रविवार, नवंबर 14, 2010

दृष्टि की बात है

जफर इरशाद भाई ने फेसबुक पर एक स्त्री का अत्यंत सुंदर फोटो लगाया है और उस फोटो की तारीफ में अमीर खुसरो की बेहतरीन और विख्यात पंक्तियाँ लगायी हैं-
अपनी छवि बनाइ के जो मैं पी के पास गयी,
जब छवि देखी पीउ की तो अपनी भूल गई।
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइ के
मोहे सुहागन कर दीनी रे मोसे नैना मिलाइ के।


मैं उस फोटो में निहित स्त्री के निर्मल और मोहक सौन्दर्य तथा खुसरो की भाव-विभोर करने वाली पंक्तियों को एक साथ देखकर मंत्र- मुग्ध हो गया। सुंदरी के शरीर को सराहूँ कि सराहूँ खुसरो की शायरी को। कभी इसे देखता हूँ , कभी उसे देखता हूँ और कभी विस्मय से उस अज्ञेय खुदा को देखता हूँ जिन्होंने इन दोनों की रचना की।
 खुदा की इन अनुपम रचनाओं में एक पर किसी बंदे ने सवाल खड़ा कर दिया है। वह बंदा और कोई नहीं प्रदीप श्रीवास्तव हैं । प्रदीप भाई आयकर विभाग, कानपुर के पूर्व प्रशासकीय पदाधिकारी हैं । अच्छे भजन एवं गजल गायक हैं । अदना आदमी इस तरह की टिप्पणी करता तो मैं उपेक्षा कर देता । लेकिन प्रतिभा-प्रदीप की उपेक्षा कैसे करूँ ! प्रदीप भाई की टिप्पणी से पता चलता है कि वे सदियों से चली आ रही गलत सिखावन से बाहर नहीं हो पाये हैं । उनके सरीखे तीक्ष्ण बुद्धि के  व्यक्ति ने भी सदियों से चली आ रही सड़ी-गली परंपरा पर प्रश्न खड़ा नहीं किया। प्रदीप भाई को लगता है कि खुसरो की पंक्तियाँ तो धार्मिक हैं लेकिन स्त्री का फोटो अधार्मिक है। इन दोनों में मेल कैसा ? उन्होंने फेसबुक पर जफर इरशाद की आलोचना करते हुए लिखा है-
‘‘जफर भाई
 आदाब
 ये बहुत पाक लाइनें (छंद ) हैं और इस फोटो के साथ....? मुझे आपसे ऐसी उम्मीद न थी।’’

