मंगलवार, सितंबर 01, 2009

purna pathshala

बिहार को चाहिए एक प्रयोगशील पूर्ण पाठशाला
भोलाराम आज अखबार में एक खबर पढ़कर प्रसन्न है. मुख्यमंत्राी जमुई जिले के सिमुलतला में नेतरहाट के ढंग का एक आवासीय विद्यालय खोलने जा रहे हैं. बिहार-विभाजन के बाद खदान के साथ-साथ नेतरहाट विद्यालय भी झारखंड में चला गया था. इससे भोलाराम बहुत उदास था. आज खुशखबरी सुनाने और उस पर मेरी राय जानने मेरे सम्मुख उपस्थित है.भोलाराम:- इस खबर से तो आप भी मेरी तरह खुश होेंगे, सर?मटुक:- खुश तो हूँ भोलाराम, लेकिन तुम्हारी तरह नहीं. तुम खुश ज्यादा इसलिए हो क्योंकि तुम्हारे अंदर सुंदर विद्यालय का कोई सपना नहीं पल रहा है. तुम्हारा सपना नेतरहाट तक जाकर रुक जाता है. एक सामान्य विद्यालय और नेतरहाट विद्यालय में क्या कोई गुणात्मक भेद है. जो विषय यहाँ पढ़ाया जाता है, वहीं वहाँ पढ़ाया जाता है. अंतर सिपर्फ संपन्नता और विपन्नता का है. सिमुलतला में विद्यालय चालीस एकड़ में बनेगा और साधरण विद्यालय के पास इतनी जमीन नहीं होती. सामान्य विद्यालयों में तेज और भुसगोल सब तरह के छात्रा पढ़ते हैं, वहाँ के लिए तेेज विद्यार्थियों का चुनाव होगा. चुनिंदा शिक्षक होंगे और यू.जी.सी. का वेतनमान पायेंगे. विद्यालय आवासीय होगा, जबकि सामान्य विद्यालय गैर-आवासीय हैं. सामान्य स्कूल उजड़े-उजड़े मालूम पड़ते हैं, वहाँ थोड़ी रौनक रहेगी और वह सुसज्जित होगा. सामान्य विद्यालयों में कहीं पढ़ाई होती है, कहीं नहीं होती है. वहाँ नियमानुसार पढ़ाई होगी. नेतरहाट जैसा विद्यालय तो हर विद्यालय होना चाहिए भोलाराम. सरकार का काम है एक-एक विद्यालय के स्तर को उँचा उठाना. नेतरहाट जैसा एक विद्यालय चाहे तो पैसा वाला व्यक्ति भी आराम से खोल सकता है. सरकार तो पूरे प्रांत का प्रतिनििध्त्व करती है न! वह अगर केवल तेज विद्यार्थियों के लिए अच्छे विद्यालय का प्रबंध् करेगी तो सामान्य और पिछड़े बच्चों के लिए प्रबंध् कौन करेगा, जो लाखों की संख्या में हैं. तेज तो उठते-गिरते मंजिल को छू ही लेते हैं. क्या गरीबी कुमार आनंद की राह को रोक पायी र्षोर्षो लेकिन लाखों सामान्य बच्चे जो कुछ हो सकते थे, आज कुछ नहीं हो पा रहे हैं. क्या हमारे प्रांत में एक ही विद्यालय के लायक तेज बच्चे हैं? तेज बच्चों के लिए भी इस तरह के अनेक विद्यालय चाहिए क्योंकि उनकी संख्या इतनी कम नहीं है! एक सिमुलतला विद्यालय तो झुनझुना है भोलाराम. तुम जैसे बच्चे उसे बजायेंगे और खुश हो जायेंगे. इसका साइड इपफेक्ट जानते हो, हर जगह उसमें नामांकन की तैयारी के लिए व्यावसायिक कोचिंग केन्द्र खुल जायेंगे. एक-एक कोचिंग सेन्टर में सैकड़ों बच्चे जानवरों की तरह रखे जायेंगे. उनमें से कुछ संभावनापूर्ण बच्चों पर कोचिंग संचालक का ध्यान होगा, बाकी सब पैसे लेने के साध्न होंगे. शोषण का जाल बिछेगा. प्रतियोगी परीक्षाओें में गिने-चुने बच्चों का चुनाव होगा, शेष हजारों-लाखों बच्चे हताशा के शिकार होंगे. जिन सलाहकारों को मुख्यमंत्राीजी ने आमंत्रिात किया है, तुम्हारी तरह ही उनके अंदर अच्छे विद्यालय का कोई सपना नहीं है. उनकी दृष्टि व्यापक और गहरी नहीं है. वे सब लकीर के पफकीर हैं!