मंगलवार, सितंबर 01, 2009

राखी के रंग

राखी का त्योहार तो एक है, लेकिन उसके रंग अनेक हैं. व्यक्ति का जो रंग होता है वही उसके त्योहार का रंग हो जाता है. व्यक्ति अपना रंग हर चीज में डालता है. इसलिए सृष्टि में वह केवल अपना ही दर्शन करता है. कहते हैं, जिस क्षण वह अपने रंग से बाहर होकर जगत को देखेगा उस क्षण सिवा परमात्मा के उसे कुछ भी नहीं दिखाई पड़ेगा. वैसे तो यह भाई-बहन के प्रेम को बढ़ाने वाला त्योहार है, लेकिन तभी जब उनके भीतर प्रेम हो. अगर प्रेम की जगह अंदर पैसा हो तो वही बढ़ने लगता है. बहन अगर राखी बाँध्ने के बदले में पैसा या कोई गिÝट पाने का भाव रखे तब समझिये वहाँ प्रेम नहीं है. इसलिए भाई अगर पैसे वाला हो तो बढ़िया-सा गिÝट देकर सस्ते में जान छुड़ा लेनी चाहिए. अगर प्रेम की जगह कोई शर्त आ जाय तो भी प्रेम छू- मंतर हो जाता है. अगर बहन को यह कहना पड़े कि मुझे पैसा नहीं चाहिए, लेकिन गाढ़े समय में मेरी रक्षा करना तो समझिये वहाँ भी प्रेम नहीं है. भला प्रेम में कभी यह कहना पड़ता है कि मेरी रक्षा करना! कहना तभी पड़ता है जब प्रेम का अनुभव आदमी न कर रहा हो.
कल ही तो अखबार में पढ़ा कि बेगूसराय के रामदीरी गाँव में एक बूढ़ा कुआँ में गिर गया. उन्हें बचाने के लिए उनका नाती कूदा और कुएँ में ही रह गया. पिफर भतीजा कूदा और वहीं रह गया. बाद में तीनों की लाशें निकाली गयीं. बूढ़े ने नाती को कौन-सी राखी पहनायी थी? भतीजे ने कब चाचा से रक्षा-बंध्न लिया था? नहीं, प्रेम शर्तबंदी नहीं. बिना शर्त के जो घट जाय, वह प्रेम है. उनके पास थोड़ा-सा भाव कम होता, जिंदगी को हिसाब से जीने वाले आदमी होते तो कुएँ में कतई नहीं कूदते. बूढ़े शरीर की रक्षा के लिए जवान शरीर की बलि नहीं चढ़ायी जाती. तब होती दुनियादारी की बात. प्रेम दुनियादारी नहीं है, प्रेम दुकानदारी नहीं है. प्रेम में रक्षा होती है, लेकिन उसकी शर्त नहीं होती. इस तरह का नैसर्गिक प्रेम तो लोक में कम ही मिलता है. लेकिन लेन-देन में भी प्रेम का एक स्वस्थ स्वरूप दिखाई पड़ता है. एक मेरे चाचा थे रामी बाबू. वैसे उनका नाम था रामानंद चौध्री. बड़े सीध्े-सादे सरल व्यक्ति. वे भैंस चराते थे. संबंधनुसार वे मेरी माँ के देवर हुए. लेकिन उनकी माँ मेरी माँ की मौसी लगती थी. इस नाते वे माँ के भाई भी हुए. उन्हें भाई वाला नाता ही पसंद था. माँ उन्हें राखी बाँध्ती थी. उन्होंने माँ को प्रेम-वचन दिया था कि हर तिलसँकराँत ;तिल संव्रंफातिद्ध के दिन वे दूध् पहुँचाया करेंगे. मकर-संव्रफांति में जब गाँव में दूध् का घोर अभाव हो जाता था, ऐसे कठिन समय में भी दुर्लभ दूध् हमें सुलभ हो जाया करता था. भाई-बहन के प्रेम का रस दही-चूड़ा के रूप में बहकर हमें तृप्त करता था. जहाँ कहीं कोई त्योहार आता है, पंडित की लोलुप नजर उस पर पड़ जाती है. अभी ‘हैप्पी बर्थ डे’ और ‘वेलेंटाइन डे’ वगैरह पंडितों की पहुँच से बचा हुआ है. क्योंकि वेलेंटाइन डे मनाने वाले थोड़े जीवंत लोग हुआ करते हैं, लेकिन बर्थ डे बहुत-से मुर्दे भी मनाते हैं. जहाँ मुर्दा मनुष्य मिला कि पंडित झट से उस पर चढ़ाई कर देता है. रक्षाबंध्न पंडितों के आव्रफमण से बचा हुआ नहंीं है. इस दिन वह जजमान खोजता रहता है. नजर पड़ते ही हाथ खींचकर ‘बंध्यो बलि राजा’ वगैरह मंत्रा बुदबुदाता हुआ थोड़ा रुपया झटक लेता है और दूसरे जजमान की टोह में निकल पड़ता है. दूसरा जजमान अगर गरीब रहा तो एक पीड़ा के साथ वह यथाशक्ति कुछ देता है, लेकिन अगर कंजूस रहा तो पंडित उसे एक विपदा की तरह आता हुआ दिखाई देता है. कुछ पंडितनुमा बहनें भी होती हैं जो भाई को खोजती चलती हैं और भाई स्थान बदलते रहते हैं. कुछ प्रेमी-प्रेमिका भाई-बहन के वेश में इस दिन मिलने का अवसर खोजते हैं. कुछ लड़कियाँ लड़कों के दिल में पनपे प्रेम पर तुषारापात करने के लिए राखी बाँध्ने चली जाती हैं.
टीवी पर एक कार्टून दिखाई पड़ा- लड़की राखी लेकर लड़के का पीछा कर रही है और लड़का जान गँवाकर भाग रहा है! इतने जोर से तो वह शायद बंदूक की गोली के डर से भी नहीं भागता! कुछ राजनीतिक छात्रा-संगठन हैं जिनमें छात्राों का मन संस्कारित किया जाता है कि जितनी भी लड़कियाँ हैं वे तुम्हारी बहनंे हैंऋ तुम उनके भाई हो. एक अप्राकृतिक शिक्षा देने से उनके अंत:करण में खलबली-सी मची रहती है. शरीर की माँग कुछ और है, शिक्षा की माँग कुछ और. इसमें उनका व्यक्तित्व सहज-सरल नहीं रह जाता. उनका आचरण भी विश्वसनीय नहीं रह जाता. आज ‘सन्मार्ग’ में पफोटो छपा है. ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्’ के कुछ छात्रा मगध् महिला पहुँच गये हैं लड़कियों से राखी बँध्वाने. कैसे एकटक लड़की केा देख रहा है! कितना गंभीर बना हुआ है! मुस्कुराता क्यों नहीं? कौन-सा राज खुलने का भय है? कहीं से भी यह प्रेम का दृश्य नहीं लगता. अप्राकृतिक काम में व्यवहार की सहजता खो जाती है. दिखावटी चीज में मजा नहंीं रहता है. इसकी तुलना में वह कार्टून’ ज्यादा जीवंत है जिसमें लड़की राखी लेकर दौड़ रही है और लड़का बेतहाशा भाग रहा है. मेरी बहन हर बार राखी पर्व में आती है. इस बार कुछ दिन पहले ही यहाँ से गयी है. पुन: आने के लिए मैंने मना कर दिया है. वहाँ से जूली को फोन किया है कि मेरी तरपफ से मिठाई मँगाकर खाना है और पफुआ के द्वारा मेरे नाम से राखी बँध्वा लेनी है. सो भोरे-भोरे मैं देसी घी में बनी हुई गरमागरम जलेबियाँ ले आकर बिन नहाये भरपेट खा चुका हूँ. नहाने के फेरा में जलेबियाँ ठंडी हो जातीं. बहन के पैसे की जलेबियाँ खाने में बहुत मजा है!
कोई भी ऐसा प्रेम-संबंध् नहीं है जिसका अनुभव मैं जूली के साथ नहीं करता हूँ. दो संबंध् प्रधन हैं- पहला प्रेमी-प्रेमिका का और दूसरा माँ-बेटे का. इसके बाद यह यह मेरी बहन भी है, बेटी भी है, सचिव भी, साली भी, डॉक्टर भी, दोस्त भी, सेविका भी, मालकिन भी, छात्राा भी, मास्टरनी भी और क्या नहीं है? आज हमलोगों ने एक दूसरे के हाथों में राखी डाली है -बाजार से खरीदकर नहीं. घर में ही एक बोरा पड़ा हुआ था उसी से एक सुतली का टुकड़ा खींच लिया. इतनी संुदर, इतनी अद्भुत राखी जिंदगी में पहली बार धरण की है. भाव जिस चीज में भर दीजिए वही चमक उठती है, खूबसूरत हो उठती है. इसीलिए कहा गया है- ‘छू दिया तुमने जिस मिट्टी को चमक उठी बनकर सोना’.
५.०८.०९

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