रविवार, अक्तूबर 16, 2011

प्रजातंत्र की पीड़ा




बिहार की जदयू विधायक जगमातो देवी के निधन से सीवान जिले के दरौंदा विधानसभा क्षेत्र की सीट खाली हो गयी है। इस जगह के लिए चुनाव होना है। प्रजातंत्र की पुकार है कि उस क्षेत्र में सर्वाधिक योग्य जनसेवक की खोज हो और उन्हें पार्टी टिकट देकर जिताये। लेकिन राजतंत्र की राय अलग है। उसमेंं राजा के बेटे को ही राजगद्दी मिलने का विधान है। स्वाधीन भारत ने प्रजातांत्रिक प्रणाली  अपनायी, लेकिन क्रांतिकारी शिक्षा के अभाव में राजतंत्रीय पुराना संस्कार जारी है। इसके दो प्रमाण मुझे तुरत मिले हैं। एक टीवी चैनल पर दिये गये बाइट में स्वर्गीया जगमातो देवी के पुत्र श्री अजय सिंह ने मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार को राजा कहकर संबोधित किया और स्टूडियो में बैठे एक ज्योतिषाचार्य ने इससे भी बढ़कर बताया कि राजा में तो ईश्वर का अंश होता है। मुझे तुलसीदास याद आ गये ! उन्होंने जीवमात्र में ईश्वर का अंश देखा था - ‘ईस्वर अंस जीब अबिनासी’। लेकिन पंडित, पुरोहित, ज्योतिषाचार्य आदि की आँखों पर राजभक्ति का ऐसा चश्मा चढ़ा रहता है कि उन्हें केवल राजा में ईश्वर का अंश दिखायी पड़ता है। हम देख रहे हैं कि भारतीय प्रजातंत्र की गंगा में राजतंत्र की यमुना भी मिली हुई है। नदियाँ आपस मंे मिले तो संगम तीर्थ बन जाता है, लेकिन दो विपरीत तंत्र आपस में मिले तो राजनीतिक रोग पैदा होता है। प्रजातंत्र के भीतर राजतंत्र के कीटाणु घुसे हुए हैं। फलतः प्रजातंत्र बीमार चल रहा है। बदन दर्द एवं बुखार से छटपटा रहा है और इलाज के लिए भारत के क्रांतिकारी सपूतों को पुकार रहा है। छोटी-सी उमर में ही उसे यह रोग लग गया है, लोग कहते हैं नहीं बचेगा।
प्रजातंत्र कह रहा है कि मेरी रक्षा करनी है तो जनता के बीच से भारत माता की सुयोग्य संतानों को चुनो, लेकिन राजतंत्र कहता है, राजा का पुत्र ही सर्वाधिक योग्य उत्तराधिकारी हो सकता है। राजतंत्र की जीत हुई है। राजा ने तय किया है कि स्व. जगमातो देवी के पुत्र अजय सिंह ही विधायक बनेंगे। लेकिन राजा की राह में एक बड़ी मुश्किल खड़ी हो गयी ! राजकुमार श्री अजय सिंह आपराधिक छवि के हैं। सुना है कि उन पर 49 केस चल रहे हैं। वैसे तो सामान्यतः कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि पार्टी एक से बढ़कर एक बाहुबलियों को अपने पेट में पचाये हुए है, उनमें एक और सही ! लेकिन लगता है कि अड़चनें कुछ ज्यादा ही कठिन रही होंगी। अजय सिंह को टिकट देना भारी दुविधा में डालने वाला रहा होगा। करीब करीब असंभव ! अब क्या हो ? राजतंत्र की रक्षा कैसे हो ? प्रदेश के राजा बड़े सूझ बूझ वाले व्यक्ति हैं। चुटकी बजाते ही हल निकालनेवाले। उनका दिमाग कौंध गया ! क्यों नहीं राजपुत्र  का आनन फानन विवाह रचाकर उनकी पत्नी का राज्याभिषेक किया जाय! राजदरबार में राजा की इस सूक्ष्म बुद्धि की जयजयकार हुई ! रास्ता निकल आया। हर्ष छा गया। लेकिन यह क्या ? राह में फिर काँटें आ गए ! पितृपक्ष चल रहा है, इसमें तो विवाह वर्जित है ! इस माह में लोग पितरों का तर्पण करते हैं, कुछ लोग तो दाढ़ी बाल भी नहीं बनाते। अब क्या हेागा ? राजा के चेहरे पर एक बार फिर मुस्कान दौड़ गयी- ‘मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए।’ सभी दरबारी बुद्धिमान राजा की मुस्कान की तरफ मुखातिब हुए और कयास लगाने लगे कि इस मुस्कान के पीछे जरूर कोई समाधान छिपा होगा ! इतने में राजाज्ञा हुई- राजपुरोहित को दरबार में फौरन हाजिर करो।
