शनिवार, सितंबर 05, 2009

ट्रेनें क्यों जलायी जाती हैं?

बिहटा स्टेशन पर लगी ट्रेन की आग की लपट मेरे शिष्य भोलाराम के दिल तक पहुँच चुकी थी. उसका शीतल âदय ए. सी. बोगियों की तरह ध्ू-ध्ू कर जल रहा था. दुख और व्रफोध् से उसकी काया काँप रही थी और उन्माद में वह बड़बड़ा रहा था- ‘यही लोग कहते हैं कि क्यों बाहर बिहारियोंं को बुरी नजर से देखा जाता है! क्यों नहीं देखा जायेगा? भला ऐसा भी कहीं होता है! अभी जून में खुसरूपुर स्टेशन पर बोगियाँ जलायी गयी थीं. पिछले साल राहुल राज की हत्या के बाद बाढ़ स्टेशन पर बोगियाँ जलायी गयी थीं. ट्रेन डकैती तो आम बात है.’ आप कहते हैं कि सारी बुराइयों की जड़ वर्तमान शिक्षा में है. कृपया बताइये कि दुनिया में कहीं ऐसी शिक्षा है जो इसकेा दूर कर सके?मटुक:- दुनिया में है या नहींं यह तो नहीं मालूम भोलाराम, लेकिन ऐसी शिक्षा हो सकती है. शिक्षा का मतलब ही है कि वह समस्याओं का समाधन निकालने की योग्यता आपको प्रदान करे. अभी चारों तरपफ समस्याएँ हैं, लेकिन समाधन खोजने वाला नहीं दिखता. क्योंकि नेता और जनता, तथाकथित बु(िजीवी और मूढ़ सभी इसी शिक्षा की उपज हैं. इस शिक्षा का एक ही काम है बु(ि का हरण करना. प्रतिभा को विनष्ट करना. स्कूल और कॉलेज बु(िमत्ता, नहीं सूचनाएँ दे रहे हैं. बच्चों और युवाओं को सूचनाएँ रटवा-रटवा कर भरी जवानी में बूढ़ा कर देते हैं. इसलिए विद्यार्थियों का विद्रोह बु(िहीन हो जाता है. वह न सिपर्फ संपत्ति को नष्ट करता है वरन् विद्रोह को ही नष्ट कर देता है. भोलाराम:- बु(िमत्ता तो पढ़ने-लिखने से, अध्ययन-मनन-चिंतन से आती है न? और आजकल के विद्यार्थी अध्ययन-मनन करते ही नहीं.मटुक:- और जो अध्ययन करते हैं वे क्यों बु(िहीन हैं? विद्यार्थियों को पढ़ाने वाला क्यों बु(िहीन है? समझने का प्रयास करो भोलाराम.भोलाराम:- तो बु(िमत्ता कैसे आती है?मटुक:- बु(िमत्ता आती है ध्यान से.भोलाराम:- तो क्या आँख मूँदकर ध्यान करने से आदमी बु(िमान हो जायेगा?मटुक:- ध्यान का अर्थ है, अपने भीतर गहराई में प्रवेश करना. अपने अंदर के बंद द्वार को खोलना. आत्मा के निकट पहुँचना. जो आदमी जितना ही अपनी आत्मा के करीब होगा, वह उतना ही बु(िमान हो जायेगा.भोलाराम- यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही है!मटुक:- करने से समझ में आएगी भोलाराम. कुछ दिन अभ्यास करके देखो, अपने आप समझ जाओगे. अभी हमारे युवा वर्ग व्रफोध् में हैं, तनाव में हैं. उनके पास कागज की डिग्री छोड़कर कुछ भी नहीं है. जिंदगी दिवालिया हो चुकी है. बड़ी दयनीय और दुखद अवस्था है उनकी. वे प्रफस्टेशन के शिकार हंै. इस अवस्था में चीजों को नष्ट करने के सिवा वे कर ही क्या सकते हैं! अशांत, पीड़ित और परेशान युवक कुछ भी तोड़ सकता है. रायपफलधरी से वह भिड़ नहीं पायेगा, सरकार से लड़ नहीं पायेगा तो अपना व्रफोध् निर्जीव वस्तुओं पर ही उतारेगा. अभी तो ट्रेन जला रहा है, देखते नहीं मौका मिलता है तो मनुष्य को मार डालता है. आर. पी. एपफ. ने मार ही डाला एक युवक को! इसी तरह की गलत शिक्षा चली तो आदमी आदमी को समाप्त कर देगा.भोलाराम:- तो आपकी समझ है कि ध्यान से यह सब ठीक हो जायेगा?मटुक:- बिल्कुल होगा. स्कूल और कॉलेजों में जरा ध्यान का प्रयोग तो शुरू कीजिए. शांत चित्त में ही ज्ञान उपजता है. मानसिक परिवर्तन होता है. व्यक्तित्व में आमूल परिवर्तन होता है. जिस व्यक्तित्व में परिवर्तन होता है, उसी के मस्तिष्क में समाज को बदलने की तेज आग पैदा होती है. अभी जो तुम्हारे दिल में आग है भोलाराम, यही आग ध्यान के द्वारा रचनात्मक हो सकती है. ध्यान आदमी को शांत करता है. व्यक्ति जितना ही शांत होगा, उतना ही सुंदर समाज के निर्माण में सहायक होगा.भोलाराम:- ध्यान के अतिरिक्त और क्या करना पड़ेगा?मटुक:- शिक्षा को भय और लोभ से मुक्त करना होगा. हम बचपन से ही सिखाते हैं बच्चों को- पढ़ोगे- लिखोगे बनोगे नवाब. नवाब बन जाओ. उफँची से उफँची कुर्सियाँ हासिल करो. तुम्हारा वेतन उफँचा से उफँचा हो. तुम्हारा मकान उफँचा हो, तुम्हारी दुकान उफँची हो. लोभ को तुम जितना आगे खींच सकते हो, खींचो. इस खींचतान में जिसको जहाँ मौका मिलता है, खींच रहा है. परिवहन विभाग के अध्किारी कपिलमुनि राय को मौका लगा तो करोड़ों खींंच लिया. बेचारे आर.पी.एपफ. को २० रुपये मारने का मौका है. नेताओं का तो पता करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि उनको कौन उघाड़े! हमारी शिक्षा ने कभी यह नहीं सिखाया कि तुम ऐसा जीवन जीयो कि शांति और आनंद को उपलब्ध् हो सको.भोलाराम:- क्या आप कहना चाहते हैं कि ध्यान से ही सब हो जायेगा, प्रशासन की सख्ती की जरूरत नहीं रहेगी?मटुक:- अवश्य रहेगी, लेकिन बहुत कम. ऐसा तामसिक वृत्ति का व्यक्ति जो ध्यान की तरपफ कभी उन्मुख न होगा, तो उसके पागलपन को प्रशासन की सख्ती से नियंत्रिात रखा जा सकेगा. प्रयास बाहर और भीतर दोनों तरपफ से करना होता है. भीतर से आदमी को बदलने का प्रयास वास्तविक है. उसके बिना सदा उपद्रव रहेगा, प्रशासक चाहे कितना ही कठोर क्यों न हो, लुंज-पुंज रहे तब तो कहना ही क्या?
१९.०८.०९

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