मंगलवार, जनवरी 26, 2010

गणतंत्र के साठ साल का हाल

हमारे गणतंत्र का साठ वर्ष आज पूरा हो रहा है. स्वाभाविक है कि पिछले साठ सालों में हमारी यात्रा किस दिशा में हुई है जरा उस पर गौर करें. हमारी यात्रा हमें किस दिशा में ले जा रही है, उस पर थोड़ा ध्यान दें. यह आकलन इसलिए जरूरी है कि अगर हमारी दिशा गलत है तो हम चेतें और उसे फौरन बदलें. 
सबसे पहले हमारा ध्यान देश की बढ़ती आबादी पर जाता है. आज से साठ साल पहले हम लगभग चालीस करोड़ थे और आज हम उससे लगभग तीन गुना अधिक हैं. यानी हर साल लगभग सवा करोड़ की वृद्धि! आदमी की जनसंख्या के विकास में हम पूरी दुनिया में नंबर वन हैं. जब आदमी के विकास में हम चोटी पर होंगे तो आदमियत घाटी में होगी. गुणवत्ता गिरेगी. पिछले साठ सालों में जनसंख्या बेतहाशा बढ़ी है , गुणवत्ता घटी है. आदमी के जीने के लिए पर्याप्त जगह चाहिए. किसी सुरम्य प्राकृतिक वातावरण में रहने के बदले मनुष्य शहरों में कबूतरखाने जैसी बहुमंजिली इमारतों के अपार्टमेंटों में रहने के लिए विवश है. सड़कों पर जाम है, हर जगह भीड़ ही भीड़ है. जब गाड़ियों की भरमार होगी, धुओं की बौछार होगी तो नयी असाध्य बीमारियों का दीदार तो होगा ही. जब तक उसकी दवाएँ खोजी जाएँगी, तब तक दूसरी असाध्य बीमारियाँ हाजिर हो जायंेगी. उत्पादन खूब होगा, लेकिन भुखमरी और गरीबी रह जायेगी. मनुष्य आपस में मारा-मारी करेगा खाने के लिए, रहने के लिए, शिक्षा के लिए, इलाज के लिए, नौकरी के लिए , आरक्षण के लिए. लेकिन किसी के पास कोई समाधान न होगा. सरकार लाचार होगी. नये-नये आश्वासनों के भ्रमजाल में जनता को उलझाये रखेगी. जहाँ पशु की तरह आदमी रहेंगे, वहाँ चिंतन का स्तर गिरेगा. भीड़ में चिन्तन नहीं होता. जहाँ वेद लिखा गया था, वह अरण्य था, आबादी नगण्य थी. तभी वेद रचने की पृष्ठभूमि बनी. जब बुद्ध थे और बुद्ध के टक्कर के व्यक्ति सिर्फ बिहार में कम से कम आठ-दस थे. तो उस समय देश की आबादी लगभग दो करोड़ थी. भारत में जब आधुनिक पुनर्जागरण आया तो उस समय अविभाजित भारत यानी पाकिस्तान , बंगलादेश आदि समेत आबादी लगभग तीस-पैंतीस करोड़ थी. 
आजादी के बाद हमने आबादी में विश्व रिकाॅर्ड बनाया. इस पर नियंत्रण पाने की शक्ति मौजूदा राजनीति ने खो दी है. दरअसल सारी गिरावटों के मूल में राजनीति है. राजनीति इतनी गिरी हुई इसलिए है कि हमारे समाज में यह धारणा बद्धमूल है कि अच्छे लोगों के लिए राजनीति नहीं है या उनके लिए वहाँ कोई जगह नहीं है. आजादी के बाद जो इस देश का दुर्भाग्य रहा वह यह कि धीरे-धीरे राजनीति से अच्छे आदमी विदा होते चले गये. जब आजादी की लड़ाई चल रही थी तो उसमें अच्छे-बुरे सब तरह के लोग शामिल थे. नेतृत्व अच्छे लोगों के हाथ में था. गाँधी, सुभाष, जयप्रकाश, नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद, लोहिया आदि न जाने कितने महापुरुषों ने राजनीति की बागडोर अपने हाथों में थाम ली थी. जब तक आजादी प्राप्त हुई तब तक कुछ लोग चल बसे, कुछ राजनीति से अलग हो गये और शेष सत्ता भोग में लीन हो गये, राजनीति में अच्छे लोगों का प्रवेश धीरे-धीरे घटने लगा और अब स्थिति यह है कि तमाम सत्ता लोलुप, स्वार्थी लोगों और अपराधकर्मियों