बुधवार, सितंबर 02, 2009

मंदिर रोड पर

जब कोई राजनेता बुरी तरह हार जाता है तो रोड पर आ जाता है. जब कोई व्यक्ति नौकरी से डिसमिस हो जाता है तो रोड पर आ जाता है. जब कोई व्यवसायी दिवालिया हो जाता है तो रोड पर आ जाता है. इसी तरह जब कोई मंदिर आध्यात्मिक साध्ना से च्युत हो जाता है तो रोड पर आ जाता है. रोड पर मंदिर-मस्जिद आदि बनाने का एक ही अर्थ है कि अब इस स्थान को धर्मिक कृत्यों से कोई मतलब नहीं है. उसकी ओट में दुराचार होगा. समाज का एक बड़ा तबका मंदिर-मस्जिद के माध्यम से अपने निहित स्वार्थ को पूरा कर रहा है. राजनीति की इसके साथ साँठ-गाँठ रहती है. राजनेता और पुरोहित-मौलवी के बीच बड़ा तालमेल सदियों से रहा है, क्योंकि दोनों भोले भाले लोगों का बहलाने और बहकाने का काम करते हैं. नहीं तो रोड पर बने मंदिरों की रक्षा के लिए भला केन्द्र सरकार कोर्ट क्यों जाती? लेकिन अदालत अभी भी जिंदा है. सर्वोच्च न्यायालय ने सॉलिसिटर जनरल को हुक्म दिया है कि वह हलपफनामा दायर करे ताकि भविष्य में रोड पर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि बनने न पाये. जो बन गया, वह बन गया, अब आगे नहीं. जब मंदिरों, मस्जिदों में जाने वालों की अपार भीड़ देखता हूँ तो मेरी समझ में नहीं आता कि ये क्या करने वहाँ जाते हैं! उन्हें वहाँ कुछ मिलता तो नहीं. कुछ गँवा कर ही आते हैं, पिफर भी जाते हैं. क्या कारण है? उन लोगों की बात तो समझ में आती है जो चोर हंै, लुच्चा हंै, ठग हंै, बेईमान हैं, लालची हैं और मंदिर चले जाते हैं. मैं ऐसे अनेक शातिर बेईमानों को जानता हूँ जो हÝतों रोड छेककर भागवत-कथा कहलवाते हैं, रामायण बँचवाते हैं और साध्ुवेश धरण कर मंच पर आसीन होकर जनता के सामने एक दूसरी छवि प्रस्तुत करना चाहते हैं. वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि ;कद्ध उनकी बेईमानी दिन दूनी रात चौगुनी बढ़े ;खद्ध इससे अगर पाप होता है तो वह कटे और ;गद्ध जनता को उल्लू बनाकर उसकी नजर में धर्मिक कहलाये ताकि बेईमानी उसकी ओट में छिपी रहे. कुछ ऐसे भी लोग हैं जो उतने जड़बु(ि नहीं हंै उतने अंध्श्र(ालु भी नहीं हैं, वे कहते हैं कि मंदिर जाने से शांति मिलती है. अच्छा लगता है. मैं कहता हूँ अच्छा तो प्रात:कालीन भ्रमण भी लगता है. जरा-सा रिलैक्स होकर बैठ जाइये तो शांति ऐसे ही आ जायेगी. पिफर मंदिर किसलिए? वे जवाब तो नहीं दे पाते, लेकिन उनको मेरा तर्क अच्छा नहीं लगता. इसी श्रेणी के कुछ लोभी ऐसे हैं जो मंदिर भगवान से कुछ माँगने जाते हैं और कुछ ऐसे भी जाते हैं जिनके विश्वास के अनुसार भगवान ने उनकी माँग पूरी कर दी है. इस तरह मंदिर वासना पूर्ति की एक जगह हो गयी है, जबकि वास्तविक मंदिर में वासना का विसर्जन होता है. इस श्रेणी के लोगों में ही बहुत ऐसे हैं कि जो नयी कार खरीदेंगे तो झट हनुमान मंदिर पहुँच जायेंगे. घरबास करेंगे तो सत्यनारायण भगवान को नहीं भूलेंगे, यद्यपि वास्तविक जिंदगी में प्रतिदिन झूठनारायण भगवान की ही पूजा करते हैं. जब मंदिर-मस्जिद आध्यात्मिक उन्नयन की जगह नहीं रह गयी है, पिफर भी क्यों ये बनते जा रहे हैं. मनुष्य का इतना आकर्षण क्यों है उध्र? मनुष्य किस अनजाने मोह से ग्रसित है? इन प्रश्नों ने बहुत दिनों से मेरा पीछा किया है. इस अनसुलझे रहस्य से पहली बार परदा ओशो ने उठाया. उन्होंने