बुधवार, अगस्त 17, 2011

एक विचारक की वैचारिक जड़ता


एक विचारक की वैचारिक जड़ता

आज प्रभात खबर में बिहार के विचारक श्री सच्चिदानंद सिन्हा के अन्ना-आंदोलन से संबंधित विचार प्रकाशित हुए हैं जो पत्रकार रवीन्द्र से बातचीत पर आधारित हैं। बातचीत पर आधारित विचारों पर मुझे पूरा भरोसा नहीं होता, क्योंकि कितने विचार विचारक के हैं और कितने पत्रकार के, कहना कठिन है ! पत्रकार की दृष्टि में छनकर जब किसी के विचार आते हैं तो उनकी शुद्धता संदिग्ध रहती है। खैर, विचार विचारक के हों या पत्रकार के यह ज्यादा मूल्यवान है भी नहीं। मूल्यवान है वह विचार जो सामने आ चुका है। इसलिए मैं यहाँ उसी पर विचार कर रहा हूँ। पहले उनका विचार रखूँगा, फिर उन पर अपनी टिप्पणी।
विचार-1 ः हमारा मानना है कि अन्ना के आंदोलन का तरीका सही नहीं है, उनका उद्देश्य सही हो सकता है।

टिप्पणी ः उद्देश्य के सही होने पर भी जब आप निःसंदिग्ध नहीं हैं तो तरीके पर कहाँ से होंगे ? क्योंकि तरीका हर व्यक्ति का अपना होता है। व्यक्ति के बदलने से तरीका बदल जाता है। अन्ना अपने तरीके से काम कर रहे हैं, आपको करना होता तो अपने तरीके से करते, लेकिन इस संबंध में आपको कुछ करना तो है नहीं, सिवा आलोचना के ! आपका तरीका यही है कि स्वयं एक छोटा आंदोलन भी न करो और कोई करे तो उसकी आलोचना शुरू कर देा !
अन्ना के उद्देश्य से तो वे भी पूर्णतः सहमत हैं जिनके विरुद्ध लड़ाई चल रही है, लेकिन आप तो उद्देश्य पर भी पक्के नहीं हैं कि वह सही ही है ! हो सकता है सही हो, हो सकता है सही नहीं हो ! कुछ पक्का नहीं ! इससे मुझे अनुमान होता है कि आप चिंतक नहीं, चिंताग्रस्त व्यक्ति हैं।
विचार-2 ः इसके लिए उन्हें जन लोकपाल विधेयक को लेकर जनता के बीच जाना चाहिए।
टिप्पणी ः आप पुराने जमाने के लोग हैं, इसलिए जनता के बीच जाने का अर्थ आप शायद समझते हैं, गाँव-गाँव पैदल घूमना। तब तो 10 साल में भी यह काम पूरा नहीं होगा और अन्ना बेचारे बीच में ही टन बोल जायेंगे। सारा आंदोलन बिखर जायेगा। हम बैलगाड़ी के युग में नहीं, जेट विमान के युग में जी रहे हैं। सूचना तंत्र इतना फैल चुका है कि विश्व के किसी कोने में आंदोलन छिड़ता है तो पूरी दुनिया में खबर फैल जाती है। अन्ना जो कर रहे हैं, यही है जनता के बीच जाने का तरीका। आप नहीं देख पा रहे हैं। वे जनता के बीच अपने तरीके से जा रहे हैं। जनता का अन्ना के समर्थन में उठ खड़ा होना इस बात का सबूत है कि उन तक जन लोकपाल विधेयक पहुँच चुका है।
विचार-3 ः देश को आजाद करने के लिए कभी किसी ने भूख हड़ताल नहीं की।
टिप्पणी ः श्रीमान् , यह भूख हड़ताल देश को आजाद करने के लिए नहीं, जन लोकपाल विधेयक लागू करने के
  लिए है !
विचार-4 ः अन्ना के अकेले अनशन से संसद के निर्णय को बदल दिया जाए, यह संभव नहीं दिखता।
टिप्पणी ः अगर अन्ना अकेले लड़ते तब तो संभव नहीं था। तब तो उनको जेल में सड़ाकर मार भी दिया जाता। लेकिन आप देख रहे हैं कि जिस दिन अन्ना को जेल में डाला जाता है उसी दिन सरकार उनसे रिहा होकर बाहर आने के लिए खुशामद करने लगती है। जिस सरकार ने रामलीला मैदान या जेपी पार्क में अनशन की इजाजत नहीं दी थी, वही उनके सामने झुक चुकी है। क्या अकेले अन्ना के बल पर यह सब हो रहा है या जनता के जोर से ?
देश की साधारण जनता जिस वास्तविकता को देख रही है उसे ही आप नहीं देख पा रहे हैं ! जब आदमी आँखों पर अपने जड़ विचारों की पट्टी बाँध लेता है तो उन्हें सच नहीं दिखता। जो खुद नहीं देख पा रहे हैं वे जनता को क्या राह दिखायेंगे ? अन्ना को सलाह देने की बात पांडित्य का मिथ्याभिमान है।

