बुधवार, दिसंबर 30, 2009

प्रेम, विवाह और समाज- juli

प्रेम का क्षेत्र बहुत व्यापक है. परिवार से लेकर देश, दुनिया और ईश्वर तक. किन्तु प्रेम की बात करते ही सबसे पहले ध्यान स्त्री और पुरुष के प्रेम पर ही जाता है. समाज में सबसे ज्यादा उलझनें इसी को लेकर हैं. देश-प्रेम, विश्व-प्रेम और ईश्वर-प्रेम को लेकर कोई ज्यादा विवाद नहीं है, क्योंकि वे अमूर्त हैं. स्त्री-पुरुष का प्रेम ठोस रूप में सामने आता है. इसलिए हमेशा यह विवादों के घेरे में रहा है. हमारा प्रतिपाद्य विषय यही है. 
किशोर वय में जब काम भावना का उदय होता है और विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण की शुरुआत होती है, तभी से परिवार और समाज लड़के-लड़कियों के स्वतंत्रतापूर्वक मिलने-जुलने पर पाबंदी लगा देता है. उनके बीच सहज व्यवहार न हो, इसकी पूरी व्यवस्था है. लड़कियों के स्वतंत्रतापूर्वक घूमने -फिरने पर भी बंदिशें लग जाती हैं. लड़कों को अपना स्वर्णिम भविष्य सँवारने के लिए लड़कियों के पचड़े से दूर रहने की हिदायत दी जाती है. नतीजा, एक दूसरे के व्यक्तित्व को सही रूप में जानने-समझने की जगह एक अतृप्त लालसा दोनों में घर कर जाती है. स्वाभाविक है कि जिस चीज को दूर रखा जायेगा, उसके प्रति तीव्र आकर्षण होगा. बंदिशों के कारण आकर्षण गलत ढंग से मिलने का रास्ता तलाशेगा. लुक-छिप कर एक-दूसरे को देखना, स्मृतियों में हमेशा सेक्स का चिंतन चलते रहना, कुंठा-ग्रस्त होना, उदास हो जाना आदि इसके स्वाभाविक परिणाम होंगे. जरा-सा मौका मिलते ही बिना समझे बूझे प्रणय निवेदन कर बैठेंगे. उस मिलन को स्थायित्व प्रदान करने के लिए कहीं निरापद जगह में भाग जाने की चेष्टा करेंगे और मौका मिलते ही भाग जायेंगे. यहीं से शुरू होगा उनकी यातनाओं का दौर. इसी क्रम में अपहरण का मामला दर्ज होगा, पकड़े जाएँगें, रिमांड-होम में रखे जायेंगे, फिर अपने-अपने घरों में दोनों वापस भेज दिये जाएँगें- पुनमूर्षको भव.  
इस दूरी का दूरगामी परिणाम होता है, जो उनके आचरणों में प्रतिबिंबित होता है. स्कूलों, काॅलेजों में प्रेम का विचित्र हाल है. कभी किसी से थोड़ी बातें हुईं, मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान हुआ तो समझ बैठे कि प्रेम हो गया ! कहीं फिल्मों की तर्ज पर एक नजर में प्यार हो जाता है, तो कहीं किसी की सूरत देखते ही उसे किसी भी तरह अपना लेने का जुनून सवार हो जाता है. कुछ लड़के अनेक लड़कियों से प्रणय-निवेदन करते नजर आते हैं. मौज-मस्ती का शगल है, जब जिसकी स्वीकृति मिल जाये. कहीं प्रेम-पंथ की कठिनाइयों को समझे बगैर कसमें वादे किए जाते हैं और बाद में दबाव में आकर आज्ञाकारी बच्चे की तरह कुल-खानदान की इज्जत निभाते हुए अन्यत्र विवाह कर लिया जाता है और दूसरा पक्ष उसकी बेवफाई पर आठ-आठ आँसू रोता है. फिर प्रेम के दावे तत्क्षण घृणा में बदल जाते हैं ! प्रेम का एक अन्य रूप अखबारों के माध्यम से मालूम होता रहता है. कहीं पति ने प्रेमिका के साथ मिलकर पत्नी की हत्या कर दी, कहीं पत्नी ने प्रेमी के साथ मिलकर पति को मार डाला, कहीं किसी लड़के ने अपनी प्रेमिका को पाने में असफल रहने पर उसके चेहरे पर तेजाब फेंक दिया ! न जाने कितने प्रसंग पढ़ने-सुनने को मिलते हैं, जिन्होंने प्रेम जैसी दुर्लभ नैसर्गिक घटना को घृणित हिंसा में तबदील कर दिया है. ये समर्पण विहीन, उच्छृंखलता से युक्त, अमानवीयता को बढ़ाने वाली घटनाएँ प्रेम कैसे हो सकती हैं ? 