उनके पत्र से प्रकट होता है कि खुसरो की शायरी तो पाक है लेकिन स्त्री का फोटो नापाक है । ‘नापाक’ शब्द का प्रयोग खुलकर नहीं हुआ है लेकिन वह स्वयंमेव ध्वनित हो रहा है।
फोटो में एक सुंदर स्त्री आईने में अपना रूप निहार रही है। उपरि वस्त्र के रूप में उसके तन पर मात्र ब्रेशियर है। उसका शारीरिक सौन्दर्य निखर उठा है । चारो तरफ सौन्दर्य की किरणें फूट रही हैं । उस चित्र को बार-बार देखकर भी मन नहीं अघाता।
पाखंडी दुनिया उस चित्र को अश्लील कहती आ रही है, नापाक कहती  आ रही है , गंदा और घिनौना कहती आ रही है और प्रदीप भाई ने भी वही कह दिया !
मैं जानना चाहता हूँ कि उस चित्र में क्या खराबी है ? कैसे नापाक और अपावन है वह ?‘शायद कोई कहे कि उस चित्र को देखकर कामोत्तेजना फैलती है, इसलिए वह अपावन है । तो क्या काम अपावन है? तब तो दुनिया में एक भी पावन आदमी खोजना कठिन होगा । दूसरी बात, काम अगर अपावन है तो जिसके पास काम होगा वही अपावन होगा न ? मैं इस बात से सहमत हूँ कि जिस पुरुष की काम-भावना उस फोटो को देखकर भड़क उठती है, वह अवश्य ही अपावन है क्योंकि उस चित्र में और उसके प्रस्तुतीकरण में कहीं भी सेक्स का प्रदर्शन नहीं है, किसी को आकृष्ट करने की कोई चेष्टा नहीं है । फिर भी अगर उसे देखकर किसी का सेक्स प्रज्वलित हो उठे तो इसका एक ही मतलब है कि उनका सेक्स दमित है । दमित सेक्स ही अश्लील रूप में प्रकट होता है। दमित व्यक्ति का सेक्स तो कपड़ों में पूर्णतः लिपटी नारी को देखकर भी भड़क उठेगा । अगर किसी का सेक्स उस चित्र को देखकर भड़कता है तो इसकी सारी जिम्मेदारी उस व्यक्ति पर है न कि फोटो पर । भला फोटो देखने पर जिस पुरुष का हाल बेहाल हो जाता हो , साक्षात् ऐसी स्त्री देख लेगा तो उसका क्या होगा ?
अब एक दूसरी दृष्टि से भी प्रदीप भाई की टिप्पणी पर विचार करते हैं । मान लेते हैं कि यह फोटो काम भड़काऊ नहीं है, लेकिन है तो एक साधारण स्त्री का ही फोटो और उसके साथ खुसरो की उच्चतम भक्तिमय पंक्तियों को सटा देना कहाँ तक उचित है ? यह तो दृष्टि की बात है। किसी को खास खास जगह ही भगवान दिखता है और किसी को सारा जग ही सीयाराममय दिखाई पड़ता है । मैंने मंदिर के सामने माथा झुकाते हुए अनगिनत लोगों को देखा है लेकिन हरे-भरे पेडों़ को प्रणाम करते किसी को नहीं देखा। अगर मुझे झुकना हो तो पहले मैं हरे-भरे पेड़ों के सामने झुकूँगा क्योंकि मंदिर की मृत प्रस्तर प्रतिमा से ज्यादा भगवान उन पेड़ांे में है जो जिंदा हैं और असंख्य प्राणियों को जिंदा रखने में सहायक हंै। यह तो इरशाद भाई की निर्मल दृष्टि का कमाल है कि उन्होंने उस स्त्री के सौन्दर्य में कुछ दिव्यता देखी जिसे देखने में प्रदीप भाई चूक गये।    गीता में कृष्ण कहते हैं - ‘‘ जो कुछ भी गौरव, चारुता और सौन्दर्य से युक्त है , उसे मेरे ही तेज के अंश से उत्पन्न समझो।’’ उस स्त्री के सौन्दर्य में मैं तो ईश्वर का ही अंश देखता हूं।
अब मैं इस फोटो के साथ इरशाद भाई की टिप्पणी पर विचार कर अपनी बात का अंत करूँगा । निश्चय ही खुसरो की पंक्तियों के सौन्दर्य को दिखाने के लिए वह चित्र सटीक नहीं है, लेकिन उस चित्र को देखकर खुसरो की पंक्तियाँ याद आ सकती हैं । खुसरो की पंक्तियों का भाव है-
माशूका कहती है कि मैं बन-ठनकर आशिक के पास गयी । लेकिन आशिक की छवि देखी तो अपनी भूल गयी । आशिक से नजर मिलते ही माशूका का सारा बनाव-शृंगार मिट गया। बात ही बदल गयी। तात्पर्य यह है कि प्रभु के पास कृत्रिम होकर नहीं जाया जा सकता। उनके पास अहंकार लेकर नहीं जाया जा सकता। अहंकार मनुष्य का बनावटी रूप है। जब प्रभु मिलते हैं तो सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन यही होता है कि मनुष्य का अहं समाप्त हो जाता है और उसका वास्तविक रूप सामने आ जाता है। ‘छाप-तिलक’ आदि कृत्रिम प्रसाधन उसी अहंकार की सजावट हैं। परमात्मा को पाया हुआ आदमी सहज, सरल और स्वाभाविक हो जाता है। उस स्त्री के सौन्दर्य में वही सहजता, सरलता और स्वाभाविकता है । आप फोटो को देखें तो एक भी प्रसाधन उनके तन पर नहीं है। न माथे पर बिन्दी है, न गले में हार है, न कान में कर्णफूल है और न नाक में नकबेसर ।‘शरीर के किसी भी अंग में कोई जेवर नहीं है। वह कहीं से रूपगर्विता भी नहीं मालूम पड़ती। इसलिए स्वाभाविक है कि उसके नैसर्गिक सौन्दर्य को देखकर खुसरो की पाक पंक्तियाँ याद आ जायें।
लेकिन दुनिया रंग-रंगीली है। एक आदमी ऐसे भी हैं जिन्हंे उस फोटो को देखकर खुसरो से बिल्कुल भिन्न पंक्तियाँ याद आती हैं। अमित हर्ष की टिप्पणी द्रष्टव्य है-
आईना भी उन पर शैदा हो गया
                   एक दुश्मन और पैदा हो गया

शाय
र कह रहा है कि इस सौन्दर्य को देखने का हक केवल मुझे है। अगर दूसरा देखता है और प्रभावित होता है तो वह मेरा दुश्मन है। यह है सौन्दर्य पर कब्जा ! सौन्दर्य पर कब्जा करने वाला हिंसा को जन्म देता है और आज समाज उसकी आग में झुलस रहा है। मानव का इतिहास इसी प्रकार के दूषित सौन्दर्य बोध से ग्रसित है।
इरशाद की दृष्टि हमें ऊपर उठाती है जबकि अमित हर्र्ष की दृष्टि हमें नीचे ही बने रहने को छोड़ देती है। कब्जा सौन्दर्य का शत्रु है क्योंकि ज्योंही कोई चीज कब्जे में आती है त्योंही उसका सौन्दर्य खत्म हो जाता है । स्त्री इतनी सुंदर इसलिए लग रही है क्योंकि वह मेरी नहीं है। ‘मेरी’ होते ही वह साधारण हो जाती है। अगर अपावन कहना ही हो तो मैं अमित हर्ष की पंक्तियों को कहूँगा क्योंकि उनका जन्म ईष्र्या की कोख से हुआ है।


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3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी व्याख्या प्रभावित करती है. मगर आपको यहाँ पर फेसबुक के उस पृष्ठ का लिंक देना चाहिए, ताकि पाठक वहाँ का संदर्भ देख-परख सके. उसके बगैर आपकी व्याख्या अधूरी और एक-तरफा है. लिंक भूल से रह गया हो तो लिंक दें, अन्यथा सीख लें. लिंक लगाना बेहद आसान है.

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  2. सुंदर भाव-अभिव्यक्ति ... फोटो देख लेने पर कुछ और कहेंगे ।

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  3. मटुकनाथ जी,
    आपका तर्कपूर्ण प्रतिक्रियात्मक आलेख पसंद आया। मैं यहाँ कहना चाहूँगा कि ‘काम’ यदि कल्याणकारी शिव है, तो एक शापित इंद्र भी है।

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