मटुक नाथ चैधरी
17.08.11





































एक विचारक की वैचारिक जड़ता

आज प्रभात खबर में बिहार के विचारक श्री सच्चिदानंद सिन्हा के अन्ना-आंदोलन से संबंधित विचार प्रकाशित हुए हैं जो पत्रकार रवीन्द्र से बातचीत पर आधारित हैं। बातचीत पर आधारित विचारों पर मुझे पूरा भरोसा नहीं होता, क्योंकि कितने विचार विचारक के हैं और कितने पत्रकार के, कहना कठिन है ! पत्रकार की दृष्टि में छनकर जब किसी के विचार आते हैं तो उनकी शुद्धता संदिग्ध रहती है। खैर, विचार विचारक के हों या पत्रकार के यह ज्यादा मूल्यवान है भी नहीं। मूल्यवान है वह विचार जो सामने आ चुका है। इसलिए मैं यहाँ उसी पर विचार कर रहा हूँ। पहले उनका विचार रखूँगा, फिर उन पर अपनी टिप्पणी।
विचार-1 ः हमारा मानना है कि अन्ना के आंदोलन का तरीका सही नहीं है, उनका उद्देश्य सही हो सकता है।

टिप्पणी ः उद्देश्य के सही होने पर भी जब आप निःसंदिग्ध नहीं हैं तो तरीके पर कहाँ से होंगे ? क्योंकि तरीका हर व्यक्ति का अपना होता है। व्यक्ति के बदलने से तरीका बदल जाता है। अन्ना अपने तरीके से काम कर रहे हैं, आपको करना होता तो अपने तरीके से करते, लेकिन इस संबंध में आपको कुछ करना तो है नहीं, सिवा आलोचना के ! आपका तरीका यही है कि स्वयं एक छोटा आंदोलन भी न करो और कोई करे तो उसकी आलोचना शुरू कर देा !
अन्ना के उद्देश्य से तो वे भी पूर्णतः सहमत हैं जिनके विरुद्ध लड़ाई चल रही है, लेकिन आप तो उद्देश्य पर भी पक्के नहीं हैं कि वह सही ही है ! हो सकता है सही हो, हो सकता है सही नहीं हो ! कुछ पक्का नहीं ! इससे मुझे अनुमान होता है कि आप चिंतक नहीं, चिंताग्रस्त व्यक्ति हैं।
विचार-2 ः इसके लिए उन्हें जन लोकपाल विधेयक को लेकर जनता के बीच जाना चाहिए।
टिप्पणी ः आप पुराने जमाने के लोग हैं, इसलिए जनता के बीच जाने का अर्थ आप शायद समझते हैं, गाँव-गाँव पैदल घूमना। तब तो 10 साल में भी यह काम पूरा नहीं होगा और अन्ना बेचारे बीच में ही टन बोल जायेंगे। सारा आंदोलन बिखर जायेगा। हम बैलगाड़ी के युग में नहीं, जेट विमान के युग में जी रहे हैं। सूचना तंत्र इतना फैल चुका है कि विश्व के किसी कोने में आंदोलन छिड़ता है तो पूरी दुनिया में खबर फैल जाती है। अन्ना जो कर रहे हैं, यही है जनता के बीच जाने का तरीका। आप नहीं देख पा रहे हैं। वे जनता के बीच अपने तरीके से जा रहे हैं। जनता का अन्ना के समर्थन में उठ खड़ा होना इस बात का सबूत है कि उन तक जन लोकपाल विधेयक पहुँच चुका है।
विचार-3 ः देश को आजाद करने के लिए कभी किसी ने भूख हड़ताल नहीं की।
टिप्पणी ः श्रीमान् , यह भूख हड़ताल देश को आजाद करने के लिए नहीं, जन लोकपाल विधेयक लागू करने के
  लिए है !
विचार-4 ः अन्ना के अकेले अनशन से संसद के निर्णय को बदल दिया जाए, यह संभव नहीं दिखता।
टिप्पणी ः अगर अन्ना अकेले लड़ते तब तो संभव नहीं था। तब तो उनको जेल में सड़ाकर मार भी दिया जाता। लेकिन आप देख रहे हैं कि जिस दिन अन्ना को जेल में डाला जाता है उसी दिन सरकार उनसे रिहा होकर बाहर आने के लिए खुशामद करने लगती है। जिस सरकार ने रामलीला मैदान या जेपी पार्क में अनशन की इजाजत नहीं दी थी, वही उनके सामने झुक चुकी है। क्या अकेले अन्ना के बल पर यह सब हो रहा है या जनता के जोर से ?
देश की साधारण जनता जिस वास्तविकता को देख रही है उसे ही आप नहीं देख पा रहे हैं ! जब आदमी आँखों पर अपने जड़ विचारों की पट्टी बाँध लेता है तो उन्हें सच नहीं दिखता। जो खुद नहीं देख पा रहे हैं वे जनता को क्या राह दिखायेंगे ? अन्ना को सलाह देने की बात पांडित्य का मिथ्याभिमान है।