कहीं अगर वास्तव में प्रेम की ज्योति फूटती है तो परिवार, समाज की ओर से कठोर घेराबंदी शुरू हो जाती है. जाति, धर्म, कुल, गोत्र, हैसियत आदि के घेरे में प्रेम का दम घुटने लगता है. परिवार में विशेषकर लड़कियों की भावनात्मक ब्लैकमेलिंग शुरू हो ‘अब परिवार की इज्जत तुम्हारे हाथ में है’, ‘तुम ऐसा करोगी तो समाज में हमारी नाक कट जायेगी.’ अगर परिवार में कुँवारी बहनें हैं तो कहा जाता है कि तुम्हारे इस गलत काम से उनकी शादी में मुश्किलें होंगी. गली-मुहल्ले की विचारशून्य स्त्रियाँ विशेष तौर पर ऐसी लड़कियों पर छींटाकशी करती नजर आती हैं. सवाल है कि ऐसी नाक किस काम की जो दो कौड़ी के रूढ़िवादी मूल्यों पर कट जाती हो ! अगर इसी आधर पर दूसरी लड़कियों की शादी नहीं होती हो तो न हो. ऐसी सड़ी हुई मानसिकता वाले परिवार में विवाह कोई शुभ परिणाम लेकर नहीं आयेगा.
प्रेम के खतरे को भाँपते हुए समाज का एक बड़ा हिस्सा लड़के-लड़कियों की शादी समय से पूर्व कर देना ही श्रेयस्कर समझता है. विशेषकर लड़कियों के मामले में कहीं ‘ ऊँच-नीच हो गयी तो’ वाली धारणा काम करती है. इसके पीछे सेक्स संबंधी पवित्राता की धारणा छिपी रहती है. हमने एक सामान्य, सहज , प्राकृतिक क्रिया-व्यापार को पवित्रता और अपवित्रता में विभाजित कर दिया है. एक ही कृत्य विवाहोपरांत पवित्र हो जाता है और विवाह के पहले अपवित्र, पाप और कलंक ! इस अतर्कपूर्ण संकीर्ण व्यवस्था ने समाज को अधिकाधिक कामुक बनाया है और मन लायक जीवन साथी चुनने में व्यवधान खड़ा कर दिया है. स्त्रियों के गुलाम होने का यह एक बड़ा कारण है क्योंकि पवित्र बने रहना उसका सबसे बड़ा गुण माना जाता है ! वह उसकी ‘इज्जत’ है !
दो प्रेमियों की संतान यदि विवाह के पूर्व जन्म ले तो उसकी दुर्गति तय है. जायज-नाजायज जैसे क्रूर शब्द हैं उसके लिए. एक निर्दोष शिशु के लिए ऐसे शब्द ! जायज-नाजायज की इस अविवेकपूर्ण अवधारणा के कारण न जाने कितनी भ्रूण-हत्याएँ होती हैं ! अब एक नजर वैध संतानों पर ! जहाँ पति-पत्नी में दिन-रात कलह और कोहराम मचा हो, एक-दूसरे की अस्मिता और स्वतंत्रता के प्रति सम्मान का कोई भाव न हो, ऐसे प्रेमशून्य दम्पतियों को नये जीवन को जन्म देने का कोई अधिकार नहीं है. जो स्वयं प्रेमपूर्ण नहीं हो सकते, उन्हें एक शिशु के प्रेमपूर्ण लालन-पालन की जिम्मेदारी कैसे दी जा सकती है ?
विवाह की परंपरा इतनी पुरानी और सुविधाजनक है कि विशेषकर स्त्री की मानसिक दशा ऐसी हो जाती है कि वह पति नामधारी व्यक्ति को ही अपना सर्वस्व समझने लगती है. तमाम सामाजिक-आर्थिक दिक्कतों के कारण नीरस , विकासशून्य संबंध निभाये जाते हैं . इस संबंध-निर्वाह को ही प्रेम समझ लिया जाता है. समय के अंतराल में एक साहचर्यगत लगाव हो ही जाता है. लेकिन यदि यही प्रेम होता तो परिवार नामक सदियों से चली आ रही संस्था पितृसत्तात्मक नहीं होती क्योंकि प्रेम में दोनों पक्ष बराबर होते हैं. यदि यही प्रेम होता तो नारियों की दशा सुधारने के लिए तमाम आंदोलन नहीं चलाने पड़ते क्योंकि प्रेम में स्वाभाविक रूप में दूसरे के विकास की चाहना होती है. यदि यही प्रेम होता तो समाज में वेश्यावृत्ति जैसी घृणित प्रथा नहीं होेेती, क्योंकि सिवाय प्रेम के कोई ऐसी शक्ति नहीं जो स्वाभाविक एकनिष्ठता उत्पन्न कर सके. यदि यही प्रेम होता तो जाति, कुल, गोत्र, दहेज जैसी तमाम खोखली रूढ़ियाँ नष्ट हो चुकी होतीं. अगर यही प्रेम होता तो पति-पत्नी एक-दूसरे के अन्यत्र संबंधों पर मूर्खतापूर्ण चैकीदारी नहीं करते, क्योंकि प्रेम हमेशा दूसरे पक्ष को स्वतंत्रता देता है. लेकिन जब समाज में झूठी प्रतिष्ठा के लिए किसी भी तरह संबंध निभा लेना ही मूल्यवान हो तो सामान्य आदमी विवाह का जुआ ढोने में ही सुख समझता है. उसकी स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे किसी कैदी को वर्षों तक अँध्ेारी कोठरी में जंजीरों से बाँधकर रखा जाय तो वह उसी अवस्था का आदी हो जाता है और उसके भीतर विद्रोह की चेतना समाप्त हो जाती है. 
