रविवार, नवंबर 01, 2009

लोग आप पर हँसते हैं !



सन 2006 की बात है. एक क्रांतिकारी सामाजिक कार्यकर्ता और नेता मीडिया से प्राप्त खबरों के आधार पर मेरे विरोधी हो गये थे. संयोगवश एक दिन मेरी पत्रिका ‘होश’ उन्हें हाथ लगी.उसे पढ़कर वे मेरे प्रशंसक हो गये. उन्होंने एक पत्र लिखकर अपने अंदर आये इस परिवर्तन के बारे में जानकारी दी. उस व्यक्ति का नाम है प्रोफेसर प्रेम कुमार. वे ‘प्रेम यूथ फाउंडेशन’ के संस्थापक हैं जिसकी शाखा पूरे बिहार में है. वे विचार और आचार से विद्रोही हैं. इसलिए उनसे मेरी पटरी बैठ गयी. सुर से सुर मिल गया. वे इस देश में पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने खुसरुपुर बुलाकर मुझे एक सभा में सम्मान दिया और मेरा भाषण करवाया. इसके पहले लाउडस्पीकर से पूरे कस्बे में मेरे आने की सूचना लोगों को दी और दीवारों पर मेरा नाम लिखवाया. उस सभा में विशिष्टजनों के साथ थानाध्यक्ष भी उपस्थित थे. उनका भी भाषण हुआ. मेरे भाषण के बाद प्रश्नोत्तर का दौर चला. उसी सभा में एक व्यक्ति ने मुझ पर आरोप लगाने की चेष्टा की. लोगों ने उनका मुँह बंद करना चाहा. लेकिन मैंने कहा- नहीं, उन्हें बोलने दें. अगर उनके पास वास्तव में कोई प्रश्न है तो मैं उसका समाधान करने का प्रयास करूँगा. अगर उन्हें केवल भड़ास निकालनी है तो उसकी भी इजाजत उन्हें मिलनी चाहिए ताकि वे हल्के हो जायँ. मेरे उत्तर की उनको जरूरत नहीं थी. मुझे लज्जित और अपमानित करना उनका ध्येय था. उनके कथन का सार अंत में इस वाक्य में प्रकट हुआ- ‘लोग, आप पर हँसते हैं ं!’ बिल्कुल सही कहा था उन्होंने. मैं अनुभव करता रहा हूँ कि मीडिया में आयी खबरों के आधार पर लोग मुझे देखकर हँसते हैं ! मैंने उन्हें जो जवाब दिया उस बीज वाक्य का पल्लवित रूप यहाँ प्रस्तुत है-
मेरे जीवन के साथ सबसे अच्छी बात यह हुई है कि मेरा नाम आते ही लोग हँस देते हैं. कुछ देर के लिए उनका तनाव दूर हो जाता है. क्षण भर के लिए वे आनंद से भर जाते हैं. कुछ पल के लिए भार मुक्त हो जाते हैं. इसे मैं अपना परम सौभाग्य मानता हूँ. मुझमें ऐसी क्षमता नहीं थी कि लाखों लोगों के जीवन में मुस्कान बिखेर सकूँ ; इसलिए इतनी बड़ी बात का श्रेय मैं अपने ऊपर लेकर अपने अहंकार को बलवान करना नहीं चाहता. यह ईश्वर की कृपा से हो गया है. मैं भी इस आनंद में डूब जाता हूँ-
औरों को हँसते देखो मनु, हँसो और सुख पाओ ;
अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ

सबके सुखी होने में, सबके हँसने में आनंद का विस्तार होता है.
प्रश्न
: आप जिस भाव में मगन होकर इसको अच्छी बात समझ रहे हैं, वैसी बात नहीं है. आपकी विडंबना पर लोग हँसते हैं !
उत्तर: चाहे लोग जिस बात पर हँसें, हँसते तो हैं न ? क्रोध तो नहीं करते है न ! ईष्र्या से तो नहीं जलते हैं न ! उनका हँसना महत्वपूर्ण है. उनके भाव को तो मैं बदल नहीं सकता. मैं तो अपने भाव में ही डूब सकता हूँ. मेरे भाव की लपट उन तक पहुँचे तो वे भी मगन हो सकते हैं.
विडंबना तो यही है न कि ‘देखो बूढ़ा होकर कैसे लड़कों की तरह आचरण करता है. बेटी से भी छोटी लड़की से प्यार कर अपना सब कुछ लुटा बैठा है !’ यही तो मेरा सौभाग्य है ! मेरी जवानी गयी ही नहीं. वह समय से पहले आयी और समय पर जाना भूल गयी ! जिस दिल में प्यार की तरंगें न उठती हों, उसे बूढ़ा कहते हैं. वह प्यार क्या जिसका ज्वार जवानी में उठे और बुढ़ापे में विदा हो जाय !
लोगों के घरों से प्रेम विदा हो गया है और वे उसे खोज रहे हैं, भटक रहे हैं. और यहाँ स्वयं प्रेम मुझे खोजते हुए आकर मेरे पिंजर में प्रकाशित हो गया है ! इस प्रकाश में मैं नहला रहा हूँ !
इतना बेवकूफ भी नहीं मैं कि आपकी बात न समझूँ. समझ रहा हूँ अच्छी तरह लेकिन मुझे बात लग नहीं रही है, क्योंकि मैं आपके तल पर नहीं हूँ. आपके तल पर जीता तो छक् से आपकी बात लग जाती. आपका हँसना हमें प्रताड़ित कर देता. कभी खून खौला देता, कभी मुरझा देता, कभी कुंठित कर देता, कभी ग्लानि से भर देता, कभी आत्महत्या के लिए उकसा देता. मेरा सौभाग्य है कि मैं आपके तल पर नहीं हूँ. इसलिए जो आपको मुझमें दिखता है वह अपने में मुझे नहीं दिखता. दिखती है बस इतनी सी बात कि भगवान ने मुझमें क्या जादू कर दिया जो इतने लोगों की मुस्कुराहट का कारण बन गया हूँ ! यह नहीं भी हो सकता था. ऐसा भी हो सकता था कि लोग मुझे देखते ही क्रोध से भड़क उठते, ईष्र्या से जल उठते.
ऐसा हो भी बहुत रहा है. लेकिन क्रोध और ईष्र्या सीधे-सीधे आने में डरती है, क्योंकि वह लोगों को स्वीकार्य नहीं होगी. इसलिए वेश बदल कर कभी मर्यादावाद का लबादा ओढ़कर, कभी नैतिकता की रामनामी चादर लपेट कर प्रकट होती है. ऐसे लोगों की मैं खबर लिया करता हूँ.
हँसने वालों में भी सभी उपहास की हँसी वाले नहीं होते. कुछ निश्छल हँसी वाले लोग भी हैं. इनमें एक नाम है ठाकुरजी का, पटना विश्वविद्यालय के कुलपति के पीए हैं. वे मुझे देखते ही आनंद विभोर हो जाते हैं और आग्रह करते हैं कि मैं दिन में एक बार दर्शन दिया करूँ. वे कहते हैं दिन भर का तनाव दूर हो जाता है. वे मुझे खुशी से पास बैठाते हैं, चाय पिलवाते हैं और कुछ से कुछ बोलकर खूब हँसते हैं. जैसे- वे वहाँ आने वाले लोगों से कहते हैं -अच्छा ये बताइये, पटना विश्वविद्यालय को बाहर कोई जानता था ? बाहर कितने लोग जानते थे ? यह तो मटुक बाबू को धन्यवाद दीजिए कि इनके कारण देश में , विदेश में पटना विश्वविद्यालय का नाम हो गया ! उनकी इस बात से मैं खुश हो जाता हूँ और मेरे विरोधी भी, क्योंकि दोनों को इसमें अपना-अपना अर्थ मिल जाता है !
कभी कहते हैं- सर, चाँद-फिजा ने आपको डिफीट दे दिया ! वे इधर बहुत आये टीवी पर. आपका आना कम हो गया. मैं कहता हूँ- नहीं साहब, आप देखते रहियेगा, वे तो विदा हो जाने वाले चाँद हैं. सदा आकाश में चमकने वाला चाँद तो मैं हूँ. घटती-बढ़ती होती रहती है. लेकिन वजूद मौजूद है.
एक दिन पटना से दिल्ली में नियुक्त हुए एक प्रोफेसर ने कहा था- देखते हैं, मेरा कितना नाम है ? मैंने कहा था- क्या मुझसे भी ज्यादा ? उन्होेंने जवाब दिया- आपका तो स्कैंडल है, 15 दिन से एक महीना में खत्म हो जायेगा.. मैंने कहा था- यह एक महीना में खत्म होेने वाला स्कैंडल नहीं है. यह वैसा स्कैंडल है जो कैंडल की तरह काल के भाल पर जलता रहेगा. भूल और भ्रम में न रहो प्रोफेसर. तुम्हारे जैसे प्रोफेसर हम जैसों का गीत गाकर अमर होते हैं ! तुम्हारा नाम हमारे नाम की छाया है ! और इस पर दोनों ठहाके लगाते हैं.
लेकिन जो कुटिल हँसी हँसते हैं, वे मेरे बड़े काम के हैं. तुलसीदास से कोई बड़ा कवि नहीं हुआ हिन्दी में आज तक. उनकी कविता पर भी लोग हँसते थे. तुलसी ने ऐसे लोगों का स्मरण किया है रामचरितमानस में-
खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा ।।
हंसहिं बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकहीं ।।
कबित रसिक न राम पद नेहू । तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू ।।
भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी ।

