शुक्रवार, सितंबर 11, 2009

रेड्‌डी के गम में आत्महत्या का सवाल

बिहार के अखबारों मंें यह खबर प्रमुखता से छपी कि आन्ध््राप्रदेश के मुखयमंत्री वाई.एस.राजशेखर रेड्‌डी की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में हुई मौत के आघात को नहीं झेल सकने के कारण कई लोग हृदयाघात के शिकार हुए. कई लोगों ने आत्महत्या कर ली. उनके गम में मरने वालों की संखया ७० से १२२ तक बतायी गयी. 'प्रत्युष नवबिहार' ने ७०, 'सन्मार्ग' ने ८० और 'हिन्दुस्तान' ने १२२ बतायीं. सारी खबरें एजेंसियों से आयी हैं. १२२ की संखया का आधार तेलगु टीवी चैनल है. आत्महत्या की इतनी बड़ी ऐतिहासिक घटना घटे और दूसरे दिन के अखबारों में इस पर कोई चर्चा न हो, कोई विश्लेषण न हो, तो बात रहस्यमय हो जाती है. मेरी जिज्ञासा हुई कि यह सनसनी केवल बिहारी अखबारों की विशेषता है कि बाहरी अखबारों की भी. 'जनसत्ता' में आठ आदमी के हार्ट अटैक से मारे जाने की खबर है. दैनिक भास्कर में कुल १२२ आदमी के द्वारा आत्महत्या की खबर है.
मैं सोचने लगा हूँ, तेजी से उड ी यह खौफनाक खबर एकाएक शांत कैसे हो गयी? इतनी बड ी त्रासदी पर दूसरे दिन विचार क्यों नहीं हुआ ? ऐसा क्यों होता है कि कभी-कभी एक की मौत मीडिया में कई दिनों तक सुर्खियों में छायी रहती है और कभी १२२ की मौत पर चुप्पी लग जाती है? क्या ये खबरें झूठ हैं ? क्योंकि मीडिया में कुछ भी संभव है ! यही खबर लाने वाला, यही खबर लेने वाला और यही खबर डूबोनेवाला! यह किसी राजनेता की लोकप्रियता दिखाने के लिए मीडिया का आयोजन तो नहीं ? लेकिन इसमें थोड ी भी तो सच्चाई होनी चाहिए ! थोड ी देर के लिए मैं मान लेता हूँ कि यह खबर सही है, तब विचार करता हूँ कि क्या रेड्‌डी की पत्नी, पुत्र, पुत्री और परिवार के लोगों से ज्यादा सदमा उन लोगों को पहुँचा जो उनसे सीधे जुड े नहंीं थे ? अगर हार्ट अटैक का कारण सदमा है, तो सबसे पहले उनकी पत्नी को हार्ट अटैक होना चाहिए क्योंकि मेरी समझ से विपत्ति का पहाड़ उन्हीं पर ज्यादा टूटा है. जितना स्वार्थ उनके परिवार का रेड्‌डी से सधता, उतना किसी भी व्यक्ति का नहीं सध सकता है. उनके निकटतम मित्रों, सीधे लाभान्वित लोगों में अगर किसी ने आत्महत्या नहीं की है और निरीह जनता ने की है तो मेरे अनुसार इसके लिए वर्तमान घिनौनी राजनीति जिम्मेदार है !
पता करने पर यह मालूम हुआ कि दक्षिण भारतीय अधिक भावुक और धार्मिक प्रवृत्ति होते हैं. सवाल वहीं का वहीं है. रेड्‌डी परिवार भी दक्षिण भारतीय हैं ? याद आया- हमलोग भक्ति साहित्य के उद्‌भव में पढ ा करते हैं- 'भक्ति द्राविड ऊपजी, लाये रामानंद'. भक्ति साहित्य का उदय दक्षिण भारत में हुआ जिसको रामानंद उत्तर भारत लाये. उत्तर भारत को भी उतना भावुक होना चाहिए, लेकिन नहीं है. जलवायु को भी दोष नहंीं दे सकते. फिर क्या कारण है ? यह भी मालूम हुआ कि दक्षिण के लोग फिल्मी सितारों और नेताओं को भी भगवान का दर्जा दे देते हैं. इसका प्रमाण है कि उत्तर भारत में अमिताभ बच्चन के एकाध मंदिर होंगे, कुछ फैन्स क्लब होंगे, लेकिन रजनीकांत के सैकड ों फैन्स क्लब हैं और पचासों मंदिर हैं.
असली कारण वहाँ से पता चलता है जब हम देखते हैं कि एन.टी.रामाराव जब धार्मिक फिल्मों से राजनीति में आये तो अपनी भगवान वाली छवि लेकर आये. उन्होंने चालाकी से अपनी रील लाइफ को रीयल लाइफ में मिक्स कर दिया. वे जनसभाओं में भी फिल्मी भगवान वाली वेशभूषा पहनते थे. उन्होंने जमकर जनता को बेवकूफ बनाया. कहना चाहिए उनकी बेवकूफी का फायदा उठाया. राजशेखर रेड्‌डी भी गरीबों के मसीहा कहे जाते हैं. नरेगा आदि कार्यक्रम उन्होंने जमकर चलाये. गरीब लोगों के मन में अपनी ऐसी छवि उतारी कि उनके सिवा उनका कोई पालनहार नहीं है. अब समझ में आता है कि वर्तमान राजनीति क्यों जनता को शिक्षित नहीं करना चाहती है. क्यों उसके भीतर अंधविश्वास को और गहरा करती है ? क्यों समझ-बूझ पैदा करने वाली शिक्षा नहीं लाना चाहती है ? क्यों बीमार भावुकता को भुनाने के लिए उसे बनाये रखना चाहती है ? क्या एक मुखयमंत्री का यह दायित्व नहीं है कि जनता को बीमार मानसिकता से मुक्त करने के लिए शैक्षिक अभियान चलाये ? बिहार में भी गरीबी, अशिक्षा, कुशिक्षा, अंधविश्वास को बरकरार रखने की हर संभव कोशिश राजनीति के द्वारा हो रही है. इसको देख-सुनकर जो चुप बैठते हैं, उन्हें कैसे बुद्धिजीवी कहा जाय ? बिहार में सभी चुप हैं, धरती चुप है, आसमान चुप है.

मटुक नाथ चौधरी
६.०९.०

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