एक ही सवाल बार-बार उठता है कि प्रेम विहीन विवाह का मोल क्या है ? राम और सीता का विवाह इसलिए मूल्यवान है कि उन दोनों में प्रेम है. प्रेम के कारण ही वन के दुख उन्हें दुख नहीं मालूम पड़े. राम जब वन के क्लेश का वर्णन उनके सामने करते हैं तो सारे भय, विषाद और परिताप को सीता एक पंक्ति में खारिज कर देती हैं- प्रभु बियोग लबलेस समाना. सब मिलि होहिं न कृपा निधाना
प्रेम ने वन के सारे दुखों को फीका कर दिया. फीका ही नहीं किया, जंगल में मंगल और मोद की सृष्टि की. राध और कृष्ण के बीच कोई वैवाहिक संबंध नहीं था. ये देानों भारतीय जनता के आराध्य हैं, प्रेम के कारण. तो संबंध महत्वपूर्ण होता है प्रेम के कारण और इस प्रेम की प्रगाढ़ता के लिए दोनेां पक्षों के बीच भावात्मक और बौद्धिक तल का एक होना जरूरी होता है. जहाँ-जहाँ भी उत्कृष्ट प्रेम के फूल खिले हैं, वहाँ-वहाँ ये दोनों चीजें अनिवार्यतः उपस्थित रही हैं. शिव अगर योगी हैं तो पार्वती भी तपस्विनी हैं. राम-सीता, कृष्ण-राधा, शिव-पार्वती की विलक्षण जोड़ी तल की एकता से पैदा हुई है. कल्पना कीजिए कि सीता का विवाह अगर रावण से हो गया होता तो उसका सारा व्यक्तित्व ही नष्ट हो गया होता. मंदोदरी कभी सुख से नहीं रह सकी. 
विषम विवाह विवाहेतर संबंधों को जन्म देने का एक बड़ा कारण है. ऐसे संबंध पति-पत्नी के बीच भयंकर कष्ट का सूत्रपात करते हैं. गाली गलौज, मारपीट से लेकर केस मुकदमे तक की नौबत आती है. पति-पत्नी की मानसिक बनावट में यह बात गहराई से बैठी रहती है कि अमुक मेरे पति या मेरी पत्नी है, उन्हें सिर्फ मुझसे प्रेम करना चाहिए. इस एकाधिकार भावना में मनुष्य जलता रहता है. एक क्षण भी यह उदारतापूर्वक यह सोचने की जरूरत नहीं समझी जाती कि किसी के हृदय पर जबर्दस्ती अधिकार कैसे किया जा सकता है ? किसी ने आपके लिए हृदय नहीं खोला तो बाहर से उसे खोलने का कोई उपाय नहीं है. दिनकर ठीक कहते हैंः- बाहर साँकल नहीं जिसे तू खोल हृदय पा जाये, इस मंदिर का द्वार सदा अंतःपुर से खुलता है. 
यह भी स्वाभाविक है कि वैवाहिक संबंध के भीतर साथ रहते-रहते थोड़ा लगाव हो जाता है और उस व्यक्ति को अन्यत्र कदम बढ़ाते देख ईष्र्या होती है. इस ईष्र्या-लता में सामाजिक स्थिति और कानूनी व्यवस्था खाद-पानी का काम करती है. यह जहरीली लता इस कदर फैल सकती है कि उसकी जकड़न में कभी-कभी पूरा परिवार ही नष्ट हो जाता है. समाज और कानून के पास दो अनचाहे व्यक्तियों को एक साथ रहने पर मजबूर करने का बल तो है, लेकिन दोनों के बीच प्रेम पैदा कैसे हो यह कला उसके पास नहीं है. वास्तविक शक्ति तो प्रेम कला है, जिसका अभाव समाज को झुलसा रहा है. सेक्स, प्रेम और विवाह से जुड़े सामाजिक ढाँचें में संपूर्ण क्रांति की जरूरत है. ऐसी स्थिति पैदा करने की जरूरत है जिससे प्रेम का वातावरण बने और उससे विवाह निकले. जब प्रेम हर कसौटी पर खरा उतरे तब विवाह हो. क्योंकि हजारों साल के इतिहास में हमने देखा कि परंपरागत विवाह से प्रेम नहीं निकल पाया है. प्रेम एक विरल घटना होकर रह गया है. प्रेमपूर्ण शारीरिक संबंध सुंुदर है चाहे वह विवाह के भीतर हो या बाहर. सभी चाहते हैं कि हम किसी को प्रेम करें, कोई हमें प्रेम करे. लेकिन ऐसा नहीं हो पाता. क्यों , प्रेम की शीतल धारा को किस पत्थर ने रोक रखा है ? प्रेम-धारा के मार्ग में अटके उस पत्थर को हटाना पड़ेगा. हम जरा उदार बनें, खुद प्रेम से जीयें और दूसरों को जीने दें. तभी यह जला हुआ जगत वृंदावन बन सकता है.


