शुक्रवार, सितंबर 25, 2009

हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ

तुलसीदास कहते हैं कि हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश विधाता के हाथ में है. भेड़ियाधसान आस्तिक इसे सीधे सच मान लेता है, लेकिन नास्तिक तर्क-वितर्क करता है. वह कहता है कि जो आज अज्ञात है, कल उसे विज्ञान ज्ञात कर लेगा. एक दिन ऐसा आयेगा कि कुछ भी अज्ञात सत्ता के हाथ में नहीं रह जायेगा. इसलिए विधाता या परमात्मा की धारणा नितांत काल्पनिक और भ्रममूलक है. कुछ दूसरे प्रकार के नास्तिक भी हैं जो भिन्न नजर से देखते हैं. उनको लगता है कि कुछ चीजें जरूर विधाता (अज्ञात सत्ता) के हाथ में हैं, लेकिन कुछ चीजें तो अपने हाथ में हैं. माना कि जन्म मैंने अपनी इच्छा से नहीं लिया. उसके बारे में कुछ पता नहीं. मरण का भी पता नहीं कब, कहाँ , कैसे हो जाय ?किन्तु हानि-लाभ, यश-अपयश तो बहुत कुंछ अपने हाथ में है, फिर क्यों तुलसीदास सबके बारे में समान राय रखते हैं ?
हम जरा गौर करें तो स्पष्ट होगा कि हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश फल हैं जो हमारे कर्मों से प्राप्त होते हैं. गीता कहती है- ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’. तुम्हारा केवल कर्म पर अधिकार है, फल पर नहीं. क्यों फल पर अधिकार नहीं है ? क्योंकि फल समष्टि से आता है. फल में केवल हमारा हाथ नहीं रहता, उसमें कई शक्तियाँ काम करती हैं. उसके बाद फल का स्वरूप निर्धारित होता है. कहते हैं द्रौपदी को नग्न करने में दुःशासन ने सारी शक्ति लगा दी, लेकिन द्रौपदी नग्न नहीं की जा सकी. हम लाभ कमाने जाते हैं, हानि मिल जाती है. हम यश पाना चाहते हैं, अपयश मिल जाता है. प्रायः हर आदमी की शिकायत रहती है कि लोग मुझे ठीक से पहचान नहीं पा रहे हैं. यहाँ तक कि लोहिया के जीवनी लेखक ओंकार शरद ने भी लिखा है - ‘सच तो यह है कि डाॅ. लोहिया के चालीस साल के राजनीतिक जीवन में कभी उन्हें देश में सही माने में समझा नहीं गया.’
बहुत बार ऐसा भी देखा जाता है कि फल पूर्णतः कर्म पर निर्भर करता है. अगर हम सम्पूर्ण एकाग्रता से फलाकांक्षारहित होकर पूर्ण कर्म करें तो फल उससे निकल आता है. ऐसी परिस्थिति में फल कर्म के अधीन रहता है. लेकिन मेरा मूल प्रश्न यह है कि कर्म की सामथ्र्य और उसे क्रियान्वित करने की आकांक्षा हमें कहाँ से प्राप्त होती है ? वह भी तो अपने वश में नहंीं है. मुझे तो लगता है कि जिसको हम अपना वश कहते हैं, वह भी अपने वश में नहीं है ! इसीलिए मैं कहता हूँ कि अगर मुझमें कर्म की प्रेरणाा है तो यह परमात्मा की इच्छा है. जिस समय कोई व्यक्ति परमात्मा की मर्जी पर सबकुछ छोड़ देता है, उस समय उसकी जीवन-ऊर्जा परमात्मा की ऊर्जा के तालमेल में आ जाती है. उनके बीच एक संतुलन , एक संगीत और एक सामंजस्य फलित होता है. मुझे तो मलूकदास की ये पंक्तियाँ प्यारी लगती हैं-
अजगर करै न चाकरी पंछी करै न काम
दास मलूका कह गये सबके दाता राम
लोगों ने समझा यह काहिलों का दर्शन है. मुझे इसमें दूसरी चीज दिखाई पड़ती है. एक निश्ंिचतता, एक बेपरवाही, एक फक्कड़पन. अस्तित्व के साथ एक सामंजस्य स्थापित करने का भाव.