मटुक नाथ चैधरी
17.08.11



















एक विचारक की वैचारिक जड़ता

आज प्रभात खबर में बिहार के विचारक श्री सच्चिदानंद सिन्हा के अन्ना-आंदोलन से संबंधित विचार प्रकाशित हुए हैं जो पत्रकार रवीन्द्र से बातचीत पर आधारित हैं। बातचीत पर आधारित विचारों पर मुझे पूरा भरोसा नहीं होता, क्योंकि कितने विचार विचारक के हैं और कितने पत्रकार के, कहना कठिन है ! पत्रकार की दृष्टि में छनकर जब किसी के विचार आते हैं तो उनकी शुद्धता संदिग्ध रहती है। खैर, विचार विचारक के हों या पत्रकार के यह ज्यादा मूल्यवान है भी नहीं। मूल्यवान है वह विचार जो सामने आ चुका है। इसलिए मैं यहाँ उसी पर विचार कर रहा हूँ। पहले उनका विचार रखूँगा, फिर उन पर अपनी टिप्पणी।
विचार-1 ः हमारा मानना है कि अन्ना के आंदोलन का तरीका सही नहीं है, उनका उद्देश्य सही हो सकता है।

टिप्पणी ः उद्देश्य के सही होने पर भी जब आप निःसंदिग्ध नहीं हैं तो तरीके पर कहाँ से होंगे ? क्योंकि तरीका हर व्यक्ति का अपना होता है। व्यक्ति के बदलने से तरीका बदल जाता है। अन्ना अपने तरीके से काम कर रहे हैं, आपको करना होता तो अपने तरीके से करते, लेकिन इस संबंध में आपको कुछ करना तो है नहीं, सिवा आलोचना के ! आपका तरीका यही है कि स्वयं एक छोटा आंदोलन भी न करो और कोई करे तो उसकी आलोचना शुरू कर देा !
अन्ना के उद्देश्य से तो वे भी पूर्णतः सहमत हैं जिनके विरुद्ध लड़ाई चल रही है, लेकिन आप तो उद्देश्य पर भी पक्के नहीं हैं कि वह सही ही है ! हो सकता है सही हो, हो सकता है सही नहीं हो ! कुछ पक्का नहीं ! इससे मुझे अनुमान होता है कि आप चिंतक नहीं, चिंताग्रस्त व्यक्ति हैं।
विचार-2 ः इसके लिए उन्हें जन लोकपाल विधेयक को लेकर जनता के बीच जाना चाहिए।
टिप्पणी ः आप पुराने जमाने के लोग हैं, इसलिए जनता के बीच जाने का अर्थ आप शायद समझते हैं, गाँव-गाँव पैदल घूमना। तब तो 10 साल में भी यह काम पूरा नहीं होगा और अन्ना बेचारे बीच में ही टन बोल जायेंगे। सारा आंदोलन बिखर जायेगा। हम बैलगाड़ी के युग में नहीं, जेट विमान के युग में जी रहे हैं। सूचना तंत्र इतना फैल चुका है कि विश्व के किसी कोने में आंदोलन छिड़ता है तो पूरी दुनिया में खबर फैल जाती है। अन्ना जो कर रहे हैं, यही है जनता के बीच जाने का तरीका। आप नहीं देख पा रहे हैं। वे जनता के बीच अपने तरीके से जा रहे हैं। जनता का अन्ना के समर्थन में उठ खड़ा होना इस बात का सबूत है कि उन तक जन लोकपाल विधेयक पहुँच चुका है।
