रविवार, सितंबर 13, 2009

हिन्दी दिवस

भोलाराम ने पूछा है- आज हिन्दी दिवस है. १४ सितंबर को ही हिन्दी दिवस क्यों मनाते हैं ?
मटुकः जब देश आजाद हुआ तो राजकाज के लिए अपना संविधान बनाना पड़ा. इसी सिलसिले में राजभाषा की बात उठी. गुलाम भारत में यह काम अंग्रेजी भाषा करती आ रही थी. हिन्दी भारत की व्यापक संपर्क की भाषा थी. इसलिए एकमत से इसे राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया. १४ सितंबर, १९४९ ई. को भारतीय संविधान में हिन्दी को राजभाषा के रूप में मान्यता मिली. तभी से राजकाज के कामों में अधिक से अधिक हिन्दी का प्रयोग हो, इस याद को बनाये रखने के लिए १४ सितंबर को हम हिन्दी दिवस के रूप में मनाते हैं.
भोलारामः- अच्छा सर, राजभाषा और राष्ट्रभाषा क्या एक ही चीज है?
मटुकः-एक चीज नहीं है. दोनों में भिन्नता है, लेकिन एक ही भाषा राजभाषा और राष्ट्रभाषा दोनों एक साथ हो सकती है. जैसे पति और पिता एक ही चीज नहीं है. लेकिन एक ही व्यक्ति दोनों हो सकता है. जिस भाषा के द्वारा राजकार्य होता है, उसे राजभाषा कहते हैं. राजकार्य का मतलब सरकारी आदेश, सूचनाएँ, विज्ञापन, कोर्ट का काम, एक प्रदेश का केन्द्र या दूसरे प्रदेश से शासकीय स्तर पर पत्र व्यवहार आदि है. भारत में जब अकबर का राज्य स्थापित हुआ था तो फारसी राजभाषा बनी और अंग्रेजों के आने तक बनी रही. १८३३ ई. के बाद अंग्रेजी राजभाषा बनी, लेकिन निचले स्तर पर उर्दू राजभाषा बनायी गयी. और राष्ट्रभाषा का मतलब उन तमाम भाषाओं से है जो उस राष्ट्र की मिट्‌टी में जन्मी, पली और बढ ी है. इस दृष्टि से भारत की सारी भाषाएँ राष्ट्रभाषाएँं हैं. अंग्रेजी राष्ट्रभाषा नहीं है, यद्यपि वह राजभाषा अभी भी बनी हुई है.
भोलाराम- जब भारत की सारी भाषाएँ राष्ट्रभाषाएँ हैं, तो हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा क्यों कहते हैं ?
मटुकः-आजादी की लड ाई के समय देश के बड े-बड े राजनेताओं ने अनुभव किया कि राष्ट्रीय एकता के लिए एक राष्ट्रभाषा का होना जरूरी है. वही भाषा राष्ट्रभाषा हो सकती है जो सार्वदेशिक हो यानी पूरे देश में कमोबेश बोली और समझी जाती हो. एकमात्र हिन्दी ऐसी भाषा थी. इसलिए इसको राष्ट्रभाषा कहा गया है. हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानने वालों ने एक तर्क यह भी दिया कि राष्ट्रभाषा राष्ट्र की पहचान होती है. जैसे अनेक राजनीतिक दलों के अलग-अलग झंडे हैं, लेकिन एक झंडा राष्ट्रीय झंडा है, जो सबका है. अनेक भाषाओं में अनेक सुंदर-सुंदर गीत हैं, लेकिन एक गीत को राष्ट्रगीत की पदवी दी गयी है. इसी तरह अनेक पक्षियों के होते हुए मोर को राष्टी्रय पक्षी घोषित किया गया है. अनेक पशुओं के रहते हुए बाघ को राष्ट्रीय पशु माना गया. केवल साम्प्रदायिकता की बू से बचाने के लिए, नहीं तो राष्ट्रपशु तो गाय को होना चाहिए. वैदिक युग से ही गाय की उपयोगिता स्वंयसिद्ध है और यह भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है. लेकिन पशुओं को लेकर कोई झगड़ा नहीं हुआ. राजभाषा और राष्ट्रभाषा को लेकर बड े-बड े विवाद हुए और अभी भी चल ही रहे हैं.