राजपुरोहित महामहोपाध्याय ज्योतिषाचार्य पंडित चतुरानन जी महाराज हाजिर हुए। उनके सामने समस्या रखी गयी। पितृ पक्ष में विवाह मुहूर्त निकालना है। पंडितजी, उचित पुरस्कार मिलेगा। पुरोहित ने कहा- प्रभु, इसमें क्या मुश्किल है, इसी पितृपक्ष में तो जिउतिया जैसा पावन पर्व माताएँ मनाती हैं। इसी पितृपक्ष में विश्वकर्मा पूजा धूमधाम से होती है। प्रजा खुशी में लाउडस्पीकर बजाती है, नाचती, गाती है, फिर विवाहोत्सव क्यों नहीं हो सकता! इसमें कोई अड़चन नहंीं है, अन्नदाता ! आवश्यकता आविष्कार की जननी है। पंडितजी ने रास्ता निकाल दिया ! पितृपक्ष में विवाह शुभ है ! लगन महूरत झूठ सब।.... देश, काल, पात्र और जरूरत के अनुसार पितृपक्ष के नियम को शिथिल करते हुए शहनाई बजाने का आदेश निर्गत हुआ ! राजा के इस निर्णय को शिरोधार्य करते हुए राजकुमार ने सहर्ष घोषणा की- ‘आओ रानी हम ढोयेंगे पालकी, यही हुई  है राय जवाहरलाल की।’ ईश्वर अंश होने के कारण राजा निर्दोष होते हैं ! वे कोई भी निर्णय ले सकते हैं ! तुलसीदास ने भी कहा- समरथ को नहिं दोष गुसाईं ! राजसभा में राजपुरोहित की भी जयकार हुई।
अब एक ही काम बच गया- सौभाग्यशालिनी, शुभाकांक्षिणी, सुलक्षणा सुकन्या की सर्च ! उस कन्या में दो गुण अनिवार्यतः होने चाहिए। एक तो उनमें राजपाट चलाने की क्षमता हो, दूसरे वह पत्नी धर्म का भी निर्वाह सफलतापूर्वक कर सके। सुनते हैं, इस पद के लिए सोलह कन्याएँ खोजी गयीं। उनका इंटरव्यू हुआ। कविता सिंह नामक एक धन्या कन्या इंटरव्यू बोर्ड के द्वारा सेलेक्ट की गयी। श्री अजय सिंह ने अपने पितरों का आह्वान किया। वे सभी आत्माएँ सूक्ष्म शरीर धारण कर विवाह समारोह में उपस्थित हुईं। उनकी उपस्थिति में मंगलगान और आन बान शान के साथ शादी संपन्न हुई।
इस मांगलिक वेला में प्रजा को संबोधित करते हुए राजपुत्र ने कहा- प्यारी प्रजा ! शोक की घड़ी में शुभ कार्य के लिए मुझे क्षमा करना। सेवा के लिए तत्पर मैं तुम्हारे हित में कुछ भी कर सकता हूँ। अन्य विधायक तो अपने क्षेत्र की सेवा में केवल पसीना बहाते हैं, लेकिन हमारे परिवार ने तुम्हारे लिए खून बहाया है। तुम्हारी सेवा करते हुए हमारे परिवार के तीन सदस्य शहीद हुए हैं। इससे अधिक कुर्बानी और क्या हो सकती है ! इसलिए इस क्षेत्र की सेवा करने का जन्मसिद्ध अधिकार केवल मेरा है। अपने रक्त से सिंचे हुए दरौंदा को किसी दरिंदा के अधीन जाते हुए नहीं देख सकता। यह कभी मत सोचना कि मैं तुम्हारे साथ नहीं हूँ। पत्नी तो पति की छाया होती है। इसके माध्यम से मैं ही तुम पर शासन करूँगा। ‘शासन’ शब्द पर चैंको मत। सेवा एक सैद्धांतिक शब्द है, शासन उसका वास्तविक रूप। सेवा प्रजातंत्र की आत्मा है और शासन राजतंत्र की। इसलिए सैद्धांतिक शब्द के लफड़े में मत रहो, वास्तविक और व्यावहारिक अर्थ गहो !

25.09.11

1 टिप्पणी:

  1. भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य है....सत्ता की निर्मम वल्गा परिवार से निकलकर दूसरे हाथों में जाने के लिए तरस रही है पर हो नहीं पा रहा ऐसा. स्त्री शक्ति को प्रतिनिधित्व देने के नाम पर छाया शासक राज्य कर रहे हैं ...लोकतंत्र के छद्म परिधान में राजतंत्र ही रूप बदल-बदल कर सामने आ रहा है. वर्त्तमान व्यवस्था के प्रति यदि जनचेतना जागृत न हो पायी तो आने वाले समय में भारत में कई कबीले राज्य करेंगे.

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