परमात्मा का यह अर्थ मेरे मन में नहीं है कि कोई मेरी मदद के लिए बैठा हुआ है और न यह अर्थ कि कोई शैतान मुझे तंग कर रहा है. परमात्मा का अर्थ केवल इतना है कि अनंत ब्रह्माण्ड में एक मैं तिनका हूँ. बह रहा हूँ. पृथ्वी अपनी कील पर शून्य में घूम रही है और अपनी कक्षा में दौड़ रही है. कहाँ से ऐसी व्यवस्था आयी ? सारा ब्रह्मांड एक सुनियोजित व्यवस्था में चल रहा है. कोई एक व्यवस्था है जरूर जिसके तहत सब कुछ एक योजनाबद्ध तरीके से चल रहा है. उसी विराट योजना का एक हिस्सा मैं भी हूँ. वह जो जागतिक व्यवस्था है, ऊर्जा है, उसी को मैं परमात्मा कह लेता हूँ.
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जो अज्ञात है, उतना ही भर परमात्मा है. दरअसल ज्ञात-अज्ञात, दृश्य-अदृश्य का तो प्रश्न ही नहीं है.जो कुछ है, वह परमात्मा है- ‘सर्वं खलु इदं ब्रह्मं.’ लेकिन ब्रह्म को जानना अभी हमारा सत्य नहीं है. इसका यह भी मतलब नहीं कि जितना भर हम जानते हैं, उतना ही भर सत्य है. जो मैं नहीं जान रहा हूँ उसे स्वीकारना और नकारना दोनों गलत होगा.
कामनायें मनुष्य के भीतर पैदा हो रही हैं, उनकी पूर्ति के प्रयास चल रहे हैं. सफलतायें-विफलतायें प्रकट हो रही हैं. इनके होने में दो भाव हो सकते हैं- कर्ता और अकर्ता के. पहला भाव कहेगा. कामनायें मैं पैदा कर रहा हूँ. सफल मैं हो रहा हूँ. विफल मैं हो रहा हूँ. मेरी दृष्टि दूसरी है-अकर्ता वाली. वही पैदा कर रहा है, वही सफल हो रहा है. वही विफल हो रहा है, वही सुख पा रहा है, वही दुख पा रहा है. मैं केवल निमित्त हूँ-माध्यम हूँ. मैं कठपुतली हूँ- ‘सबहिं नचावत राम गुसाईं.’ मैं नाचने वाला हूँ. नचाने वाला कोई और है. अभी मैं इसी भाव-दशा में हूँ. संभव है, कल यह भावदशा बदल जाय.
एक अच्छे ब्लाॅगर मित्र संजय ग्रोवरजी कहते हैं -‘विज्ञान ने 90 प्रतिशत अज्ञात को ज्ञात कर लिया है.’ मुझे लगता है कि वे इस अनुपात पर फिर से विचार करेंगे तो उनका फासला बढ़ जायेगा. मेरा अनुमान है कि इस अनंत ब्रह्मांड का जितना हिस्सा ज्ञात है उसमें 0.000001 प्रतिशत मनुष्य ज्ञात कर सका है. मैं विज्ञान के पिता आइन्सटीन के हवाले से ही जानता हूँ कि वे अथाह ज्ञान-सागर के तट पर मात्र एकाध कण चुन पाये हैं. ब्रह्मांड अनंत है. वैज्ञानिक जितना ही खोजता जायेगा, उतना ही ज्यादा अज्ञात का उद्घाटन होता चला जायेगा. वह कभी भी पूरे रहस्य से पर्दा नहीं उठा पायेगा.
लेकिन पदार्थ पर से मनुष्य पर्दा हटा भी दे तो क्या फायदा अगर स्वयं परदे में रह जाय. अगर आदमी को यही मालूम न हो सके कि मैं कौन हूँ तो संसार को जानने से क्या लाभ ? पदार्थ को जानने से ज्यादा जरूरी है अपनी चेतना को जानना. इसे जानने के दो तरीके बताये गये हैं- संकल्प और समर्पण. इसे ही ध्यान और प्रेम कहा गया है. मैं जब कहता है कि सब कुछ परमात्मा करता है तो इसका मतलब है कि मैंने समर्पण कर दिया है, क्योंकि मैं प्रेम-पथ का पथिक हूँ.

3 टिप्‍पणियां:

  1. ha, ha ha, kya ek o ghata doon ? baki baton per kuch nahi kahenge ?

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  2. बाकी बातें पुराने तर्कों का ही विस्तार हैं। क्या कहूं ? यही हो सकता है कि अपने पिछले कमेंट को दोबारा पोस्ट कर दूं:-)

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