सोमवार, दिसंबर 28, 2009

प्रेम की परिभाषा

जब मेरा प्रेम उजागर हुआ तो मीडिया में यह बात जोर-शोर से प्रचारित हुई कि ‘मटुकनाथ ने गढ़ी प्रेम की नयी परिभाषा’ ! मैं भौंचक ! प्रेम की नयी परिभाषा ! तो कोई पुरानी परिभाषा भी होगी! अनुमान भिड़ाया तो लगा कि विवाह प्रेम की पुरानी परिभाषा है और तमाम वर्जनाओं की मिट्टी में दबा जो प्रेम का अंकुर फूट पड़े वह है प्रेम की नयी परिभाषा ! और न जाने कितनी बातें उनके मन में आयी होंगी जिन्होंने उनकी नजर में मुझे नयी परिभाषा का जनक बनाया होगा ! हमारे प्रेम से प्रेम की एक रूढ़िवादी धारणा टूटी होगी, इसलिए जीवंत प्रेम को प्रेम की नयी परिभाषा समझा गया होगा. दरअसल प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती, क्योंकि प्रेम एक जिंदा चीज है. मरी हुई चीज की परिभाषा होती है. विवाह की परिभाषा हो सकती है. जिस चीज को सीमा में बाँध सकते हैं, उसकी परिभाषा हो सकती है. प्रेम की कोई सीमा नहीं होती. उसकी व्याख्या हो सकती है. उस पर काव्य लिखा जा सकता है. लेकिन उसे परिभाषित नहीं किया जा सकता. उसके बारे में कुतूहल हो सकता है, जिज्ञासा हो सकती है, जानने की प्यास हो सकती है. जल प्रलय में सब कुछ डूब चुका था. अकेला मनु बचा था. जब श्रद्धा ने उसे पहली बार देखा तो प्राणों में कोई प्यास जग गयी. वह प्यास पुकार उठती है-  
कौन तुम ? संसृति जलनिधि तीर , तरंगों से फेंकी गयी मणि एक
मनु तो सामने था. गठीला पुरुष था, संुदर था. अकेला था. सब कुछ प्रकट था. फिर भी प्रश्न उठ रहा है कौन तुम ? मनु के सौन्दर्य ने श्रद्धा के भीतर एक अनिर्वचनीय आकर्षण पैदा कर दिया है. एक चाहत पैदा की है. एक नयी अनुभूति पैदा की है, वही अनुभूति प्रश्न बन गयी है. जब प्रेम की पहली पहली जीवंत अनुभूति होती है तो उसके साथ ही प्रश्न उठता है क्या है प्रेम ? क्यों होता है प्यार ? एक गीत सुनिये- क्यों आती है बहार ? क्यों लुटता है करार ?  
क्यों होता है प्यार ? न तुम जानो न हम ! 
गूँगे का गुड़ है प्यार, अंतरतम ही भावै. प्यार ऊर्जा का विस्फोट है. ओवर फ्लोइंग एनर्जी है. प्रेम क्षणिक उन्मेष है. प्रेम एक प्रकार का पागलपन है. पागलपन व्यक्ति की वह मानसिक अवस्था है जो समाज के ढाँचे में फिट नहीं बैठे. लेकिन प्रेम के पागलपन की खुशबू अलग होती है. साधारण पागल से बिल्कुल भिन्न. प्रस्तुत है एक उदाहरण- एक पुरुष की शादी एक स्त्री से कर दी जाती है जिसे उसने कभी देखा नहीं, जाना नहीं, चाहा नहीं. लेकिन सबकी इच्छा है कि वह पुरुष जिंदगी भर उस स्त्री को प्यार करे. अगर वह साधारण है, मीडियाॅकर है, कम संवेदनशील है तो एडजस्ट कर सकता है. बच्चा पैदा कर लेगा, उसे पढ़ाने-लिखाने और धन कमाने में लग जायेगा. लेकिन अगर वह अधिक संवेदनशील है तो शरीर के मिलन से संतुष्ट नहीं होगा. उसके भीतर कोई आकांक्षा, कोई अदम्य प्यास छटपटाती रहेगी जो जैविक धरातल पर संतुष्ट नहीं होगी. कोशिश करने से प्यार नहीं होता. व्यक्ति पागल हो जा सकता है. इससे अलग एक दूसरे प्रकार का अतिशय संवेदनशील व्यक्ति हो सकता है जो उस भीतरी आकांक्षा की पूर्ति के लिए जमीन आसमान एक कर दे. सब कुछ का त्याग कर दे. सारे खतरे मोल ले ले. वह प्राणों की कीमत देकर प्रेम पाना चाहे. यह अलग किस्म का एक श्रेष्ठ पागल होगा जो प्रेम पाकर मानसिक स्वास्थ्य और संतुलन को पा लेगा. ऐसे पागल का जनसामान्य से तालमेल उखड़ जाता है. लोग उनकी बात नहीं समझ पाते. कम्यूनिकेशन गैप पैदा हो जाता है. कुछ लोग उन्हें मारने दौड़ते हैं, कुछ लोग पूजने लगते हैं और कुछ लोग कहते हैं कि वे समय से पहले आ गये. अभी इनके लायक समाज नहीं बना है. लेकिन मेरी समझ है कि ऐसे लोगों के लायक समाज शायद कभी नहीं होता. कृष्ण न जाने कितने हजार वर्ष पहले पैदा हुए. क्या आज भी समाज उन्हें पचाने लायक हुआ है ? अगर कृष्ण बाँसुरी लेकर गोपियों के साथ रास रचाने लगे तो जो पुजारी मंदिर में बैठकर उनकी पूजा कर रहे हैं, वे पुलिस के पास दौड़े चले जायेंगे कि रोको इनको. पूजा तक तो बात ठीक थी. लेकिन असली कृष्ण का भरोसा नहीं, वह मेरी राधा के साथ भी नाच सकता है, इसमें बड़ी झंझट है. जब प्रेम पजेशन नहीं रह जायेगा तभी कृष्ण के लायक समाज होगा और ऐसे समाज में हर पुरुष कृष्ण होगा और हर स्त्री राधा होगी. प्रेम एक पौधे की तरह होता है जिसका बीज हर व्यक्ति का हृदय है. उसे सही समाज रूपी मिट्टी मिले, गुरु रूपी माली मिले तो पनप सकता है, फैल सकता है, फूल सकता है. सही समाज का अर्थ ऐसा समाज जो युवावर्ग को प्रेम की स्वतंत्रता दे. प्रेम पौधे की तरह ही विकसनशील होता है. वह ऐसा पौधा है कि फैलते-फैलते सम्पूर्ण आकाश में फैल जाय. उचित भूमि न मिलने के कारण प्रेम बीज रूप में समाप्त हो जाता है. कभी अगर पनपता है तो परिवार रूपी बकरी उसे चर जाती है और समाज रूपी भैंसा उसे कुचल देता है. उस बिरवे को कुचल कर नासमझ समाज हिंसा की ज्वाला में जलता रहता है. प्रेम के अभाव में ही शोषण होता है. प्रेम के अभाव में आदमी आपस में लड़ता है. भय, संत्रास, कुंठा, व्यक्तित्व विघटन, अजनबीपन ये सब बीमारियाँ प्रेम के अभाव में पैदा होती हैं. आज आवश्यकता प्रेम की परिभाषा के चक्कर में पड़ने की नहीं, उसके पाॅजिटिव रूप को लेकर आगे निकलने की है. अपने जीवन को प्रेम से आप्लावित करने की है. इसके लिए जो भी दुख उठाना पड़े, उसकी तैयारी चाहिए. प्रेम इतना बड़ा स्वर्ग है कि उसके लिए कोई भी नर्क झेला जा सकता है. प्रेम की पहचान आनंद है. उसकी पीड़ा में भी एक आनंद छिपा होता है. जिस प्रेम में आनंद तत्व खो जाय, वह बहुत कीमती नहीं हो सकता. जब कभी आनंद खोेने लगे तो प्रेमियों को सावधान हो जाना चाहिए. देखना चाहिए किसी के प्रति मेरे मन में प्रतिशोध तो नहीं आ गया. जो व्यक्ति आनंद को उपलब्ध हो जाता है, उसका कर्तव्य बनता है कि वह दूसरों के लिए प्रेम और आनंद का मार्ग प्रशस्त करे.


