रविवार, अक्तूबर 18, 2009

महिला संगठन का औचित्य- जूली

महिला संगठन एक अप्राकृतिक घटना है, इसलिए यह कभी सफल नहीं होगा. देश के कोने-कोने में न जाने कितने महिला संगठन हैं, उनसे आज तक कोई बड़ा काम हुआ है ? महिला कोई बड़ा काम तब कर पाती है जब उसके पीछे पुरुष का हाथ होता है और पुरुष भी जीवन में तब सफल होता है जब उसके पीछे महिला का साथ होता है. प्रकृति ने दोनों को अधूरा बनाया है और एक-दूसरे से मिलकर ही दोनों पूरे होते हैं.
प्रकृति ने कुछ खूबियाँ महिलाओं को दी हैं जो पुरुषों को नहीं दी हैं. कुछ खूबियाँ पुरुषों को दी हैं जो महिलाओं को नहीं मिली हैं. महिला शांत और आनंदित तभी होगी जब प्रकृति द्वारा मिले गुणों का विकास करेगी. यही बात पुरुषों के साथ है. स्त्रीत्व और पुरुषत्व अगर आपस में लड़ पड़े तो जीतेगा कोई नहीं. दोनों इस संघर्ष में केवल झुलस कर पस्त हो जायेंगे.
पुरुष और स्त्री में कुछ मूलभूत भेद हैं जिनसे उनके पूरे जीवन में अंतर आता है. आप देखेंगे कि कैसे ये भेद एक को दूसरे से जोड़ने में सहायक हैं. ये भेद ही उन्हें ऋणात्मक और धनात्मक ध्रुवों की तरह एक दूसरे की ओर आकृष्ट करते हैं. अगर ये भेद न होते तो दोनों के रास्ते अलग-अलग होते. पुरुष वीर्यदान करता है, स्त्री उसे ग्रहण करती है. दान और ग्रहण का आनंद दोनों को समान रूप से प्राप्त है. जीवन में अनेक अवसर हैं जो दान और ग्रहण के आनंद से परिपूरित हैं. पुरुष धन अर्जित कर लाता है और स्त्री को दान कर देता है. पुरुष धन देते समय सुख का अनुभव करता है. स्त्री उस धन को ग्रहण कर उसे परिवार के अन्य सदस्यों की सेवा में लगा देती है. अपना तो उसे ध्यान ही नहीं है. उनके सामने तो पति और बच्चे हैं. अपना ख्याल भूलकर ही स्त्री परिवार में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शक्ति हो जाती है. पति उसके अधीन है, बच्चे तो मानो उसी के हैं. परिवार के केन्द्र में माता होती है. मातृत्व स्त्री की सबसे बड़ी ताकत है जिसके सामने पूरा परिवार नतमस्तक है.
स्त्री गर्भ धारण करती है. पुरुष को यह गुण परमात्मा ने नहीं दिया है. गर्भ धारण करने के कारण उसमें स्थिरता है. उसकी रक्षा के लिए प्रकृति ने पुरुष को गतिमान बनाया है. गर्भ धारण करने के कारण प्रकृति ने उसे सहिष्णुता प्रदान की है, पुरुष थोड़ा असहिष्णु होता है. बच्चों के लालन-पालन के लिए प्रकृति ने स्त्री को कोमलता दी है. कोमलता की रक्षा के लिए कठोरता आवश्यक है. इसलिए प्रकृति ने पुरुष को कठोर बनाया है. स्त्री रक्षणीय है और पुरुष रक्षक है. गर्भ धारण करने के समय से लेकर और प्रसव के समय से आगे के कुछ महीनों तक स्त्री को सेवा की जरूरत है. पुरुष उसकी सेवा में तत्पर रहता है. न जाने कितने वर्षाें के बाद सरकार को यह समझ आई कि मातृत्व अवकाश केवल स्त्री को ही नहीं पुरुष को भी चाहिए, क्योंकि दोनों पूरक हैं.
आप देख रहे हैं कि स्थिरता और गत्यात्मकता , सहिष्णुता और असहिष्णुता, कोमलता और कठोरता, रक्षणीयता और रक्षकता आदि गुण कैसे एक दूसरे के पूरक हैं. असहिष्णु पिता बच्चों की बदमाशी से ऊब कर छड़ी उठा लेता है... सहिष्णु माता उन दोनों के बीच आकर खड़ी हो जाती है. बच्चे को कठोरता और कोमलता साथ-साथ मिल जाती है. कठोरता उसे सजग करती है और कोमलता उसकी रक्षा करती है. दोनों चीजें अलग-अलग तरह से सजग भी करती हैं और रक्षा भी करती हैं.
