बुधवार, अक्तूबर 07, 2009

शर्मसार !

भोलाराम एक भ्रमणशील भावुक जीव है. कल वह मगध विश्वविद्यालय के एक हिन्दी प्रोफेसर के घर चला गया था. चर्चा मेरे बारे में भी छिड गयी. उन्होंने कहा- ‘जो हो, मटुकजी के कारण हिन्दी प्रोफेसरों को शर्मसार होना पड़ा है.’’ उनकी यह बात भोलाराम की समझ में न आयी. मुझसे इस टिप्पणी पर प्रकाश डालने को कहा है.
मटुकः- अनुभव की कमी के कारण उन्होंने ऐसा कहा होगा, भोलाराम. दरअसल हिन्दी ही नहीं, सभी विषयों के प्रोफेसरों को शर्मसार होना पड़ा है. मैंने इतिहास की एक नेताइन प्रोफेसर को सार्वजनिक रूप से शर्मसार होने की घोषणा करते हुए सुना है. सभी विषय ही नहीं, सभी विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों को शर्मसार होना पड़ा है. केवल प्रोफेसर ही नहीं, पटना निवासी शर्मसार हुए हैं, क्योंकि टीवी पर ‘पटना के प्रोफेसर मटुकनाथ’ में पटना का नाम बार-बार लिया गया है. पटने तक बात सीमित रहती तो गनीमत थी. पूरे बिहार के शर्मसार होने की बात हुई है. घटना के कुछ ही समय के बाद एक आदमी के घर मैं गया था. औरतों में मुझे देखने की बड़ी उत्सुकता रहती है. लुक-छिप कर कई महिलाओं ने मुझे देखा. कुछ करीब भी आयीं. उनमें से एक प्रौढ़ा ने मुझसे कहा- ‘पहले मैं बिहार से बाहर जाती थी तो लालू के कारण शर्मसार होना पड़ता था, अब आपके कारण होना पड़ता है.’ इसलिए शर्मसार के दायरे को छोटा मत समझो, पूरा बिहार शर्मसार हुआ है. लेकिन इतने भर बात रहती तो भी विशेष चिंता की बात नहीं थी. पूरा भारत और पूर्वी सभ्यता शर्मसार हुई है. मुझे भारत के अनेक लोगों ने पश्चिमी सभ्यता के प्रदूषण का प्रचारक कहा है. इधर के रहने वाले लोग जो पश्चिम में जाकर बस गये हैं और वहाँ के रंग में रँग गये हैं, लेकिन पूजा के लिए गंगाजल लेने के लिए भारत आते हैं, मेरा अनुमान है कि वे भी शर्मसार हुए होंगे. अगर कभी किसी अन्य ग्रह पर मनुष्य जैसे प्राणी का पता चला और उनसे सम्पर्क स्थापित हुआ तो भी मेरे कारण पूरे प्लैनेट (पृथ्वी) को शर्मसार होना पड़ेगा. जब पृथ्वी के आदमी उनसे हाथ मिलायेंगे तो इनके ठंडे हाथों को देखकर वे पूछेंगे - हाथ मिलाते हुए तुम लज्जित क्यों हो रहे हो ? तो ये जवाब देंगे- क्षमा करना मित्र, मेरे ग्रह पर मटुकनाथ नामक जीव रहता है, जिसका स्मरण आते ही मैं शर्मसार हो जाता हूँ !
भोलारामः- आप अति पर चले जाते हैं सर. पूरी दुनिया क्यों शर्मसार होगी, भारत तक जरूर आपकी चर्चा है. दूसरे देश के लोग अगर जानेंगे कि आप पर कुछ लोग शर्मसार हो रहे हैं तो हँस देंगे और उन्हें भारत के अविकसित होने का कारण पता चल जायेगा. जिस देश का आदमी काम-कुंठा में इतना समय देगा, उनको आविष्कार और अनुसंधान के लिए समय कब मिलेगा ? अभी आपने शर्मसार लोगों की विस्तृत संख्या के बारे में बताया. असल में, मैं जानना चाहता हूँ कि ऐसे शर्मसार लोगों की मानसिकता क्या होती है? वे क्यों ऐसा सोचते हैं ? अगर शर्मसार होने वाला काम आपने किया है, तो ग्लानि से गड़ कर मर जाना चाहिए आपको. आपके भीतर शर्म का लेश नहीं है. इसके विपरीत गर्व और आनंद के अनुभव में मगन रहते हैं. और दूसरे लोग परेशान हैं. बात क्या है ?
मटुकः- मनुष्य एक मुखौटा पहनकर जीता है. मुखौटा कभी-कभी धारण करना पड़े तो अपने असली चेहरे का ख्याल बना रहता है. लेकिन जिसे दिन-रात मुखौटा धारण करना पड़ता है, वह अपना चेहरा भूल जाता है. मुखौटे को ही चेहरा मान लेता है. हमारे आस-पास के मनुष्य की स्थिति करीब-करीब इसी तरह हो गयी है. मुखौटा यह है कि मैं एक अच्छा आदमी हूँ. दूसरा बुरा है. तुम ध्यान देना प्रायः हर आदमी अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है. ऐसा ही सुनना उसे प्रिय लगता है. कभी-कभी ऊपरी मन से, किसी स्वार्थवश किसी की तारीफ करनी पड़ती है. अगर किसी से कोई स्वार्थ न सधता हो, तो क्यों किसी की प्रशंसा करेगा ? दूसरों की प्रशंसा सुनना काँटों की तरह गड़ता है. और भी बहुत बातें हैं. लेकिन तुम बताओ कि तुमने उन्हें कोई जवाब दिया या नहीं ?