8 टिप्‍पणियां:

  1. कभी सुना था कि प्रेम क्रांति है आपको देखा तो जाना कि सचमुच।

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  2. Bahut sundar. Pyar jin manorogioN ki dawa ho sakta hai we ise bimari sabit karne par tule haiN.Sirf is vajah se ki unki sankhya zyada hai, we khudko swasth samajhte haiN.
    bahut din baad aapki post aayi. chaliye is intezar ko ek sher se bharte haiN :

    Pyar ka pahla khat likhne meN waqt to lagta hai,
    Naye pariNdoN ko udne meN waqt to lagta hai.

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  3. पूर्ण रूप से सहमत.. प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती/ हो सकती। यह वास्तव में गूंगे के गुड़ के समान है। हमेशा के तरह बढि़या लेख..।
    साधुवाद।
    ॥दस्तक॥|
    गीतों की महफिल|
    तकनीकी दस्तक

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  4. अच्‍छा है, अनुभव बांटते रहि‍ये।

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  5. गुरुदेव की जय हो.
    एक ही बार पढ़ा है पर असर व्यापक है.

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  6. व्यक्ति का स्वयं का कृत्य ही उसके लिए आइना होता है । यदि कृत्य से आनंद बढ़ता है तो वह शुभ है, पुण्य है । यदि कृत्य दुख में ले जाए,आनंद न बन पाए तो वह अशुभ है । प्रेम, जो दुनिया का सर्वाधिक चर्चित विषय रहा है,उसकी चर्चा ही इसलिए है, क्योंकि उसे समझा नहीं गया है । प्रकृति ने किसी भी प्राणी जाती को जिंदा रखने के लिए विपरीत्त ध्रुव बनाए हैं स्त्री और पुरुष । इनके बीच में जो आकर्षण की सहज खुशबू है, उसे ही अधिकतर लोग प्रेम की संज्ञा देते हैं । उस प्रेम को समझने और जानने वाले बहुत कम हैं जो अद्वैत का द्वार बनता है । जिसमें दूसरा मिट जाता है और रह जाता है एक । मीरा का प्रेम इसका श्रेष्ठ उदाहरण है । मीरा बाहर-भीतर हर ओर अपने आराध्य कृष्ण का ही दर्शन करती है । उनके साहित्य में किसी से कोई द्वेष नहीं है, क्योंकि उनके अंतस में किसी के प्रति द्वेष नहीं है । आपका प्रेम मीरा की ऊँचाइयाँ छूए । मेरी शुभेच्छा स्वीकार करें ।

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