शनिवार, सितंबर 19, 2009

एक लड़की की चिट्‌ठी

प्यारे पाठको
मैंने इंटरनेट पर अपना ब्लॉग खोला है- मटुकजूली डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम. मैं जो भी लिखता हूँ, सोचता-विचारता हूँ, अपने ब्लॉग पर डाल देता हूँ. उसे पढ कर लोग अपनी प्रतिक्रियाएँ देते हैं. मेरे ब्लॉग पर अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं. उनमें एक बिट्‌टू नामक लड की की बड ी दिलचस्प प्रतिक्रिया आयी है. प्रतिकूल प्यारी प्रतिक्रिया पढ कर प्रसन्नता हूई है. ऐसी प्रतिक्रियाओं का जवाब देने में मुझे आनंद आता है. प्रस्तुत है जवाब-
उस लड की या स्त्री ने मेरा लेख पढ ा-समझा है या नहंीं यह उनकी टिप्पणी से पता नहीं चलता, क्योंकि मेरे लेखों पर उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं दी है. उन्होंने मेरे बारे में जो कुछ इतने दिनों में पढ ा-सुना है, उससे संबंधित जितनी बातें उनका मन ग्रहण कर सका है, उसे ही उन्होंने रख दिया है. मेरे जवाब के पहले प्रतिक्रिया देख लें-
'' मैं आपसे कभी सहमत नहीं हो सकती. आप मानो या न मानो आपने जो भी किया गलत ही किया. टीचर के पद को कलंकित ही किया है. मुझे तो शर्म आती है यह कहने में कि मैं कभी बीएन कॉलेज में पढ ी हूँ और आपके बारे में जानती हूँ. मिस जूली की पीचडी हो गयी है तो तैयार रहिये आप अकेले रहने को. अच्छा पब्लिसिटी स्टंट अपनाया उसने.''
सबसे पहले यही बात स्पष्ट कर दूँ कि आप जो प्रतिक्रिया प्रकट करती हैं, उसके माध्यम से अपना ही व्यक्तित्व खोल कर रख देतीे हैं. आपकी प्रतिक्रिया आपका आईना है. जिस पर आप प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही हैं, भले ही उसका कोई अंश आप उजागर न कर सकें, लेकिन आप अपना चेहरा तो दिखला ही देती हैं. यद्यपि आपने अपने ब्लॉग का पता छुपाकर रखा है, उसे सार्वजनिक नहीं किया है लेकिन अपने को छिपा नहीं सकीं. आपका अंदरूनी व्यक्तित्व यहाँ झलक गया है. इसके आधार पर मैं आपका चरित्र-चित्रण कर सकता हूँ- आप वैचारिक दृष्टि से सोयी हुई स्त्री हैं. आपके व्यक्तित्व की कोई अलग पहचान नहीं है, उससे कोई खुशबू नहीं आ रही है. आपके भीतर जितना कूड़ा समाज ने डाल दिया है, उतना ही भर आप हैं.
मैं अपने विचारों के लिये सहमति या असहमति किसी से नहंीं चाहता हूँ. मैं केवल इतना चाहता हूँ कि जो मेरे विचार हैं, अगर वे आपको कुरेदते हैं तो आप भी उन पर विचार करें. आपका अनुभव अगर उसे स्वीकार करता है तो आप हमारे विचारों के मेल में आ जाते हैं. वे विचार आपके हो जाते हैं. अगर आपका अनुभव कहता है कि मेरे चिंतन में कोई खोट है तो आप उस पर उँगली रख सकते हैं, अपने अनुभव में हमें भागीदार बना सकते हैं. उसकी भी जरूरत न हो तो आप उसे भुला दे सकते हैं. उसकी नोटिस भी लेने की जरूरत नहीं. बिट्‌टूजी, मैंने कब आपकी सहमति माँगी जो आपने लिखा-' मैं आपसे कभी सहमत नहीं हो सकती.' आपका पहला वाक्य व्यर्थ चला गया. जिनका जीवन व्यर्थ हो, वे इसी तरह के व्यर्थ वाक्य बनाते हैं.
आपने लिखा है-' मिस जूली की पीएचडी हो गयी है तो तैयार रहिये आप अकेले रहने को'. इससे कई बातें निकलती हैं. पहला तो यह कि आप मुझे अकेले देखना चाहती हैं. इसके भी दो कारण हो सकते हैं- प्रथम तो यह कि आपको मुझे अकेले तड पते देखने में मजा आ सकता है. द्वितीय, कौन जाने आप जैसी स्त्री वैकेंसी का इंतजार कर रही हो! जिस समय जूली बीए में पढ रही थी, उस समय आप जैसी स्त्रियों ने कहा था- बीए के बाद जूली मुझे छोड देगी. जूली मुझसे दूर दिल्ली चली गयी. आप जैसी स्त्रियों ने सोचा-अब तो पक्का है, वहीं कोई जवान, सुंदर और तेजस्वी लड का उसे मिल जायेगा. छोड देगी. एमए तक नहीं छोड ा. ऐसी आशा रखने वाली कुछ महिलायें निराश हो चुकी हैं, लेकिन आपकी आशा अभी भी प्रज्ज्वलित है. इसका पीएचडी का काम चल रहा है. जल्द ही पूरा होगा. आप तैयार रहें, अपनी छूंछी आशा के साथ अकेले रहने को.
आपको दूसरे में बेवफाई दिख रही है, तो इसका मतलब है कि आप एक बेवफा औरत होंगी. अपनी बेवफाई की एक निशानी तो आप अपने वाक्य में ही छोड गयी हैं. आपका वाक्य है- ' आप मानो या न मानो आपने जो भी किया, गलत ही किया है.' आप बतलाती हैं कि कभी आप बी.एन. कॉलेज कभी आप बी.एन. कॉलेज की छात्रा थीं यानी बिहार की थीं. बिहार के लोग 'आप' के साथ 'मानिये' लगाते हैं, 'मानो' नहीं. इस तरह की भाषा पछाँह यानी दिल्ली तरफ के लोग बोलते हैं. आपने विलायती बोल तुरत सीख लिया और अपनी बोली के प्रति इतनी जल्दी बेवफाई दिखला दी ?. अगर 'आप मानो' सही होता और 'आप मानिये' गलत होता तो समझा जाता कि आपने कुछ सीखा. लेकिन आप परायी भाषा पर तो इतनी लट्‌टू हुईं कि गलत होते हुए भी उसे स्वीकार कर लिया और अपनी शुद्ध भाषा को लात मार दिया. बेवफाई आपके रक्त में कहीं न कहीं होनी चाहिए. वरना जूली की बेवफाई की कल्पना असंभव है.
आप लिखती हैं-'मुझे तो शर्म आती है यह कहने में कि मैं कभी बीएन कॉलेज में पढ़ी हूँ और आपके बारे में जानती हूँ.' आपने भले ही बीएन कॉलेज में पढ ा हो पर मुझसे नहीं पढ ा होगा, नहीं तो आपके 'पढ ी हूँ' को 'मैंने पढ ा है' में बदल देता. मुझसे पढ ा हुआ कोई भी लड का या लड की इस तरह का अशुद्ध वाक्य नहीं लिख सकता. क्या कभी आपको अपनी भाषागत अशुद्धियों पर शर्म नहीं आयी ? दरअसल शर्म या तो अपने कुकृत्यों के बोध पर जगती है या अपने किसी निकटतम व्यक्ति के कुकृत्यों पर. आप तो कभी मेरे निकट रही नहीं. मैं पहचान तक नहीं रहा हूँ आपको. फिर भी आपको शर्म आ गयी, इस नाते कि मैं कभी बीएन कॉलेज में शिक्षक था और आप कभी उस कॉलेज में छात्रा थीं ? इतने भर से शर्म आती हो तो किस कॉलेज में चोर, बेईमान, छिनार, उचक्के, बदमाश और हत्यारे नहीं पढ ते हैं ? कभी उन पर शर्म आती है या नहीं ? केवल मुझ पर आयी ? अगर मुझ पर शर्म आयी है तो आपके जीवन के रहस्य से एक परदा और उठ सकता है. पटने में कुछ नेताइन प्रोफेसर हैं. उन्हें भी मेरे कृत्यों पर शर्म आती है और मेरे कारण उन्हें प्रताडि त होना पड ा है. पटने में सभी जानते हैं कि उनके अपने पति के अलावा भी कई पुरुषों से प्रेम संबंध हैं. इस तरह की कुछ महिलाओं को मेरे कारण शर्मिन्दगी महसूस होती है. आप भी जरा अपने गरीबान में झाँक कर देख लें.
आपका जूली के बारे में एक वाक्य है- 'अच्छा पब्लिसिटी स्टंट अपनाया उसने'. एक ही बात कहना चाहूँगा-वह तो सफल हो गयी, आप कब होंगी ?
आपके सम्पूर्ण कथन का सारभूत वाक्य है- '(मैंने) टीचर के पद को कलंकित ही किया है.' ये आप जैसे लाखों नासमझ लोगों का कथन है. इस पर मैं अगले दिन गहराई से विचार प्रस्तुत करूँगा, लेकिन आपका जो मानसिक स्तर है, वह उसे समझ पाने में सक्षम नहीं होगा. किन्तु उन तमाम समझदार समर्थकों-विरोधियों के लिए मैं उस पर अवश्य चिंतन प्रस्तुत करूँगा.

