मंगलवार, सितंबर 01, 2009

rajhinsa hinsa na bhavati

राजहिंसा हिंसा न भवति!
भोलाराम को लोकतंत्रा की रक्षा की चिंता सताती रहती है. आज उसने कहा- देखिये सर, हत्यारे विजय कृष्ण को जेल में भी वीआईपी वार्ड दे दिया गया है. अलग कमरा, चौकी, तोशक, तकिया, टेबल-कुर्सी, अखबार, टीवी, रसोइया कौन सी सुविध नहीं दी गयी! आश्चर्य तो यह है कि जेल मैनुअल के अनुसार पूर्व मंत्राी होने के नाते वे इन विशेष सुविधओं के हकदार हैं! क्या एक मंत्राी के द्वारा की गयी हत्या और एक अपराध्ी के द्वारा की गयी हत्या में भेद होेता है? क्या यह कथन धेखा है कि लोकतंत्रा में कानून की दृष्टि में सब समान होते हैं? मटुक:- तुमने पढ़ा है न भोलाराम कि ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’. इसी तरह राजपुरुषों के द्वारा की गयी हिंसा हिंसा नहीं होती. हिंसा उनका ध्र्म है, स्वभाव है. जब तक हिंसा न होगी, सत्ता कैसे मिलेगी? सत्ता पाने के लिए और पायी सत्ता की रक्षा के लिए हिंसा अनिवार्य है. इसलिए तुम कह सकते हो ‘राजहिंसा हिंसा न भवति’. वैसे तुम्हारा प्रश्न उचित है वत्स. मगर आदर्श और यथार्थ में बड़ा पफर्क होता है. तुमने जो कहा, वह लोकतंत्रा का आदर्श है. तुम जो देख रहे हो, वह लोकतंत्रा का यथार्थ है. तुम जैसे लोग इस तरह की बात करके आदर्श और यथार्थ में एक द्वन्द्व पैदा कर देते हैं. लोग सोचने लगते हैं कि जब लोकतंत्रा ऐसा होता है, तो इसका माने है कि अभी लोकतंत्रा आया नहीं है. इस विचार को जगाये रखो, वरना लोकतंत्रा का अर्थ वही रह जायेगा जो हमारे नेतागण अपने आचरण से प्रकट कर रहे हैं. भोलाराम:- सोचिए सर, क्या जेल मैनुअल का यह विशेष नियम हमारे संविधन की मूल भावना के विरोध् में नहीं है?मटुक:- सोचा हुआ है भोलाराम, सब सोचा हुआ है. संविधन बनाया था, अम्बेदकर, राजेन्द्र प्रसाद जैसे महान तेजस्वी और त्यागी नेताओं ने और उसमें संशोध्न करते हैं आज के महामंद भोगी नेता. पफर्क तो पड़ेगा. पूर्व मंत्राी अगर राजनीतिक कारणों से जेल जाते तो उक्त सुविधएँ उचित होतीं. अगर दैवयोग से सामान्य आपराध्कि मामले में पफँस जाते तो भी शायद उचित होतींऋ लेकिन हत्या जैसे जघन्य अपराध् में ऐसी सरकारी सुविधएँ मुझे भी उचित नहीं जँचती. लेकिन भोलाराम, विजय कृष्ण को कम सजा नहीं मिल रही है. सजा की पीड़ा हमेशा सापेक्ष होती है. सुख-सुविध में, रौब-दाब में रहने वाले ऐसे नेता की जो दुर्गति हो रही है, वह अपने आप में बहुत बड़ी सजा है. लेकिन गंदे नाले पर गुजर करने वाले किसी अपराध्ी को यही सजा मिलती तो सजा ही मजा हो जाती. सृष्टि में सब कुछ सापेक्ष है. मगर मूल समस्या भोलाराम, यह नहीं है कि उन्हें कुछ सुविधएँ मिल रही हैं. मूल समस्या है कि आज की राजनीति हिंसा की जमीन पर खड़ी है. यह हिंसा उजागर इसलिए हो गयी भोलाराम, कि जो मारा गया, वह भी मुख्यमंत्राी के निकट का आदमी था. पढ़ा नहीं आज के अखबार में, पफोटो भी छपा है, मुख्यमत्राी जी २ अप्रैल की रात में दो घंटे तक सत्येन्द्र सिंह के घर पर विजय कृष्ण को जद यू में शामिल करने के लिए रुके थे. ३ अप्रैल को वे शामिल भी हो गये थे. अगर सत्येन्द्र सिंह एक अदना आदमी होते तो किसी को हत्या का पता नहीं चलता और मामला रपफा-दपफा हो जाता.भोलाराम:- बिल्कुल सच कह रहे हैं सर, मुन्ना नामक एक मामूली मनुष्य का मामला उजागर नहीं हुआ. २००२ में विजय कृष्ण की बेटी पूनम के बुलावे पर मुन्ना विजय कृष्ण के घर पर गया था और तब से लौटा नहीं. बाप रे बाप! ऐसे घातक राजनेता से डर लगता है सर.मटुक:- डरो नहीं भोलाराम, मृत्यु अवंश्यभावी है. कुछ दिनों के लिए इस ध्रती पर आये हो. कुछ लीला करो. अपना पक्ष निर्धरित करो और पूरी ताकत से लड़ो. पांडव अभी वनवास में हैं. कौरवों का एकछत्रा अकंटक राज्य है. इस राज्य को जनता का साथ लेकर जनता के लिए छीनो. डरो मत, क्योंकि डरने वाले भी मरते हैं और उनकी मौत बड़ी दुखद होती है. मौत आनंददायी होती है बहादुरों की, हिम्मतवालों की, जनता से प्रेम करने वालों की. मरो गाँध्ी की तरह, गोडसे की तरह नहीं. मरते समय भी मुँह से आह और कराह न निकले, निकले तो केवल ‘हे राम’. राम जनता से प्रेम का सूचक शब्द है.भोलाराम:- अकेला चना कैसे भाड़ पफोड़ेगा सर?मटुक:- पहले आत्मवान बनो भोलाराम! सत्य के लिए गये संघर्ष में आत्मा निखरती है. निखरी हुई आत्मा के पास निखरे हुए लोग स्वत: आकृष्ट होते हैं. उसकी चिंता मत करो. गाँध्ी अकेले बढ़ते गये और उन्हें सहयोगी मिलते गये. सहयोगियों की नहीं, सत्य की पिफकर करो.भोलाराम:- आपकी बात अबूझ होने लगी. सत्य माने क्या?मटुक:- सत्य माने तुम. सत्य माने यह संसार. तुम अपने लिये जीयो. तभी तुम दूसरों के लिए भी जी पाओगे. इस जीने में जो बाध्क बने उनके साथ सारी शक्ति लगाकर लड़ो. लेकिन इतना भर ध्यान रखना कि तुम्हारे जीने में किसी का शोषण न हो. तुम अपनी स्वतंत्राता हासिल करोऋ लेकिन किसी की स्वतंत्राता में बाध्क मत बनना. अभी तुम्हारा सत्य इतना ही है. ज्यों- ज्यों ध्यानपूर्वक जीना शुरू करोगे, सत्य अपनी परतें तुम्हारे सामने खोलता चला जायेगा.
२२.०८.०९

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