंग अगर डट जाय तो वे भी टैक्टफुली हट जाते थे. उस समय मुझे उनका झुकना अच्छा नहीं लगा था. लेकिन इतना तो जरूर था कि खूँखार लड़के भी उनका लिहाज करते थे. कारण सिर्फ एक था, वे किसी छात्र का नुकसान नहीं करते थे.
आज के अहंकारी अधिकारी छात्रों को निष्कासित कर समस्याओं के समाधान की बजाय बढ़ाने में विश्वास करते हैं. विद्यार्थियों से ज्यादा उपद्रवी ये अधिकारी हैं. ये कभी शर्मसार नहीं हुए ! सच है, जो अपने कृत्य पर कभी शर्मसार नहीं होता, वही दूसरों के कृत्यों पर शर्मसार होता है, भोलाराम. तुम काहे को ऐसे-ऐसे प्रोफेसर के घर जाते हो ? एक से एक अच्छे प्रोफेसर भी हैं, उनके घर जाओ, थोड़ा सीखोगे.
भोलारामः हवा-पानी लेने जाते हैं सर. आपके सामने तो कोई कुछ बोलता नहीं. आपके प्रति कौन क्या भाव रखता है, यह आपको कैसे मालूम होगा ?
मटुक- नहीं भोलाराम, इस उद्देश्य से किसी के पास मत जाओ. क्या महात्मा गाँधी के निंदक नहीं थे या नहीं हैं ? अरे उनसे ऐसे घृणा करने वाले लोग भी थे कि उन्हें जिन्दा तक नहीं छोड़ा. मैंने अनेक लोगों के मुँह से सुना है - गाँधी ने भारत को बरबाद कर दिया है. इसलिए जो तुम्हें करना है, वह करते जाओ. ऐसे लोगोें के पास जाकर अपना समय नष्ट नहीं करो. सुनो, कबीरदास क्या कह रहे हैं-
हस्ती चढ़िए ग्यान कौ सहज दुलीचा डारि ।
स्वान-रुप संसार है, भूँकन दे झक मारि ।।
Tuesday, October 06, 2009
आत्महत्या का अधिकार
कोई भी आदमी मरना नहीं चाहता है, चाहे जितने दुख में हो. ऊपर से भले बोल दे कि हे विधाता, अब मुझे उठा लो. लेकिन अगर सचमुच मृत्यु आ जाय तो वह घबरा जायेगा और यमदूत से कहेगा - ‘‘नहीं, नहीं, मेरे कहने का मतलब दूसरा था. मैं तो कहना चाहता था- ‘मेरे दुख को उठा लो, मुझे छोड़ दो. आप गलतफहमी में आ गये हुजूर. कृपया लौट जायँ. मैं बिल्कुल ठीक हूँ.’’ जब तक आशा बची रहती है, तब तक मनुष्य मरना नहीं चाहता है. आशा उसे जिलाये रखती है. आशा आत्महत्या निरोधक है. ऐसा आदमी भी अगर कभी मृत्यु का आलिंगन कर लेता है, तो इसका अर्थ है कि दुख साधारण नहीं होगा. वह सहने की सीमा के पार चला गया होगा.
यह विरोधाभास है कि आत्महत्या का निर्णय वही व्यक्ति लेता है जो जीवन के प्रति घनघोर आसक्त होता है. जो जीवन खूब जीना चाहता है, लेकिन अपनी शर्तों पर. शर्त अगर पूरी न हो तो वह आत्महत्या कर लेता है. जो बेशर्त जीता है, उसके मन में आत्महत्या का ख्याल कभी नहीं आता. जिंदगी का मजा तो बेशर्त जीने में है. लेकिन बहुत कठिन है बेशर्त जीना. जीवन की गहन समझ जिन्हें आती है, वही बेशर्त जीने में सक्षम होते हैं, वरना हम तो पग-पग पर जीने के लिए शर्त रखते हैं.
यहाँ विचारणीय मुद्दा है कि क्या आत्महत्या करने वालों को जिलाये रखने में कानून सक्षम है ? मुझे तो नहीं लगता है, क्योंकि जिसे मृत्यु का ही भय नहीं रहा, उसे कानून का क्या भय होगा ? जीवन में सबसे बड़ा भय मृत्यु का होता है. उससे बड़ा भय यदि कोई हो सकता है तो यही कि हमें निरंतर पीड़ा में न रहना पड़े. उससे मौत भली. और आत्महत्या विरोधी कानून मनुष्य को मौत से भी बड़ा दुख देने का क्रूर उपाय है. जो आदमी जीवन ही नहीं रखना चाहता है, कानून उसका क्या बिगाड़ेगा ? हाँ, जो आत्महत्या के प्रयास में विफल हो जाता है, कानून उसे ही पकड़ता है. जिसने आत्महत्या की, उसको स्वर्ग या नरक से पकड़ कर लाने को कोई उपाय नहीं, उसे दंडित करने का कोई साधन नहीं. यह कानून केवल उसके लिए है, जो बच गया. एक तो बेचारे पर असह्य दुख पड़ा जिससे परेशान होकर वह मरना चाह रहा है. दैवयोग से वह बच गया तो उसे सहानुभूति की जरूरत है. उस अवस्था में भी उसे पुलिस और कचहरी का एक नया दुख देना कहाँ तक मुनासिब है ? इस कानून के कारण आत्महत्या करने वाला ऐसी तैयारी करेगा ताकि बचने का कोई उपाय ही न रहे. इस कानून के रहते पुलिस के डर से उसका उचित इलाज भी नहीं हो पाता है, वह मरने को बाध्य होता है. जिसे बचाया जा सकता था, कानून के डर से लोग विवश होकर उसे मरने देते हैं. इस कानून की विडंबना यह है कि यह जिलाने में नहीं मारने में सहायक है. इसलिए इस कानून को यथाशीघ्र हटना चाहिए.
आत्महत्या का अधिकार असहायों, वृद्धों, रोगियों, अपाहिजों भिखारियों आदि के लिए सुखदायी होगा. एक उदाहरण से स्पष्ट करना चाहूँगा. एक वृद्ध व्यक्ति है. उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है. वह इतना असमर्थ है कि उठकर शौच भी नहीं जा सकता. वह बिछावन पर पड़ा-पड़ा मल-मूत्र त्याग कर रहा है. नरक में कराह रहा है. अगर वह किसी को कहे कि मुझे कृपाकर जहर दे दो तो इसमें क्या परेशानी है ? लेकिन कानून के डर से कोई भी आदमी उसे जहर नहीं देगा, क्योंकि तब उस पर हत्या का आरोप लग जायेगा. यहाँ कानून उसे नरक में जीने को मजबूर कर रहा है. सड़क पर पड़े-पड़े ऐसे अनेक भिखारी मिलेंगे जो जाड़े की कड़ाके की ठंड में भी मौत के दिन गिन रहे हैं. या तो समाज और देश इतना अच्छा हो जाय कि हर असहाय की सहायता के लिए वृद्धाश्रम हो जहाँ उसकी उचित सेवा हो सके, लेकिन जब तक समाज और देश ऐसा नहीं है, तब तक इस पीड़ादायी कानून को ही हट जाना चाहिए.
ऐसा भी बहुत देखा जाता है कि एक आदमी असाध्य बीमारी से पीड़ित है. उसकी मृत्यु तय है. असीम दर्द में वह रात-दिन पड़ा है. परिवार वाले सेवा करते-करते स्वयं बीमार पड़ने लगे हैं. रोगी और परिवार सबकी इच्छा है कि हे भगवान् अब बुला लो. लेकिन कानून दीवार बनकर खड़ा है. यहाँ पर इस कानून का एक ही काम है मरीज और उसके परिवार की पीड़ा को लंबा करना.
इससे कुछ भिन्न प्रकार के लोगों के लिए भी आत्महत्या का अधिकार सुखदायी है. एक आदमी बिल्कुल अकेला है. दुनिया में उसका कोई नहीं है. उसे किसी से मतलब नहीं है. दुनियावालों को भी उससे कोई मतलब नहीं है, क्योंकि मतलब हमेशा दो तरफा होता है. वह जीवन से ऊब चुका है. मरना चाहता है. कानून क्यों उसे आत्महत्या से रोकेगा ? रोककर किसको क्या फायदा पहुँचायेगा ? अगर कोई कहे कि समाज को फायदा हो सकता है, इसलिए समाज चाहेगा कि वह व्यक्ति जिंदा रहे. अगर वह व्यक्ति वास्तव में समाज के लिए उपयोगी है तो समाज उसे अकेला नहीं छोड़ेगा, उसके जीवन में प्रेम भरेगा और उसकी मरणेच्छा को जीवनेच्छा में बदल देगा. अगर कोई ऐसा न करे और सिर्फ उस व्यक्ति का शोषण करना चाहे तो किसी व्यक्ति को इतनी स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह अपने को शोषित होने से बचा ले.
इस कानून के विरुद्ध बड़े पैमाने पर आवाज नहीं उठती है, क्योंकि आत्महत्या करने वालों पर इसका अंकुश काम नहीं करता है. कानून के रहते कोई भी आदमी अपना काम तमाम बिना किसी खास बाधा के कर सकता है. इस कानून के उठ जाने से एक फायदा यह भी संभव है कि विक्षिप्त टाइप के जो लोग सामूहिक आत्मदाह का नाटक करते हैं, वे नाटक करना बंद कर देंगे. लेकिन जो इसका उपयोग समाज और सरकार को धमकाने के लिए करना चाहते हैं, उन्हें धमकाने के आरोप में गिरफतार करना चाहिए. कुछ लोग सरकार को घेरने के लिए और जनता में सहानूभूति की लहर पैदा करने के लिए सामूहिक आत्मदाह करना चाहते हैं. यह लड़ाई का एक आत्मघाती तरीका है. उग्रवादियों-आतंकवादियों और उनमें बस इतना-सा ही फर्क है कि एक दूसरे को मारना चाहता है और वे अपने आप को. एक बात में दोनों समान हैं कि दोनों अपनी बातें मनवाने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं.
आत्महत्या का अधिकार उसे मिलना चाहिए जो कामनारहित होकर मरना चाहता है. किसी से कोई गिला-शिकवा नहीं. ऐसा आदमी शांति से मरना चाहे तो मर सकता है. यह बात दीगर है कि ऐसा आदमी मरना नहीं चाहता है. दूसरों के प्रति शिकायत से भरा आदमी ही आत्महत्या करता है.
आत्महत्या के अधिकार के पीछे एक दृष्टि और है. देश अति आबादी से पीड़ित है. अगर नकारा आदमी मरकर देश का भार हल्का करना चाहते हैं, तो देश को क्यों आपत्ति हो ? खास कर उस देश में जहाँ ‘नकारा’ को ‘सकारा’ बनाने का कोई प्रबंध न हो ? आत्महत्या के अधिकार का दुरुपयोग न हो, इसके लिए उसमें उपयुक्त निर्देश रहना लाजिमी है.
यह विरोधाभास है कि आत्महत्या का निर्णय वही व्यक्ति लेता है जो जीवन के प्रति घनघोर आसक्त होता है. जो जीवन खूब जीना चाहता है, लेकिन अपनी शर्तों पर. शर्त अगर पूरी न हो तो वह आत्महत्या कर लेता है. जो बेशर्त जीता है, उसके मन में आत्महत्या का ख्याल कभी नहीं आता. जिंदगी का मजा तो बेशर्त जीने में है. लेकिन बहुत कठिन है बेशर्त जीना. जीवन की गहन समझ जिन्हें आती है, वही बेशर्त जीने में सक्षम होते हैं, वरना हम तो पग-पग पर जीने के लिए शर्त रखते हैं.
