शनिवार, अक्तूबर 10, 2009

पीसू इंडिया न्यूज पोर्टल ( www.pisuindia.com) के द्वारा लिया गया साक्षात्कार

प्रिय राकेशजी

अभी-अभी आपकी प्रश्नावली मिली. मैं अपेक्षा कर रहा था कि आप कुछ नये प्रकार के प्रश्न करेंगे. युवावर्गों की कुछ ऐसी समस्याएँ रखेंगे जिनका दैनंदिन जीवन में उन्हें सामना करना पड़ता है. लेकिन ये वही प्रश्न हैं जिनके जवाब हम लंबे समय से देते आ रहे हैं और अब ऊब चुके हैं. इसलिए सहसा मन में आया, इसे छोड़ दूँ और नये प्रश्नों की माँग करूँ ! मगर इससे आपको निराशा हाथ लग सकती थी और यह मेरे लिए असह्य होता. इसलिए जवाब दे रहा हूँ.

1. आपकी और जूली की मुलाकात कैसे हुई थी ? सर्वप्रथम प्यार का इजहार किस तरफ से हुआ ?
मेरी और जूली की मुलाकात बीएन काॅलेज में क्लास में हुई. यह क्लास करने में नियमित नहीं थी. कभी आती थी, कभी नहीं. प्रथम मुलाकात मंें हम दोनों के मन के किसी कोने में यह भाव नहीं था कि कभी हम दोनों प्यार कर सकते हैं. यह अगर प्रतिदिन क्लास आती और परस्पर एक-दूसरे को जानने का मौका मिलता तो शायद जो बाद में घटा वह पहले भी घट सकता था. क्लास नियमित न आने से इन पर मेरा कोई ध्यान नहीं था और न यह मुझे पसंद करती थी.
बीए पार्ट-1 के बाद जब यह नियम से क्लास आने लगी तब पढ़ाई के क्रम में यह मेरे नवीन, बेबाक, ईमानदार, सहज, साहसी विचार और व्यवहार से प्रभावित हुई. मैं इसकी तेजस्विता, सूझ-बूझ, संवेदनशीलता और साहित्य की अचूक समझ से प्रभावित हुआ. हमलोग विचारों का आदान-प्रदान करने लगे. हमारा प्यार विचारों पर सवार होकर आया. धीरे-धीरे हमलोग एक-दूसरे के निजी जीवन की जिज्ञासाएँ करने लगे. ज्यों-ज्यों एक-दूसरे को जानते गये , त्यों-त्यों स्पष्ट होता गया कि हमलोग एक-दूजे के लिए बने हैं और एक दिन जूली ने अचानक प्यार का इजहार कर दिया.
2. जूली के घरवालों की क्या प्रतिक्रिया थी ?
जूली के घरवालों को बहुत दिनों के बाद मालूम हुआ, क्योंकि वे पटने से तीन सौ किलोमीटर दूर एक कस्बे में रहते थे. उन्हें मेरी पत्नी और उनके सहयोगियों की तरफ से जानकारी दी गयी. उनके घरवालों के फूटते आक्रेाश को वे लोग चतुराई से भुनाना चाहते थे. उन लोगों ने जूली को मुझसे अलग करने के लिए अनेक प्रकार की बुद्धिमत्तापूर्ण साजिशें रचीं. लेकिन शायद परमात्मा हमारे पक्ष में था. इसलिए उन्हें विफलता हाथ लगी.
3. क्या आप अपनी पहली पत्नी से खुश नहीं थे, ऐसी क्या वजह थी कि आपने जूली को अपनाया ?
पत्नी और मुझमें तालमेल नहीं था. लेकिन जब हमलोग विवाहित हो ही चुके थे, तो एक समझौता के साथ सामान्य सुखी दाम्पत्य जीवन शायद जी सकते थे. लेकिन पत्नी के मैके वालों के निरंतर मूढ़तापूर्ण हस्तक्षेप ने हमलोगों को मिलने और समझौते के साथ जीने नहीं दिया. उनकी एक ही शर्त थी कि मेरा कहीं प्रेम न हो, चाहे पत्नी से प्रेम न भी हो तो चलेगा. यह मेरे लिए घुटन भरा था. प्रेम-प्यासी मेरी आत्मा चीत्कार कर उठी थी. किसी भी कीमत पर गुलामी मुझे सह्य नहीं थी. आजादी की साँस लेते हुए जिनके साथ समानता और समझदारी के साथ सुन्दर जीवन जी सकूँ, ऐसी स्त्री की तलाश थी. दैवयोग से अंधेरे जीवन में रोशनी बनकर जूली आ गयी. अपने कदम को न्यायोचित ठहराने केे लिए पत्नी की किसी कमी को उघाड़ने में मेरी दिलचस्पी जरा भी नहीं है. कमियाँ दोनों में रही होंगी. कमियाँ मनुष्य में होती ही हैं.