भोलाराम:- बार-बार सपनों की बात आप करते हैं. क्या उसे बताने की कृपा करेंगेमटुक:- यह सपना केवल मेरा नहीं है. संसार में जितने महान् शिक्षाशास्त्राी और संबु( व्यक्ति पैदा हुए हैं, उन सबों का है. वे सब एकमत होकर कहते हैं- शिक्षा वह है जो मनुष्य के भीतर छिपे उनके व्यक्तित्व को प्रकट कर दे. हर व्यक्ति परमात्मा के घर से एक अद्वितीय प्रतिभा का बीज लेकर आया है. शिक्षा का काम है कि वह पहचान करे कि किस व्यक्ति के भीतर कौन-सा बीज छिपा हुआ है और वह किस भाँति प्रकट होगा. जैसे एक चट्टान का टुकड़ा सड़क के किनारे पड़ा है. कोई उसको पूछने वाला नहीं होता, लेकिन एक मूर्तिकार की नजर उस पर पड़ती है. वह पत्थर के भीतर छिपे व्यक्तित्व को पहचान लेता है और छेनी से अनावश्यक हिस्सा छाँट कर अलग कर देता है. उससे प्रकट होती है किसी बु( की मूर्ति, किसी मोनालिसा की मूर्ति. मूर्तिकार वाला काम शिक्षा का है. छिपे को प्रकट कर देना. हमारी शिक्षा ऐसी नहीं है. वह अंदर को बाहर नहीं करती. बाहर का कचड़ा अंदर डालती है और इस तरह एक गुलाम मानसिकता पैदा होती है. यह जो सिमुलतला में खुलने जा रहा है, इसके द्वारा बेहतर गुलाम पैदा हो सकेंगे जो अगले मुख्यमंत्रिायों के सलाहकार, सेवक वगैरह बन सकेंगे.भोलाराम:- अंदर और बाहर का क्या रहस्य है, ठीक-ठीक समझ में नहंीं आयार्षोर्षोमटुक:- तुम्हें लगता होगा कि दुनिया एक है, लेकिन दुनिया दो है. एक बाहर है और एक हमारे अंदर. बाहर की दुनिया में जब मनुष्य की खोज शुरू होती है तो विज्ञान पैदा होता है, कला पैदा होती है, लेकिन अंदर की दुनिया में जब खोज होती है तो ध्र्म और अध्यात्म पैदा होता है. एक पर्दा इस संसार पर पड़ा हुआ है और एक पर्दा खुद हमारे उफपर पड़ा हुआ है. आइन्सटीन जैसे वैज्ञानिक बाहर की दुनिया का पर्दा उठाते हैं और उससे प्रकट हो जाता है सापेक्षतावाद का सि(ान्त, लेकिन अपने उफपर पड़े पर्दे को गौतम सि(ार्थ जैसे वैज्ञानिक उठाते हैं और भीतर से बु(त्व प्रकट हो जाता है. व्यक्ति दुनिया से चाहे जितने पर्दे उठा दे पर स्वयं घूँघट में रह जाये तो पीड़ा नहीं मिटती. आइन्सटीन बहुत पीड़ा के साथ मरे. इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है भीतर का पर्दा उठाना, लेकिन दुनिया में शिक्षा बाहर का पर्दा उठाने में लगी है. भारत में तो बाहर का भी परदा उठाने का काम नहीं होता है. पश्चिमी जगत के लोग बाहर का परदा उठाते हैं और हम झाँकते हैं. अनुकरण करते हैं, अनुसंधन नहीं करते हैं. सिमुलतला आवासीय विद्यालय में कोई नया अनुसंधन नहीं होगा, कोई प्रयोग नहीं होगा. वह सीबीएसई के मार्गदर्शन में काम करेगा. मेरे मन में जिस विद्यालय की परिकल्पना है, वह प्रयोगशील होगा और पूर्ण होगा. पूर्णता इस अर्थ में कि वहाँ अंदर और बाहर दोनों दिशाओं में खोज चलेगी. दोनों के रहस्यों से परदा उठाने के प्रयास चलेंगे. प्रयोगशीलता इस अर्थ में जहाँ से हम इस वर्ष आरंभ करेंगे, अगले वर्ष वहाँ से आगे निकल जायेंगे. जिस प(ति को आज अपनायेंगे, वह समय के साथ विकसित होती जायेगी. वह विद्यालय किसी अन्य विद्यालय की तर्ज पर नहीं खुलेगा. उसका अपना तर्ज होगा जो दिनोंदिन विकसनशील होगा. कैसी विडंबना है कि आजादी के समय जो नेतरहाट विद्यालय खुला था, आज 62 वर्ष बाद भी उसी तरह का विद्यालय खोलने का प्रयास चल रहा है. मनुष्य को मनुष्य बनाने वाला विद्यालय कब खुलेगा? ( व्रफमश: द्ध
मटुक नाथ चौध्री 30.08.09

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