भोलारामः- हाँ, दिया न ! मैंने कहा कि आपलोग हिन्दी वाले उनकी प्रतिभा के सामने श्रीहीन हो गये हैं. आपलोग रात-दिन नाम के लिए लिखते रहते हैं, लेकिन नाम न हो सका और उन्हें सारा देश जान गया है. बिहार का तो बच्चा-बच्चा जानता है. इसे आप लोग पचा नहीं पा रहे हैं.
मटुकः इस पर वे क्या बोले..?
भोलारामः- यही कहा कि ‘‘बुराई तुरत फैलती है. बुरे आदमी का नाम रातेां-रात हो जाता है. कसाब को देखिये, कौन-सी प्रतिभा है, लेकिन दुनिया में नाम हो गया. महात्मा गाँधी बनने में जीवन लग जाता है, लेकिन एक मिनट में कोई गोडसे बनकर कुख्यात हो जाता है. नाम होने में समय लगता है, बदनाम होने में कोई समय नहीं लगता.’’ उनके इस जवाब पर आपकी राय जानना चाहूँगा, सर ?
मटुकः- मैं उनसे सहमत हूँ, भोलाराम. लेकिन इसके पीछे कुछ और बाते हैं, जिन पर नफरत के परदे के कारण ध्यान नहीं जाता है. कसाब और गोडसे को उन्होंने अपने से बहुत ही तुच्छ प्राणी समझ लिया होगा. कसाब की बुद्धि और साहस के बारे में कभी सोचा ? महज दस आदमी समुद्र के सारे प्रहरियों की आँखों में धूल झोंकर, कुछ लोगों को मौत के घाट उतारकर एक अरब की आबादी वाले भारत की नाक मुंबई में घुसकर पूरे देश को थर्रा देते हैं. उस आदमी ने अपनी जान को हथेली में ले लिया है. हिन्दी के इन तथाकथित अच्छे प्रोफेसरों से पूछो कि आप लोगों में क्या एक भी ऐसे हैं जिन्होंने अपने मिशन को पूरा करने के लिए जान को हथेली पर ले लिया है ? अगर नहीं हैं, तो कृपया कसाब से अपने को अच्छा कहना बंद कीजिये. कसाब अगर बुरा है, तो आप उससे हजार गुना बुरे हैं. पैसे के पीछे पागल आप जैसे लेाग ही पैसा लेकर कसाब को देश में घुसने देते हैं. आप जैसे लोग ही हैं, जो पैसे के लिए देश को बेच दे सकते हैं. जिनको जहाँ मौका लग रहा है, बेच ही रहे हैं. नाम जुनून से होता है भोलाराम; सर पर कफन बाँधकर चलने से होता है. ये दोनों बातें कसाब और गोडसे से ये ‘अच्छे लोग’ सीख लिये होते तो देश की ऐसी दुर्दशा नहीं होती. ये तो प्रेम भी करते हैं तो चोरकट वाला. कोई देख न ले, कोई जान न ले ! मुखौटा !!
जिस दिन जान अंदर से निकल कर हथेली पर आ जाती है, उसी दिन नाम हो जाता है. नाम अच्छे अर्थों में हुआ है या बुरे अर्थों में , यह उसके उद्देश्य पर निर्भर करता है. कसाब और गोडसे का उद्देश्य हत्या करना है, ध्वंस है. इसलिए वे बदनाम हुए. मेरा उद्देश्य इसके ठीक विपरीत प्रेम और निर्माण है. अब जो लोग प्रेम से घृणा करते हैं, उनके लिए मैं कुख्यात हूँ. जो प्रेम से प्रेम करते हैं, उनके लिए मैं सुविख्यात हूँ. असल में ‘सु’ और ‘कु’ प्रयोक्ता के बारे में बताता है. मेरे बारे में नहीं. मेरे बारे में तो इतना ही है कि मैं प्रेम दीवाना हूँ. प्रेम के सामने मुझे किसी चीज की चाह नहीं है. प्रेम के लिए धन गँवाना पड़ता है, तो राजी हूँ. प्रेम के लिए बदनामी मिलती है, तो स्वागत है. और इन लोगेां ने अच्छा आदमी कहलाने के लिए प्रेम का गला काट दिया है. पैसा के लिए प्रेम को बेच दिया है. ऐसे कायर, चालाक और प्रेमहीन लोग ही शर्मसार हुए हैं भोलाराम ! अच्छे लोग क्यों शर्मसार होंगे ! वैसे आदमी शर्मसार हुए हैं जो परदे के अंदर कुछ कर रहे हैं और मेरी आँधी में उनका कपड़ा उघड़ रहा है. लाख समेटते हैं, फिर भी दिख जाता है, इसलिए वे बुरी तरह चिढ़े हुए हैं. मुझ पर उनका गुस्सा उसी तरह है जैसे कोई नंगा करने वालों पर गुस्साता है.