4. क्या आपकेा नहीं लगता है कि ऐसा करके आपने कुछ गलत किया है ?
कुछ कारणवश समाज ने वासना और प्रेम के प्रति गलत दृष्टि अपना ली है. और वही गलत दृष्टि एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को संक्रमित करती आ रही है. गलत धारणा एक अच्छे संस्कार के रूप में सबके भीतर बैठा दी जाती है. फलतः दमित लोग प्रकृति के इस अद्भुत रहस्यमय वरदान से वंचित रह जाते हैं. विरले किसी की दृष्टि खुलती है और वह सचाई को देख लेता है. उन्हें ताकत भी सचाई से ही प्राप्त हो जाती है. फिर इसका अर्थ नहीं रह जाता कि वह अकेला है या उसके साथ भीड़ है. झूठ को और गलत को भीड़ की जरूरत पड़ती है. सोचिये, कोई आदमी कार से जा रहा है और ईंट-पत्थर से आप उसकी कार नहीं तोड़ेंगे, किसी साइकिल वाले की हवा नहीं निकालेंगे. लेकिन ज्योंही भीड़ के द्वारा रोड जाम की घोषणा होती है, सारे गलत काम का लायसेंस आपको मिल जाता है. उस समय आपको नहीं लगता कि गलत कर रहे हैं. जब अकेला व्यक्ति सारे अंधकार से लड़ने के लिए तैयार हो जाय तो समझिये कुछ बात जरूर है. किसी अन्य स्रोत से उन्हें ताकत जरूर मिल रही है. हम दोनों अकेले लड़ रहे हैं , क्योंकि हमें पता है कि जीवन में पहली बार हमलोगों के द्वारा सबसे सही और सबसे जरूरी काम हो रहा है.
5. आपकी शादी के विरोध में छात्रों ने हंगामा किया था, खासकर पटना में क्यों ? क्या प्रतिक्रिया देना चाहेंगे ?
हमलोगों ने शादी नहीं की है. सिर्फ प्रेम किया है और इससे बड़ा कुछ होता नहीं है जिसे किया जा सके.
अनेक प्रकार की प्रताड़नाओं के बाद 7 जुलाई, 2006 को एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत हम पर हमला किया गया था. उसके कई पहलू थे- मुझे पीटना और जूली को मारकर विकलांग करना या भीड़ में जीवन का पत्ता साफ कर देना ताकि जिम्मेदारी भीड़ पर चली जाय. दूसरा पहलू था सारे मीडियाकर्मियों को इकट्ठा कर पूरे देश-दुनिया में मेरे भ्रष्टाचार को उजागर करना, ताकि हमलोग कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रह जायँ. तीसरा जेल भेजवाना और चैथा था नौकरी से निकलवाना. जेल जाना बाकी है, बाकी सब बीध पूरा हो गया है.
कुछ छात्रों का उपयोग पटना विश्वविद्यालय के कुछ शातिर प्रोफेसरों ने मेरे खिलाफ किया था. लेकिन 10-5 बरगलाये गये विद्यार्थियों को छोड़ विशाल छात्र-समुदाय मेरे पक्ष में था. 11 जुलाई, 2006 को विद्यार्थियों ने बी. एन. काॅलेज कैम्पस में स्वतः-स्फूर्त भावावेश में आकर मेरा भव्य स्वागत किया था. मेरे शानदार स्वागत को सहन करने में असमर्थ ईष्र्याग्नि में जलते हुए एक-दो शिक्षक नेताओं और प्राचार्य ने मुझे निलंबित करवा दिया. मेरे निलंबन के बाद मेरे समर्थन में विद्यार्थियों की जो भीड़ उमड़ी, वह ऐतिहासिक थी. जे.पी. आंदोलन के बाद संभवतः वह सबसे बड़ा जुलूस था. छात्रों का विशाल समुदाय उस समय भी मेरे साथ था और आज भी है. लेकिन मैं अपने हित में उनका इस्तेमाल नहीं करना चाहता.