विचार-3 ः देश को आजाद करने के लिए कभी किसी ने भूख हड़ताल नहीं की।
टिप्पणी ः श्रीमान् , यह भूख हड़ताल देश को आजाद करने के लिए नहीं, जन लोकपाल विधेयक लागू करने के
  लिए है !
विचार-4 ः अन्ना के अकेले अनशन से संसद के निर्णय को बदल दिया जाए, यह संभव नहीं दिखता।
टिप्पणी ः अगर अन्ना अकेले लड़ते तब तो संभव नहीं था। तब तो उनको जेल में सड़ाकर मार भी दिया जाता। लेकिन आप देख रहे हैं कि जिस दिन अन्ना को जेल में डाला जाता है उसी दिन सरकार उनसे रिहा होकर बाहर आने के लिए खुशामद करने लगती है। जिस सरकार ने रामलीला मैदान या जेपी पार्क में अनशन की इजाजत नहीं दी थी, वही उनके सामने झुक चुकी है। क्या अकेले अन्ना के बल पर यह सब हो रहा है या जनता के जोर से ?
देश की साधारण जनता जिस वास्तविकता को देख रही है उसे ही आप नहीं देख पा रहे हैं ! जब आदमी आँखों पर अपने जड़ विचारों की पट्टी बाँध लेता है तो उन्हें सच नहीं दिखता। जो खुद नहीं देख पा रहे हैं वे जनता को क्या राह दिखायेंगे ? अन्ना को सलाह देने की बात पांडित्य का मिथ्याभिमान है।

मटुक नाथ चैधरी
17.08.11

























एक विचारक की वैचारिक जड़ता

आज प्रभात खबर में बिहार के विचारक श्री सच्चिदानंद सिन्हा के अन्ना-आंदोलन से संबंधित विचार प्रकाशित हुए हैं जो पत्रकार रवीन्द्र से बातचीत पर आधारित हैं। बातचीत पर आधारित विचारों पर मुझे पूरा भरोसा नहीं होता, क्योंकि कितने विचार विचारक के हैं और कितने पत्रकार के, कहना कठिन है ! पत्रकार की दृष्टि में छनकर जब किसी के विचार आते हैं तो उनकी शुद्धता संदिग्ध रहती है। खैर, विचार विचारक के हों या पत्रकार के यह ज्यादा मूल्यवान है भी नहीं। मूल्यवान है वह विचार जो सामने आ चुका है। इसलिए मैं यहाँ उसी पर विचार कर रहा हूँ। पहले उनका विचार रखूँगा, फिर उन पर अपनी टिप्पणी।
विचार-1 ः हमारा मानना है कि अन्ना के आंदोलन का तरीका सही नहीं है, उनका उद्देश्य सही हो सकता है।