से राजनीति भर गयी. हर पाँचवे वर्ष राजनीति में ज्यादा खराब लोग आते गये. अच्छे लोग राजनीति से भयभीत हो गये. वे पलायनवादी हो गये. यह कैसी विडंबना है कि एक तरफ तथाकथित अच्छे आदमी राजनीति को गाली देते हैं तो दूसरी तरफ यह भी कहते हैं कि राजनीति में अच्छे आदमी को नहीं जाना चाहिए. अच्छे आदमी को राजनीति में जाने से जब लोग रोकते हैं तो राजनीति में बुरे लोग घुसेंगे ही. फिर यह कहना कि राजनीति का अपराधीकरण हो गया है, असंगत बात है. मेरी धारणा है कि राजनीति में खराब लोगों के घुसने के लिए जिम्मेदार अच्छे लोग हैं, क्योंकि उन्होंने ही उनके लिए जगह खाली कर दी. 
आज अच्छे आदमी की एक नुपंसक परिभाषा हमारे हाथ में है. अच्छा आदमी हम उसे कहते हैं जो झगड़ा-झंझट से परहेज करता है. भगोड़े को हम अच्छा आदमी कहते हैं. हमें यह बदलना होगा. हम अच्छा आदमी उसे कहेंगे जो बुराई से टक्कर लेगा, संघर्ष करेगा. जीवन का चाहे जो भी क्षेत्र हो, जो बुराई से लड़ने को तत्पर रहे उसे हम अच्छा आदमी कहेंगे. अच्छा आदमी आजकल उपदेश दे रहा है. उपदेश सुनने वाले भी उन्हीं की तरह कुछ मरियल लोग हैं. नहीं तो उपदेश सुनता कौन है ? अच्छे आदमी के हाथ में उपदेश नहीं ताकत आनी चाहिए. वह ताकत आयेगी राजनीति में भाग लेने से. राजनीति इतनी ताकतवर है कि जीवन का सबकुछ वही तय कर रही है. हमारा शरीर, हमारा मन, हमारा भाग्य, हमारा भविष्य सब राजनीति तय कर रही है. स्कूलों में, काॅलेजों में क्या पढ़ाया जाय, बच्चों के मन में कैसे विचार उत्पन्न किये जायँ यह सब राजनीति तय कर रही है. यही कारण है कि पिछले साठ सालों में राजनीति ने शिक्षा को बदलने का काम नहीं किया. जो शिक्षा अंग्रेजों के काम की थी वही भारतीय शासकों के काम की है. उसे बदलना खतरनाक है. स्वाधीन चेतना पैदा करने वाली शिक्षा, मनुष्य को एक सच्चा मनुष्य बनाने वाली शिक्षा की चर्चा भी नहीं होती. रद्दी और शातिर किस्म के राजनेता शिक्षा में परिवर्तन की बात नहीं करेंगे, वह अपने पाँवों खुद कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा. राजनेता की तो बात दूर भारत में एक भी शिक्षक शिक्षा में परिवर्तन के लिए इच्छुक नहीं है. उसे मोटी सैलरी चाहिए, आराम चाहिए. विश्वविद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों में राजनेताओं का चेला बनने की बेचैनी है. पद पाने की तिकड़म में मशगूलता है. शिक्षक शिक्षा में उत्सुक नहीं है. कुछ बन जाने के लिए पागल है. कैसे वाइस चांसलर बन जायँ, कैसे किसी बोर्ड के मेम्बर और चेयरमैन बन जायँ.
गणतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह हर व्यक्ति को समान सम्मान दे. उसकी नजर में प्रत्येक व्यक्ति बराबर है. क्या इस दिशा में हम आगे बढ़े हैं ? सत्ता में बैठते ही क्या आदमी तानाशाह नहीं हो जाता है ? एक दलित भी जब मुख्यमंत्री बनता है तो क्या सामंत का बाप नहीं हो जाता है ? क्या लोगों से वे अपनी पूजा नहीं करवाते ? उसके खिलाफ अखबार में बात आये तो क्या वे अखबार में विज्ञापन देना बंद नहीं कर देते ? उसके खिलाफ चुनाव में कोई खड़ा हो जाय तो डी.एम. रूपी नौकर के माध्यम से क्या उसका नामांकन गैरकानूनी तरीके से रद्द नहीं करवा देते ? 