6. आप प्यार को किस तरह परिभाषित करते हैं ? क्या आपके संबंध को प्यार का दर्जा देना चाहिए, क्यों ?
जब दूसरे के लिए जीने में आनंद आने लगे. दूसरा अपना जैसा लगने लगे. उसके सुख में सुख और दुख में दुख का अनुभव होने लगे, तो समझिये प्यार हो गया. यही संबंध जब और गहराई में उतरता है तो प्रेमी मिट जाता है, प्रिय ही बचता है. प्रेम में दो नहीं रहते. इसी को कबीर ने कहा है- ‘प्रेम गली अति साँकरी तामें दो न समाय’.
जनसाधारण में इसका गलत अर्थ प्रचलित है. वहाँ इसका अर्थ है कि एक आदमी से दो आदमी प्यार नहीं कर सकता. जैसे एक म्यान में देा तलवारें नहीं रह सकतीं. एक आदमी एक को ही प्यार कर सकता है. लेकिन यहाँ तो सँकरी प्रेम गली की बात है. एक आदमी एक से भी प्रेम करेंगे, तब भी तो दो रहेंगे न ? लेकिन प्रेम में दो रहता ही नहीं. वे देा हों या दो हजार या दो अरब सब मिलकर एक हो जायँ तो प्यार है. ऐसी घटना तभी घटती है जब प्यार करनेवाला खो जाय. वही मिटेगा तभी कोई नहीं बचेगा - एक रह जायेगा. यह प्रेम की असाधारण अवस्था है और साधारण प्रेम ही इस असाधारण अवस्था में पहँुचाने में समर्थ है. जो मूढ़ साधारण प्रेम की निंदा करता है, वह कभी भी असाधारण प्रेम की ओर प्रयाण नहीं कर पायेगा.
जो व्यक्ति जिस स्तर का होता है, उसी स्तर से हमारे प्रेम को देखता है. किसी के पास देखने का इसके अलावा सामान्यतः कोई रास्ता भी नहीं होता. कोई भी आदमी मेरे प्यार को वही दर्जा देगा जिस दर्जे का आदमी वह है.
हमें व्यक्तिगत तौर पर किसी से कोई दर्जा नहीं लेना है, क्योंकि यह बेवकूफी से भरी बात है. हमारे स्वभाव और जीवन से अनभिज्ञ दूसरा हमारा निर्णायक कैसे हो सकता है ? असली बात यह है कि हम उत्तरोतर अपने प्रेम को गहराई प्रदान करें और हम अपने अहंकार केा मिटायें तो प्रेम का असली स्वाद चखेंगे.
7. जूली को कभी ऐसा महसूस नहीं होता होगा कि आपके साथ शादी करके उसने कुछ गलत किया है ? शायद वो किसी और से शादी करती तो आपसे कहीं ज्यादा स्मार्ट जीवनसाथी मिल सकता था.
जूली नासमझ नहीं है कि बिना विचारे कुछ कर ले और बाद में पछताये. पछताता वह है जो फूल समझकर किसी तरफ लपके और उन्हें काँटा मिल जाय. जिनके प्रेम का आरंभ ही काँटों पर चलने से हुआ हो, उनके जीवन में आगे फूल ही फूल हैं.
समाज में अंधों की भरमार है. बिना विवेक जगाये प्रेम करने चल पड़ते हैं और बाद में सोचते हैं कि गलती हो गयी. जूली अपने मन मुताबिक जीवन जी रही है. जो आज ठीक से जी रही है, वही कल भी ठीक से जीयेगी. सही जीवन का नियम है कि हम साथ चलें, परस्पर सहयोग करें लेकिन पराधीनता को न ओढ़ें. स्वतंत्रता परम सुख है. पराधीनता दुख है. जीवन को गणित समझने वाले लोग जीवन जी नहीं पाते. लाभ-हानि का बही-खाता लेकर चलने वाले लोग प्रेम नहीं कर पाते. प्रेम एक रिस्क है. प्रेम एक दुस्साहस है. ‘चढ़ै तो चाखै प्रेम रस गिरै तो चकनाचूर’. चकनाचूर होने के डर से हर कोई प्रेम-पर्वत पर चढ़ नहीं पाता. इसीलिए सभी आदमी प्रेम नहीं कर पाते. नून तेल लकड़ी वाले सामान्य, मरियल और उबाऊ वैवाहिक जीवन व्यतीत करते हैं. यहाँ यह बता दूँ कि मैं मरियल वैवाहिक जीवन का विरोधी नहीं हूँ. आदमी की स्वतंत्रता है, जो जिस तरह जीना चाहे जीये. किसी को ध्यान इतना ही रखना है कि उसके जीने से दूसरे का जीना हराम न हो.