टिप्पणी ः उद्देश्य के सही होने पर भी जब आप निःसंदिग्ध नहीं हैं तो तरीके पर कहाँ से होंगे ? क्योंकि तरीका हर व्यक्ति का अपना होता है। व्यक्ति के बदलने से तरीका बदल जाता है। अन्ना अपने तरीके से काम कर रहे हैं, आपको करना होता तो अपने तरीके से करते, लेकिन इस संबंध में आपको कुछ करना तो है नहीं, सिवा आलोचना के ! आपका तरीका यही है कि स्वयं एक छोटा आंदोलन भी न करो और कोई करे तो उसकी आलोचना शुरू कर देा !
अन्ना के उद्देश्य से तो वे भी पूर्णतः सहमत हैं जिनके विरुद्ध लड़ाई चल रही है, लेकिन आप तो उद्देश्य पर भी पक्के नहीं हैं कि वह सही ही है ! हो सकता है सही हो, हो सकता है सही नहीं हो ! कुछ पक्का नहीं ! इससे मुझे अनुमान होता है कि आप चिंतक नहीं, चिंताग्रस्त व्यक्ति हैं।
विचार-2 ः इसके लिए उन्हें जन लोकपाल विधेयक को लेकर जनता के बीच जाना चाहिए।
टिप्पणी ः आप पुराने जमाने के लोग हैं, इसलिए जनता के बीच जाने का अर्थ आप शायद समझते हैं, गाँव-गाँव पैदल घूमना। तब तो 10 साल में भी यह काम पूरा नहीं होगा और अन्ना बेचारे बीच में ही टन बोल जायेंगे। सारा आंदोलन बिखर जायेगा। हम बैलगाड़ी के युग में नहीं, जेट विमान के युग में जी रहे हैं। सूचना तंत्र इतना फैल चुका है कि विश्व के किसी कोने में आंदोलन छिड़ता है तो पूरी दुनिया में खबर फैल जाती है। अन्ना जो कर रहे हैं, यही है जनता के बीच जाने का तरीका। आप नहीं देख पा रहे हैं। वे जनता के बीच अपने तरीके से जा रहे हैं। जनता का अन्ना के समर्थन में उठ खड़ा होना इस बात का सबूत है कि उन तक जन लोकपाल विधेयक पहुँच चुका है।
विचार-3 ः देश को आजाद करने के लिए कभी किसी ने भूख हड़ताल नहीं की।
टिप्पणी ः श्रीमान् , यह भूख हड़ताल देश को आजाद करने के लिए नहीं, जन लोकपाल विधेयक लागू करने के
  लिए है !
विचार-4 ः अन्ना के अकेले अनशन से संसद के निर्णय को बदल दिया जाए, यह संभव नहीं दिखता।
टिप्पणी ः अगर अन्ना अकेले लड़ते तब तो संभव नहीं था। तब तो उनको जेल में सड़ाकर मार भी दिया जाता। लेकिन आप देख रहे हैं कि जिस दिन अन्ना को जेल में डाला जाता है उसी दिन सरकार उनसे रिहा होकर बाहर आने के लिए खुशामद करने लगती है। जिस सरकार ने रामलीला मैदान या जेपी पार्क में अनशन की इजाजत नहीं दी थी, वही उनके सामने झुक चुकी है। क्या अकेले अन्ना के बल पर यह सब हो रहा है या जनता के जोर से ?
देश की साधारण जनता जिस वास्तविकता को देख रही है उसे ही आप नहीं देख पा रहे हैं ! जब आदमी आँखों पर अपने जड़ विचारों की पट्टी बाँध लेता है तो उन्हें सच नहीं दिखता। जो खुद नहीं देख पा रहे हैं वे जनता को क्या राह दिखायेंगे ? अन्ना को सलाह देने की बात पांडित्य का मिथ्याभिमान है।

मटुक नाथ चैधरी
17.08.11





































एक विचारक की वैचारिक जड़ता

आज प्रभात खबर में बिहार के विचारक श्री सच्चिदानंद सिन्हा के अन्ना-आंदोलन से संबंधित विचार प्रकाशित हुए हैं जो पत्रकार रवीन्द्र से बातचीत पर आधारित हैं। बातचीत पर आधारित विचारों पर मुझे पूरा भरोसा नहीं होता, क्योंकि कितने विचार विचारक के हैं और कितने पत्रकार के, कहना कठिन है ! पत्रकार की दृष्टि में छनकर जब किसी के विचार आते हैं तो उनकी शुद्धता संदिग्ध रहती है। खैर, विचार विचारक के हों या पत्रकार के यह ज्यादा मूल्यवान है भी नहीं। मूल्यवान है वह विचार जो सामने आ चुका है। इसलिए मैं यहाँ उसी पर विचार कर रहा हूँ। पहले उनका विचार रखूँगा, फिर उन पर अपनी टिप्पणी।
विचार-1 ः हमारा मानना है कि अन्ना के आंदोलन का तरीका सही नहीं है, उनका उद्देश्य सही हो सकता है।

