गुरुवार, सितंबर 17, 2009

विश्वविद्यालय में बम !

खबर है कि कल सवेरे मोटर साइकिल पर सवार दो लड़कों ने पटना विश्वविद्यालय कार्यालय में दो बम फेंके. सौभाग्य से वे नहीं फटे, अगर फट जाते तो विश्वविद्यालय श्मशान में बदल जाता. विश्वविद्यालय जितना ही अनुशासन लाने का प्रयास करता जा रहा है, उतनी ही उच्छृंखलता वहाँ बढ ती जा रही है. कहावत चरितार्थ हो रही है-मर्ज बढ ता ही गया, ज्यों-ज्यों दवा की. आप क्या सोचते हैं, सर ? भोलाराम ने पूछा है.
मटुकः-बउवा भोला, बम दो प्रकार का होता है. एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म. स्थूल बम वह है जो कल फेंका गया था. सूक्ष्म बम वह है जिसके द्वारा किया गया संहार सबकी समझ में नहीं आता है. पहला बम शरीर को आघात पहुँचाता है, दूसरा विचार को. विश्वविद्यालय स्वयं एक विचार विनाशक सूक्ष्म बम है. जो विचार पैदा करने और निखारने की जगह होनी चाहिए थी, वह विचार मारने की जगह बनी हुई है. जहाँ विचार मरता है, वहाँ हिंसा जनमती है. सूक्ष्म बम की सेवा में स्थूल आ ही जाता है. मैं इसी रूप में सोचता हूँ भोला. कुछ और पूछना है ?
भोलारामः- यह ठीक से समझ नहीं पाया कि विश्वविद्यालय विचार कैसे मार रहा है ? विद्यार्थियों के निष्कासन के प्रसंग में स्पष्ट करें.
मटुकः- समाज को पुलिस की जरूरत होती है, न्यायालय की जरूरत होती है और विश्वविद्यालय की जरूरत होती है. तीनों के अलग-अलग काम हैं, करने के अलग ढंग हैं. विश्वविद्यालय वह जगह है जहाँ मनुष्य को सच्चा मनुष्य बनाया जाता है. विश्वविद्यालय एक प्रकार की रिफाइनरी है, जहाँ कच्चे तेल का शोधन होता है. यानी अमानुष को मानुष बनाने की प्रक्रिया का नाम है विश्वविद्यालय. फिर भी कुछ अमानुष रह जायेंगे जो मानुष नहीं हो पायेंगे, उन्हें पकड ने का काम पुलिस का है और दंडित करने का काम न्यायालय का. विश्वविद्यालय ने अपना काम छोड कर न्यायालय का काम अपना लिया है -वह बिगड े हुए विद्यार्थियों को सुधारने के बदले उन्हें निष्कासित कर दंडित करता है. विद्यार्थियों को अध्ययन की ओर मोड ने की कोई चेष्टा उनकी तरफ से नहीं है. पठन-पाठन का वातावरण बनाने का कोई प्रयास नहीं है. इस गंभीर समस्या पर गंभीर लोगों को बुलाकर विचार करने का समय उसके पास नहीं है.चार चंड मिलकर सब तय कर लेते हैं. उसके भीतर विद्यार्थियों के गलत आचरण पर क्रोध जगता है. इस विषम स्थिति की पैदाइश के लिए वह कहीं से भी अपने को जिम्मेदार नहीं समझता है. वह क्रोधावेश में सीधे विद्यार्थियों को दंडित कर देता है. न्यायालय क्रोध में आकर किसी को दंडित नहीं करता है. वह शांत चित्त से न्याय करता है. लेकिन विश्वविद्यालय तो विक्षिप्त जैसा आचरण कर रहा है ! गीता कहती है- 'पर धर्मो भयावहः' अपना धर्म छोड़कर दूसरे का धर्म अपना लेना खतरनाक होता है. विश्वविद्यालय न्यायालय का धर्म अपनाकर खतरनाक खेल खेल रहा है ! न वह न्यायालय हो सकता है और न वह विश्वविद्य ालय रह गया है. वह धोबी का कुत्ता हो गया है- न घर का, न घाट का.