शारीरिक सौष्ठव और स्मार्टनेस सबको भाता है. देह बड़ी सुंदर और आकर्षक होती है, लेकिन उससे भी अधिक सुंदर मन होता है और सबसे गहरा सौन्दर्य हृदय का होता है. ये सौन्दर्य के तीन सोपान हैं. जो पहली सीढ़ी पर अटका है , वह केवल बाहरी सौन्दर्य को देख पायेगा जो क्षणिक है. हृदय सौन्दर्य का सागर है. आपको एक उदाहरण देता हूँ. मदर टेरेसा के चेहरे पर कितनी झुर्रियाँ हैं ! लेकिन मुझे वह अपूर्व सुन्दर मालूम पड़ती है. लता मंगेशकर के चेहरे को स्क्रीन पर बारीकी से अगर देखा होगा तो अनेक गड्ढे हैं. लेकिन मुझे उससे अधिक सुंदर स्त्री दिखती ही नहीं. वह ऐसा शानदार सौन्दर्य है जिसके चरणों पर लोट-पोट हो जाने में आनंद है. जूली को भी भगवान ने ऐसी ही आँख दी है. इसलिए मेरे सौन्दर्य के आगे सारे स्मार्ट लड़के उन्हें फीके मालूम पड़ते हैं. काश, स्मार्ट लड़के इस बात को समझ पाते ! और स्मार्ट लड़की इस रहस्य को जान पाती !
8. जब आप और जूली घर से बाहर निकलते हैं, तो लोगों की क्या प्रतिक्रिया होती हैै ? कैसा महसूस होता है ?
जब जूली और मैं बाहर निकलता हूँ तो अनेक बार अच्छी प्रतिक्रिया होती है. विरोधी तो भरे पड़े हैं. लेकिन वे टकराते नहंीं हैं. क्या लेना-देना ? कुतूहल से लोग खुद देखते और दिखाते हैं. कानाफूसी करते हैं, मुस्कुराते हैं और आगे बढ़ जाते हैं. अच्छे भाव वाले लोग प्रेम से मिलते हैं, सहानुभूति जताते हैं. मदद करने की इच्छा व्यक्त करते हैं. पता का आदान-प्रदान करते हैं. कुछ लोलुप लोग जूली को देखकर लाड़ टपकाते हैं. एक बार हमलोग मोटरसाइकिल से कहीं जा रहे थे. डाकबंगला चैराहे पर गाड़ी रुकी. उधर से दो लफंगे भी मोटरसाइकिल से गुजर रहे थे. एक ने जूली की तरफ देखने का दूसरे को इशारा किया. दूसरे की आवाज सुनाई पड़ी- तब न ई बुढ़वा पगलैल है ! सड़क पर कभी-कभी मंदबुद्धि के भी कुछ युवा मिलते हैं. वे कुछ ज्यादा नहीं बोल पाते. मेरे कुछ आगे निकल जाने पर जोर से ‘मटुकनाथ’ बोल देंगे, ही-ही करेंगे. कभी-कभी ऐसे लोगों पर बहुत गुस्सा आता है. क्षण भर के लिए मन में आता है कि उठा के पटक दूँ और लगाऊँ जोर से घूँसा. पर दूसरे ही क्षण वह भाव विलीन हो जाता है. उन बेचारों की दीनता सामने आती है. दया उमड़ने लगती है. कभी-कभी यह भी भाव होता है कि कितनों से लड़ोगे मटुक, अनदेखी-अनसुनी करो और आगे बढ़ो. भारतीय नारियों को जैसे सड़कों पर उचक्कों-लफंगों को झेलना पड़ता है, कुछ ऐसा ही मुझे झेलना पड़ता है. ऐसा न होता तो अनुभवात्मक स्तर पर नारी की पीड़ा मैं नहीं समझ पाता.
प्रेम इस अर्थ में साधना है कि हम सबके दुर्भाव का सामना करें, लेकिन उनके प्रति मन में दुर्भावना नहीं आने दें. जितना हम ऐसा कर पाने में समर्थ हो रहे हैं, उतनी ही हमारी चेतना निखर रही है. इसलिए किसी के प्रति हमारे मन में प्रतिशोध का भाव नहीं है. ये पंक्तियाँ हमें याद आती हंै-
दुनिया के रंज सहना और कुछ न मुँह से कहना
सच्चाइयों के बल पर आगे को बढ़ते रहना