टिप्पणी ः उद्देश्य के सही होने पर भी जब आप निःसंदिग्ध नहीं हैं तो तरीके पर कहाँ से होंगे ? क्योंकि तरीका हर व्यक्ति का अपना होता है। व्यक्ति के बदलने से तरीका बदल जाता है। अन्ना अपने तरीके से काम कर रहे हैं, आपको करना होता तो अपने तरीके से करते, लेकिन इस संबंध में आपको कुछ करना तो है नहीं, सिवा आलोचना के ! आपका तरीका यही है कि स्वयं एक छोटा आंदोलन भी न करो और कोई करे तो उसकी आलोचना शुरू कर देा !
अन्ना के उद्देश्य से तो वे भी पूर्णतः सहमत हैं जिनके विरुद्ध लड़ाई चल रही है, लेकिन आप तो उद्देश्य पर भी पक्के नहीं हैं कि वह सही ही है ! हो सकता है सही हो, हो सकता है सही नहीं हो ! कुछ पक्का नहीं ! इससे मुझे अनुमान होता है कि आप चिंतक नहीं, चिंताग्रस्त व्यक्ति हैं।
विचार-2 ः इसके लिए उन्हें जन लोकपाल विधेयक को लेकर जनता के बीच जाना चाहिए।
टिप्पणी ः आप पुराने जमाने के लोग हैं, इसलिए जनता के बीच जाने का अर्थ आप शायद समझते हैं, गाँव-गाँव पैदल घूमना। तब तो 10 साल में भी यह काम पूरा नहीं होगा और अन्ना बेचारे बीच में ही टन बोल जायेंगे। सारा आंदोलन बिखर जायेगा। हम बैलगाड़ी के युग में नहीं, जेट विमान के युग में जी रहे हैं। सूचना तंत्र इतना फैल चुका है कि विश्व के किसी कोने में आंदोलन छिड़ता है तो पूरी दुनिया में खबर फैल जाती है। अन्ना जो कर रहे हैं, यही है जनता के बीच जाने का तरीका। आप नहीं देख पा रहे हैं। वे जनता के बीच अपने तरीके से जा रहे हैं। जनता का अन्ना के समर्थन में उठ खड़ा होना इस बात का सबूत है कि उन तक जन लोकपाल विधेयक पहुँच चुका है।
विचार-3 ः देश को आजाद करने के लिए कभी किसी ने भूख हड़ताल नहीं की।
टिप्पणी ः श्रीमान् , यह भूख हड़ताल देश को आजाद करने के लिए नहीं, जन लोकपाल विधेयक लागू करने के
  लिए है !
विचार-4 ः अन्ना के अकेले अनशन से संसद के निर्णय को बदल दिया जाए, यह संभव नहीं दिखता।
टिप्पणी ः अगर अन्ना अकेले लड़ते तब तो संभव नहीं था। तब तो उनको जेल में सड़ाकर मार भी दिया जाता। लेकिन आप देख रहे हैं कि जिस दिन अन्ना को जेल में डाला जाता है उसी दिन सरकार उनसे रिहा होकर बाहर आने के लिए खुशामद करने लगती है। जिस सरकार ने रामलीला मैदान या जेपी पार्क में अनशन की इजाजत नहीं दी थी, वही उनके सामने झुक चुकी है। क्या अकेले अन्ना के बल पर यह सब हो रहा है या जनता के जोर से ?
देश की साधारण जनता जिस वास्तविकता को देख रही है उसे ही आप नहीं देख पा रहे हैं ! जब आदमी आँखों पर अपने जड़ विचारों की पट्टी बाँध लेता है तो उन्हें सच नहीं दिखता। जो खुद नहीं देख पा रहे हैं वे जनता को क्या राह दिखायेंगे ? अन्ना को सलाह देने की बात पांडित्य का मिथ्याभिमान है।

मटुक नाथ चैधरी
17.08.11

















आज प्रभात खबर में बिहार के विचारक श्री सच्चिदानंद सिन्हा के अन्ना-आंदोलन से संबंधित विचार प्रकाशित हुए हैं जो पत्रकार रवीन्द्र से बातचीत पर आधारित हैं। बातचीत पर आधारित विचारों पर मुझे पूरा भरोसा नहीं होता, क्योंकि कितने विचार विचारक के हैं और कितने पत्रकार के, कहना कठिन है ! पत्रकार की दृष्टि में छनकर जब किसी के विचार आते हैं तो उनकी शुद्धता संदिग्ध रहती है। खैर, विचार विचारक के हों या पत्रकार के यह ज्यादा मूल्यवान है भी नहीं। मूल्यवान है वह विचार जो सामने आ चुका है। इसलिए मैं यहाँ उसी पर विचार कर रहा हूँ। पहले उनका विचार रखूँगा, फिर उन पर अपनी टिप्पणी।
विचार-1 ः हमारा मानना है कि अन्ना के आंदोलन का तरीका सही नहीं है, उनका उद्देश्य सही हो सकता है।