भोलारामः- बड ी कड ी टिप्पणी करते हैं, सर. आप भी विश्वविद्यालय के मारे हुए हैं, इसीलिए क्या ?
मटुकः- तुम्हारा ऐसा सोचना स्वाभाविक है भोलाराम. हर घटना के दो पहलू होते हैं- एक अच्छा और एक बुरा. वह उस आदमी पर निर्भर करता है कि कौन-सा पहलू वह लेता है. मेरे निष्कासन के भी दो पहलू हैं- मैं उसका अच्छा पहलू लेकर सुखी हूँ. तुमने कभी सोचा है, २९ दिसम्बर, १९७८ से लेकर १४ जुलाइर्, २००६ तक विश्वविद्यालय ने मेरी किस क्षमता का उपयोग किया ? और जान लो, जिस क्षमता को उपयोग नहीं होता , वह धीरे-धीरे नष्ट हो जाती है. प्रायः हर शिक्षक और विद्यार्थी की क्षमता का विश्वविद्यालय में विनाश हो रहा है. इसीलिए मैंने विश्वविद्यालय को सूक्ष्म बम कहा है. निलंबन की अवधि में मैंने विश्राम का मजा लिया. मैं मानता हूँ कि मानव जीवन का लक्ष्य विश्राम है. निरर्थक कर्म के बवंडर में आदमी फँस गया है. बवंडर जैसा नचा रहा है, आदमी नाच रहा है. वह अपने वश में नहीं है. मनुष्य पराधीन है और जानते ही हो- 'पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं.' निलंबन जब निष्कासन में तबदील हुआ तो मजा और बढ गया, क्योंकि हमारे भीतर की सुषुप्त सृजनात्मकता करवटें बदलने लगी है. और प्यारे, सृजनात्मकता ही आनंद है, जीवन है, क्योंकि वह एक सुंदर खेल है. निलंबन में हाजिरी बनाने तक का बंधन था. अब तो उस बंधन से भी मुक्त हूँ. जहाँ चाहूँ घूमूँ; जो चाहूँ करूँ !
परम स्वतंत्र न सर पर कोई
भावै जोइ करउँ सोइ सोई.
भोलारामः-खाना-पीना कहाँ से चलेगा ?
मटुकः- अरे बुड बक भोला, कभी चिड ँय-चुनमुन को को नौकरी करते देखा है ? कोई जीव-जंतु सर्विस नहीं करता. दाता राम सबका खयाल रखते हैं. मेरा नहीं रखेंगे ? मैं सवेरे उठकर छत से पेड़ की फुनगियों पर फुदकते पक्षियों को बराबर निहारता हूँ और आनंद विभोर हो जाता हूँ. वही उन्मुक्त गगन बिहारी मेरे आदर्श हैं. हवा में पंख फैलाकर तैरना ! आह कैसी मस्ती है ? फिर उड कर इस डाली से उस डाली. इस पेड से उस पेड . कहीं किसी छत पर अनाज के दाने मिले, चुग लिये. कोई कीड ा पकड में आया. क्षुधा शांत कर ली. कभी आपस में थोड ी-बहुत लड ाई भी हो गयी. फिर सल्हा. कभी एक जाति के पक्षियों में स्थायी शत्रुता नहीं देखी होगी. यह तो मनुष्य ही है कि एक बार लड ाई शुरू करता है तो जिंदगी के अंत पर ही उसका अंत होता है. और कभी-कभी नयी पीढ ी को भी संक्रमित कर देता है.
भोलारामः- अगर न्यायालय आपकी बर्खास्तगी समाप्त कर दे तो क्या आप फिर बंधन में आ जायेंगे ? यानी दुख में ?
मटुकः- फिर उसके भी दो पक्ष होंगे भोलाराम- अच्छा और बुरा. मैं उसका अच्छा पक्ष ले लूँगा. विद्यार्थियों के साथ मुझे मजा आयेगा. उनके साथ रहकर कुछ नया रचूँगा. अगर विश्वविद्यालय में वापस होने का सुयोग मिलेगा तो वहाँ नया मटुकनाथ दिखाई पड ेगा. नये सिरे से छात्रों को सँवारूँगा.
भोलारामः- कहने का तात्पर्य यह कि आप हर हालत में सुखी रहेंगे ?
मटुकः- यही जीवन-कला है. जो इस कला को सीखता है, उसे कोई शत्रु कभी पराजित नहीं कर पाता. उसी को अजातशत्रु कहते हैं. मैं अजातशत्रु हूँ, भोलाराम.

