शुक्रवार, अक्तूबर 16, 2009

बस में संस्कृति

किसी भी शहर में दौड़ने वाली बसें वहाँ की संस्कृतियों की झलक दिखलाती चलती हंै. किसी भी राज्य या शहर की बसों पर सवार होइये, वहाँ की विपन्नता-सम्पन्नता, आचार-व्यवहार, मानसिकता सब कुछ आपके सामने प्रकट हो जायेगा. हाल ही मैंने पुणे की यात्रा की. वहाँ की बसों पर थोड़ा घूमा और मुझे पटना और दिल्ली की बसें याद आ गयीं. पटने में तो सड़क ही नहीं, इसलिए सरकारी बस भी नहीं. यहाँ की खास-खास सड़कों पर प्राइवेट मिनी बसें चलती हैं, जिनमें मनुष्य लदे रहते हैं, लटके रहते हैं. जिस सीट पर एक भी आदमी आराम से न बैठ पाये, उस पर दो बैठाये जाते हैं. ठिगने हैं तो ठीक , लंबे हैं तेा आपकी टाँगंे अगली सीट में अटक जायेंगी. टाँगें तिरछी करके बाहर निकाल लें, तभी किसी तरह बैठा जा सकता है. जिन यात्रियों को सीट नहीं मिल पाती है, उन्हें कंडक्टर-खलासी की कड़क आवाज- आगे बढ़ते जाइये, बढ़ते जाइये- बोरे की तरह एक दिशा में चाँक देती है.
पुणे में बसेां में भीड़-भाड़ नहीं होती. केवल आफिस टाइम में थोड़ी भीड़ देखी जाती है. चूँकि अधिकांश कामकाजी लोगों के पास अपनी गाड़ियाँ होती हैं, इसलिए बसों की संख्या भी वहाँ कम है. बस में दोनों तरफ की सीटों के बीच जहाँ लोग खड़े होते हैं, उनकी सुविधा के लिए ऊपर की पाइप से ‘हथपकड़ा’ लटका रहता है जो देखने में सुंदर और हाथों के लिए आरामदेह है. यात्री आराम से यात्रा करते हैं, कोई धक्का-मुक्की नहीं, बकझक नहीं, गरमागरम बहसें नहीं.
बिहार और पटने की बसेां में टिकट या किराये के पैसे के लिए यात्री और कंडक्टर के बीच जो जद्दोजहद चलती है, वह कभी-कभी जंग में बदल जाती है. यात्री चाहता है पैसा न लगे तो अच्छा . अगर देना ही पड़ जाय तो कम से कम. उधर कंडक्टर मूंछों पर ताव फेरता है कि पैसे तो लेकर रहेंगे. उनकी ‘रफ’ आवाज दहशत पैदा कर पैसे वसूलती है और कभी-कभी अनाड़ी आदमी से ज्यादा भी. किराये को लेकर घोर किचकिच.
पुणे की बसों में इसके ठीक विपरीत माहौल दिखायी पड़ता है. ऐसा तो दिल्ली की बसों में भी नहीं देखा जाता है. वहाँ भी कंडक्टरों को चिल्लाकर टिकट के लिए कहना पड़ता है. लेकिन पुणे की बसों में एक शांति रहती है, कोई चिल्लाहट नहीं. कंडक्टर को टिकट के लिए किसी को कहना नहीं पड़ता है. यात्री स्वंय लेते हैं. जो पास होल्डर हैं, वे यह नहीं कहते कि पास है, बल्कि पास निकालकर दिखला देते हैं. ‘हस्त कम्प्यूटर’ से टिकट देने की व्यवस्था तो मैंने पुणे में ही देखी. ऐसी व्यवस्था दिल्ली में भी नहीं है. पुणे की किराया-दर वैज्ञानिक है, दिल्ली की अवैज्ञानिक और पटने का तो कहना ही क्या ! कभी निश्चित, कभी अनिश्चित. एक साल पूर्व दिल्ली में किराया-दर थीं- 2,5,7 और 10 रूपये. इसका रहस्य मेरी समझ में न आया, क्योंकि कोई दूरी 3 रुपये की भी हो सकती है, कोई 4 की , कोई 6 की , कोई 8 और 9 की भी, फिर ऐसा क्यों ? पुणे में किराया दर 2, 3,4,5 ....15 है. दूरी के अनुसार ‘हस्त कम्प्यूटर’ से टिकट निकल आता है. संभवतः प्रति किलोमीटर किराया एक रुपया है. कोई शिकवा-शिकायत नहीं. जितने किलोमीटर चलिये , उतने का किराया दे दीजिये, हिसाब साफ है. पटने में डी.एम. जो किराया निश्चित कर देते हैं, उसमें भी बसवाला कभी-कभी यात्री का चेहरा देखकर ,उन्हें अनभुआर समझकर घालमेल करता रहता है.
पुणे की बसों में रफ्तार है, जबकि पटने में बसें ठेलों और रिक्शों के पीछे रेंगती चलती हैं. हनुमाननगर से पटना जंक्शन की दूरी लगभग 5 किमी है जिसे तय करने में मिनी बस को 30 से 40 मिनट लगते हैं. यह दूरी एक पदयात्री 45 मिनट में तय कर सकता है. यह तो पुणे में ही देखा गया कि एक मेन रोड पर बस के लिए अलग लेन है. उस पर केवल बसें चल सकती हैं. स्वाभाविक है कि बस में गति होगी.
एक अंतिम बात और जो पटने और दिल्ली की बसेां में दिखाई पड़ती है लेकिन पुणे की बसों में नहीं. वह है स्त्रियों के साथ छेड़छाड़ पटने में बसों से ज्यादा टेम्पुओं में इस तरह की घटनाएँ आहिस्ता से घटती रहती हैं, क्येांकि उनमें स्त्रियेां के लिए अलग सीटें नहीं होतीं. कुछ पुरुषयात्री इस कोशिश में लगे रहते है कि किसी बहाने छू-छा का मौका मिले. अगर न मिल सके तो घूरने से उन्हें कौन रोक सकता है ? अनवरत घूरना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. कोई कैसे टोके ? कोई क्या कहकर रोके ? रोकने वाली जो उनके अंदर हया थी उसका तो पहले ही हरण हो चुका होता है ! कभी-कभी कड़क मिजाज की स्त्रियाँ ऐसे उचक्कों पर इस कदर फुफकारती हैं कि उनकी घिग्घी बँध जाती है. लेकिन जो संकोची, भीरू और भीड़ भरे स्थानेां में नरवस रहती हैं, उन स्त्रियों को तो भुगतना ही पड़ता है.
कटहल की तरह बसों से लटके यात्री बतलाते हैं बिहार की आबादी नियंत्रण से बाहर है. इसे सँभालो, नियंत्रित करो. किरायों को लेकर किचकिच कहती है कि बिहार में गरीबी बेहिसाब है. इसका हल कब निकालोगे ? बिहार के नगरेां में बसों का रेंगना पुकारता है - सत्ताधारियो , अपने दिल की तरह सड़कों को संकीर्ण और ऊबड़-खाबड़ न रहने दो. उदार बनो और सड़कों को उदार बनाओ. स्त्रियों के साथ छेड़छाड़ कानों में कहती है कि कैद में रहते-रहते काम रूग्ण हो गया है. छेड़छाड़ और घूरने की घटनायें उसके लक्षण हैं. इस लक्षण को नैतिकता , उपदेश और शासन से न दबाओ. बीमारी का इलाज करो. काम को आजाद करो. उसे एक सुशिक्षा के साथ बहने दो- बहता पानी निर्मला. जो शिक्षा चल रही है, वह कुशिक्षा है. सुशिक्षा से मेरा तात्पर्य एक ऐसी शिक्षा से है जो जवान होते ही लड़के -लड़कियों को करीब आने दे, एक-दूसरे को पूरी तरह जानने दे. एक-दूसरे को जानने में जो उचित मार्ग-दर्शन करे, वह सुशिक्षा है. सेक्स के तथ्य को ठीक-ठीक जानना ही उसकी बीमारियों से बचने का उपाय है. इसके बगैर सारे उपदेश, सारी नैतिक शिक्षाएँ केवल बीमारी को ढँकेगी. इससे बीमारी और बढ़ेगी.
मित्रो ! बसें केवल यात्रियों को नहीं ढोती हैं, वे आपकी सभ्यता-संस्कृति को भी अपने साथ लिये चलती हैं. उनके आइने में अपने को निहार कर जरा अपना रूप सँवार लें ताकि लोगों को आप सुंदर दिखें. आपका आचार-व्यवहार और बोली ‘औरन को शीतल करै, आपहुं शीतल होय ’.