9. अच्छा ये बताइये कि आज के युवा कैसा प्यार करते हैं ? तन का या फिर मन का ?
तन और मन का विभाजन गलत है, क्योंकि दोनों दो चीजें नहीं हैं. एक को छोड़कर दूसरे का कोई अस्तित्व ही नहीं होता. दोनों के मिलन से मनुष्य की सत्ता बनती है. आप इस तरह से समझें कि यह जो शरीर है, वह मन का ही स्थूल रूप है, क्योंकि शरीर के पोर-पोर में मन समाया हुआ है और जो मन है वह शरीर का ही सूक्ष्म रूप है. शरीर का सूक्ष्म रूप मन है और मन का स्थूल रूप शरीर.
अगर कोई किसी विवशता में केवल मानसिक प्रेम करेगा तो वह प्रेम पिलपिला होगा. अगर कहीं शरीर ही मिले, मन न मिले तो वह बलात्कार होगा, प्यार नहीं. प्यार मन और शरीर दोनों के मिलने से होता है.
एक प्यार और होता है, जो शरीर और मन से होते हुए ऊपर उठ जाता है. हृदय का या आत्मा का जब पट खुलता है तो उस प्यार का कहना क्या ! चैबीसों घंटे मदिरापान है वह. कबीर, मीरा, चैतन्य, नारद आदि तमाम संतों का प्रेम इसी श्रेणी का है. प्यार अपनी सार्थकता को इसी स्थान पर पहुँच कर प्राप्त करता है. इसके पहले प्यार विषण्ण और दुखी होने को बाध्य है. निश्चय ही उसमें आनंद रहेगा, लेकिन पीड़ा भी रहेगी.
10. हमारा समाज प्यार करने वाले जोड़े के खिलाफ क्यों रहता है?
क्योंकि प्यार के बारे में उसकी समझ गलत है. यद्यपि मैं कहना चाहूँगा कि पूर्णतः गलत भी नहीं है. आंशिक रूप से सही भी है. कारण यह है कि प्यार बहुत खतरनाक चीज है. नासमझ आदमी के हाथों में पड़कर प्यार बहुत बड़ा विध्वंस ले आता है. आप प्यार को परमाणु ऊर्जा समझिये जिससे परमाणु बम बनाकर विनाश किया जा सकता है और जिससे बिजली उत्पादित कर निर्माण भी किया जा सकता है. प्यार के बिना जीवन का निर्माण संभव नहीं है. प्रेम और वासना में गहरा रिश्ता है. इन दोनों के रिश्ते को समझ कर प्रेम को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए. लेकिन अज्ञानतावश समाज इसे समझने की कोशिश नहीं करता, सिर्फ इससे भागता है. समाज साँप से भागता है और साँप को मारता है. ज्ञानी लोग उसे पालते हैं और उसके जहर से दवा बनाकर अमृत का काम लेते हैं. यही हाल प्यार का है, वह जहर भी है और अमृत भी. आपके ज्ञान पर निर्भर करता है कि आप उसका कौन-सा हिस्सा ले पाते हैं. दुनिया की सभी वस्तुओं के दुहरे उपयोग