यहाँ विचारणीय मुद्दा है कि क्या आत्महत्या करने वालों को जिलाये रखने में कानून सक्षम है ? मुझे तो नहीं लगता है, क्योंकि जिसे मृत्यु का ही भय नहीं रहा, उसे कानून का क्या भय होगा ? जीवन में सबसे बड़ा भय मृत्यु का होता है. उससे बड़ा भय यदि कोई हो सकता है तो यही कि हमें निरंतर पीड़ा में न रहना पड़े. उससे मौत भली. और आत्महत्या विरोधी कानून मनुष्य को मौत से भी बड़ा दुख देने का क्रूर उपाय है. जो आदमी जीवन ही नहीं रखना चाहता है, कानून उसका क्या बिगाड़ेगा ? हाँ, जो आत्महत्या के प्रयास में विफल हो जाता है, कानून उसे ही पकड़ता है. जिसने आत्महत्या की, उसको स्वर्ग या नरक से पकड़ कर लाने को कोई उपाय नहीं, उसे दंडित करने का कोई साधन नहीं. यह कानून केवल उसके लिए है, जो बच गया. एक तो बेचारे पर असह्य दुख पड़ा जिससे परेशान होकर वह मरना चाह रहा है. दैवयोग से वह बच गया तो उसे सहानुभूति की जरूरत है. उस अवस्था में भी उसे पुलिस और कचहरी का एक नया दुख देना कहाँ तक मुनासिब है ? इस कानून के कारण आत्महत्या करने वाला ऐसी तैयारी करेगा ताकि बचने का कोई उपाय ही न रहे. इस कानून के रहते पुलिस के डर से उसका उचित इलाज भी नहीं हो पाता है, वह मरने को बाध्य होता है. जिसे बचाया जा सकता था, कानून के डर से लोग विवश होकर उसे मरने देते हैं. इस कानून की विडंबना यह है कि यह जिलाने में नहीं मारने में सहायक है. इसलिए इस कानून को यथाशीघ्र हटना चाहिए.
आत्महत्या का अधिकार असहायों, वृद्धों, रोगियों, अपाहिजों भिखारियों आदि के लिए सुखदायी होगा. एक उदाहरण से स्पष्ट करना चाहूँगा. एक वृद्ध व्यक्ति है. उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है. वह इतना असमर्थ है कि उठकर शौच भी नहीं जा सकता. वह बिछावन पर पड़ा-पड़ा मल-मूत्र त्याग कर रहा है. नरक में कराह रहा है. अगर वह किसी को कहे कि मुझे कृपाकर जहर दे दो तो इसमें क्या परेशानी है ? लेकिन कानून के डर से कोई भी आदमी उसे जहर नहीं देगा, क्योंकि तब उस पर हत्या का आरोप लग जायेगा. यहाँ कानून उसे नरक में जीने को मजबूर कर रहा है. सड़क पर पड़े-पड़े ऐसे अनेक भिखारी मिलेंगे जो जाड़े की कड़ाके की ठंड में भी मौत के दिन गिन रहे हैं. या तो समाज और देश इतना अच्छा हो जाय कि हर असहाय की सहायता के लिए वृद्धाश्रम हो जहाँ उसकी उचित सेवा हो सके, लेकिन जब तक समाज और देश ऐसा नहीं है, तब तक इस पीड़ादायी कानून को ही हट जाना चाहिए.
ऐसा भी बहुत देखा जाता है कि एक आदमी असाध्य बीमारी से पीड़ित है. उसकी मृत्यु तय है. असीम दर्द में वह रात-दिन पड़ा है. परिवार वाले सेवा करते-करते स्वयं बीमार पड़ने लगे हैं. रोगी और परिवार सबकी इच्छा है कि हे भगवान् अब बुला लो. लेकिन कानून दीवार बनकर खड़ा है. यहाँ पर इस कानून का एक ही काम है मरीज और उसके परिवार की पीड़ा को लंबा करना.
इससे कुछ भिन्न प्रकार के लोगों के लिए भी आत्महत्या का अधिकार सुखदायी है. एक आदमी बिल्कुल अकेला है. दुनिया में उसका कोई नहीं है. उसे किसी से मतलब नहीं है. दुनियावालों को भी उससे कोई मतलब नहीं है, क्योंकि मतलब हमेशा दो तरफा होता है. वह जीवन से ऊब चुका है. मरना चाहता है. कानून क्यों उसे आत्महत्या से रोकेगा ? रोककर किसको क्या फायदा पहुँचायेगा ? अगर कोई कहे कि समाज को फायदा हो सकता है, इसलिए समाज चाहेगा कि वह व्यक्ति जिंदा रहे. अगर वह व्यक्ति वास्तव में समाज के लिए उपयोगी है तो समाज उसे अकेला नहीं छोड़ेगा, उसके जीवन में प्रेम भरेगा और उसकी मरणेच्छा को जीवनेच्छा में बदल देगा. अगर कोई ऐसा न करे और सिर्फ उस व्यक्ति का शोषण करना चाहे तो किसी व्यक्ति को इतनी स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह अपने को शोषित होने से बचा ले.
इस कानून के विरुद्ध बड़े पैमाने पर आवाज नहीं उठती है, क्योंकि आत्महत्या करने वालों पर इसका अंकुश काम नहीं करता है. कानून के रहते कोई भी आदमी अपना काम तमाम बिना किसी खास बाधा के कर सकता है. इस कानून के उठ जाने से एक फायदा यह भी संभव है कि विक्षिप्त टाइप के जो लोग सामूहिक आत्मदाह का नाटक करते हैं, वे नाटक करना बंद कर देंगे. लेकिन जो इसका उपयोग समाज और सरकार को धमकाने के लिए करना चाहते हैं, उन्हें धमकाने के आरोप में गिरफतार करना चाहिए. कुछ लोग सरकार को घेरने के लिए और जनता में सहानूभूति की लहर पैदा करने के लिए सामूहिक आत्मदाह करना चाहते हैं. यह लड़ाई का एक आत्मघाती तरीका है. उग्रवादियों-आतंकवादियों और उनमें बस इतना-सा ही फर्क है कि एक दूसरे को मारना चाहता है और वे अपने आप को. एक बात में दोनों समान हैं कि दोनों अपनी बातें मनवाने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं.
आत्महत्या का अधिकार उसे मिलना चाहिए जो कामनारहित होकर मरना चाहता है. किसी से कोई गिला-शिकवा नहीं. ऐसा आदमी शांति से मरना चाहे तो मर सकता है. यह बात दीगर है कि ऐसा आदमी मरना नहीं चाहता है. दूसरों के प्रति शिकायत से भरा आदमी ही आत्महत्या करता है.
आत्महत्या के अधिकार के पीछे एक दृष्टि और है. देश अति आबादी से पीड़ित है. अगर नकारा आदमी मरकर देश का भार हल्का करना चाहते हैं, तो देश को क्यों आपत्ति हो ? खास कर उस देश में जहाँ ‘नकारा’ को ‘सकारा’ बनाने का कोई प्रबंध न हो ? आत्महत्या के अधिकार का दुरुपयोग न हो, इसके लिए उसमें उपयुक्त निर्देश रहना लाजिमी है.
Thursday, October 01, 2009
सहस नयन पर दोष निहारा
मेरे ब्लाॅग पर ‘बीमार नैतिकता बनाम स्वस्थ नैतिकता ’ पढ़ने ( ?) के उपरांत लखनऊ के एक ‘निशाचर’ ने टिप्पणी की है - ‘‘आपके विषय में अधिक नहीं जानता लेकिन जहाँ तक जानता हूँ वह यह कि आपकी पत्नी व बच्चे भी हैं. ऐसे में अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर विवाहेत्तर संबंधों में लीन हो जाना क्या नैतिक है ?आपका विवाह बेमेल हो सकता है परन्तु बच्चे तो आपकी इच्छा के बगैर नहीं हुए होंगे. फिर उन जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर और उनके लिए एक आदर्श पिता बनने के बजाय आप "प्रेम" में लीन हो गए. यह कहाँ तक उचित है? यदि आपका विवाह बेमेल था तो आपने विवाह किया ही क्यों? या फिर आपने तलाक़ लेकर उससे मुक्ति क्यों नहीं पा ली ?
यह दूसरी नाव मिलने तक पहली को छोड़ देने की घबराहट नहीं थी (आत्मिक या दैहिक स्वार्थ)?
निशाचर भाई
दूसरों के जीवन में ताक-झाँक और छींटाकशी अनैतिक है. दूसरों के जीवन में झाँकने की दिलचस्पी उन्हें ज्यादा होती है जो अपना जीवन नहीं जी रहे होते हैं. जो अपना जीवन जीने में मस्त हंै, उन्हें कहाँ फुर्सत कि दूसरों के घर में हुलुक-बुलुुुक करें. आपकी असली समस्या यह नहीं है कि मैं क्या कर रहा हूँ, समस्या है कि आप क्या कर रहे हैं. वही आपके लिए अच्छा या बुरा परिणाम लायेगा. दूसरों के जीवन पर ध्यान लगाने से तीन स्थितियाँ बन सकती हैं. या तो आप उनका अनंुकरण करें या उनकी भत्र्सना करें या तटस्थ होकर देखें. अनुकरण भयावह चीज है. इसमें आपकी अस्मिता समाप्त हो जाती है. अनुकरण से अगर कुछ हासिल हो भी तो भी आप दोयम दर्जे के नागरिक बनते हैं. भत्र्सना करके मन में थोड़ा तोष होता है कि मैं उससे बेहतर मनुष्य हूँ. लेकिन इसके पहले आपको एक तनाव से गुजरना पड़ता है. जिन्हें क्षोभ नहीं होगा, वह क्यों किसी की भत्र्सना करेगा ? भत्र्सना के बावजूद किसी-किसी को आशंका तो बनी ही रहती है कि कौन जाने वही बेहतर आदमी हो. तीसरी दृष्टि बड़ी दुर्लभ है. यह उसे प्राप्त होती है जो अपना जीवन जी रहा होता है. इस दृष्टि से सम्पन्न आदमी भी दूसरों की तरफ देख सकता है. दूसरों के जीवन में ऐसा क्या कुछ है जो मुझे अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित कर सके. अगर है तो इतने मात्र से वह प्रेरित होगा और उस आदमी को धन्यवाद देगा. नहीं है, तो उनकी तरफ से आँख मूँद लेगा. लेकिन भत्र्सना वाला आदमी उलझेगा, टकरायेगा, उपद्रव करेगा, क्योंकि उसका जीवन खाली है और उस खालीपन को भरना चाहेगा. कहावत है, खाली दिमाग शैतान का घर. यहाँ खाली से इतना ही मतलब है कि उसका समय निरर्थक कामों में नष्ट हो रहा है. क्योंकि वास्तव में दिमाग कभी किसी का खाली रहता नहीं है. निरंतर वह गलत-सही सोचता रहता है. दिमाग को खाली करना जीवन का सबसे बड़ा तप, सबसे बड़ी कला है, सबसे बड़ी समझ है, क्योंकि खाली दिमाग में ही सत्य का अवतरण होता है. वास्तव में खाली दिमाग शैतान का नहीं परमात्मा का घर है.