क्या हमने पिछले साठ सालों में अपनी चुनाव प्रणाली बदली ? क्या वह धनपतियों, बाहुबलियों, धोखेबाजों और तानाशाहों को चुनने की प्रक्रिया नहीं है ? हर बीस वर्ष में एक पीढ़ी बदल जाती है. लेकिन क्या यहाँ के पद-पीड़ित नेता नयी पीढ़ी के लिए स्वेच्छा से पद छोड़ते हैं ? संसद में कितने बूढ़े हैं जो मौत के दिन गिन रहे हैं ? क्या वे देश की नयी पीढ़ी पर पत्थर नहीं बने हुए हैं ? शरीर काम नहीं कर रहा है, मस्तिष्क काम नहीं कर रहा है लेकिन सांसद बने हुए हैं !
पिछले साठ सालों में राजनीति व्यक्तिगत स्वार्थपरता की ओर केन्द्रित होती चली गयी. चुनाव जीतने के बाद हम अपना घर भरेंगे. अपने कार्यकर्ताओं का मुँह भरेंगे. बाकी देश भाड़ में जाय. सामूहिक सुख, सामूहिक आनंद, सामूहिक स्वतंत्रता की कोई कल्पना राजनीति के सामने नहीं है. अपना सुख, अपनी सुरक्षा, अपनी सुविधा से संबंधित विधेयक सर्वसम्मति से संसद में त्वरित गति से पारित होते हैं. एक अद्भुत समानता जरूर आ गयी है-सारे राजनीतिक दलों की विचारधाराएँ एक समान हो गयी हैं. दक्षिणपंथ और वामपंथ के भेद मिट गये हैं. पूँजीवादी और समाजवादी विचारधाराएँ मिलकर एक हो गयी हैं. पहले भी बहुत ज्यादा भेद कहाँ था ?
सुख सामूहिक ही हो सकता है. हमारा और आपका सुख अलग-अलग हो तो देश टूटेगा. भाषा के नाम पर, प्रान्तीयता के नाम पर राष्ट्र को तोड़ने की बात ज्यादा होने लगी है. बाहरी और भीतरी आतंकवाद जो पिछले साठ सालों में बढ़ता गया है, वह इस कुत्सित राजनीति की देन है. देश की सूरत बदल सकती है जब राजनीति बदले, कानून बदले, समाज बदले, शिक्षा बदले. यह सब केवल अच्छे आदमियों के राजनीति में प्रवेश से संभव है. अच्छा आदमी वह है जो किसी प्रकार की मनोग्रंथि से पीड़ित नहीं है, चाहे ग्रंथि हीनता की हो या उच्चता की. ग्रंथिग्रस्त आदमी खतरनाक होता है. वह पद पाने की दौड़ मंे अनिवार्यतः शामिल होता है. जब तक पद नहीं है, तब तक वह हीन बना रहता है. लेकिन पद पाते ही उच्चता से ग्रसित हो अधिनायक हो जाता है. अच्छा आदमी वह है जो अपने आप में तृप्त और आनंदित है. ऐसा आदमी न पद के लिए दौड़ेगा, न कठिनाई से भागेगा. गाँधी ऐसे ही आदमी थे. परिवर्तन जीवन का नियम है. इसलिए साठ सालों में कुछ परिवर्तन तो हुए हैं लेकिन क्रांति नहीं हुई है. भारत को एक क्रांति की जरूरत है. यह क्रांति गंभीर आदमी से नहीं होगी. जिंदगी को जो खेल समझता है, उससे होगी. क्रांति भयभीत आदमी से नहीं होगी. क्रांति पुराने मूल्यों को जीने वाले आदमी से नहीं होगी. क्रांति केवल उनसे होगी जो जनतांत्रिक मूल्यों को ठीक-ठीक समझते हैं और उसी के अनुरूप जीते हैं. क्रांति की दिशा में पहला कदम होगा गलत राजनेताओं और सत्ताधारियों को सम्मान देना बंद करना . शोषण से धन संग्रह करने वाले धनपतियों को सम्मान देना बंद करना. सच्चे, ईमानदार, मेहनतकश और सृजनशील लोगों को सम्मान देना शुरू करें तो एक महत्वपूर्ण क्रांति का सूत्रपात इतने से हो जायेगा.