हैं. सब आप पर निर्भर है. साँप बाहर रहता है, कभी आपकी मुलाकात हो सकती है, कभी नहीं भी. लेकिन वासना की साँपिन आपके अंदर पैदा होती है. उससे तो भागने का उपाय ही नहीं. उसे जानना ही होगा. बिना जाने मुक्ति नहीं. और समाज भाग रहा है. कोई माता-पिता अपने बच्चों से सेक्स की बात नहीं करता है. विडंबना यह है कि वह बच्चा सेक्स-कर्म की ही देन है. युवावर्ग को इस तरह का स्वस्थ ज्ञान फैलाने का दायित्व अपने ऊपर लेना होगा, तभी समाज बदल सकता है.
11 पिसु इंडिया के माध्यम से युवा-वर्ग को क्या कहना चाहेंगे?
पिसु इंडिया के माध्यम से मैं युवा-वर्ग को निम्नलिखित बातें कहना चाहूँगा-
. दूसरों के जीवन में दिलचस्पी लेने से अपने जीवन की समस्या हल नहीं होती. इसके लिए अपने जीवन को गहराई से देखना पड़ता है. जो अपने जीवन की गहराई में जितना प्रवेश करेंगे, वे उतना ही उसे देख पाने में सक्षम होंगे. देखने मात्र से समस्या हल होती है, अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता है.
युवा वर्ग किसी का अनुकरण न करे, अपने मूल स्वभाव को पहचाने और उसे विकसित करने का रास्ता ढूँढे़़. जो अपने भूल स्वभाव को पहचान लेगा, वही दूसरों के जीवन से सीख ले पायेगा. वरना वह भटक जायेगा.
ग. युवा वर्ग की सामान्य समस्या प्रेम है. लड़के प्रेम के लिए तड़पते हैं, लेकिन लड़कियाँ नहीं मिलतीं. लड़कियाँ अपने जीवन को अधिकाधिक सुरक्षित रखने के लिए विवाह के भरोसे रहती हैं जो उनके अभिभावकों के माध्यम से उन्हें प्राप्त होते हैं. लड़कियों के साथ समान व्यवहार की जरूरत है. यह जरूरी है कि प्रेम खोजनेवाला प्रत्येक युवा अपने घर की स्त्रियेां को प्रेम की आजादी दे. जो ऐसा करेगा, वह प्यासा नहीं रहेगा. अगर बड़ी संख्या में युवा वर्ग ऐसा करेंगे तो बड़ी संख्या में लोग प्रेम पाने में सफल होंगे. इसके अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है. इक्के-दुक्के लोग तो वर्तमान व्यवस्था में भी प्रेम पा लेते हैं, लेकिन बड़ी संख्या में प्रेम पाने के लिए दकियानूसी विचारों से बाहर आना होगा और अपनी बहनों को प्रेम की आजादी देनी होगी.
. पढ़ाई और प्यार में रार नहीं है. इस तरह से भी प्रेम किया जा सकता है जिससे पढ़ाई में और वृद्धि हो, प्रेम-रस के साथ अध्ययन-रस बढ़े.