आपने जिम्मेदारी का सवाल उठाया है. यह शब्द अप्रेम की दुनिया से आता है. जिससे हम प्रेम नहीं कर पाते हैं, उसके प्रति हम जिम्मेदारी निभाते हैं. प्यार से सराबोर माँ बच्चे को चूम रही है, पुचकार रही है, खेला रही है, उसके साथ खेल रही है. बच्चे ने पेशाब कर दिया. माँ खिलाखिलाकर हँस पड़ती है. आनन-फानन में उसके गीले कपड़े बदल देती है, नहा देती है,नये वस्त्र पहना देती है, पाउडर से सुवासित कर देती है. क्या आप कहेंगे कि माँ जिम्मेदारी का पालन कर रही है ? वह तो आनंद मगन है. वैसा करने का मौका न मिले तो जीवन सूख जाय. वह उसका आनंद है, जिम्मेदारी नहीं है. जो काम जिम्मेदारी के बोध से किया जाता है, वह बोझ बन जाता है. उसके संपादन में कष्ट होता है. फलतः कर्म कुशलतापूर्वक संपादित नहीं होता. एक दूसरा उदाहरण देता हूँ. आप ट्रेन में बैठे हैं. बहुत भीड़ है, लेकिन आपको जगह मिली हुई है. इस बीच एक अत्यन्त बूढ़ा असमर्थ आदमी वहाँ आ जाता है. खड़ा रहना उसके लिए संभव नहीं है. तीन तरह के लोग वहाँ हो सकते हैं. पहला उन्हें देखते ही करुणा से भर सकता है, उन्हें लग सकता है कि वे मेरे पिता समान हैं. वह झट-से उठ खड़ा होगा और अपनी जगह उन्हें बैठाकर सुख को उपलब्ध होगा. बूढ़े को बैठकर राहत मिली और उन्हें बैठा कर उस आदमी को. दोनों सुखी हुए. यह जिम्मेदारी नहीं है, प्रेम और करुणा है. जिम्मेदारी की स्थिति तब बनेगी जब किसी दूसरे आदमी को मन ही मन लगेगा - खूँसट कहाँ से आ गया आराम में खलल डालने ! लगता है, उठना ही पड़ेगा ! बोझिल मन से वह उठता है- ‘बैठिये बाबा, काहे को इस अवस्था में घर से निकलते हैं ?’ दूसरे आदमी ने यद्यपि त्याग किया लेकिन उनका मन विषाक्त है. आनंद का लेश नहीं. त्याग तो पहले आदमी ने भी किया लेकिन इसका उसे कोई बोध नहीं. उसने तो दूसरों को सुखी कर सुख का भोग किया. इसीलिए मैं मानता हूँ कि जीवन ‘त्याग’ नहीं ‘भोग’ है. एक तीसरे प्रकार का आदमी भी हो सकता है. उसको भी दूसरे की तरह बूढ़े का आगमन अखरेगा. लेकिन वह खुद खड़ा नहीं होगा. दबंगई का परिचय देते हुए फटकारकर किसी और को खड़ा कर देगा. उसकी जगह बूढ़े को बैठा देगा. ऐसा ही आदमी नेता बनता है और सफल होता है.
मैंने अपनी पत्नी और बच्चे के लिए क्या किया, नहीं किया , यह पूछने का हक आपको नहीं है और न ही मुझे उसे गिनाकर आपके ओछेपन में शामिल होने की ख्वाहिश है. आप मुझे एक गैर-जिम्मेदार आदमी समझें. आप जैसे परमार्थियों से देश पटा पड़ा है , फिर भी दीन दशा में है. एक आदमी खोज दीजिए जो अपने आपको स्वार्थी कहता हो. मैं एक स्वार्थी व्यक्ति हूँ. और ठीक-ठीक स्वार्थ साधने की कला ढूँढ रहा हूँ. आपका परमार्थ आपको मुबारक ! मूढ़ आदमी का जन्म दूसरों को सलाह देने के लिए ही होता है. अगर कोई मुझसे पूछे कि मूढ़ की पहचान क्या है, तो मैं कहूँगा जो बिना माँगे किसी को अनपेक्षित सलाह देता नजर आये, तुरत पहचान लेना कि वह मूढ़ है. एक तो बिन माँगे सलाह देना मूढ़तापूर्ण है, लेकिन जो सलाह दी जा रही हो वह भी मूढ़तापूर्ण हो तो उसे हम वज्र-मूढ़ कहेंगे. आपकी यह सलाह इसी तरह की है -‘ यदि आपका विवाह बेमेल था तो आपने विवाह किया ही क्यों ? ’ विवाह के पहले कोई विवाह बेमेल कैसे हो सकता है ?
आप जिज्ञासु होते तो तथ्य की जानकारी देकर मैं आपको तुष्ट करता , लेकिन आप आक्रमणकारी हैं और उसके लिए मैं काल भैरव हूँ.
यह दूसरी नाव मिलने तक पहली को छोड़ देने की घबराहट नहीं थी (आत्मिक या दैहिक स्वार्थ)?
निशाचर भाई
दूसरों के जीवन में ताक-झाँक और छींटाकशी अनैतिक है. दूसरों के जीवन में झाँकने की दिलचस्पी उन्हें ज्यादा होती है जो अपना जीवन नहीं जी रहे होते हैं. जो अपना जीवन जीने में मस्त हंै, उन्हें कहाँ फुर्सत कि दूसरों के घर में हुलुक-बुलुुुक करें. आपकी असली समस्या यह नहीं है कि मैं क्या कर रहा हूँ, समस्या है कि आप क्या कर रहे हैं. वही आपके लिए अच्छा या बुरा परिणाम लायेगा. दूसरों के जीवन पर ध्यान लगाने से तीन स्थितियाँ बन सकती हैं. या तो आप उनका अनंुकरण करें या उनकी भत्र्सना करें या तटस्थ होकर देखें. अनुकरण भयावह चीज है. इसमें आपकी अस्मिता समाप्त हो जाती है. अनुकरण से अगर कुछ हासिल हो भी तो भी आप दोयम दर्जे के नागरिक बनते हैं. भत्र्सना करके मन में थोड़ा तोष होता है कि मैं उससे बेहतर मनुष्य हूँ. लेकिन इसके पहले आपको एक तनाव से गुजरना पड़ता है. जिन्हें क्षोभ नहीं होगा, वह क्यों किसी की भत्र्सना करेगा ? भत्र्सना के बावजूद किसी-किसी को आशंका तो बनी ही रहती है कि कौन जाने वही बेहतर आदमी हो. तीसरी दृष्टि बड़ी दुर्लभ है. यह उसे प्राप्त होती है जो अपना जीवन जी रहा होता है. इस दृष्टि से सम्पन्न आदमी भी दूसरों की तरफ देख सकता है. दूसरों के जीवन में ऐसा क्या कुछ है जो मुझे अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित कर सके. अगर है तो इतने मात्र से वह प्रेरित होगा और उस आदमी को धन्यवाद देगा. नहीं है, तो उनकी तरफ से आँख मूँद लेगा. लेकिन भत्र्सना वाला आदमी उलझेगा, टकरायेगा, उपद्रव करेगा, क्योंकि उसका जीवन खाली है और उस खालीपन को भरना चाहेगा. कहावत है, खाली दिमाग शैतान का घर. यहाँ खाली से इतना ही मतलब है कि उसका समय निरर्थक कामों में नष्ट हो रहा है. क्योंकि वास्तव में दिमाग कभी किसी का खाली रहता नहीं है. निरंतर वह गलत-सही सोचता रहता है. दिमाग को खाली करना जीवन का सबसे बड़ा तप, सबसे बड़ी कला है, सबसे बड़ी समझ है, क्योंकि खाली दिमाग में ही सत्य का अवतरण होता है. वास्तव में खाली दिमाग शैतान का नहीं परमात्मा का घर है.
आपने जिम्मेदारी का सवाल उठाया है. यह शब्द अप्रेम की दुनिया से आता है. जिससे हम प्रेम नहीं कर पाते हैं, उसके प्रति हम जिम्मेदारी निभाते हैं. प्यार से सराबोर माँ बच्चे को चूम रही है, पुचकार रही है, खेला रही है, उसके साथ खेल रही है. बच्चे ने पेशाब कर दिया. माँ खिलाखिलाकर हँस पड़ती है. आनन-फानन में उसके गीले कपड़े बदल देती है, नहा देती है,नये वस्त्र पहना देती है, पाउडर से सुवासित कर देती है. क्या आप कहेंगे कि माँ जिम्मेदारी का पालन कर रही है ? वह तो आनंद मगन है. वैसा करने का मौका न मिले तो जीवन सूख जाय. वह उसका आनंद है, जिम्मेदारी नहीं है. जो काम जिम्मेदारी के बोध से किया जाता है, वह बोझ बन जाता है. उसके संपादन में कष्ट होता है. फलतः कर्म कुशलतापूर्वक संपादित नहीं होता. एक दूसरा उदाहरण देता हूँ. आप ट्रेन में बैठे हैं. बहुत भीड़ है, लेकिन आपको जगह मिली हुई है. इस बीच एक अत्यन्त बूढ़ा असमर्थ आदमी वहाँ आ जाता है. खड़ा रहना उसके लिए संभव नहीं है. तीन तरह के लोग वहाँ हो सकते हैं. पहला उन्हें देखते ही करुणा से भर सकता है, उन्हें लग सकता है कि वे मेरे पिता समान हैं. वह झट-से उठ खड़ा होगा और अपनी जगह उन्हें बैठाकर सुख को उपलब्ध होगा. बूढ़े को बैठकर राहत मिली और उन्हें बैठा कर उस आदमी को. दोनों सुखी हुए. यह जिम्मेदारी नहीं है, प्रेम और करुणा है. जिम्मेदारी की स्थिति तब बनेगी जब किसी दूसरे आदमी को मन ही मन लगेगा - खूँसट कहाँ से आ गया आराम में खलल डालने ! लगता है, उठना ही पड़ेगा ! बोझिल मन से वह उठता है- ‘बैठिये बाबा, काहे को इस अवस्था में घर से निकलते हैं ?’ दूसरे आदमी ने यद्यपि त्याग किया लेकिन उनका मन विषाक्त है. आनंद का लेश नहीं. त्याग तो पहले आदमी ने भी किया लेकिन इसका उसे कोई बोध नहीं. उसने तो दूसरों को सुखी कर सुख का भोग किया. इसीलिए मैं मानता हूँ कि जीवन ‘त्याग’ नहीं ‘भोग’ है. एक तीसरे प्रकार का आदमी भी हो सकता है. उसको भी दूसरे की तरह बूढ़े का आगमन अखरेगा. लेकिन वह खुद खड़ा नहीं होगा. दबंगई का परिचय देते हुए फटकारकर किसी और को खड़ा कर देगा. उसकी जगह बूढ़े को बैठा देगा. ऐसा ही आदमी नेता बनता है और सफल होता है.
मैंने अपनी पत्नी और बच्चे के लिए क्या किया, नहीं किया , यह पूछने का हक आपको नहीं है और न ही मुझे उसे गिनाकर आपके ओछेपन में शामिल होने की ख्वाहिश है. आप मुझे एक गैर-जिम्मेदार आदमी समझें. आप जैसे परमार्थियों से देश पटा पड़ा है , फिर भी दीन दशा में है. एक आदमी खोज दीजिए जो अपने आपको स्वार्थी कहता हो. मैं एक स्वार्थी व्यक्ति हूँ. और ठीक-ठीक स्वार्थ साधने की कला ढूँढ रहा हूँ. आपका परमार्थ आपको मुबारक ! मूढ़ आदमी का जन्म दूसरों को सलाह देने के लिए ही होता है. अगर कोई मुझसे पूछे कि मूढ़ की पहचान क्या है, तो मैं कहूँगा जो बिना माँगे किसी को अनपेक्षित सलाह देता नजर आये, तुरत पहचान लेना कि वह मूढ़ है. एक तो बिन माँगे सलाह देना मूढ़तापूर्ण है, लेकिन जो सलाह दी जा रही हो वह भी मूढ़तापूर्ण हो तो उसे हम वज्र-मूढ़ कहेंगे. आपकी यह सलाह इसी तरह की है -‘ यदि आपका विवाह बेमेल था तो आपने विवाह किया ही क्यों ? ’ विवाह के पहले कोई विवाह बेमेल कैसे हो सकता है ?
