बुधवार, जनवरी 13, 2010

प्रेम का अपमान और मीरा का सम्मान ! juli

मीरा का नाम आते ही हमलोग बड़े भावविभोर हो जाते हैं. उनके अद्भुत प्रेम की चर्चा शुरू हो जाती है. उनके गीत, उनकी मस्ती, उनकी भक्ति सब हमें अद्वितीय मालूम पड़ती है. आधुनिक स्त्री-विमर्श के लिए वह महान् प्रेरणा के रूप में दिखाई पड़ती है. मीरा के जीवन के वर्णनों से संबंधित अनेक किताबें हैं, राजस्थान में शोध-संस्थान है, पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित निबंधेां, गोष्ठियों आदि की तो केाई गिनती ही नहीं. लेकिन जरा दो मिनट ठहरकर सोचना चाहिए कि हम किस स्त्री की पूजा कर रहे हैं ? उस स्त्री की जिसने अपने पति को पति नहीं माना ! उस स्त्री की जिसने पति के रहते किसी अन्य पुरुष से प्रेम किया ! उस स्त्री की जिसने प्रेम के नाम पर ‘लोकलाज कुल की काणि’ छोड़ दी ! उस स्त्री की जो घर की दहलीज छोड़ गलियों में बावरी-सी साधु-संतों के संग नाची ! क्या हम अपने घर-परिवार में ऐसी स्त्री को स्वीकार सकते हैं ? क्या ऐसी स्त्री को हम परिवार-समाज को कलंकित करने वाली नहीं मानते ? तब निश्चय ही हमें उन्हें आदर देने की भूल नहीं करनी चाहिए. ऐसा करना पाखंड होगा क्योंकि हम बिल्कुल ऐसे नहीं हैं. हम तो विवाह मात्र को सबसे बड़ा पुण्य समझते हैं जिसे हर कीमत पर निभाया जाना चाहिए. प्रेम तो हमारे लिए कुल-खानदान की इज्जत पर बट्टा लगाने वाला है. विवाहित व्यक्ति का प्रेम और भी बड़ा अपराध है. सारांश यह कि हम बहुत ही मान-मर्यादा वाले, हिसाबी-किताबी, सभ्य लोग हैं और मीरा जैसी स्वयं में मस्त, बेपरवाह और विद्रोही स्त्री से हमारी बिल्कुल पटरी नहीं बैठती. इसलिए जैसा कि मैंने पहले कहा हमें मीरा के बारे में बात बिल्कुल बंद कर देनी चाहिए और अगर करते हैं तो ठीक-ठीक समझना चाहिए कि मीरा क्या हैं ? क्योंकि बिना समझ के कोई भी पूजा मात्र रूढ़ि होती है. उससे कोई रूपांतर नहीं घटित होता. 
संसार का प्रत्येक महान व्यक्ति हमेशा अपनी बनाई राह पर चला है. उसने वह किया है जिसकी गवाही उसकी आत्मा ने दी है. मीरा की क्रांतिकारिता की शुरूआत भी यहीं से होती है. कृष्ण से प्रेम उनका मूल स्वभाव था, इसलिए उन्होंने परवाह नहीं की कि वे भोजराज की पत्नी हैं और उन्हें उसी तरह जीना चाहिए. नहीं, मन जिसके रंग में रँगा हो उसे ही पति माना जाना चाहिए, दूसरा कोई पति कैसे हो सकता है ? मीरा साफ कहती हैं -  
मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई  
जाके सिर मोर मुकुट , मेरो पति सोई
यह विवाह के विरुद्ध प्रेम का उद्घोष है. प्रेम मूल्यवान है, उसके होने से ही संबंधों का मूल्य है. उसके बिना सब निष्प्राण है. जीवंत व्यक्ति जीवंतता को मोल देता है. इसलिए मीरा-सी जीवंत स्त्री प्रेम को चुनती है. आज के तथाकथित आधुनिक महिला संगठनों को मीरा की इस असल आधुनिकता से सीख लेनी चाहिए जिनके लिए विवाह ही मात्र नैतिक होता है, उससे इतर प्रेम अनैतिक. संभवतः मीरा को वे इसलिए स्वीकारती हैं कि उनके कृष्ण तो भगवान थे. वे अगर सामान्य व्यक्ति होते तब बहुत संभव था कि यह प्रेम उनके गले नहीं उतरता. इसलिए इस बात पर विचार करना जरूरी है कि कृष्ण यदि सामान्य व्यक्ति होते तब क्या होता ? तब क्या हम मीरा को स्वीकारते ? शायद नहीं. इसलिए मुझे लगता है कि मीरा की सच्ची स्वीकृति तब होगी जब हम सही अर्थों में प्रेम को स्वीकृति देंगे. प्रेम को परम नैतिक मूल्य मानेंगे. उसे ही नैतिकता का आधार बनाएँगे. प्रेम का उत्सव मनाएँगे जैसे मीरा मनाती हैं. नाच उठती हैं अपने गिरधर के आगे-  