भोलाराम-एक राष्ट्रभाषा के जरिये राष्ट्रीय एकता कैसे कायम हो सकती है, इसे उदाहरण के साथ समझाने की कृपा करें.
मटुकः-भोलाराम, एकता हमेशा प्रेम से आती है और अहंकार से जाती है. भाषा तो सिर्फ इन दोनों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है. भाषा से अगर एकता पैदा होती है तो भाषा से एकता टूटती भी है, क्योंकि वह मात्र माध्यम है. लोग माध्यम को ही देख पाते हैं, उसके पीछे छिपे असली कारण को नहीं पहचान पाते. उदाहरण के लिए आजादी के पूर्व देश के सभी बड े नेता एकमत थे कि अंग्रेजी की जगह हमें हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाना है. लेकिन आजादी के बाद बंगाल और तमिलनाडु में हिन्दी के विरुद्ध तीखी प्रतिक्रिया हुई. मेरी समझ में इसका एक बड ा कारण हिन्दी भाषियों का अहंकार था, जिसकी वजह से हिन्दी प्रेम की भाषा न हो पायी. अहिन्दीभाषियों ने समझा कि हिन्दी हम पर थोपी जा रही है. वहाँ के राजनीतिबाजों ने हिन्दी-विरोध की लहर भी पैदा की. इसका परिणाम हुआ कि आजतक हिन्दी पूर्णतः स्वीकृत नहीं हो पायी. तुम कल्पना करो भोला कि चेन्नई पढ ने गये. वहाँ एक लड की से तुम्हें प्यार हो गया. उस प्यार के कारण तुम्हें तमिल से प्यार हो जायेगा और तुम्हारी प्रेमिका को हिन्दी से. देखते-देखते तुम तमिल बोलने लगोगे और वह हिन्दी. अगर तुम दोनों तमिल और हिन्दी के विकल्प में अंग्रेजी को चुनोगे तो प्रेम-रस से वंचित रहोगे. प्रेम का असली स्वाद अपनी भाषा में ही मिलता है.
भोलारामः-ठीक है, हिन्दी के साथ-साथ आम भारतीय भाषाएँ भी राष्ट्रभाषा के रूप में रहें, लेकिन अंग्रेजी तो हटे ?
मटुकः-किसलिए अंग्रेजी हटे ? इसीलिए न कि तुम अंग्रेजी नहीं सीखना चाहते हो, कठिनाई से बचना चाहते हो ? जो राष्ट्र कठिनाई से बचेगा, वह विकास नहीं कर पायेगा.
भोलारामः- आप तो सर, हिन्दी के होते हुए अंग्रेजी के पक्षधर मालूम पड़ते हैं ?
मटुकः-क्योंकि इसका नुकसान मैंने झेला है और झेल रहा हूँ. किशोरावस्था में मदान्ध हिन्दी प्रेमियों के दुष्प्रचार में आकर मैंने अंगेजी सीखना छोड दिया. अंग्रेजी का ज्ञान बहुत जरूरी है. अंग्रेजी में साहित्य, विज्ञान और तकनीक का इतना विशाल भंडार है कि उतने का अनुवाद न तो संभव है और न आवश्यक. अनुवाद में ज्यादा समय न लगाकर सीधे उनसे जुड जाना है. वह अंतरराष्ट्रीय संपर्क की भाषा भी है. इसलिए हर भारतीय को तीन भाषाएँ सीखनी चाहिए- एक अपनी भाषा, दूसरे अपने देश की एक भाषा और तीसरे अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा. जो अहिन्दी भाषी क्षेत्र के हैं वे अपनी भाषा के साथ हिन्दी और अंग्रेजी सीखें और जो हिन्दी भाषी क्षेत्र के हैं वे अंग्रेजी के साथ एक अन्य भारतीय भाषा सीखें. इतना ध्यान में रखें कि ही हिन्दी के बिना भारत में चलना मुश्किल होगा और अंग्रेजी के बिना दुनिया में. इनके साथ जापानी, रूसी, चीनी, जर्मन आदि जितनी भाषाएँ सीख सकें, उतना अच्छा !

१३.०९.०९

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