आप जिज्ञासु होते तो तथ्य की जानकारी देकर मैं आपको तुष्ट करता , लेकिन आप आक्रमणकारी हैं और उसके लिए मैं काल भैरव हूँ.
Tuesday, September 29, 2009
बीमार नैतिकता बनाम स्वस्थ नैतिकता
मेरे ब्लाॅग पर उज्जैन से ‘महाजाल’ ब्लाॅग वाले सुरेश चिपलूनकर ने ‘गुरु-शिष्या- संबंध’ नामक लेखमाला पढ़कर (?) टिप्पणी भेजी है-‘‘ मैं आपके जूली ‘‘कृत्य’’ से पूर्णतः असहमत हूँ...विस्तार में जाना नहीं चाहता क्योंकि इसमें कई मुद्दे और पक्ष जुड़े हुए हैं, जैसे कि आपकी पत्नी, आपके अन्य शिष्य और ‘‘शिष्याएँ’’ भी...। कुल मिलाकर मेरे अनुसार, आपने एक अनैतिक कार्य किया है, भले ही आप अपने ‘‘शिक्षक वाले तर्कों ’’ से खुद को कितना ही उच्च आदर्शों ( ?) साबित करने की कोशिश करें .’’े
प्रिय चिपलूनकर साहब
आप मेरे जूली ‘कृत्य’ से सहमत नहीं हैं, तो कोई हर्ज नहीं. मैंने ब्लाॅग पर लेख पढ़ने के लिए आमंत्रण दिया था. क्या आपने पढ़ा ? अगर हाँ, तो उसका प्रमाण आपकी टिप्पणी में कहाँ है ? विस्तार में गये बिना, मुझसे जुड़े मुद्दों और पक्षों पर विचार किये बिना निष्कर्ष निकालने की बेचैनी आपके भीतर है और आखिर बिना विचारे निष्कर्ष तो आपने दे ही दिया. क्या आप इसे नैतिक कृत्य समझते हैं ? हड़बड़ी क्या थी, एक-दो दिन और ठहर जाते, थोड़ा तथ्य इकट्ठा करते, तटस्थ विश्लेषण करते, उसके बाद निष्कर्ष देते ! तब आपके निष्कर्ष में एक वजन आ जाता. यह कैसा निष्कर्ष ? जरा-सा कोई फूँक दे तो उड़ जाय ? अंग्रेजी में एक कहावत है ‘टू मच माॅरैलिटी क्रिएट्स इम्माॅरैलिटी’. अति नैतिकता का आग्रह अनैतिकता को जन्म देता है. आपकी एक छोटी-सी टिप्पणी अनैतिकता का जन्म बन गयी है. आपकी इस अनैतिक संतान पर एक नजर- ‘ कुल मिलाकर मेरे अनुसार, आपने एक अनैतिक कार्य किया है, भले ही आप अपने ‘शिक्षक वाले तर्कों’ से खुद को कितना ही उच्च आदर्शों ( ?) वाला साबित करने की कोशिश करें. ’ इस एक वाक्य में जो अनेक भाषा-दोष हैं, फिलहाल मैं उनकी तरफ से आँख मूँदता हूँ. ( वैसे लिक्खाड़ लोगों से इतनी नैतिकता की माँग स्वाभाविक है कि वे शुद्ध और साफ लिखें)
मेरे सामने ऊँचा आदर्श केवल सत्य है और सत्य को साबित करने की जरूरत नहीं पड़ती, उसे केवल देखना पड़ता है. उससे आँखें चार करनी पड़ती हैं. साबित केवल झूठ को करना पड़ता है, क्योंकि उसका कोई अस्तित्व नहीं होता. मैंने जो सत्य अपने आलेख में प्रस्तुत किया, उससे आँखें चार करने के बदले आपने आँखें चुरायीं हैं. साबित उन्हें करना पड़ता है जिसने कुछ छिपाकर रखा है. जिसका जीवन खुली किताब है उसको पढ़ने की पात्रता भी आपने नहीं दिखायी ? मेरा अनुमान है कि आप झूठ को सच और सच को झूठ साबित करने में लगे रहते होंगे, वरना यह ख्याल आपके दिमाग में आया कहाँ से ? जिसे आप अनैतिक कहते हैं, उसी को मैं भी अनैतिक कहता तभी मुझे कुछ और साबित करने की जरूरत पड़ती.
असल में, आपकी और मेरी नैतिकता की मान्यताएँ अलग-अलग हैं. आपके कहने का अर्थ संभवतः यह है कि विवाह से हटकर जो मैंने प्रेम किया, वह अनैतिक है. और मैं कहता हूँ कि विवाह नामक संस्था ही अनैतिक है, क्योंकि इसने प्रेम का गला घोंट कर रख दिया है. प्रेम आगे-आगे चले, विवाह उसके पीछे चले तब तो ठीक है. लेकिन विवाह आगे आ जाय और प्रेम को कहे तुम मेरा अनुगमन करो तो यह अस्वाभाविक और अप्राकृतिक है, इसीलिए अनैतिक भी है. जीवन-मूल्य प्रेम है. चाहे जिस विधि से आता हो, श्लाघ्य है. प्रेमरहित विवाह संबंध को ढोना, अपने पर और पत्नी पर जुल्म करना है. प्रेमरहित परिवार भूतो का घर है.
मेरी और आपकी नैतिकता की धारणा एक उदाहरण से स्पष्ट की जा सकती है. कल्पना कीजिए मैं एक सुंदर पार्क में हूँ. मुझसे मिलने के लिए आतुर एक स्त्री आती है. मैं उसे गले से लगा लेता हूँ. मैं उसके प्रेमालिंगन में डूब जाता हूँ. खो ही जाता हूँ. पता नहीं कि मैं हूँ भी या नहीं. इसी बीच आप उस तरफ से गुजर रहे होते हैं. देखते ही आपको जैसे बिच्छू डंक मार देता है. अनाचार हो रहा है ! सार्वजनिक स्थल पर घोर अनैतिक कृत्य हो रहा है ! इसे रोको, समाज भ्रष्ट हो जायेगा, कहाँ है पार्क का गार्ड ? पुलिस बुलाओ. चार-पाँच आप जैसे लोग अगर वहाँ इकट्ठे हो गये तो पुलिस भी बुलाने की जरूरत नहीं. आप स्वयं ही कार्रवाई शुरू कर देंगे. अब इस स्थिति को देखिये कि मैं आनंद में हूँ. अपने अस्तित्व का ज्ञान भूल गया हूँ. और आप पीड़ा में हैं. ईष्र्या की आग आपके नस-नस में लहर गयी है. जो आजतक आपको नहीं मिला, उसे कैसे दूसरा व्यक्ति पा सकता है ? जिस भाव का आपने दमन किया हुआ है, उसे कैसे किसी दूसरे को प्रकट करने दिया जा सकता है ?
मैं आनंद में हूँ और आप पीड़ा में पड़ गये हैं. सुख में होना, प्रेम में होना नैतिक है. दुख में होना, ईष्र्या में होना अनैतिक है.
एक दूसरा आदमी उसी पार्क से गुजरता है. वह काम-तृप्त है, प्रसन्न है, सहज है. अलबत्ता तो उसका ध्यान ही मेरी तरफ नहीं जायेगा, अगर जायेगा तो आमोद से उसका मन भर जायेगा. वाह, प्रकृति का कैसा मनोरम दृश्य देखने को मिला ! वह विधाता को इस सुंदर दृश्य को देखने का मौका देने के लिए धन्यवाद देगा और आगे बढ़ जायेगा. वह इतना ख्याल जरूर रखेगा कि उनकी उपस्थिति की भनक मुझ प्रेमी जोड़े को न लगे. वह अपनी उपस्थिति से मेरी प्रेम-समाधि तोड़ना न चाहेगा. मुदित होकर एक मुस्कुराहट के साथ वह वहाँ से निकल जायेगा. उसके चित्त पर उस दृश्य की छाया भी न होगी.
यह दूसरा व्यक्ति स्वस्थ है. आप बीमार हैं. आपको इलाज की जरूरत है. देखते हैं, कोई पागल कैसे किसी राहगीर को अकारण मारने दौड़ता है. आपकी स्थिति उससे ज्यादा बेहतर नहीं. उसका दिमाग थोड़ा ज्यादा घसक गया है. एक-दो कदम और आगे बढ़ने पर आप भी उस स्थिति में जा सकते हैं.
आप अपने शब्दों पर जरा गौर कीजिए- ‘जूली-कृत्य’. क्योंकि जिंदगी आपके लिए एक कृत्य है, एक काम है. जीवन अगर एक काम हो तो उसे ढोना पड़ता है, निपटाना पड़ता है, उसे कर्तव्य मानकर निभाना पड़ता है. नहीं निभा पाये तो तनाव होता है, मन अशांत होता है. आप मुझसे बहुत दूर हैं. मुझसे अगर आपका संपर्क हुआ होता तो आप देखते कि जीवन एक उत्सव है. मेरे लिए जीवन महोत्सव है, कृत्य नहीं. तब आप इस ‘कृत्य’ शब्द को बदलकर लिखते- जूली-प्रेम, जूली-उत्सव. आपने टिप्पणी तेा मेरे बारे में की है, लेकिन ये शब्द आपकी ही जीवन-शैली और ‘कृत्य’ की खबर दे रहे हंैे. मैं तो आपका आईना भर हूँ. आपने मुझमें अपनी ही छवि देखी हंै. मेरा जीवन आपके लिए अज्ञात है.