अगर पुरुष अपनी कठोरता का उपयोग स्त्री की सेवा में न कर उसे सताने में करने लग जाए तो परिवार में विप्लव होगा. पुरुष जो रक्षक है, उसका भक्षक हो जाए तो अशांति फैलेगी. पुरुष जो दानी है उसमें कंजूसी कर दे तो अपना ही आनंद खोयेगा. ठीक इसके विपरीत स्त्री अगर अपनी कोमलता और सहिष्णुता छोड़कर रणचंडी हो जाए तो परिवार नष्ट हो जाएगा. पुरुषत्व ग्रहण कर पुरुष को पराजित नहीं किया जा सकता. पुरुषत्व को स्त्रीत्व के द्वारा ही पराजित किया जा सकता है. दुर्भाग्यवश आधुनिक युग के महिला संगठनों ने पुरुषत्व के माध्यम से पुरुष को जवाब देना शुरू किया है. इसमें हे देवि ! निश्चय ही आपकी हार होगी. क्यांेकि पुरुषत्व में आप पुरुषों से आगे नहीं निकल पायेंगी. पुरुषों के अत्याचार से बचने के लिए महिला के पक्ष में कुछ कानून बने हैं. कानून बनते ही कुछ पुरुषार्थी महिलाओं ने उनका दुरुपयोग शुरू कर दिया है. कभी ‘घरेलू हिंसा’ हिंसा में नहीं गिनी जाती थी, आज जब गिनी जाने लगी है तो हिंसा से बचने के लिए नहीं, बल्कि अपनी हिंसा को सहारा देने के लिए कुछ स्त्रियों ने उसे हथियार की तरह उठाना शुरू कर दिया है. परिणाम में शांति नहीं अशांति फैलेगी. मेरा स्पष्ट देखना है कि किसी को प्रताड़ित कर कोई सुखी नहीं हो सकता. पुरुष प्रताड़ना का तो लंबा इतिहास है, लेकिन इधर कुछ वर्षों से स्त्री द्वारा प्रताड़ना का सिलसिला भी शुरू हो चुका है. पटने में पत्नी से प्रताड़ित कुछ लोगों ने महिला संगठन की तर्ज पर पुरुष संगठन बनाया और उसमें मटुकजी को आमंत्रित किया. मटुकजी ने उन मित्रों को पूरी सहानुभूति के साथ समझाया कि इस तरह का संगठन अप्राकृतिक, अवैज्ञानिक और मूढ़तापूर्ण है. दुर्भाग्य से आज भी स्त्रियों का उतना विकास नहीं हुआ है कि वे इस तरह की मूढ़ता से बच सकें. लेकिन पुरुष तो उसकी तुलना में विकसित हैं. इसलिए यह महिला के लिए तो क्षम्य है, लेकिन पुरुष के लिए हास्यास्पद है. आप ध्यान दें तो पायेंगे कि महिला संगठनों को उकसाने में पुरुषों का हाथ हुआ करता है. पुरुषों के बिना तो महिला संगठन पंगु है. महिला फ्रंट पर है, पुरुष नेपथ्य में है. इतना ही अंतर है. चालाक पुरुष पीछे है, मूढ़ महिलाएँ आगे हैं.
मटुकजी ने ‘भारतीय पुरुष परिषद’ के मित्रों से कहा- ‘‘ आप पत्नी प्रताड़ित हैं. पत्नी आपको सिर्फ अपने बल पर प्रताड़ित नहीं कर रही है. वह किन्हीं पुरुषों की गोद में खेल रही है और उनकी मदद से आपकेा प्रताड़ित कर रही है. दूसरी तरफ आप अपने घर में करुणामयी मां को देखें. उनका आशीर्वाद, उनकी सारी ताकत अपने बेटे के पक्ष में है. आपके पीछे भी स्त्री की ताकत है. इसलिए स्त्री संगठन और पुरुष संगठन दोनेां एक धोखा है. इस धोखे में न आप पड़ें और न कोई नया धोखा खड़ा करें. कहीं स्त्री प्रताड़ित हैं , तेा कहीं पुरुष प्रताड़ित हैं. आप प्रताड़ितों का एक संघ बनाएँ जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों शामिल हों, तब यह वैज्ञानिक होगा और कारगर भी. इसके बाद मैं तुरत उसकी सदस्यता ग्रहण कर लूँगा.’’
हमारे इंदौर आगमन के पूर्व पता चला कि यहाँ भी एक महिला संगठन ने बिना जाने-समझे बवाल मचाया. हमें अपमानित करने, जूता-चप्पल से पीटने की धमकियाँ भी दी गयीं. मुझे उन देवियों से इतना ही कहना है कि हे देवि ! जूते-चप्पलों से आपके हाथ की , आपके व्यक्तित्व की शोभा नहीं बढ़ेगी. आपके कोमल हाथों में तो फूल-माला ही शोभेगी. कालिख के बजाय रंग-गुलाल शोभेगा. आपकी मर्जी, आप अपनी शोभा बढ़ायें या अपने को कुरूप कर लें. लेकिन इतना ध्यान रखें देवि कि पुरुष के जूते आपकी जूती से अधिक मजबूत होते हैं. जूतियों से आप पुरुषों केा गुलाम नहीं बना पायेंगी. आपका प्रेम ही उसे गुलाम बनाता है. प्रेम के अलावा शासन करने का दूसरा कोई सुंदर रास्ता नहीं है. आपमें पुरुषेां पर शासन करने की भूख है. शुभ इच्छा है. उनके हृदय पर शासन करें. उन्हें अपनी मुस्कान से जीतें.