मटुकजूली
8.10.09

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह गुरु जी वाह,"बहुत कठिन है डगर पनघट की" अब आपने जेट युग मे रिक्शा पकड़ लिया है,आपकी दलीलें बहुत बढिया हैं-लेकिन प्रेम प्रकटन पर ही समझ आयेंगी। बधाई

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  2. कभी आईना उठा के तेरे रू-ब-रू जो देखा
    मैं तो ये समझ ना पाया, मेरी शक्ल है या तू है
    इतना तो इश्क-ए-यार में खो जाना चाहिये
    तस्वीर-ए-यार खुद में नजर आना चाहिये

    प्रणाम

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  3. मटुक सर प्रणाम ,
    व्यक्तिगत स्वतंत्रता व समाज में व्यवस्था दो अलग अलग पहलु है . अगर किसी एक पे जोर दिया जाये तो दूसरा प्रभावित होता है . आपका कथन सही है की हर व्यक्ति को अपने तरीके से जीने का अधिकार है .पर समाज में लोगो का मानसिक स्तर अभी ऐसी स्वतंत्रता का उचित आनंद लेने योग्य नहीं है . आपने और जूली जी ने अपना पक्ष बहुत मजबूती से रखा है . ऐसा प्रतीत होता है की आपके रिश्ते में बहुत गहराई है . आपका कहना सही है की आपको अपना जीवन अपने हिसाब से जीने का अधिकार है लेकिन यह भी निश्चित जानिए की अगर इस जीने के अधिकार का विस्तार किया गया तो समाज में अव्यवस्था फ़ैल जाएगी . कानून में शादी की उम्र २१ साल रखी है इस उम्र तक व्यक्ति इतना समझदार तो हो जाता है की उसे पता हो की जिसके साथ वो शादी कर रहा है वह उसके योग्य है की नहीं . अगर कोई व्यक्ति स्वतंत्रता का पक्षधर है तो उसे शादी के बंधन में नहीं पड़ना चाहिए . शादी के पहले हर व्यक्ति जानता है शादी एक सामाजिक और क़ानूनी बंधन है . जिसके साथ आप शादी कर रहे है वह भी आपसे यही उम्मीद कर रहा होता है .इस लिए मेरा तो यही कहना है की शादी करने के उपरांत स्वतंत्रता की बात ठीक नहीं है . ऐसा हो सकता है की जिसके साथ आपकी शादी हुई हो उससे आपकी पटरी नहीं बैठ रही है और विना प्रेम के वैवाहिक जीवन में कोई अर्थ नहीं है इसलिए आपका पक्ष भी सही जान पड़ता है . इसलिए मेरा तो मत है की स्वतंत्रवादियो को विवाह करना ही नहीं चाहिए क्योकि प्रेम सिर्फ एक बार थोड़े होता है वह तो जीवनभर होता ही रहता है इसलिए किस किसको छोड़ेंगे .

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  4. annirudhji
    आपके विचार बहुत ही अच्छे हैं. हमारी सहमति है.
    हमारी जिज्ञासा है कि क्या समाज अभी वाकई व्यवस्थित है ? और अगर व्यवस्थित हंै तो क्या आप इससे संतुष्ट हैं ? क्या इसमें परिवर्तन की जरूरत नहीं है ?
    जिन लोगों को इस व्यवस्था से फायदा है वे इसकी रक्षा हर तरह से करना चाहते हैं. जो इस व्यवस्था से शोषित हैं वे इससे अलग हट जायेंगे और शोषण होने नहीं देंगे. शोषण न होने देना अगर अवव्यस्था का फैलना है , तो हम चाहेंगे कि ये खूब फैले.
    जिस दिन हमारी व्यवस्था म स्त्रियों को सही ढंग से जीने का अधिकार मिलेगा, उसी दिन छोड़ने पकड़ने वाली सारी बातें हल हांेगी.

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  5. अनिरुद्धजी , आपकी बातों पर विस्तार से एक पोस्ट लिखने का इरादा है. अभी इतना ही.

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