प्रिय चिपलूनकर साहब
आप मेरे जूली ‘कृत्य’ से सहमत नहीं हैं, तो कोई हर्ज नहीं. मैंने ब्लाॅग पर लेख पढ़ने के लिए आमंत्रण दिया था. क्या आपने पढ़ा ? अगर हाँ, तो उसका प्रमाण आपकी टिप्पणी में कहाँ है ? विस्तार में गये बिना, मुझसे जुड़े मुद्दों और पक्षों पर विचार किये बिना निष्कर्ष निकालने की बेचैनी आपके भीतर है और आखिर बिना विचारे निष्कर्ष तो आपने दे ही दिया. क्या आप इसे नैतिक कृत्य समझते हैं ? हड़बड़ी क्या थी, एक-दो दिन और ठहर जाते, थोड़ा तथ्य इकट्ठा करते, तटस्थ विश्लेषण करते, उसके बाद निष्कर्ष देते ! तब आपके निष्कर्ष में एक वजन आ जाता. यह कैसा निष्कर्ष ? जरा-सा कोई फूँक दे तो उड़ जाय ? अंग्रेजी में एक कहावत है ‘टू मच माॅरैलिटी क्रिएट्स इम्माॅरैलिटी’. अति नैतिकता का आग्रह अनैतिकता को जन्म देता है. आपकी एक छोटी-सी टिप्पणी अनैतिकता का जन्म बन गयी है. आपकी इस अनैतिक संतान पर एक नजर- ‘ कुल मिलाकर मेरे अनुसार, आपने एक अनैतिक कार्य किया है, भले ही आप अपने ‘शिक्षक वाले तर्कों’ से खुद को कितना ही उच्च आदर्शों ( ?) वाला साबित करने की कोशिश करें. ’ इस एक वाक्य में जो अनेक भाषा-दोष हैं, फिलहाल मैं उनकी तरफ से आँख मूँदता हूँ. ( वैसे लिक्खाड़ लोगों से इतनी नैतिकता की माँग स्वाभाविक है कि वे शुद्ध और साफ लिखें)
मेरे सामने ऊँचा आदर्श केवल सत्य है और सत्य को साबित करने की जरूरत नहीं पड़ती, उसे केवल देखना पड़ता है. उससे आँखें चार करनी पड़ती हैं. साबित केवल झूठ को करना पड़ता है, क्योंकि उसका कोई अस्तित्व नहीं होता. मैंने जो सत्य अपने आलेख में प्रस्तुत किया, उससे आँखें चार करने के बदले आपने आँखें चुरायीं हैं. साबित उन्हें करना पड़ता है जिसने कुछ छिपाकर रखा है. जिसका जीवन खुली किताब है उसको पढ़ने की पात्रता भी आपने नहीं दिखायी ? मेरा अनुमान है कि आप झूठ को सच और सच को झूठ साबित करने में लगे रहते होंगे, वरना यह ख्याल आपके दिमाग में आया कहाँ से ? जिसे आप अनैतिक कहते हैं, उसी को मैं भी अनैतिक कहता तभी मुझे कुछ और साबित करने की जरूरत पड़ती.
असल में, आपकी और मेरी नैतिकता की मान्यताएँ अलग-अलग हैं. आपके कहने का अर्थ संभवतः यह है कि विवाह से हटकर जो मैंने प्रेम किया, वह अनैतिक है. और मैं कहता हूँ कि विवाह नामक संस्था ही अनैतिक है, क्योंकि इसने प्रेम का गला घोंट कर रख दिया है. प्रेम आगे-आगे चले, विवाह उसके पीछे चले तब तो ठीक है. लेकिन विवाह आगे आ जाय और प्रेम को कहे तुम मेरा अनुगमन करो तो यह अस्वाभाविक और अप्राकृतिक है, इसीलिए अनैतिक भी है. जीवन-मूल्य प्रेम है. चाहे जिस विधि से आता हो, श्लाघ्य है. प्रेमरहित विवाह संबंध को ढोना, अपने पर और पत्नी पर जुल्म करना है. प्रेमरहित परिवार भूतो का घर है.
मेरी और आपकी नैतिकता की धारणा एक उदाहरण से स्पष्ट की जा सकती है. कल्पना कीजिए मैं एक सुंदर पार्क में हूँ. मुझसे मिलने के लिए आतुर एक स्त्री आती है. मैं उसे गले से लगा लेता हूँ. मैं उसके प्रेमालिंगन में डूब जाता हूँ. खो ही जाता हूँ. पता नहीं कि मैं हूँ भी या नहीं. इसी बीच आप उस तरफ से गुजर रहे होते हैं. देखते ही आपको जैसे बिच्छू डंक मार देता है. अनाचार हो रहा है ! सार्वजनिक स्थल पर घोर अनैतिक कृत्य हो रहा है ! इसे रोको, समाज भ्रष्ट हो जायेगा, कहाँ है पार्क का गार्ड ? पुलिस बुलाओ. चार-पाँच आप जैसे लोग अगर वहाँ इकट्ठे हो गये तो पुलिस भी बुलाने की जरूरत नहीं. आप स्वयं ही कार्रवाई शुरू कर देंगे. अब इस स्थिति को देखिये कि मैं आनंद में हूँ. अपने अस्तित्व का ज्ञान भूल गया हूँ. और आप पीड़ा में हैं. ईष्र्या की आग आपके नस-नस में लहर गयी है. जो आजतक आपको नहीं मिला, उसे कैसे दूसरा व्यक्ति पा सकता है ? जिस भाव का आपने दमन किया हुआ है, उसे कैसे किसी दूसरे को प्रकट करने दिया जा सकता है ?
मैं आनंद में हूँ और आप पीड़ा में पड़ गये हैं. सुख में होना, प्रेम में होना नैतिक है. दुख में होना, ईष्र्या में होना अनैतिक है.
एक दूसरा आदमी उसी पार्क से गुजरता है. वह काम-तृप्त है, प्रसन्न है, सहज है. अलबत्ता तो उसका ध्यान ही मेरी तरफ नहीं जायेगा, अगर जायेगा तो आमोद से उसका मन भर जायेगा. वाह, प्रकृति का कैसा मनोरम दृश्य देखने को मिला ! वह विधाता को इस सुंदर दृश्य को देखने का मौका देने के लिए धन्यवाद देगा और आगे बढ़ जायेगा. वह इतना ख्याल जरूर रखेगा कि उनकी उपस्थिति की भनक मुझ प्रेमी जोड़े को न लगे. वह अपनी उपस्थिति से मेरी प्रेम-समाधि तोड़ना न चाहेगा. मुदित होकर एक मुस्कुराहट के साथ वह वहाँ से निकल जायेगा. उसके चित्त पर उस दृश्य की छाया भी न होगी.
यह दूसरा व्यक्ति स्वस्थ है. आप बीमार हैं. आपको इलाज की जरूरत है. देखते हैं, कोई पागल कैसे किसी राहगीर को अकारण मारने दौड़ता है. आपकी स्थिति उससे ज्यादा बेहतर नहीं. उसका दिमाग थोड़ा ज्यादा घसक गया है. एक-दो कदम और आगे बढ़ने पर आप भी उस स्थिति में जा सकते हैं.
आप अपने शब्दों पर जरा गौर कीजिए- ‘जूली-कृत्य’. क्योंकि जिंदगी आपके लिए एक कृत्य है, एक काम है. जीवन अगर एक काम हो तो उसे ढोना पड़ता है, निपटाना पड़ता है, उसे कर्तव्य मानकर निभाना पड़ता है. नहीं निभा पाये तो तनाव होता है, मन अशांत होता है. आप मुझसे बहुत दूर हैं. मुझसे अगर आपका संपर्क हुआ होता तो आप देखते कि जीवन एक उत्सव है. मेरे लिए जीवन महोत्सव है, कृत्य नहीं. तब आप इस ‘कृत्य’ शब्द को बदलकर लिखते- जूली-प्रेम, जूली-उत्सव. आपने टिप्पणी तेा मेरे बारे में की है, लेकिन ये शब्द आपकी ही जीवन-शैली और ‘कृत्य’ की खबर दे रहे हंैे. मैं तो आपका आईना भर हूँ. आपने मुझमें अपनी ही छवि देखी हंै. मेरा जीवन आपके लिए अज्ञात है.
Sunday, September 27, 2009
सामान्यीकरण से सावधान
मेरे ब्लाॅग पर ‘हिन्दू दर्शन संकीर्ण नहीं’ शीर्षक लेख पढ़ने के बाद मुंबई से आयुर्वेदिक चिकित्सक डॅा. रूपेश श्रीवास्तव ने टिप्पणी की है- ^^मटुक बाबू आपके द्वारा भेजे मेल से आपके ब्लाग का पता मिला। आपने जो लिखा वह कुछ वैसा ही है कि जिसे अण्डे खाने हैं वह उसके पक्ष में तर्क और तथ्य जुटा लेता है कि प्रोटीन है वगैरह... जिसे नहीं खाना है वह कहता है कि "नान फाइबरस फूड" है दिल के दौरे का कारण हो सकता है। सब अपने चश्में से दुनिया देखते हैं। आप करो भाई जो आपको करना है किसी को सहमत नहीं कर सकते हां बस तर्क से निरुत्तर जरूर कर सकते हैं। हम अगर सुअर हैं तो मानव मल हमारे भोजन है अब ऐसे में हम अगर मनुष्यों से शास्त्रार्थ करें तो क्या परिणाम निकलने वाला है। उल्लू,चमगादड़ जैसे प्राणी अगर शिक्षक हों इंजीनियर हों साइंसदान हों और वे मनुष्यों से जिरह करें कि तुम सबकी जीवन की सोच एक नामालूम अस्तित्व सूर्य पर केन्द्रित है तो मनुष्य क्या कहेगा कि भाई तुम्हें दिखेगा नहीं क्योंकि तुम उल्लू हो। आप करो जो आपको करना है क्योंकि हम जो मानते हैं वही सत्य होता है जो मानते ही नहीं वह कैसे सत्य हो सकता है। आपकी पूर्व पत्नी और परिवार के प्रति मुझे कोई सहानुभूति होनी चाहिये क्या ये आपसे जानना है.... अवश्य बताएं। मैं सोचता हूं कि आप समलैंगिक संबंधों पर भी कलम चलाएं आपके स्पष्ट विचार जान कर अच्छा लगेगा, वो भी प्रेम-व्रेम जैसा ही कुछ बताया जाता है।**
भड़ास!
September 26, 2009 10:42 AM
आदरणीय डाॅक्टर साहब
मेरे लेखन का उद्देश्य किसी की सहमति पाना नहीं है. सहमति लेकर मैं करूँगा क्या ? और असहमति से मेरा बिगड़ेगा क्या ? मैं जो कुछ भी करता हूँ, अपने बुद्धि-विवेक से. अपने द्वारा किये गये कर्म का नियंता मैं हूँ, भोक्ता मैं हूँ. अगर मैं दूसरों की देखादेखी करता तो स्वभावतः मेरे बहुत समर्थक होते, लेकिन मेरा आनंद खो जाता. अगर मैं भूलवश कुछ गलत कर गुजरता तो शायद उसे सही साबित करने का प्रयास इसलिए करता ताकि लोगों का समर्थन मिले और मैं जिंदा रह सकूँ. जो दूसरों के अनुसार चलता है, उसे ही दूसरों के समर्थन और प्रशंसा की जरूरत पड़ती है. मैंने कभी इसकी जरूरत महसूस नहीं की. अपने स्वाराज्य में रहता हूँ. आनंद से विचरता हूँ. अपनी तरफ से ‘ना काहू सों दोस्ती ना काहू सौं बैर’. मनुष्य जाति एक बड़े भ्रम का शिकार रही है कि कोई उसकी सहायता कर सकता है, कोई उसको नुकसान पहुँचा सकता है. मैंने अपने एकांत के उस कोने में ठहर कर देखा है, जहाँ कोई सहायता नहीं पहुँचा सकता, जहाँ कोई नुकसान भी नहीं पहुँचा सकता. इसलिए इसके लिए कोई प्रयास भी मैं नहीं करता. यह बात जरूर है कि एक प्राकृतिक व्यवस्था के तहत सहायताएँ स्वयमेव आती हैं, नुकसान भी स्वयमेव होता है. मैं दोनों के बीच समभाव रखते हुए अपने को संतुलित रखने का प्रयास करता हूँ. ‘प्रयास’ शब्द भी बहुत सही नहीं है. कहना चाहिए संतुलन भी अपने आप आ जाता है.