पग बाँध घूंघर्यां नाच्यां री 
यह प्रतिदिन का नाच, यह उत्सव, यह आंतरिक मस्ती प्रेम का लक्षण है. हो सकता है कि सबके भीतर मीरा जितना प्रेम न हो पर शुरुआत तो हो सकती है. वे सागर हैं किंतु बूँद का भी स्वागत तो हो सकता है. लेकिन स्वागत कभी नहीं होता, होता है तो सिर्फ अपमान. मिलती है तो सिर्फ लांछना, बदलचलन कहलाने का पुरस्कार. मीरा गिरधर के हाथ बिक गयी थीं पर लोगों ने तो उन्हें बिगड़ी ही कहा. उन्हें मारने के सारे इंतजाम किये गये. राणा ने विष का प्याला भेजा. आज भी हमारा समाज बदला नहीं है. क्या आज प्रेमियों को मारने-सताने के सारे इंतजाम नहीं होते ? किंतु ऐसे ही इंतजामेां के बीच मीरा की स्थिति क्या है ? मीरा विष का प्याला पीती हैं और हँस पड़ती हैं- बिख रो प्यालो राणा भेज्यां, पीवां मीरा हांसां री
अद्भुत है यह हँसी ! जब भीतर गहनता में प्रेम बसा हो तो बाहर का विष कैसे प्रभावकारी हो सकता है ? जागतिक विष मीरा के प्रेम रसायन से मिलकर अमृत बन जाता है. यह सच्चे प्रेमी की भाव-दशा है. वहाँ सारी बाधाएँ प्रेम के पर्वत पर चढ़ने की सीढ़ी बन जाती हैं. बदनामी भी मीठी लगने लगती है-  
राणाजी म्हाने या बदनामी लगे मीठी  
कोई निन्दो, कोई बिन्दो, मैं चलूँगी चाल अपूठी 
मीरा की बदनामी कितनी हुई होगी , इसका सिर्फ अनुमान किया जा सकता है. उनका संघर्ष चैतरफा था. उनके विरोध में राणा की राजसत्ता थी, सिसौदिया कुल की मर्यादा थी, पुरुष प्रभुत्व की सत्ता थी और सामंती समाज की रूढ़ियाँ भी. इनमें से कोई एक भी स्त्री की स्वतंत्र चेतना की हत्या करने में सक्षम है. फिर जहाँ चारो एकत्र हों वहाँ आतंक का क्या कहना ! मीरा ने इन सबका सामना किया और कई बार आगे बढ़कर इन्हें ललकारा भी- सीसोद्यो रूठ्यो म्हांरो काई कर लेसी।  
म्हें तो गुण गोविन्द का गास्यां , हो माई ।।
लोकलाज कुल मर्यादा की दुहाई देने वालों को उन्हेांने बेबाक चुनौती दी-  
लोकलाज कुल काण जगत की, दइ बहाय जस पाणी।  
अपणे घर का परदा कर ले, मैं अबला बौराणी ।। 
इतनी स्वतंत्र चेतना वाली मीरा प्रेम में गुलाम बन जाने को तैयार होती हैं. वह कृष्ण की चाकरी करना चाहती हैं- म्हाणे चाकर राखो जी 
प्रेम में गुलाम होने का रस है. यह हमारे सांसारिक संबंधों के ठीक विपरीत स्थिति है. हम अपने संबंधों में खुद मालिक होना चाहते हैं. ंिकंतु प्रेमी अपनी माल्कियत दूसरे को सौंप देता है. वहाँ चेष्टा खुद दास बन जाने की होती है, दूसरे को दास बनाने की नहीं. इसलिए प्रेम स्वतः अहंकार से मुक्त करने लगता है. इस अहंकार से जितनी मात्रा में मुक्ति मिलती है, उतना ही प्रेम शिखर पर चढ़ता चला जाता है. प्रतिक्षण आनंद का क्षण हो जाता है. मीरा के घुँघरु ऐसे ही आनंद में बजे थे, उनके गीत ऐसे ही चरम प्रेम में फूटे थे जिसमें सारे विरोधों का कोलाहल दब गया. वैसे प्रेम घुँघरु आज कितने पैरों में बँधेंगे ? उस बंधनहीन प्रेम के नृत्य में क्या हम झूमने को तैयार हैं ? मीरा के घुँघरु आज भी पुकार रहे हैं ... आज, पटना, 12.07.09