13 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी बात सोलह आने सच है और खरी है... बहुत अच्छी बात उठाई है आपने

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  2. चालाक पुरुष पीछे है, मूढ़ महिलाएँ आगे
    "करे कराये आप है, पलटु-पलटु शोर"
    "माता निर्माता भवति"

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  3. बेहतरीन आलेख....बड़े-बड़ों की आंखें खोल दे...

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  4. कल जब मैं इस पोस्ट को पढ़ रहा था तो अंत तक कहीं ख़्याल भी नहीं था कि यह किसने लिखी है। बाद पढ़ने के जूली जी का नाम देखा। आज देखा तो उनका नाम ऊपर के हैडिंग में भी है। बहरहाल नाम में ज्यादा कुछ नहीं रखा है। इस पोस्ट की कुछ बातों से सहमत हूं तो कुछ से असहमत। असहमति लिखने के लिए जो मूड और माहौल चाहिए उससे थोड़ा-सा बाहर हूं। सही बात तो यह भी है कि इस किस्म की बहसों से थोड़ा-सा थक भी गया हूं और पक भी। कोशिश करुंगा कि जल्दी ही अपनी बात कहूं। लेकिन कोई ज़रुरी नहीं कि कहूं ही।

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  5. जूली जी स्त्री विमर्श पर लिखने के लिए बधाई ! बहुत बार सुना है औरत-औरत की दुश्मन होती है । पर यहां आपने स्त्री और पुरुष को उनकी प्रकृति के अनुकूल व्याख्यायित किया है । वर्तमान की यह सर्वाधिक जटिल समस्या बनती जा रही है कि स्त्री पुरुषवत् और पुरुष स्त्रीवत् होता जा रहा है । शायद प्रकृति संतुलन चाहती है । बेहतर हो स्त्री स्त्री ही रहे और पुरुष पुरुष ही । और दोनों के बीच मधुर संतुलन बना रहे । उम्मीद करता हूँ आगे भी इस प्रकार के मुद्दों पर आपकी लेखनी चलती रहेगी ।

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  6. मनोजजी
    आपने सार बात कह दी, पुरुष पुरुष ही रहे और स्त्री स्त्री ही. यह जानना अवश्य जरूरी है कि दोनों का सुन्दर रूप क्या है. आभार इतनी संक्षिप्त और सटीक टिप्पणी के लिए

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  7. अरविन्द श्रीवास्तव जी को आभार. हमारी आँख ही नहीं खुलती, बस यही समस्या है दुरन्त. पुरु़षवाद और स्त्रीवाद में मानववाद कहीं खो जाता है.

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  8. sanjayji ki sahmati-asahmati ke binduon ka intejar hai. thakne aur pakne ko main bakhoobi samajh sakti hoon. aabhar

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  9. ललितजी
    माता निर्माता भवति तो सत्य है , किन्तु अमूमन ऐसा नहीं होता क्योंकि उनका खुद का व्यक्तित्व ही निर्मित नहीं होता. माता होना कुछ और ही बात है. जन्म देने वाली जननी से अलग है वह. आमतौर पर सभी बच्चों वाली खुद को माता ही समझ कर महान मानने लगती हैं. जबकि उनके संकीर्ण हृदय में प्रेम और करुणा अत्यल्प होती है. आगे इस विषय पर लिखना चाहूँगी. आभार

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  10. ये लेख इस मामले मे अनूठा है और बहुत सन्तुलित भी. स्त्री और पुरुष की लडाई एक फ़ालतू बात है
    लडाई होनी चाहिये गलत परम्परा से, गलत व्यवहार से, गलत सोच से, शोषण से, अत्याचार से तभी कुछ नतीजे सामने आ सकते है.
    प्यार और परस्पर सम्मान से हर घर मे स्वर्ग जैसा आनन्द हो सकता है.

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  11. अभी इस पोस्ट को थोड़ा फुरसत से पढ़ूँगा।

    कहीं व्यस्त था फिर भी देर से ही सही, इस टिप्पणी के माध्यम से, सहर्ष यह सूचना दी जा रही है कि आपके ब्लॉग को प्रिंट मीडिया में स्थान दिया गया है।

    अधिक जानकारी के लिए आप इस लिंक पर जा सकते हैं। इसके पहले भी चर्चा यहाँ हुई थी।

    बधाई।

    बी एस पाबला

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  12. बढ़िया लिखा है, शुभकामनायें !

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