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह प्रोफ़ेसर साहब बसों के माध्यम से खूब परिचय कराया आपने पटना, पुणे और दिल्ली के भूगोल का और वहां के समाज का । मुझे तो रेल यात्रा की याद हो आई। सच है कि बिहार के हालात अभी बहुत ही पीछे है.सार्थक लेख।
    दीपावली की शुभकामना
    अजय कुमार झा

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  2. मित्रो ! बसें केवल यात्रियों को नहीं ढोती हैं, वे आपकी सभ्यता-संस्कृति को भी अपने साथ लिये चलती हैं. उनके आइने में अपने को निहार कर जरा अपना रूप सँवार लें ताकि लोगों को आप सुंदर दिखें. आपका आचार-व्यवहार और बोली ‘औरन को शीतल करै, आपहुं शीतल होय ’.

    पटना , पूना और दिल्ली की बस सेवाओं का अच्छा वृत्त-वित्र प्रस्तुत किया है आपने ।

    हमेशा की तरह इस आलेख में भी ओशो की खुशबू नासापुटों में प्रवेश कर गई और महका गई मेरे मन-मंदिर को ।

    http://gunjanugunj.blogspot.com

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  3. mitra ajayji
    aapko lekh achcha laga, hamara prayas sarthak hua. aabhar

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  4. manoj bhartiji, aapke blog per kavitayen dekh osho rus me bhing gaya. aapki tippani ke bare me juli ne jab bataya tab main prabhu ko padh raha tha,aansoon chalak aaye. sara sherya unka. pranam

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