11 टिप्‍पणियां:

  1. ek bahut hi sarthak lekh likha hai magar kya koi prem ko samajh paya hai .........nhi agar jisne samajh liya to wo phir is sansaar se alag hi ho gaya ya kaho use phir pata hi nhi hota ki sansaar kahan hai wo aur prem dono hi ek doosre ka pratiroop ho jate hain.......kahin koi kami nhi sari jigyasayein shant ho jati hain.

    उत्तर देंहटाएं
  2. मटुक सर , प्रणाम
    आपने मीरा पे बहुत अच्छी बात कही .बहुत कम लोग है जो इसे बात को गहराई से समझेंगे .यहाँ सब उथले उथले जीते है

    कौन है दुनिया में जो दर्द को समझेगा ,
    किया है जिसने प्रेम वही प्रेम को समझेगा .........

    आप जिस दुनिया को समझाना चाह रहे है . वो कभी नहीं समझेगी . कृष्ण समझा गए ,मीरा समझा गयी , ओशो समझा गए .किसने समझा??? .जब इनसे नहीं समझी तो आपसे क्या समझेगी . आप क्यों अपनी उर्जा नष्ट कर रहे है .जीवन अनमोल है .जो सम्पदा इश्वर ने आपकी झोली में डाली है उसका आनंद ले . लोग तो कहते रहते है कहते रहेंगे . जब कोई दूसरा प्रसंग मिल जायेगा तो आपको छोड़ कर वहा लग जायेंगे . आप तो किस्मत वाले है जो आपको देर से ही सही प्यार तो मिला . यहाँ तो जाने कितनी जिंदगिया बर्बाद हो गयी अपने प्यार को खोजते खोजते .
    आपको बहुत बहुत शुभकामनाये

    उत्तर देंहटाएं
  3. मीरा हो या जूली, प्रेमपरीक्षा तो सभी को देना पड़ा है, और फिर मीरा जिस प्रेम का रसास्वादन कर चूकी थी उनके लिए मान क्या अपमान क्या। आपने भी इस चीज को भोगा है इसलिए इस समाज को कोसने से कुछ नहीं होगा और फिर कृष्ण के प्रेम की बात आएगी तो समाज उसे तो स्वीकार कर लेगा क्योंकि कृष्ण भगवान है पर आम आदमी का प्रेम भी मीरा के प्रेम से इतर नहीं होता और इसे समाज के स्वीकारने अथवा ठुकराने से कोई अंतर नहीं पड़ता।

    उत्तर देंहटाएं
  4. अरुण साथीजी और अनिरुद्ध पांडेजी
    आभार. समाज को कोसना या समझाना लक्ष्य नहीं है. आज तक कोई भी नहीं समझा पाया. हमें खुद ही बहुत कुछ समझना है. लेख सिर्फ जितना समझा है, जितनी दिल की बात है बस उतना भर रखने का प्रयास है. उसमें कभी आक्रमण भी होगा ही. वह जरूरी होता है कई बार.
    जूली

    उत्तर देंहटाएं
  5. वंदनाजी को प्रणाम और आभार. जहाँ सारी जिज्ञासाएँ शांत हो जाएँ, प्रेम का वह रूप अभी बहुत दूर है. अभी तो अपनी ही चेतना ही ऐसी गहराईयाँ हैं जहाँ पहले कभी नहीं देखा था. जहाँ सवाल दर सवाल आते हैं. फिर जवाब भी आ जाते हैं. कभी और उत्तरों की प्रतीक्षा रहती है. लगता है, प्रेम में दूसरा माध्यम हो जाता है, उतरना तो अपने ही भीतर होता है. जो व्यक्ति इसमें सच में सहायक हो जाता है, उसी की खोज चलती रहती है. सौभाग्य है कि वह मिला है.
    जूली

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपका प्रेम मीरा की गहराइयाँ ले और आपको अपने अंतस में उसके दर्शन हों जो सर्वत्र ब्रह्माण्ड में ...अनंत विस्तार लिए हुए है ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ... चलो हम भारत देश को वस्तुत: गण के तंत्र में विकसित करें ।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत ही सुंदर विश्‍लेषण है। इससे पहले मैंने मीरा के व्‍यक्तित्‍व के बारे में इतना सोचा नहीं था। आज सैकड़ों साल बीतने के बाद भी मीरा जैसे व्‍यक्तित्‍व की स्‍वीकृति अपने समाज में मिलने की कल्‍पना भी नहीं की जा सकती।

    आपका पूरा ब्‍लॉग और इसका एक-एक लेख पूरी तरह से मौलिक विचारों से ओतप्रोत है। पढ़ने पर लगता है कि कितना सही और सटीक विश्‍लेषण है। यह अपने आप में एक पाठशाला है जिसमें अपने मन की दुविधा, जीवन के विरोधाभास, रूढ़‍िवाद, ढोंग आदि के बारे में मुक्‍त सोच मिलती है। मुझे तो यह लगता है कि हर किशोर, युवा व्‍यक्ति को आपका पूरा ब्‍लॉग अद्योपांत पढ़ना चाहिए। इससे उसे अपनी स्‍वतंत्र मानसिकता विकसित करने में मदद मिलेगी। आपका ब्‍लॉग लेखन एक नई पीढ़ी तैयार करने में अपना योगदान देगा और नई क्रांति की भूमि तैयार करेगा। इसे जारी रखें। साथ ही समसामयिक घटनाओं पर भी अपना विश्‍लेषण प्रदान करते रहें।

    - आनंद

    उत्तर देंहटाएं

ब्लॉग आर्काइव

Add-Hindi



Subscribe to updates