बुधवार, नवंबर 18, 2009

ये कौन बोल रहा है जूली की जुबान से ?

‘‘ मेरे समेत तमाम महिलाओं के होठों पर एक सवाल खौल रहा है.... कि ये कौन बोल रहा है उनकी जुबान से ?’’


जग जानता है, आप भी जानती हैं देवि कि वो मुजरिम मटुक नाथ चैधरी है. वही जूली की जुबान से बोलता है और मटुक की जुबान से जूली बोलती है. इसलिए मुजरिम हाजिर है मुहब्बत की सजा पाने को.
लेकिन मूल्यवान सवाल यह नहीं है कि किसके भीतर से कौन बोल रहा है. मूल्यवान तो यह है कि बोल क्या रहा है. मूल्यवान यह नहीं कि कृष्ण गीता बोले थे या नहीं; कौन जानता है ? कोई प्रमाण नहीं है. कृष्ण की जुबान से गीता निकली है या व्यास की जुबान से कौन जानता है ? व्यास कोई व्यक्ति है या कोई पद है कहना कठिन है. व्यास एक है या अनेक कौन जानता है ? अंधों के लिए यह पता करना जरूरी है कि कौन बोल रहा है, आँख वाला तो देखेगा कि क्या बोल रहा है! अंधा नाम जानकर प्रतिक्रिया देता है, क्योंकि उसके पास कथ्य की पहचान नहीं होती. अगर कोई बात कृष्ण ने कही तो ठीक, ओशो ने कही तो गलत ! गाँधी ने कही तो ठीक, मटुक ने कही तो गलत ! मीरा ने कही तो ठीक, जूली ने कही तो गलत !
हमारे ब्लाॅग पर जूली का एक लेख प्रकाशित हुआ- ‘ महिला संगठन का औचित्य’. जूली ने यह लेख अप्रैल, 2007 में इंदौर यात्रा के समय तब लिखा था, जब वहाँ की एक महिला संगठन की नेताइन ने जूली और मेरे विरोध में सर पर आसमान उठा रखा था. इंदौर के नागरिकों ने उसे एक ‘असामान्य औरत’ बताया था. हम सुनकर मुस्कुराये थे, क्योंकि इधर हमलोग भी तो असामान्य ही थे! दो असामान्य एक शहर में नहीं रह सकते ! उक्त महिला का जब यथार्थ जाना कि शहर में क्या-क्या उपद्रव वो करती रहती हैं, तो मैंने जूली से कहा उस पर तुम्हारा लिखना ही उचित होगा. जैसे पुरुष को पुरुष ही ढंग से पीट सकता है, वैसे ही स्त्री की पिटाई स्त्री से ही हो तो उचित है. जूली ने कहा कि किसी को पीटने की जरूरत नहीं है. सिर्फ सच लिख देना है, इसी में झूठ पिट जाता है. संतुलित विचार रख देना है, इसी में असंतुलित विचलित हो जाता है. स्त्रियोचित विचार रख देने से मर्दनुमा औरतें बौखला जाती हैं. ऐसी स्त्रियाँ खुद अपने को इतना सताती हैं कि अलग से उन्हें सताने की जरूरत नहीं. इसलिए मैं जो भी लिखूँगी, सच-सच लिखूँगी. न नारी की ओर से, न पुरुष की ओर से. बल्कि दोनों की ओर से, प्रकृति की ओर से.
और वास्तव में जूली ने ऐसा ही लेख लिखा. उसका लेख स्त्री और पुरुष के प्रेम को बढ़ाने वाला है. दोनों को अपनी-अपनी गलतियों से सावधान करने वाला है. इस लेख को वहाँ की पत्रिका ‘धर्मयुद्ध’ ने छापा था. इस लेख में निहित विचार हम दोनों के हैं. ऐसा नहीं है कि किसी की जुबान से कोई बोल रहा है. हम दोनों समवेत रूप से बोल रहे हैं, क्योंकि हम दोनों कहने के लिए भिन्न हैं, भिन्न हैं नहीं. मटुक और जूली एक ही जल की दो तरंगें हैं-
गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न
ऐसा कई बार होता है कि किसी विषय पर हम दोनों अलग-अलग लिखते हैं और मिलाकर देखते हैं तो पाते हैं कि दोनों ने एक ही बात लिखी है. अब एक ही लेख को दो बार क्यों छापें ? हाँ, कभी-कभी किसी विन्दु पर मतभेद भी होते हैं. वह मतभेद बड़ा मूल्यवान होता है, क्योंकि उस पर हम दोनों फिर से विचार करते हैं और विचार के बाद सहमति आती है. इस विचार में कभी जूली की समझ का विकास होता है, तो कभी मेरी समझ का. इसलिए मतभेद मूल्यवान होते हैं, लेकिन उन मतभेदों पर ठंडे दिल से विचार न हो तो वही लड़ाई के कारण भी बन सकते हैं. प्रेमी ठंडे दिल से विचार करते हैं और घृणावादी गरम दिमाग से. एक नारीवादी नारी ने खौलते दिमाग से इस लेख पर विचार किया है- ‘‘मेरे समेत तमाम महिलाओं के होठों पर एक सवाल खौल रहा है... कि ये कौन बोल रहा है उनकी जुबान से.’’
मुझे तो वे होंठ बड़े प्यारे लगते हैं जो चुंबन की चाहत में खौलते हैं और वे मस्तिष्क अच्छे लगते हैं जिसमें मौलिक विचार खौलते हैं.
ढाई साल पहले लिखा यह लेख ब्लाॅग पर डाल दिया गया. पता चला कि राष्ट्रीय सहारा ने ब्लाॅग से उठा कर 4 नवंबर को उसे छापा. अखबार इतनी नैतिकता का ख्याल भी नहीं कर रहा है जिसकी सामग्री है, छापने से पहले उसकी अनुमति ले ले. अगर अनुमति न भी ले सके तो कम से कम लेखिका को सूचित कर दे. अगर सूचित न कर सके तो उस लेख को ठीक से पढ़ ले, समझ ले, तब जाकर उस पर बहस चलवाये. लेकिन राष्ट्रीय सहारा की ‘आधी दुनिया’ की संपादिका ने नैतिकता की सारी हदों को पार करते हुए जूली के नाम से उस शब्द को बहस के केन्द्र में रखा जिसका प्रयोग जूली ने किया ही नहीं है ! मैं ‘आधी दुनिया’ फीचर की संपादिका से पूछना चाहता हूँ कि ‘याचक’ शब्द जूली के हैं या गीताश्री के ? जूली ने अपने लेख ‘महिला> संगठन का औचित्य’ में कहीं भी स्त्री के लिए ‘याचक’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है. जूली एक समझदार और जिम्मेदार स्त्री है, वह सोच-समझ कर लिखती है. उसका एक-एक वाक्य सुविचारित और संतुलित होता है. वह अखबार और पत्रिकाओं में लिखने वाली कुछ विक्षिप्त महिलावादियों की तरह उन्माद में नहीं लिखती है.

क्रमशः


नोटः- जूली का लेख ‘महिला संगठन का औचित्य’ इसी ब्लाॅग पर पढ़ें और उसकी प्रतिक्रिया में लिखा गया गीताश्री का लेख पढ़ने के लिए इस लेख के शीर्षक पर क्लिक करें.

1 टिप्पणी:

  1. kuch to log kahenge....
    kya sahi hai kya galat hai iske nirnay ka vivek bahgwan ne har vyakti ko diya hai ( paglon ko bhi .. tabhi to wah aag nahi chuta, current ke taar se door rahta hai ). jo tark ki kasauti per uchit hai wahi satya hai .

    satya vyas

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