कहा- अनंत जन्मों की यात्राा में किसी जन्म में अगर कभी व्यक्ति ने मंदिर का थोड़ा भी रहस्य जाना है, वहाँ कभी थोड़ा भी परमात्मा के खुलते द्वार का आभास पाया है, तो उसकी स्मृति उसके अचेतन मन के किसी कोने में दबी पड़ी है. वह बड़ी गहरी है. वही अचेतन में दबी स्मृति उसे ध्क्का मारती है और वह मंदिर पहुँच जाता है. मेरी पफुआ लगभग ८४ वर्ष की है. उसने मेरे Ýलैट के एक कोने में छोटा-सा मंदिर बना लिया है. उसमें भगवान रामचंद्र जी का सीता, लक्ष्मण, हनुमान सहित पफोटो है. वहाँ और भी कुछ महाशय हैं. वह प्रतिदिन सुबह तीन घंटे और शाम में दो घंटे पूजा करती है. अगरबत्ती जलाती है, आरती उतारती है, प्रसाद चढ़ाती है और एक ही घिसा पिटा पाठ रोज करती है, लेकिन कभी उफबती नहीं. उनकी अंध् आस्तिकता अटल है और मेरी नास्तिकता. इसलिए दोनों में कभी-कभी नोंक झोंक हो जाया करती है. एक दिन मैं उनसे कहता हूँ- तुम मेरे घर में रहकर दूसरों की पूजा करती हो? मेरी क्यों नहीं करती?पफुआ- तुम भगवान हो जो तुम्हारी पूजा करूँ?मटुक- हाँ, मैं भगवान हूँ. तुम्हें भले पता न हो, लेकिन तुम्हारे घर में भगवान ने अवतार ले लिया है. मैं असली भगवान हूँ. तुम जिसकी पूजा करती हो वह नकली भगवान है. पफुआ मेरी बेवकूपफी पर हँसने लगती है. लेकिन मैं उन्हें मनाने में लगा हुआ हूँ. कहता हूँ मैं जिंदा भगवान हूँ. साँस लेता हूँ, खाता-पीता हूँ, चलता-पिफरता हूँ, बोलता हूँ, हँसता हूँ. तुम्हारा भगवान यह सब करके दिखाये तो मैं समझूँ. पफुआ- वह पफोटो तो भगवान का प्रतीक है न.मटुक- वही तो मैं कह रहा हूँ. वह भगवान नहीं है, पत्थर है, पफोटो है, प्रतीक है केवल, लेकिन तुमने भगवान मान लिया है. जब तुम पत्थर और पफोटो को भगवान मान सकती हो तो मुझे क्यों नहीं मान सकती? इस पर पफुआ खिसिया जाती है और कहती है कि भगवान के विरोध् के कारण तुम्हारी नौकरी चली गयी. तुम बचपन में पूजा-पाठ करते थे, तो कितने संस्कारवान लगते थे. अब तुमको क्या हो गया है? एक धर्मिक मेरी पफुआ है जो मानती है कि भगवान को न मानने के कारण मेरी नौकरी चली गयी. लेकिन मैं पफुआ को कैसे समझाउफँ कि वी.सी. को ही मैंने भगवान मान लिया है. लिखकर कहा भी है कि आप मेरे लिए भगवान शंकर हैं, महेश हैं, शिव हैं. आप मेरा कल्याण करें और निलंबन का संहार करें. लेकिन उन्होंने निलंबन का नहीं, मेरी नौकरी का संहार कर दिया और कहा- बच्चा मैं तुम्हारा छोटा-मोटा नहीं, बड़ा कल्याण करने जा रहा हूँ. मुझ पर वीसी रूपी शिव प्रसन्न हैं. इसी कारण मैं इतना खुश रहता हूँ. इस पर पफुआ ने गौर किया. कहा- हाँ, इस स्थिति में दूसरे होते तो रोते रहते. तुम पर तो कोई असर ही नहीं देखती हूँ. पफुआ को अनुकूल पाकर मैंने कहा- अब भी मुझे भगवान मान लो. मगर मानने से कुछ होगा नहीं. मेरे भीतर भगवान देख लो. लेकिन मेरे भीतर तभी देख पाओगी जब अपने भीतर देख लोगी. इसलिए भगवान को अपने में खोजो. अपने भीतर देखने की एक व्यवस्था हमारे प्राचीन भारत में मंदिर बना कर की गयी थी. अभागा वर्तमान भारत उस रहस्य को भूल गया है और अब रोड पर मंदिर बनाता है. पतित मनुष्य ने भगवान की ऐसी पफजीहत की कि वह रोड पर आ गया है. इसलिए सर्वोच्च न्यायालय को ध्न्यवाद जिसने भविष्य में रोड पर आने से भगवान को बचा लिया है.

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