टिप्पणी ः उद्देश्य के सही होने पर भी जब आप निःसंदिग्ध नहीं हैं तो तरीके पर कहाँ से होंगे ? क्योंकि तरीका हर व्यक्ति का अपना होता है। व्यक्ति के बदलने से तरीका बदल जाता है। अन्ना अपने तरीके से काम कर रहे हैं, आपको करना होता तो अपने तरीके से करते, लेकिन इस संबंध में आपको कुछ करना तो है नहीं, सिवा आलोचना के ! आपका तरीका यही है कि स्वयं एक छोटा आंदोलन भी न करो और कोई करे तो उसकी आलोचना शुरू कर देा !
अन्ना के उद्देश्य से तो वे भी पूर्णतः सहमत हैं जिनके विरुद्ध लड़ाई चल रही है, लेकिन आप तो उद्देश्य पर भी पक्के नहीं हैं कि वह सही ही है ! हो सकता है सही हो, हो सकता है सही नहीं हो ! कुछ पक्का नहीं ! इससे मुझे अनुमान होता है कि आप चिंतक नहीं, चिंताग्रस्त व्यक्ति हैं।
विचार-2 ः इसके लिए उन्हें जन लोकपाल विधेयक को लेकर जनता के बीच जाना चाहिए।
टिप्पणी ः आप पुराने जमाने के लोग हैं, इसलिए जनता के बीच जाने का अर्थ आप शायद समझते हैं, गाँव-गाँव पैदल घूमना। तब तो 10 साल में भी यह काम पूरा नहीं होगा और अन्ना बेचारे बीच में ही टन बोल जायेंगे। सारा आंदोलन बिखर जायेगा। हम बैलगाड़ी के युग में नहीं, जेट विमान के युग में जी रहे हैं। सूचना तंत्र इतना फैल चुका है कि विश्व के किसी कोने में आंदोलन छिड़ता है तो पूरी दुनिया में खबर फैल जाती है। अन्ना जो कर रहे हैं, यही है जनता के बीच जाने का तरीका। आप नहीं देख पा रहे हैं। वे जनता के बीच अपने तरीके से जा रहे हैं। जनता का अन्ना के समर्थन में उठ खड़ा होना इस बात का सबूत है कि उन तक जन लोकपाल विधेयक पहुँच चुका है।
विचार-3 ः देश को आजाद करने के लिए कभी किसी ने भूख हड़ताल नहीं की।
टिप्पणी ः श्रीमान् , यह भूख हड़ताल देश को आजाद करने के लिए नहीं, जन लोकपाल विधेयक लागू करने के   लिए है !
विचार-4 ः अन्ना के अकेले अनशन से संसद के निर्णय को बदल दिया जाए, यह संभव नहीं दिखता।
टिप्पणी ः अगर अन्ना अकेले लड़ते तब तो संभव नहीं था। तब तो उनको जेल में सड़ाकर मार भी दिया जाता। लेकिन आप देख रहे हैं कि जिस दिन अन्ना को जेल में डाला जाता है उसी दिन सरकार उनसे रिहा होकर बाहर आने के लिए खुशामद करने लगती है। जिस सरकार ने रामलीला मैदान या जेपी पार्क में अनशन की इजाजत नहीं दी थी, वही उनके सामने झुक चुकी है। क्या अकेले अन्ना के बल पर यह सब हो रहा है या जनता के जोर से ?
देश की साधारण जनता जिस वास्तविकता को देख रही है उसे ही आप नहीं देख पा रहे हैं ! जब आदमी आँखों पर अपने जड़ विचारों की पट्टी बाँध लेता है तो उन्हें सच नहीं दिखता। जो खुद नहीं देख पा रहे हैं वे जनता को क्या राह दिखायेंगे ? अन्ना को सलाह देने की बात पांडित्य का मिथ्याभिमान है।

मटुक नाथ  17.08.11


























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