7 टिप्‍पणियां:

  1. यह बात तो सही की व्यक्ति की प्रतिक्रिया उसका आइना होती है, और सोये हुए लोगो को खुद नहीं मालूम होता की
    वे किस लिए जी रहे है हाँ मगर वे सलाह देने में कभी नहीं हिचकिचाते .
    बहुत सही चरित्रचित्रण किया है आपने असल में इस देश की महिलायें अपनी अस्मिता को पहचानती ही नहीं है, वे खुद परतंत्र है और चाहती है की दूसरे भी परतंत्र रहें.

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  2. Matuk ji yahan aap teacher ki trah behave karen to behtar hoga. Agar bhasha galat hai to correct kar den but aap us lady ko jo naseehat de rahen hain vo aap per bhi to laagu hotu hai.Is tarah se react karne ki philosophy to Osho ne nahi sikhai?

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  3. मटुक जी आप महान हैं. जो किया सो किया; उस पर मैं प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करना चाहता. लेकिन आपने अपने कृत्यों पर मिली प्रतिक्रिया को बेहिचक अपने ब्लॉग पर स्थान दिया है वह कबीले तारीफ है.

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  4. प्रिय मटुक जी
    मैंने आपके विषय में अपने ब्लॉग पर कुछ विचार प्रस्तुत किये हैं पढियेगा जरूर
    इस मरुस्थल में मरूद्यान मिलेगा जरूर.

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  5. आप तो पहले से ही एक सेलिब्रिटी हैं -ब्लागजगत में आपका स्वागत है ! हिन्दी की शुचिता के प्रति आपका समर्पण प्रशंसनीय है !

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  6. मैं आपके जूली "कृत्य" से पूर्णतः असहमत हूं… विस्तार में जाना नहीं चाहता क्योंकि इसमें कई मुद्दे और पक्ष जुड़े हुए हैं, जैसे कि आपकी पत्नी, आपके अन्य शि्ष्य और "शिष्याएं" भी…। कुल मिलाकर मेरे अनुसार, आपने एक अनैतिक कार्य किया है, भले ही आप अपने "शिक्षक वाले तर्कों" से खुद को कितना ही उच्च आदर्शों वाला(?) साबित करने की कोशिश करें।

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  7. आपकी बेवाकी निस्संदेह लोगों को हिम्मत से जीने और अपनी बात कहने की शिक्षा देगी , भले ही भीड़ में चलते ये लोग काफी दिनों में भीड़ से निकलने में सक्षम हो पायें !
    आप दोनों का फैसला नितांत व्यक्तिगत है, कारण विवेचना करने का अधिकार किसी का नहीं होना चाहिए !
    शुभकामनायें !!

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