गुरुवार, सितंबर 24, 2009

क्या परमात्मा है ?

परमात्मा को लेकर तीन मनःस्थितियाँ हो सकती हैं- हैं, नहीं है, नहीं जानता कि है या नहीं. वास्तविकता तो यह है कि हमलोग तीसरी स्थिति में हैं. हम नहीं जानते कि परमात्मा है या नहंीं. लेकिन इस मनोदशा में मनुष्य का रहना बड़ा कठिन है, क्योंकि यह निरालंब अवस्था है. मनुष्य को जीने के लिए चाहिए एक अवलंब. बिना सहारे के आदमी जी नहंीं सकता. इसलिए दो रास्ते बचते हैं. प्रथम यह कि हम जानने का प्रयास करें कि परमात्मा है या नहीं. हम खोज करें. खोज के दो रास्ते हैं-एक रास्ता बाहर प्राकृतिक जगत की तरफ जाता है. इस खोज से विज्ञान पैदा हुआ. दूसरा रास्ता अपने भीतर की तरफ जाता है. भीतर खोजने वाले कहते हैं अत्यंत शांतचित्त से जब मन की सारी गतिविधियाँ तिरोहित हो जाती हैं तो आत्मतत्व का बोध होता है. वही परमात्मा है. जो अपने भीतर आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है, वह देख पाता है कि वही आत्मा सब जगह है. सब जगह जब उसी के दर्शन होने लगते हैं तो इसी को परमात्मा का साक्षात्कार कहते हैं. तुलसीदास इसी दार्शनिक सत्य की अभिव्यक्ति इस रूप में करते हैं- ‘सीय राममय सब जग जानी, करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी’. परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं एक खास अनुभूति है जो आनंददायी, शांतिदायी और पूर्णता का बोध कराने वाली कही जाती है.
खोज एक कठिन काम है, एक तपश्चर्या है. इस तरफ लाखों में कोई एक बर्हियात्रा पर निकलता है और प्रकृति के रहस्यों का उद्घाटन करता है. करोड़ों में कोई एक अन्तर्यात्रा पर निकलता है और आत्मा के रहस्यों का उद्घाटन करता हैं. शेष लोग खोज का कष्ट नहीं उठाते. सुविधा मार्ग पर चलते हैं. ये सुविधामार्गी दो प्रकार के होते हैं- कुछ मान लेेते हैं कि परमात्मा है और कुछ मान लेते हैं कि परमात्मा नहंीं है. ये दोनों किस्म के सुविधाभोगी तर्क के द्वारा परमात्मा को सिद्ध-असिद्ध करने में अपने समय का सदुपयोग-दुरुपयोग करते हैं. तर्क से हम किसी चीज का विश्ेलषण तो कर सकते हैं, किसी को प्रमाणित कर सकते हैं या अप्रमाणित कर सकते हैं , लेकिन उसे पा नहीं सकते. परमात्मा खोने या पाने की चीज हो सकती है, तर्क की नहीं. अनजान के प्रति सारे तर्क फिजूल हैं. जिसने परमात्मा को मान लिया उसको हम आस्तिक कहते हैं और जिसने नकार दिया उसे नास्तिक कहते हैं. इन दोनों में नास्तिक ज्यादा जीवंत होता है, क्योंकि परमात्मा को नकारने के लिए थोड़ी बुद्धि चाहिए, थोड़ा होश चाहिए, थोड़ा साहस चाहिए. जितने निरबुधिया हैं, वे आस्तिक हैं. वे पूजा-पाठ, तोता रटंत प्रार्थना, यज्ञ, व्रत आदि कर्म-कांडों में अपना समय बिताते हैं. बुद्धि की अनेक फैकल्टी हेाती है. जिसकी बुद्धि ईश्वर के मामले में सोयी हेा उसकी राजनीति में, चोरी में, ठगी में, धोखाधड़ी, शोषण आदि में जागी हो सकती है. इसलिए बेईमानों और दुराचारियों की इन तथाकथित धार्मिक कृत्यों में अधिक संंिलप्तता पायी जाती है. दशहरा, दीवाली, गणेश-महोत्सव, जन्माष्टमी, सावन में बाबाधाम, सरस्वती पूजा इत्यादि जितने भी धार्मिक कृत्य हैं उनमें ये बढ़-चढकर हिस्सा लेते हैं. लाउडस्पीकर बजाते हैं, पटाखे छोड़ते हैं, नशापान करते हैं और अपने को स्थापित करने का हर प्रयास करते हैं. इसमें बाधा आने पर मारपीट करते हैं. गोली भी चलाते हैं. विसर्जन के दिन सड़कों पर इनकी बादशाहत देखते हीे बनती है. इनकी सेवा में पुलिस की गाड़ी वज्रयान सहित साथ-साथ चलती है. कुछ आस्तिक जिनकी बुद्धि खुराफाती नहीं है, वे किसी लाभ में पूजा पर ध्यान लगाते हैं. इनमें से कई लोगों के भगवान के साथ व्यावसायिक संबंध होते हैं. वे सशर्त पूजा करते हैं. हे छठ माई, अगर आप मेरे बेटे को नौकरी लगा देंगी तेा मैं आपको 10 साल तक सूप चढ़ाऊँगी. किसी को कहीं से कोई लाभ मिल गया, किसी पर हाथ साफ कर दिया तो झट हनुमान मंदिर चले जाते हैं. चंदन-टीका लगाकर पूरी भक्ति से लड्डू चढाते हैं. नयी गाड़ी खरीदते हैं तो भी हनुमान मंदिर दौड़ पड़ते हैं. गाड़ी को सिंदूर