3 टिप्‍पणियां:

  1. गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ.

    सादर

    समीर लाल

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  2. देश के 60वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर आपका यह आलेख स्वागत योग्य है । जनसंख्या-विस्फोट,राजनीति...जो आज भ्रष्टशासनतंत्र की नीति हो गई है, इसे अच्छे लोगों द्वारा ही बदला जा सकता है, लेकिन अच्छे लोग कौन ? जो सत्ता से बाहर हैं वे या जो सत्ता में आने को बेताब हैं ? अच्छा शब्द स्वयं स्थिति सापेक्ष और विषय सापेक्ष है । जो हमें राजनीति के बाहर रहता अच्छा लगता है, वही राजनीति में आते ही बुरा हो जाता है; क्योंकि उसके सुप्त स्वार्थ जाग जाते हैं । एक अच्छा आदमी, जो राजनीति में जाने के बाद भी अच्छा बना रहे दुर्लभ चीज है । बुद्ध और प्रज्ञाशील व्यक्ति ही ऐसे हो सकते हैं । लेकिन भीड़ बुद्धों को कब सम्मान देती है, वह तो उनके विदा होने पर उनकी पूजा ही कर सकती है । आज सर्वाधिक जरूरत है हर विवेकशील नर-नारी को गंदी राजनीति छोड़ कर अपनी अंतसचेतना से जीने की । स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि उन्हें 10 ऐसे व्यक्ति मिल जाएँ जो स्वचेता हों, तो वे एक नए विश्व का निर्माण कर सकते हैं । लेकिन उन्हें कहाँ मिले वे 10 लोग । सवा सौ करोड़ लोगों में क्या आज 500-550 लोग अच्छे और स्वचेता मिल पाएँगे , जो देश की बागडोर सम्हाल सकें या क्या भ्रष्टशासनतंत्र उन्हें निगल रहा है और आगे भी निगलता रहेगा ???

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  3. क्या बात है काफी दिन से आपका लेख नहीं आया ?
    होली के अवसर पर आप दोनों (एक ही ) को मेरी हार्दिक शुभकामनायें !! मित्रता की बात कह कर, कहीं भूल तो नहीं गए, याद दिला रहा हूँ !
    अगर कभी दिल्ली आना हो तो फ़ोन अवश्य करियेगा !
    सादर !

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