मटुक नाथ चौधरी
१६.०९.०९

23 टिप्‍पणियां:

  1. मेरी तरफ से बधाई स्वीकारें ..

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  2. मेरी तरफ से बधाई स्वीकारें ..

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  3. ब्लॉग की दुनिया में जोड़े का स्वागत। लेकिन ब्लॉग के नाम से बेहद निराशा हुई। आखिर प्रेम पार्टी और प्रेम पार्क बनाने का दावा करने वाले इस युगल के ब्लॉग का नाम अलग क्यों है?

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  4. matuk ewam juli ji
    aapke lekh ko padha,,,,,
    aapkee waakpatutaa aur tarkon ne prabhawit kiya.
    parantu kuch baaten saaf nahee hui.

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  5. jab udas ho to baat kar lena.
    jab dil chahe mulakaat kar lena.
    rahte hai aapke dil k kisi kone mein.
    waqt mile toh talash kar lena.
    madan baliyan
    09354512065

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  6. ब्लॉग की दुनिया में आपका स्वागत है। आप दोनों से से मेरी बातचीत आजतक ऑफिस,झंडेवालान,दिल्ली में हुई थी। आप वैलेंटाइन डे पर बात करने आए थे और मैं नीचे तक आपको छोड़ने गया था,आपको ये सब शायद याद नहीं। तब आपको वहां से पालम जाना था. जमकर लिखिए,जो महसूस करते हैं वो लिखिए और जिंदगी जीते हैं,उन पहलुओं पर लिखिए।.

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  7. Dear Matuknath ji please dont mind if I am sounding little harsh. Human being is different from animals and birds becoz they have wisdom. How can you treat Chirai, Kaua aur Mnai (human)at par. this philosophy is ridiculous!

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  8. priya zehar mahoday
    naam ki talaash chal rahi hai. abhi hum ekdam naye hain. computer hi kal tak nahi jante the, blog ki to baat hi kya. kai kamiyaan hain abhi. aap sab mitra janon se sikhkar door karoonga.aabhar

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  9. sagarji,
    aabhar. wo baaten kaun si hain ? chhote se lekh me kai baaten rah jati hain. main janta hoon

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  10. aasishji
    samay dene ke liye kritagya hoon. jab samay ho comment bhi deen.

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  11. dhanyawad naradji, agar aisa hai to aapki takniki madad se ise aur behtar karoonga. ise apne blog se jodenge to khushi hogi.

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  12. rajivji
    kuch harsh nahi tha. vichar ke liye hi to hum sab ektra hain. aapki baat ka pura jawab dene ke liye ek post jald likhoonga. aapki bat sahi hai per mere bhav ko pura nahi samjha gaya. ish baat ke kai aur pahloo hain. jald hi blog per milenge. aabhar.

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  13. मटुकजी, जूली जी,
    मैं आपका प्रशंसक हूं। गुरु-शिष्या के ऐसे कई जोड़ों के बारे में हममें से कई लोग जानते हैं। पर वे सब कमरे से बाहर निकलकर सच्चाई स्वीकारने में डर जाते हैं। मैंने टीवी पर कई बहसों में आपको देखा। आपका साहस और जवाबदेही अद्भुत रहे। मैं भी ओशो का प्रशंसक हूं। ब्लाग से संबंधित कोई तकनीकी जानकारी आपको चाहिए हो, और मुझे भी उसकी जानकारी हो तो आपकी मदद ज़रुर करना चाहूंगा। ज़रुरी हुआ तो आपसे भी मदद लूंगां
    शुभकामनाओं सहित
    www.samwaadghar.blogspot.com

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  14. matuk ji ka andaj gajb hai...juli ki to bat hee aur...

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