17 टिप्‍पणियां:

  1. abhi jo tippaniyan bheji gayi thi unhe galti se maine aswikar kar diya. rupesh shrivastava, ab inconvenienti ur prabhat ji tippaniyan thi. main mafi chahoongi. ab we tippaniyan prakasit nahi ho pa raaahi hain. kya karoon?

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  2. सुन्दर लेख

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  5. ज्ी हां प्रेम की परिभाष आपने सही रखी है परन्तू एक बात जो मैं कहना चाहूंगा वह है प्रेम किसी भी परिभाषा और किसी भी कारण से परे है और इसका उदाहरण आपसे बेहतर कोई नहीं हो सकता। आपके ब्लॉग पर आचार्य रजनीश की तस्वीर देख कर काफी प्रशन्नता हुई। रही बात स्त्रीयों की पवित्रता की तो यह सबसे बड़ा कारण समाज के पिछड़ने का। वह समाज जो इस तरह का मापदण्ड बनाया स्वंय गंदगी में गिरा हुआ है। हमारे समाज में यदि ढक कर किया जाय तो सभी काम सही है नहीं ऐसा क्यों होता कि ससुर और बहू का संबध्ंा चोरी चोरी चलता रहता है और समाज चटकारा लेता रहता है। रही बात समाज के बदलने का यह तभी संभव है जब हर एक आदमी अपने अंदर की बात को सुने प्रेम को कोई नहीं नकारता पर अपने पर पड़ते ही समाज को सामने ले आता है।