तुलसीदास कहते हैं कि दुष्टों के हँसने से मेरा हित ही होगा, क्योंकि मधुर कंठ वाली कोयल को कौवे तो कठोर ही कहा करते हैं न ! जैसे हंस पर बगुले और पपीहे पर मेढक हँसते हैं, वैसे ही मलिन मन वाले दुष्ट भी मेरी निर्मल वाणी पर हँसते हैं. जो न तो कविता के रसिक हैं और न जिनका राम के चरणों में प्रेम है, उनके लिए यह कविता सुखद हास्य रस का काम देगी. एक तो यह भाषा (लोकभाषा) की रचना है, दूसरे मेरी बुद्धि भोली है, इससे यह हँसने योग्य ही है, हँसने में कोई दोष नहीं.
‘खल परिहास होइ हित मोरा’ वास्तव में खलों के उपहास करने से फायदा होता है. इस रहस्य को मुझसे ज्यादा कौन जानता है ? उपहास करने वालों का स्वागत होना चाहिए. मेरा जो इतना नाम हुआ उसके पीछे यही लोग हैं. ये न होते तो प्रेम करने वाले एक साधारण आदमी को कौन जानता और क्यों जानता ? यद्यपि उनका उद्देश्य कुछ और होता है , लेकिन परिणाम केवल उनके उद्देश्य पर निर्भर होता नहीं, वह हमारे काम पर भी निर्भर होता है !
तुलसीदास ने अपनी कविता को समझने के लिए दो कसौटियाँ रखी हैं, या तो आप कविता की समझ रखते हों या आपका राम के चरणों में प्रेम हो. दोनों हो तो कहना ही क्या ? तब आप उनकी कविता में उसी तरह समग्रता में डूब पायेंगे जैसे स्वयं तुलसीदास, नहीं तो कम से कम एक गुण तो रहना ही चाहिए. दोनों का अभाव हो तो आपके लिए ‘रामचरितमानस’ सुखद हास्य रस है.
मैं कहना चाहता हूँ कि मुझे भी समझने के लिए दो कसौटियाँ हैं - या तो आपने जीवन में सच्चे भाव से प्रेम किया हो या आप ओशो के श्री चरणों में अनुराग रखते हों. एक भी हो तो आप मुझे समझ पायेंगे. दोनों हो तो खूब अच्छी तरह समझ लेंगे. दुर्भाग्य से हँसने वाले लोग इन दोनों में एक भी शर्त पूरी नहीं करते. इसलिए मैं उनके लिए एक ‘सुखद हास्य रस’ हूँ. और मेरे लिए यह आनंद का विषय है.

1 टिप्पणी:

  1. बात तो आपने बिल्कुल ठीक ही कही है प्रेम को महिमा भी बिरोधी ही दिलाते है प्रेम करना और प्रेम की विवेचना करना अलग अलग बाते है ऐसे ही जैसे कोइ एक खोज करना और अब तक हुइ खोजो पर प्रकाश डालना.
    सुन्दर आलेख
    http://hariprasadsharma.blogspot.com/

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