मेरा उद्देश्य है विचार-विमर्श के द्वारा सत्य के करीब पहुँचना. सत्य की छाया बनना. एक ऐसे विचार को पैदा करना जो अपने चश्मे का भी रंग देख सके और दूसरों के चश्मे को भी पहचान सके. पूर्वग्रहरहित तथ्यपरक वाद-विवाद अगर हो तो शायद कोई संवाद बन सके. एक ऐसे ही संवाद की तलाश है. सत्य सत्य है. वह हमारे मानने, न मानने पर निर्भर नहीं हैै. मैं जब किसी के विचारों की शव-परीक्षा करता हूँ, तो इसलिए कि उसके माध्यम से सचाई सामने आये. तथ्य और सत्य को न देखनेवाले अंधे नैतिकतावादियों को निरुत्तर करने में मुझे आनंद जरूर आता है. उनको देखते ही मेरा क्षात्र-धर्म दीप्त हो उठता है. लगता है, भीतर किसी ने पंाचजन्य फूँक दिया. विचारों के आक्रमण -प्रत्याक्रमण , उनके दाँव-पेंच को देख मैं उसी तरह आनंदित होता हूँ जैसे युद्ध के मैदान में तलवार भाँजता हुआ कोई सच्चा सूरमा.
आप लिखते हैं -‘‘ आपकी पूर्व पत्नी और परिवार के प्रति मुझे कोई सहानुभूति होनी चाहिए क्या ये आपसे जानना है ? ’’ बिल्कुल मुझसे नहीं जानना है. लेकिन इतना जरूर जानना है कि आपकी सहानुभूति का आधार क्या है ? आपकी आँखों के द्वारा निकट से सम्यक् रूप से देखी गयी मेरी वास्तविक पत्नी या मीडिया में प्रकट हुई मेरी कलाकार पत्नी या इस तरह के मिलते-जुलते मामले में देखी गयी दूसरों की पत्नियाँ ? अगर हर मामले की विशिष्टता की पहचान आपके पास नहीं है तो आपकी सहानुभूति, आपकी धारणायें सब हवा-हवाई हैं. सामान्यीकरण सत्यान्वेषण के लिए विकट दीवार है. जब एक भी मनुष्य एक-दूसरे के समान नहीं है, तो यह सामान्यीकरण आयेगा कहाँ से ? मनुष्य की कुछ विशिष्टता ही उसे पशु से अलग करती है. हर व्यक्ति की विशिष्टता ही उसे दूसरों से अलग करती है. लेकिन आप एक दृष्टि से सही हैं, क्योंकि मनुष्य की विशिष्टता को प्रकट करने वाली शिक्षा कहाँ है ? एक ही फर्मे में सबको ढालने वाली शिक्षा ने मनुष्य को निर्जीव जैसा बना दिया. निर्जीवों में बड़ी समानता होती है. फैक्ट्री में ढाली गयी कारें एक समान होती हैं. श्मशान घाट में लाये गये मुर्दे समान होते हैं. जीवंत आदमी एक समान नहीं हो सकता.
मैं अपनी बात और स्पष्ट करने के लिए अपने जीवन की एक घटना सुनाता हूँ. मैंने इंटरमीडिएट में पटना काॅलेज, पटना में नाम लिखाया. मैट्रिक अपने गाँव से किया. मैंने देखा कि मेरे वर्ग में एक लड़का है जो अंधा है. मैं करुणामिश्रित आश्चर्य में डूब गया, क्योंकि अब तक मैंने ट्रेन में, गाँव-घर में, मेले-मंदिर में भीख माँगते असहाय अंधों को ही देखा था. दया मुझे बहुत आयी थी. संस्कारवश मैंने उस नयनविहीन सहपाठी पर सहानुभूति उड़ेल दी. उन्होंने मुझे सावधान किया - ‘मुझ पर सहानुभूति जताने की जरूरत नहीं. कोई भी आँखवाला मुझसे बेहतर नहंीं है. मैं किसी से कम नहीं हूँ.’
मेरी पत्नी और मेरे परिवार के प्रति सहानुभूति जताने के लिए मुझसे पूछने की जरूरत नहीं, लेकिन कम से कम मेरी पत्नी से तो पूछ लेते ! उन्हें आपकी सहानुभूति की जरूरत है या नहीं ? कोई भी स्वाभिमानी आदमी क्यों किसी की सहानुभूति चाहेगा ? सच्ची सहानुभूति वह है जो क्रियारूप धारण करे. मेरी पत्नी और परिवार के प्रति आप जैसे लाखों लोग सहानुभूति रखते हैं. लेकिन केवल मन में. किसी ने मेरे परिवार से हाल-चाल तक नहंीं पूछा. ऐसी सहानुभूति किसी के पास हो, किसी के पास न हो, उससे क्या फर्क पड़ता है ?
एक और गुप्त बाद बता दूँ. मनुष्य बहुत जटिल प्राणी है. वह किसी भाव का नाम बदलकर उपयोग कहीं कर लेता है. मैं आपको नहीं घेर रहा हूँ. लेकिन ऐसे कई लोगों को मैंने देखा है जो मेरे प्रति उत्पन्न हुई ईष्र्या को पत्नी के प्रति सहानुभूति में बदलकर अपनी आक्रामकता को सही सिद्ध करना चाहते हैं.
आपकी सहानुभूति कहीं अपने आपको अत्यधिक मानवीय दिखलाने की सुषुप्त लालसा तो नहीं है ? झाँक कर देखियेगा. यह काम आप ही कर सकते हैं. इतना जरूर कह देना चाहता हूँ कि जो भी विचार मैंने व्यक्त किया, जरूरी नहीं कि वह ठीक हो. सत्य इससे परे भी हो सकता है. सत्य का जो पहलू आपको दिखता है, उसे आप रखने की कृपा करेंगे.
आपकी इच्छा है कि मैं समलैंगिक संबंधों पर भी कलम चलाऊँ. कुछ दिनों बाद आपकी फरमाइश पूरी करने का प्रयास करूँगा.
मटुक
भड़ास!
September 26, 2009 10:42 AM
आदरणीय डाॅक्टर साहब
मेरे लेखन का उद्देश्य किसी की सहमति पाना नहीं है. सहमति लेकर मैं करूँगा क्या ? और असहमति से मेरा बिगड़ेगा क्या ? मैं जो कुछ भी करता हूँ, अपने बुद्धि-विवेक से. अपने द्वारा किये गये कर्म का नियंता मैं हूँ, भोक्ता मैं हूँ. अगर मैं दूसरों की देखादेखी करता तो स्वभावतः मेरे बहुत समर्थक होते, लेकिन मेरा आनंद खो जाता. अगर मैं भूलवश कुछ गलत कर गुजरता तो शायद उसे सही साबित करने का प्रयास इसलिए करता ताकि लोगों का समर्थन मिले और मैं जिंदा रह सकूँ. जो दूसरों के अनुसार चलता है, उसे ही दूसरों के समर्थन और प्रशंसा की जरूरत पड़ती है. मैंने कभी इसकी जरूरत महसूस नहीं की. अपने स्वाराज्य में रहता हूँ. आनंद से विचरता हूँ. अपनी तरफ से ‘ना काहू सों दोस्ती ना काहू सौं बैर’. मनुष्य जाति एक बड़े भ्रम का शिकार रही है कि कोई उसकी सहायता कर सकता है, कोई उसको नुकसान पहुँचा सकता है. मैंने अपने एकांत के उस कोने में ठहर कर देखा है, जहाँ कोई सहायता नहीं पहुँचा सकता, जहाँ कोई नुकसान भी नहीं पहुँचा सकता. इसलिए इसके लिए कोई प्रयास भी मैं नहीं करता. यह बात जरूर है कि एक प्राकृतिक व्यवस्था के तहत सहायताएँ स्वयमेव आती हैं, नुकसान भी स्वयमेव होता है. मैं दोनों के बीच समभाव रखते हुए अपने को संतुलित रखने का प्रयास करता हूँ. ‘प्रयास’ शब्द भी बहुत सही नहीं है. कहना चाहिए संतुलन भी अपने आप आ जाता है.
मेरा उद्देश्य है विचार-विमर्श के द्वारा सत्य के करीब पहुँचना. सत्य की छाया बनना. एक ऐसे विचार को पैदा करना जो अपने चश्मे का भी रंग देख सके और दूसरों के चश्मे को भी पहचान सके. पूर्वग्रहरहित तथ्यपरक वाद-विवाद अगर हो तो शायद कोई संवाद बन सके. एक ऐसे ही संवाद की तलाश है. सत्य सत्य है. वह हमारे मानने, न मानने पर निर्भर नहीं हैै. मैं जब किसी के विचारों की शव-परीक्षा करता हूँ, तो इसलिए कि उसके माध्यम से सचाई सामने आये. तथ्य और सत्य को न देखनेवाले अंधे नैतिकतावादियों को निरुत्तर करने में मुझे आनंद जरूर आता है. उनको देखते ही मेरा क्षात्र-धर्म दीप्त हो उठता है. लगता है, भीतर किसी ने पंाचजन्य फूँक दिया. विचारों के आक्रमण -प्रत्याक्रमण , उनके दाँव-पेंच को देख मैं उसी तरह आनंदित होता हूँ जैसे युद्ध के मैदान में तलवार भाँजता हुआ कोई सच्चा सूरमा.
आप लिखते हैं -‘‘ आपकी पूर्व पत्नी और परिवार के प्रति मुझे कोई सहानुभूति होनी चाहिए क्या ये आपसे जानना है ? ’’ बिल्कुल मुझसे नहीं जानना है. लेकिन इतना जरूर जानना है कि आपकी सहानुभूति का आधार क्या है ? आपकी आँखों के द्वारा निकट से सम्यक् रूप से देखी गयी मेरी वास्तविक पत्नी या मीडिया में प्रकट हुई मेरी कलाकार पत्नी या इस तरह के मिलते-जुलते मामले में देखी गयी दूसरों की पत्नियाँ ? अगर हर मामले की विशिष्टता की पहचान आपके पास नहीं है तो आपकी सहानुभूति, आपकी धारणायें सब हवा-हवाई हैं. सामान्यीकरण सत्यान्वेषण के लिए विकट दीवार है. जब एक भी मनुष्य एक-दूसरे के समान नहीं है, तो यह सामान्यीकरण आयेगा कहाँ से ? मनुष्य की कुछ विशिष्टता ही उसे पशु से अलग करती है. हर व्यक्ति की विशिष्टता ही उसे दूसरों से अलग करती है. लेकिन आप एक दृष्टि से सही हैं, क्योंकि मनुष्य की विशिष्टता को प्रकट करने वाली शिक्षा कहाँ है ? एक ही फर्मे में सबको ढालने वाली शिक्षा ने मनुष्य को निर्जीव जैसा बना दिया. निर्जीवों में बड़ी समानता होती है. फैक्ट्री में ढाली गयी कारें एक समान होती हैं. श्मशान घाट में लाये गये मुर्दे समान होते हैं. जीवंत आदमी एक समान नहीं हो सकता.
मैं अपनी बात और स्पष्ट करने के लिए अपने जीवन की एक घटना सुनाता हूँ. मैंने इंटरमीडिएट में पटना काॅलेज, पटना में नाम लिखाया. मैट्रिक अपने गाँव से किया. मैंने देखा कि मेरे वर्ग में एक लड़का है जो अंधा है. मैं करुणामिश्रित आश्चर्य में डूब गया, क्योंकि अब तक मैंने ट्रेन में, गाँव-घर में, मेले-मंदिर में भीख माँगते असहाय अंधों को ही देखा था. दया मुझे बहुत आयी थी. संस्कारवश मैंने उस नयनविहीन सहपाठी पर सहानुभूति उड़ेल दी. उन्होंने मुझे सावधान किया - ‘मुझ पर सहानुभूति जताने की जरूरत नहीं. कोई भी आँखवाला मुझसे बेहतर नहंीं है. मैं किसी से कम नहीं हूँ.’