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  6. मनुष्य,जानवर,समाज,परिवार,प्रेम,काम,बंदिश,आज़ादी,विवाह,प्रश्नवाचक चिह्न,सुख,दुःख,नैसर्गिक,कुदरती..... मटुक,जूली... सुन्दर लेख,प्यारा लेख,क्रान्तिकारी लेख......
    सप्रेम
    डा.रूपेश श्रीवास्तव

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  7. Both of you are an ideal couple . I pray God to give one lover like Julie. Please give me blessing and wish for me- prabhakar nandan

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  8. आप आदर्शवादी हैं, पर मानव स्वाभाव नहीं है. हम सब अन्दर से वानर हैं, हमारे अन्दर का जानवर रह रह कर सामने आता है. प्रकृति ने हमें ऐसा ही बनाया है. स्त्री और पुरुष दोनों में प्रेम, सेक्स, इर्ष्या, हिंसा, स्वार्थ, आकर्षण, लालच जैसी भावनाएं एक दूसरे से गुंथी हुई हैं. मानव हजारों सालों में न बदल सका है न कभी बदल पाएगा. बस अपनी उन्नत बुद्धि का प्रयोग वह अपने कृत्यों को सही ठहराने के लिए करता रहेगा.
    ab inconvenienti

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  9. प्रभाकर नंदनजी
    प्रत्येक व्यक्ति को उसके तालमेल का साथी मिले , तभी गहन प्रेम संभव होता है. आपको भी अपने मेल का साथी मिले. शुभकामनायें
    जूली

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  10. साथीजी, शुक्रिया. आपकी बात से पूर्ण सहमति है.

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  11. 2-3 din se soch raha huN ki aapke lekh par tippni karuN. Par jahaN lagbhag har baat se sahmati ho vahaN kya tippni ki jaaye! Is liye koi tippni nahiN kar raha.

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  12. जूली जी !! इस सुंदर अभिव्यक्ति के लिए बधाई स्वीकार करें । आपने प्रेम जैसे विषय को अपनी अंर्वेदना से लिखा और संवारा है । आपके विचारों की उर्वरा भूमि ओशो की है और इस बनावटी , खोखले समाज पर वर्षों से पड़े अज्ञान के पत्थर को हटाने में हमें ओशो जैसे संबुद्ध पुरुषों की जरूरत है । यह समस्या पंडित, पुरोहित और राजनेताओं से हल नहीं हो सकती । ये तो हमेशा से मानव आत्मा के शोषक रहें हैं । आपने प्रेम पर लिख कर कम से कम ब्ला़ग पढ़ने वालों को तो प्रेम पर पड़े इस पत्थर को हटाने का जो संदेश दिया है, वह सराहनीय है । आज के युवा वर्ग से हम अपेक्षा कर सकते हैं कि वह समाज की इन गली-सड़ी और प्रेम-विरोधी परम्पराओं को ध्वस्त करने के लिए अपने विद्रोह का दमन न करें और प्रेम के पक्ष में खड़े होकर अपनी अंतस-चेतना के विवेक से निरंतर क्रांतिकारी बने रहें । एक सुंदर समाज की संरचना प्रेम की नींव पर ही खड़ी की जा सकती है । उम्मीद है अपने विचार इसी प्रकार रखती रहेंगी और इस शुभ क्रांति के दीप को हमेशा यूँ ही प्रज्वलित बनाए रखेंगी ।

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  13. My comments are not about your blog.. I wanted to write to you since a long long time and I want to congratulate you for getting your job back in the university ..I was so shocked by what happened ..i used to get nightmares about it... If I would have been at your place I for sure would not have been so brave and would have just committed ...don't know would have done what ...I just want to say I dont know what you did was right or wrong and I don't care ... I want to tell you that I love you both ..very much and I will love both of you for a long long time... May god bless you both and keep you happy ..

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