भोलारामः- ई तो बड़का बात बोल दिये सर. कसाब के बारे में जो नयी दृष्टि दी उससे तो मेरा दिमागे पलट गया. ई प्रोफेसर सब इतने डरगुहा हैं कि हमलोग भी धमसा देते हैं तो तुरत समझौता कर लेते हैं. हमलोग परीक्षा में चोरी कर रहे हैं और ये लोग बैठकर टुकुर-टुकुर ताक रहे हैं. बोलते हैं- ‘जो करना है करो- कौन झंझट में पड़े. हम नौकरी करते हैं, बाल-बच्चा है, दरमाहा से काम है.’ इस मानसिकता के हैं ये प्रोफेसर लोग. और एक आप हैं, मुझे याद है कि मेरे सामने बी.एन.काॅलेज के एक प्रिंसिपल साहब से कहा था- अगर चोरी चलने देनी है, तो मुझे इनविजिलेटर बनाने की जरूरत नहीं है. जिस दिन चोरी रोकने के लिए कमर कसियेगा, उस दिन मेरी याद कीजिएगा. और उस प्राचार्य ने परीक्षा में आपको ड्यूटी नहीं दी. इस पर आपके विरोधी प्रोफेसरों ने कहा- ‘ इन्होंने ड्यूटी से मुक्त होने की अच्छी तरकीब सोच ली.’ वे ड्यूटी करना नहीं चाहते थे. उनका उद्देश्य आपसे विपरीत कर्तव्य से पलायन था और आपका निष्ठापूर्वक सही माने में कर्तव्य का पालन करना था. स्वाभाविक है कि ये विपरीत धर्मा आपको पसंद नहीं करेंगे, और इनकी संख्या कम नहीं है. ये कभी अपने कृत्य पर शर्मसार नहीं हुए हंै, आप पर शर्मसार होते हैं ! कुछ अच्छे प्रोफेसरों ने आपको समझाया -‘सिद्धान्त से काम नहीं चलता है, प्रैक्टिकल बनो’. आपने कहा था- ‘‘मैं चोरी के विरोध में नहीं हूँ. मेरी शर्त इतनी है कि सबको चोरी का समान अधिकार मिले. हम निमँुहे और कमजोर छात्रों का चिट-पुर्जा छीन लेते हैं और दबंगों से दूर-दूर रहते हैं. केवल दिखाने के लिए बोल देते हैं कि जिनके पास चिट-पुर्जा है, दे दो, नहीं तो हम तो कुछ नहीं कहेंगे, मजिस्ट्रेट छोड़ेगा नहीं.
मटुकः- अच्छी याद दिलायी भोलाराम, मैंने तो ऐसे प्रोफेसरों केा देखा है जो नकल कर रहे छात्रों की सुरक्षा में गार्डिंग करते थे. वे गेट पर रहते थे. प्राचार्य या मजिस्ट्रेट आ रहे हों तो झट-से विद्यार्थियों को सावधान कर देते थे. क्षण भर के लिए वे धड़ाधड़ चिट-पुर्जा अंदर घुसाकर मजिस्ट्रेट के निकल जाने का इंतजार करते थे. काॅपी पर आँख गड़ाये रहते थे और झूठो कलम लिखे शब्दों पर ही चलाते थे. हाँ, एक प्रिसिंपल जरूर थे , बीएन काॅलेज में बोस साहब, वे दबंगों से भी चिट ले लेते थे. लेकिन दबंग अगर डट जाय तो वे भी टैक्टफुली हट जाते थे. उस समय मुझे उनका झुकना अच्छा नहीं लगा था. लेकिन इतना तो जरूर था कि खूँखार लड़के भी उनका लिहाज करते थे. कारण सिर्फ एक था, वे किसी छात्र का नुकसान नहीं करते थे.
आज के अहंकारी अधिकारी छात्रों को निष्कासित कर समस्याओं के समाधान की बजाय बढ़ाने में विश्वास करते हैं. विद्यार्थियों से ज्यादा उपद्रवी ये अधिकारी हैं. ये कभी शर्मसार नहीं हुए ! सच है, जो अपने कृत्य पर कभी शर्मसार नहीं होता, वही दूसरों के कृत्यों पर शर्मसार होता है, भोलाराम. तुम काहे को ऐसे-ऐसे प्रोफेसर के घर जाते हो ? एक से एक अच्छे प्रोफेसर भी हैं, उनके घर जाओ, थोड़ा सीखोगे.
भोलारामः हवा-पानी लेने जाते हैं सर. आपके सामने तो कोई कुछ बोलता नहीं. आपके प्रति कौन क्या भाव रखता है, यह आपको कैसे मालूम होगा ?
मटुक- नहीं भोलाराम, इस उद्देश्य से किसी के पास मत जाओ. क्या महात्मा गाँधी के निंदक नहीं थे या नहीं हैं ? अरे उनसे ऐसे घृणा करने वाले लोग भी थे कि उन्हें जिन्दा तक नहीं छोड़ा. मैंने अनेक लोगों के मुँह से सुना है - गाँधी ने भारत को बरबाद कर दिया है. इसलिए जो तुम्हें करना है, वह करते जाओ. ऐसे लोगोें के पास जाकर अपना समय नष्ट नहीं करो. सुनो, कबीरदास क्या कह रहे हैं-
हस्ती चढ़िए ग्यान कौ सहज दुलीचा डारि ।
स्वान-रुप संसार है, भूँकन दे झक मारि ।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. आदरनीय सर --- आप के कारण हिन्दी प्रोफेसरों को भले ही शर्मसार होना पड़ा है.---- पर हमे तो आप पर गर्व है।