मेरी पत्नी और मेरे परिवार के प्रति सहानुभूति जताने के लिए मुझसे पूछने की जरूरत नहीं, लेकिन कम से कम मेरी पत्नी से तो पूछ लेते ! उन्हें आपकी सहानुभूति की जरूरत है या नहीं ? कोई भी स्वाभिमानी आदमी क्यों किसी की सहानुभूति चाहेगा ? सच्ची सहानुभूति वह है जो क्रियारूप धारण करे. मेरी पत्नी और परिवार के प्रति आप जैसे लाखों लोग सहानुभूति रखते हैं. लेकिन केवल मन में. किसी ने मेरे परिवार से हाल-चाल तक नहंीं पूछा. ऐसी सहानुभूति किसी के पास हो, किसी के पास न हो, उससे क्या फर्क पड़ता है ?
एक और गुप्त बाद बता दूँ. मनुष्य बहुत जटिल प्राणी है. वह किसी भाव का नाम बदलकर उपयोग कहीं कर लेता है. मैं आपको नहीं घेर रहा हूँ. लेकिन ऐसे कई लोगों को मैंने देखा है जो मेरे प्रति उत्पन्न हुई ईष्र्या को पत्नी के प्रति सहानुभूति में बदलकर अपनी आक्रामकता को सही सिद्ध करना चाहते हैं.
आपकी सहानुभूति कहीं अपने आपको अत्यधिक मानवीय दिखलाने की सुषुप्त लालसा तो नहीं है ? झाँक कर देखियेगा. यह काम आप ही कर सकते हैं. इतना जरूर कह देना चाहता हूँ कि जो भी विचार मैंने व्यक्त किया, जरूरी नहीं कि वह ठीक हो. सत्य इससे परे भी हो सकता है. सत्य का जो पहलू आपको दिखता है, उसे आप रखने की कृपा करेंगे.
आपकी इच्छा है कि मैं समलैंगिक संबंधों पर भी कलम चलाऊँ. कुछ दिनों बाद आपकी फरमाइश पूरी करने का प्रयास करूँगा.
मटुक
Saturday, September 26, 2009
हिन्दू-दर्शन संकीर्ण नहीं
गुरु-शिष्या संबंध-2 पर एक ब्लाॅगर अमिताभ त्रिपाठी की टिप्पणी पढ़कर मुझे कुछ ऐसी ही प्रसन्नता हुई , मानो - ‘ आज सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा ’. पाठकों की सुविधा के लिए उनकी पूरी टिप्पणी नीचे दे रहा हूँ.
‘‘मटुकजी, आप जो कुछ कर रहे हैं, वह आपका व्यक्तिगत जीवन है. मुझे आपत्ति इस बात पर है कि आप हिन्दू दर्शन, परंपरा और गुरु-शिष्य परंपरा को केवल अपने संदर्भ में परिभाषित करने के लिए लोगों को अर्द्धसत्य बताकर गुमराह कर रहे हैं. गीता में जिस ‘काम’ की बात आपने की है, वह लिविडो नहीं कामना है और इसका अर्थ है कि कामना अर्थात् इच्छाओं की पूर्ति नहीं होने से क्रोध उत्पन्न होता है और व्यक्ति की कामना केवल लिबिडो नहीं है.
मेरा आपसे आग्रह केवल इतना ही है कि गीता, स्वामी विवेकानंद को इस बहस में मत घसीटिये, क्योंकि गीता का महत्व हिन्दू समाज में काम की व्याख्या के लिए नहीं है और न ही हिन्दू समाज स्वामी विवेकानंद को भगिनी निवेदिता के बीच की अफवाहों के लिए जानता है. परंतु आपको सारा समाज तो केवल एक उपलब्धि के लिए जानता है. बेहतर होगा कि आप फ्रायड की भाँति लिविडो और अपने जीवन के संदर्भ में हिन्दू दर्शन और हमारे प्रेरणा पुरुषों की व्याख्या न करें, बाकी आप अपने व्यक्तिगत जीवन में जो मर्जी आये करें.’’
प्रिय अमिताभजी, आपके पाँच वाक्यों में दो बार ‘हिन्दू दर्शन’ और दो बार ‘हिन्दू समाज’ शब्द आये हुए हैं. इससे स्पष्ट होता है कि आप हिन्दुत्व-ग्रसित व्यक्ति हैं. आप उस साम्प्रदायिक विचारधारा के व्यक्ति हैं जो मस्जिद को ध्वस्त करने में ‘हिन्दू दर्शन’ की और गुजरात के दंगों में ‘हिन्दु समाज’ की विजय देखती है. हमें गीता और विवेकानंद की व्याख्या करने से मना करना आपकी आपराधिक प्रवृत्ति की भी सूचना देता है. इसके साथ ही आपके चित्त के रोंगों को भी प्रकट करता है. क्या गीता और विवेकानंद आप जैसे लोगों की बपौती हैं ? दुनिया में कोई कानून नहीं है जो मुझे गीता, कुरान, बाइबिल, धम्मपद आदि ग्रंथ पढ़ने और उनकी व्याख्या करने से रोक सके ? ये सारे ग्रंथ और सारे महापुरुष किसी जाति, सम्प्रदाय और देश की नहीं , संपूर्ण विश्व की धरोहर हैं.
कोई भी समझदार आदमी इतना जरूर जानता है कि किसी भी चीज की व्याख्या अपने संदर्भ में ही हो सकती है. अपने ज्ञान, अपने मानसिक स्तर और अपने अनुभव के अलावा व्याख्या करने का कोई दूसरा उपाय ही नहीं है. हजारों सालों से गीता की व्याख्याएँ होती आ रही हैं, अपने-अपने संदर्भों में. आपने किस-किस को मना किया है ? शंकराचार्य ने अपने संदर्भ में गीता की व्याख्या की और उससे संन्यास एवं अकर्म निकाल लिया. इसका दुष्परिणाम हुआ कि देश में पलायनवादी प्रवृत्ति पनप गयी. जरूरत एक ऐसी व्याख्या की थी जो कर्म को स्थापित करे. यह काम तिलक ने किया. अब तक की सारी व्याख्याओं केा उलट कर गीता का मर्म उद्घाटित करते हुए ओशो ने उसे मनस-शास्त्र घोषित किया. किन्हीं भी दो महापुरुषों की व्याख्याएँ एक समान नहीं हैं. फिर भी आप उसकी व्याख्या करने से मुझे रोकना चाहते हैं ? आपकी इस विचारधारा से तानाशाही की दुर्गंध आ रही है.
व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक जीवन कोई अलग-थलग चीज नहीं है. सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं. अगर उनके अन्तर्सम्बन्धों को आप नहीं देख पा रहे हैं , तो मैं आपके लिए भगवान से प्रार्थना ही कर सकता हूँ. तालाब में फेंका गया एक पत्थर पूरे तालाब को आंदोलित कर देता है. मेरे व्यक्तिगत जीवन में किसी ने कंकड़िया मार कर उसे आंदोलित किया है, जिसकी लहर आप तक पहुँची है और आप उद्वेलित हैं. हम सब छोटे-छोटे टापू नहीं हैं, एक ही महासागर के हिस्से हैं. हमारा जीवन परस्पर आश्रित है. अगर मैं ‘अर्द्धसत्य’ बताकर लोगों को ‘गुमराह’ कर रहा हूँ, तो आपसे निवेदन है कि पूर्ण सत्य बताकर लोगों को गुमराह होने से बचा लें. मैं अपनी ओर से आपकेा मना नहीं करूँगा, बल्कि आपकी पीठ थपथपाऊँगा.
लगता है, आपने फ्रायड के ‘लिबिडो’ को एक ऐसे स्रोत से समझा है जिनके पास फ्रायड की समझ नहीं है. फ्रायड एक ऐसे महान मनोवैज्ञानिक हैं जिन्होंने दुनिया को हिला कर रख दिया है. पहली बार ईमानदार चिंतन की शुरुआत फ्रायड से हुई है. फ्रायड के द्वारा ही लोगों को पहली बार मालूम हुआ कि दमन गलत है. उन्होंने कृष्ण को सही ढंग से समझने की एक आधार-भूमि तैयार कर दी है, क्योंकि मनुष्य जाति के इतिहास में अकेले कृष्ण हैं जो दमनवादी नहीं हैं. कृष्ण प्रेम से नहीं भागते. स्त्रियों से परहेज नहीं करते. गीता के निर्माता कृष्ण अत्यन्त सहज पुरुष हैं. स्त्री-पुरुष का प्रेमालिंगन और समागम एक जीवन-तथ्य है. लेकिन आप जैसे लोगों ने संभोग को भी समस्या बना दिया है. गीता आपके लिए पूजा करने वाला धार्मिक ग्रंथ होगा, मेरे लिए धड़कता हुआ जीवन है. पश्चिम के दार्शनिक शोपेनहावर ने जब पहली बार गीता का ड्यूसन द्वारा किया गया अनुवाद पढ़ा तो सड़क पर नाचने लगा था. उसने कहा था- ‘यह किताब पढ़ने के लिए नहीं, नाचने के लिए है.’ उसी किताब से आप मुझे वंचित रखना चाहते हैं ? स्वाभाविक है, क्योंकि आप गीता के दो ही उपयोग जानते हैं- एक अदालत में गीता की कसम लेकर झूठ बोलने के लिए और दूसरे, मरणासन्न व्यक्ति को सुनाने के लिए, ताकि कुकर्मियों को भी स्वर्ग मिल जाय !
आपको लग रहा होगा कि ‘लिबिडो’ का अर्थ होता है यौन-लिप्सा जो कि आपकी नजर में घिनौनी चीज है. आप शायद समझते होंगे कि धन-लिप्सा, पद-लिप्सा, यश-लिप्सा, युद्ध-लिप्सा आदि कोई अच्छी चीज होगी. अगर आप सीधे-सीधे या किसी समझदार विद्वान के माध्यम से ‘लिबिडो’ का अर्थ समझते तो आपको मालूम होता कि इस शब्द का अर्थ होता है ‘काम-ऊर्जा’ जिसे सेक्स-एनर्जी कह सकते हैं. केवल स्त्री-पुरुष का समागम काम-ऊर्जा नहीं है. यह मानव जीवन के मूल में है. मानव-जीवन ही नहीं संपूर्ण सृष्टि के अंतरतम में छिपी हुई है. काम ऊर्जा न हो तो किसी प्रकार का सृजन संभव नहीं है. काम ऊर्जा के खेल से ही फूल खिलते हैं. पक्षियों के गीत का सौन्दर्य काम-ऊर्जा की देन होती है. आप तो हिन्दू हैं , पता ही होगा कि पुराण में कहा गया है कि ब्रह्मा ने जो जगत बनाया है काम से पीड़ित होकर ही. ‘लिबिडो’ उस सागर की तरह है जिससे अनंत कामनाओं की तरंगे पैदा होती हैं.
मैंने कब कहा कि हिन्दू समाज में विवेकानंद भगिनी निवेदिता को लेकर चल रही अफवाहों के लिए जाने जाते हैं ? कोई कुछ भी कहे व्यक्ति अपने संदर्भ में उसका अर्थ ले ही लेता है. मेरे कहने का मतलब है कि किसी के संबंधों को समझने का एक ही आधार है अपने संबंध का स्तर ; अपना मानसिक विकास. काम-अतृप्त मानसिक दशा के कारण कृष्ण छिनार कहे जाते हैं, मीरा आवारा कही जाती हैं. कहा जाता है कि भगवान बुद्ध ने आम्रपाली को पटा लिया था, सुजाता से उनके शारीरिक संबंध थे. यह सब मैंने आपके ही हिन्दू समाज से सुना है. कोई गढ़ कर नहीं कह रहा हूँ. प्रेम के लिए विद्रोह करने वाली एक लड़की को एक हिन्दू वकील ने कहा- ‘अरे, तुम मीरा बनने चली हो, आवारागर्दी करेागी.’?