लगा देते हैं, माला पहना देते हैं, स्वस्तिक का चिह्न बना देते हैं. खुश होकर घर लौटते हैं. कभी हानि के भय से पूजा की जाती है. भय की आशंका जब बहुत गहन हो जाती है तो ऐसे आदमी देवी-देवता की तरफ दौड़ पड़ते हैं. मेरा बच्चा बच जायेगा तो हे दुर्गा माई, आपको जीव के बदले जीव दूँगी. अगर आदमी का बच्चा बच गया तो बकरी या भैंस के बच्चे की खैर नहीं. धूमधाम से बलिदान पड़ता है. मृतक पशु का सर पुरोहित के और धड़ जजमान के हिस्से में. छठ माई के डर से जनसाधारण थर-थर काँपते हैं. अगर छठ का प्रसाद जूठा हुआ तो चरक फूटना तय है. डर के मारे एक भी आदमी छठ पूजा के पहले प्रसाद को चख नहीं सकता. इस तरह के भयभीत आस्तिक भी परमात्मा की शरण में जाते हैं.
उधर नास्तिक बेचारों की भी स्थिति इससे बहुत अच्छी नहीं होती. वे अगर्चे पूजा-पाठ, कर्मकांड, ईश्वर आदि का खूब उपहास उड़ायेंगे, लेकिन जीने का सहारा उनको भी चाहिए. इसलिए उनके भी दो भेद हैं- आस्थावादी और संदेहवादी. आस्थावादी कहीं न कहीं अपनी आस्था के लिए अवलंब ढूँढ़ ही लेते हैं. कोई कार्ल माक्र्स में अपनी श्रद्धा लगायेगा, तो कोई माओ में, कोई लोहिया में तो कोई चार्वाक में. उनके लिए वही भगवान समान हैं. अगर उनका कोई विरोध करे तो बर्दाश्त के बाहर हो जाता है. इसके बावजूद मैं मानता हूँ कि मुर्दा चीजों में आस्था रखने से बेहतर है ऐसे महान् विचारकों के विचारों में आस्था रखना. संदेहवादी सबके प्रति संदेहशील होता है. संदेह का मतलब है न विश्वास और न अविश्वास. कहते हैं, ये अगर अपने संदेह को बढ़ाते जायँ तो संदेह की चरम सीमा आ सकती है. ऐसी स्थिति एक दिन आ सकती है जब संदेह पर ही संदेह होने लगे. ओशो कहते हैं उस समय तत्क्षण संदेह श्रद्धा में बदल जाता है. ऐसी श्रद्धा उत्पन्न होते ही ज्ञान प्रकट हो जाता है. गीता कहती है- ‘श्रद्धावान लभते ज्ञानम्’. यह असली श्रद्धा है. यह श्रद्धा अपने आप में एक उपलब्धि है. तथाकथित आस्तिक की श्रद्धा नकली होती है, वह किसी भी क्षण बदल जाती है. मैं अनुभव से जानता हूँ कि मेरे प्रति एक समय जो अटूट श्रद्धा रखते थे, एक समय ऐसा आया कि वह टूट गयी. क्यों ? क्योंकि सम्यक् संदेह के पहले ही श्रद्धा आ गयी थी. व्यावहारिक जीवन में ऐसी ही कामचलाऊ श्रद्धा देखी जाती है, जिसका कोई मोल नहीं.
इस तरह परमात्मा की तरफ गतिशील संसार में मनुष्य की तीन मुख्य श्रेणियाँ हुईं. पहली श्रेणी का आदमी ईश्वरीय अनुभूति से बहुत दूर है. दूसरी श्रेणी का आदमी नजदीक आ रहा है और तीसरी श्रेणी का नजदीक आ चुका है. प्रथम श्रेणी में पूर्णतः सोये मनुष्य आते हैं. दूसरी श्रेणी में चिंतक, विचारक, वैज्ञानिक आदि आते हैं. तीसरी श्रेणी में भक्त और संत आते हैं. पहली श्रेणी को भेड़ियाधसान आस्तिक, दूसरी श्रेणी को नास्तिक और तीसरी श्रेणी को सच्चा आस्तिक कह सकते हैं. परमात्मा की खोज की पात्रता सच्चे आस्तिक रखते हैं जिनका संदेह मिट गया है. विवेकानंद का आरंभिक जीवन एक नास्तिक का था. रामकृष्ण के सत्संग में उनका संदेह मिटा और श्रद्धा आयी.

3 टिप्‍पणियां:

  1. हांलांकि इनमें से ज़्यादातर बातों से मैं असहमत नहीं हूं मगर ओशो को इतना ज़्यादा पढ़ रखा है कि इसमें कुछ नया भी नहीं लग रहा। अगली किस्त का इंतज़ार है।

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  2. ओशो-दर्शन

    अच्छी पोस्ट है, धन्यवाद

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  3. प्यारे भाई ! आपकी टिप्पणी पढ़कर प्रसन्नता हुई. ब्लाॅग पर जाकर भी कुछ देखा. मजा आ गया. आप जिंदादिल इंसान हैं. ओशो के प्रेमी तो हैं ही, संन्यासी भी जरूर होंगे. संभवतः अंतर सोहिल नाम वहीं से मिला हो. हमदोनों तो एक कुल खानदान के निकले. आपको पाकर हमें बेहद प्रसन्नता है. अपने बच्चों के क्रियाकलापों का आपने इतना संुदर वर्णन किया है कि वात्सल्य-रस में हम नहा गये. आपकी तस्वीर कहीं नहीं दिखी. आपको देखने और मित्रता की इच्छा है हमारे दोस्त.
    हमदोनोें का प्रणाम स्वीकार करें.
    मटुकजूली

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