    आपने सही उदाहरण दिया है।

    हस्ती चढ़िए ग्यान कौ सहज दुलीचा डारि ।
    स्वान-रुप संसार है, भूँकन दे झक मारि ।।

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  2. हा । हा। हा। हा । हा। हा। हा । हा। हा। हा । हा। हा।
    भाई मज़ा आ गया। छोटा-मोटा तर्क करके आनंद नहीं खोना चाहता।
    हा । हा। हा। हा । हा। हा। हा । हा। हा। हा । हा। हा।

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  3. भोलानाथ नाम का ही भोला है,आपसे सब कुछ उगलवा लेता है,
    बहुत अच्छा पात्र खोजे है,बधाई हो-मुखौटा लगाने वाले लोग अपनी परछांई से भी डरते हैं,सामना करने की हिम्मत नही होती,जो कुछ है सामने आना चाहिए,आपको पुनश्च शुभकामनाऐं कभी विस्तार से चर्चा होगी,

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  4. "मुखौटा कभी-कभी धारण करना पड़े तो अपने असली चेहरे का ख्याल बना रहता है. लेकिन जिसे दिन-रात मुखौटा धारण करना पड़ता है, वह अपना चेहरा भूल जाता है. मुखौटे को ही चेहरा मान लेता है"
    बहुत सुन्दर और एकदम सच लिखा है

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  5. प्रिय मटुकजूली जी
    हो सके तो कृप्या वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें

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  6. प्रिय ललित भाई
    आपकी टिप्पणी पढ़कर गद्गद् हुआ. ‘मुखौटा लगाने वाले लोग अपनी परछाई से भी डरते हैं.’ क्या कमाल कहा आपने ! आपने जो सुन्दर कार्य अपने लिए चुना है, वह हमें आकृष्ट करता है. छत्तीसगढ़ के जगद्लपुर एक बार हम गये हैं. फिर जाने का मौका आया तो आपसे मिलकर बड़ी खुशी होगी. आपके कार्याें को देख प्रेरणा मिलेगी.

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  7. अजी जनाब
    एक दर्जन हँसी ऊपर और एक दर्जन नीचे
    दोनों के बीच बहता आनंद का दरिया
    भई, बेमिसाल, अनुपम, आनंददायी. हा, हा, हा हा..........

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  8. प्यारे स्वामी अंतर सोहिलजी !
    आपने अपने प्रोफाइल में लिखा है कि टिप्पणी करने में आपके भीतर द्वन्द्व छिड़ जाता है, तभी तो आप इतनी अच्छी टिप्पणी कर लेते हैं. पूरे लेख से एक सार वाक्य चुन लेना मामूली बात नहीं है. आपकी पहचान की क्षमता का प्रतीक है.

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