आप कहते हैं -‘आपको सारा समाज केवल एक उपलब्धि के लिए जानता है.’ मुझे कभी एहसास नहीं हुआ कि मेरी भी कोई उपलब्धि है !
व्यक्तिगत जीवन में भी व्यक्ति जो मर्जी आये नहीं कर सकता. यह देखना जरूरी होता है कि उसकी स्वतंत्रता किसी और की स्वतंत्रता का हरण तो नहीं कर रही है. लेकिन आपकी विचारधारा के लोग दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में दखल देते हैं और उसे अपने अनुसार चलाने की हरसंभव कोशिश करते हैं.
आपका प्रोफाइल देखा, आप अपना पूरा परिचय छुपाये हुए हैं. अपराध बोध से ग्रसित व्यक्ति अपने को छिपाता है. पूछना चाहता हूँ कि छिपकर आक्रमण करना हिन्दू संस्कृति है या व्याध संस्कृति या कायर संस्कृति ?
‘‘मटुकजी, आप जो कुछ कर रहे हैं, वह आपका व्यक्तिगत जीवन है. मुझे आपत्ति इस बात पर है कि आप हिन्दू दर्शन, परंपरा और गुरु-शिष्य परंपरा को केवल अपने संदर्भ में परिभाषित करने के लिए लोगों को अर्द्धसत्य बताकर गुमराह कर रहे हैं. गीता में जिस ‘काम’ की बात आपने की है, वह लिविडो नहीं कामना है और इसका अर्थ है कि कामना अर्थात् इच्छाओं की पूर्ति नहीं होने से क्रोध उत्पन्न होता है और व्यक्ति की कामना केवल लिबिडो नहीं है.
मेरा आपसे आग्रह केवल इतना ही है कि गीता, स्वामी विवेकानंद को इस बहस में मत घसीटिये, क्योंकि गीता का महत्व हिन्दू समाज में काम की व्याख्या के लिए नहीं है और न ही हिन्दू समाज स्वामी विवेकानंद को भगिनी निवेदिता के बीच की अफवाहों के लिए जानता है. परंतु आपको सारा समाज तो केवल एक उपलब्धि के लिए जानता है. बेहतर होगा कि आप फ्रायड की भाँति लिविडो और अपने जीवन के संदर्भ में हिन्दू दर्शन और हमारे प्रेरणा पुरुषों की व्याख्या न करें, बाकी आप अपने व्यक्तिगत जीवन में जो मर्जी आये करें.’’
प्रिय अमिताभजी, आपके पाँच वाक्यों में दो बार ‘हिन्दू दर्शन’ और दो बार ‘हिन्दू समाज’ शब्द आये हुए हैं. इससे स्पष्ट होता है कि आप हिन्दुत्व-ग्रसित व्यक्ति हैं. आप उस साम्प्रदायिक विचारधारा के व्यक्ति हैं जो मस्जिद को ध्वस्त करने में ‘हिन्दू दर्शन’ की और गुजरात के दंगों में ‘हिन्दु समाज’ की विजय देखती है. हमें गीता और विवेकानंद की व्याख्या करने से मना करना आपकी आपराधिक प्रवृत्ति की भी सूचना देता है. इसके साथ ही आपके चित्त के रोंगों को भी प्रकट करता है. क्या गीता और विवेकानंद आप जैसे लोगों की बपौती हैं ? दुनिया में कोई कानून नहीं है जो मुझे गीता, कुरान, बाइबिल, धम्मपद आदि ग्रंथ पढ़ने और उनकी व्याख्या करने से रोक सके ? ये सारे ग्रंथ और सारे महापुरुष किसी जाति, सम्प्रदाय और देश की नहीं , संपूर्ण विश्व की धरोहर हैं.
कोई भी समझदार आदमी इतना जरूर जानता है कि किसी भी चीज की व्याख्या अपने संदर्भ में ही हो सकती है. अपने ज्ञान, अपने मानसिक स्तर और अपने अनुभव के अलावा व्याख्या करने का कोई दूसरा उपाय ही नहीं है. हजारों सालों से गीता की व्याख्याएँ होती आ रही हैं, अपने-अपने संदर्भों में. आपने किस-किस को मना किया है ? शंकराचार्य ने अपने संदर्भ में गीता की व्याख्या की और उससे संन्यास एवं अकर्म निकाल लिया. इसका दुष्परिणाम हुआ कि देश में पलायनवादी प्रवृत्ति पनप गयी. जरूरत एक ऐसी व्याख्या की थी जो कर्म को स्थापित करे. यह काम तिलक ने किया. अब तक की सारी व्याख्याओं केा उलट कर गीता का मर्म उद्घाटित करते हुए ओशो ने उसे मनस-शास्त्र घोषित किया. किन्हीं भी दो महापुरुषों की व्याख्याएँ एक समान नहीं हैं. फिर भी आप उसकी व्याख्या करने से मुझे रोकना चाहते हैं ? आपकी इस विचारधारा से तानाशाही की दुर्गंध आ रही है.
व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक जीवन कोई अलग-थलग चीज नहीं है. सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं. अगर उनके अन्तर्सम्बन्धों को आप नहीं देख पा रहे हैं , तो मैं आपके लिए भगवान से प्रार्थना ही कर सकता हूँ. तालाब में फेंका गया एक पत्थर पूरे तालाब को आंदोलित कर देता है. मेरे व्यक्तिगत जीवन में किसी ने कंकड़िया मार कर उसे आंदोलित किया है, जिसकी लहर आप तक पहुँची है और आप उद्वेलित हैं. हम सब छोटे-छोटे टापू नहीं हैं, एक ही महासागर के हिस्से हैं. हमारा जीवन परस्पर आश्रित है. अगर मैं ‘अर्द्धसत्य’ बताकर लोगों को ‘गुमराह’ कर रहा हूँ, तो आपसे निवेदन है कि पूर्ण सत्य बताकर लोगों को गुमराह होने से बचा लें. मैं अपनी ओर से आपकेा मना नहीं करूँगा, बल्कि आपकी पीठ थपथपाऊँगा.
लगता है, आपने फ्रायड के ‘लिबिडो’ को एक ऐसे स्रोत से समझा है जिनके पास फ्रायड की समझ नहीं है. फ्रायड एक ऐसे महान मनोवैज्ञानिक हैं जिन्होंने दुनिया को हिला कर रख दिया है. पहली बार ईमानदार चिंतन की शुरुआत फ्रायड से हुई है. फ्रायड के द्वारा ही लोगों को पहली बार मालूम हुआ कि दमन गलत है. उन्होंने कृष्ण को सही ढंग से समझने की एक आधार-भूमि तैयार कर दी है, क्योंकि मनुष्य जाति के इतिहास में अकेले कृष्ण हैं जो दमनवादी नहीं हैं. कृष्ण प्रेम से नहीं भागते. स्त्रियों से परहेज नहीं करते. गीता के निर्माता कृष्ण अत्यन्त सहज पुरुष हैं. स्त्री-पुरुष का प्रेमालिंगन और समागम एक जीवन-तथ्य है. लेकिन आप जैसे लोगों ने संभोग को भी समस्या बना दिया है. गीता आपके लिए पूजा करने वाला धार्मिक ग्रंथ होगा, मेरे लिए धड़कता हुआ जीवन है. पश्चिम के दार्शनिक शोपेनहावर ने जब पहली बार गीता का ड्यूसन द्वारा किया गया अनुवाद पढ़ा तो सड़क पर नाचने लगा था. उसने कहा था- ‘यह किताब पढ़ने के लिए नहीं, नाचने के लिए है.’ उसी किताब से आप मुझे वंचित रखना चाहते हैं ? स्वाभाविक है, क्योंकि आप गीता के दो ही उपयोग जानते हैं- एक अदालत में गीता की कसम लेकर झूठ बोलने के लिए और दूसरे, मरणासन्न व्यक्ति को सुनाने के लिए, ताकि कुकर्मियों को भी स्वर्ग मिल जाय !
आपको लग रहा होगा कि ‘लिबिडो’ का अर्थ होता है यौन-लिप्सा जो कि आपकी नजर में घिनौनी चीज है. आप शायद समझते होंगे कि धन-लिप्सा, पद-लिप्सा, यश-लिप्सा, युद्ध-लिप्सा आदि कोई अच्छी चीज होगी. अगर आप सीधे-सीधे या किसी समझदार विद्वान के माध्यम से ‘लिबिडो’ का अर्थ समझते तो आपको मालूम होता कि इस शब्द का अर्थ होता है ‘काम-ऊर्जा’ जिसे सेक्स-एनर्जी कह सकते हैं. केवल स्त्री-पुरुष का समागम काम-ऊर्जा नहीं है. यह मानव जीवन के मूल में है. मानव-जीवन ही नहीं संपूर्ण सृष्टि के अंतरतम में छिपी हुई है. काम ऊर्जा न हो तो किसी प्रकार का सृजन संभव नहीं है. काम ऊर्जा के खेल से ही फूल खिलते हैं. पक्षियों के गीत का सौन्दर्य काम-ऊर्जा की देन होती है. आप तो हिन्दू हैं , पता ही होगा कि पुराण में कहा गया है कि ब्रह्मा ने जो जगत बनाया है काम से पीड़ित होकर ही. ‘लिबिडो’ उस सागर की तरह है जिससे अनंत कामनाओं की तरंगे पैदा होती हैं.
मैंने कब कहा कि हिन्दू समाज में विवेकानंद भगिनी निवेदिता को लेकर चल रही अफवाहों के लिए जाने जाते हैं ? कोई कुछ भी कहे व्यक्ति अपने संदर्भ में उसका अर्थ ले ही लेता है. मेरे कहने का मतलब है कि किसी के संबंधों को समझने का एक ही आधार है अपने संबंध का स्तर ; अपना मानसिक विकास. काम-अतृप्त मानसिक दशा के कारण कृष्ण छिनार कहे जाते हैं, मीरा आवारा कही जाती हैं. कहा जाता है कि भगवान बुद्ध ने आम्रपाली को पटा लिया था, सुजाता से उनके शारीरिक संबंध थे. यह सब मैंने आपके ही हिन्दू समाज से सुना है. कोई गढ़ कर नहीं कह रहा हूँ. प्रेम के लिए विद्रोह करने वाली एक लड़की को एक हिन्दू वकील ने कहा- ‘अरे, तुम मीरा बनने चली हो, आवारागर्दी करेागी.’?
आप कहते हैं -‘आपको सारा समाज केवल एक उपलब्धि के लिए जानता है.’ मुझे कभी एहसास नहीं हुआ कि मेरी भी कोई उपलब्धि है !
व्यक्तिगत जीवन में भी व्यक्ति जो मर्जी आये नहीं कर सकता. यह देखना जरूरी होता है कि उसकी स्वतंत्रता किसी और की स्वतंत्रता का हरण तो नहीं कर रही है. लेकिन आपकी विचारधारा के लोग दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में दखल देते हैं और उसे अपने अनुसार चलाने की हरसंभव कोशिश करते हैं.
आपका प्रोफाइल देखा, आप अपना पूरा परिचय छुपाये हुए हैं. अपराध बोध से ग्रसित व्यक्ति अपने को छिपाता है. पूछना चाहता हूँ कि छिपकर आक्रमण करना हिन्दू संस्कृति है या व्याध संस्कृति या कायर संस्कृति ?
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