शनिवार, सितंबर 12, 2009

असहायों की सहायिका रेखा मोदी

भागलपुर जिले के, मेरे पड़ोसी गाँव के एक बुजुर्ग आदमी अपनी बीमार पत्नी का इलाज कराने पटना आये थे. शाम में पत्नी को डॉक्टर से दिखाकर वे लौट रहे थे. उसी समय राजेन्द्रनगर में दिनकर गोलंबर के पास बारात पार्टी की आतिशबाजी चल रही थी. पटाखे से बचने के लिए वह बीमार औरत भागी कि उधर से आती हुई बोलेरो ने उन्हें कुचल दिया. गाड ी भाग निकली. वह दुर्घटनाग्रस्त स्त्री पीएमसीएच में भरती की गयी, जहाँ उसकी मृत्यु हो गयी. दूसरे दिन पोस्टमार्टम के लिए उन्हें पुलिस से आदेश प्राप्त करना था. एक हवलदार रैंक का आदमी हॉस्पीटल आकर पोस्टमार्टम की पर्ची काटता है, जिसमें मरीज का नाम, पता, मृत्यु का कारण आदि सब लिखा जाता है. ऐसा लिखने के लिए पुलिस पैसा चाह रही थी. यह गरीब आदमी पैसा कहाँ से लाता! जो पैसा देता उसकी पर्ची कटती, जो नहीं देता वह गिड गिड ाता, लेकिन उसकी कोई सुनवाई नहीं होती, विशुद्ध आश्वासन मिलता. उस आदमी ने मुझे फोन किया. मैं उनकी मदद के लिए पीएमसीएच पहुँचा. इमरजेंसी वार्ड के पश्चिमी किनारे पर्ची कट रही थी. पर्ची कट क्या रही थी, दुखी लोग पुलिस के द्वारा सताये जा रहे थे. पुलिस पर्ची काटने में नहीं, भीड पर पैंतरेबाजी करने में समय जाया कर रही थी. मैं सोचने लगा कि किस तरह इनकी मदद करूँ! अंत में मैंने हवलदार साहब से निवेदन किया- कल रात में इस गरीब की पत्नी मरी है, आज दोपहर के दो बज रहे हैं. अगर आज पोस्टमार्टम नहीं होगा, तो कब तक लाश पड ी रहेगी और कब तक ये बेचारे इस नरक में पड े रहेंगे? पुलिस ने कहा- इनकी बारी आयेगी तो होगा, अभी स्थिर रहिये. मैं स्थिर हो गया और उनकी वीभत्स लीला देखने लगा. वहाँ या तो दबंगों का काम पहले होता था या पैसे वालों का. मैं सोचने लगा-लगता है, इस गरीब की बारी आज नहीं आयेगी. मुझे पीरबहोर जाकर थानेदार से निवेदन करना चाहिए. यह सोच ही रहा था कि उस जगह एक कार आकर रुकी. एक सुंदर, स्मार्ट महिला ललाट के ऊपर काला चश्मा अटकाये इस दृश्य का निरीक्षण कर रही थी. थोड़ी देर में ठसक के साथ कार से बाहर आयी और हवा बाँधने लगी. क्या हो रहा है? क्यों इतनी भीड है ? क्या काम है आपको ? उनके साथ एक औरत भी थी. मैंने अनुमान किया, जिस तरह से मैं मदद के लिए बुलाया गया हूँ, वैसे ही ये भी बुलायी गयी हैं. अच्छा देखता हूँ, वे किस तरह अपना काम निकालती हैं ! मैं चमत्कृत हो गया. बहुत दक्षता के साथ उन्होंने पहले पब्लिक को अपने पक्ष में मोटिवेट किया, फिर पुलिस को हल्की फटकार देते हुए उनकी मदद में बैठ गयीं. पुलिस का संस्कार हत हो चुका था. सारी कार्रवाई उन्होंने अपने हाथ में ले ली. मरीज के मरने के समय के हिसाब से उन्होंने पुर्जे का नंबर लगाया और खुद पर्ची काटना शुरू कर दिया. पुलिस के घालमेल पर नियमबद्धता की विजय हुई. उस हिसाब से मेरे आदमी का नंबर पहले आ गया. मुझे राहत मिली. मुझे जिज्ञासा हुई कि मैं जानूँ कि यह देवी दुर्गा कौन है ? उनकी कुशलता, निर्भीकता, रौब और असहायों की सहायता के लिए उनकी तत्परता देख मैं मन ही मन नतमस्तक हो चुका था. जिज्ञासा हुई कि इनका नाम जान लूँ और इनसे कभी मिलूँ. पूछा- मैडम आपका नाम क्या है ? उन्होंने अपने एक सहायक को इशारा किया कि इन्हें मेरा विजिटिंग कार्ड दे दीजिए. वे कार्ड खोज रहे थे. उसी क्रम में बताया कि आप रेखा मोदी हैं, उपमुखयमंत्री की बहन. मैंने नाम सुना था. आज दर्शन हुए. मीडिया में उनकी उतनी अच्छी छवि नहीं रखी गयी थी, जितनी उस समय वे मुझे लगीं. मैं भगवान से प्रार्थना करने लगा -प्रभु, ऐसी-ऐसी कम से कम सौ दुर्गाएँ पटने में भेजो. अपार गंदगी है. एक रेखा मोदी कितना साफ करेंगी ? उनके सहायक ने बताया- इस बार पटना मध्य से इन्हें चुनाव में खड ा किया जायेगा. ऐसी समाज सेविका को निश्चय ही खड ा होना चाहिए और जीतना चाहिए.
यही रेखा मोदी आज जमानतीय और गैरजमानतीय वारंट से जूझ रही हैं. असहाय नर्सिंग छात्राओं की मदद में पहुँची थीं. लेकिन इनसे इनका कुछ बिगड़ेगा नहीं, क्योंकि इनके पीछे ताकत है. उस ताकत का ये सदुपयोग कर रही हैं. जहाँ-जहाँ असहाय स्त्रियों पर अत्याचार होते हैं, उनकी मदद में ये पहुँचती हैं. लगभग डेढ महीना पहले गायघाट में स्थित संवासिनों की मदद करने भी ये पहुँची थीं. इनकी सक्रियता समाज हित में है और सुविधाभोगी अधिकारियों के खिलाफ है. इसलिए थोड ी परेशानी आयेगी. अच्छे लोगों को अपनी ताकत देकर इन्हें और ताकतवर बनाने जरूरत है.
मटुक नाथ चौधरी
९.०८.०९

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