सोमवार, नवंबर 30, 2009

अपने स्वभाव के अनुसार चलना श्रेयस्कर

हमारे ब्लाॅग पर ‘ एक स्त्री का अतिवाद ’ शीर्षक लेख पढ़कर संजय ग्रोवरजी ने टिप्पणी भेजी है-
'' अगर तुलसीदास और बलात्कार-प्रसंग को छोड. दिया जाए तो बाक़ी के आपके लेख से मैं सहमत हूं। जहां तक बलात्कार की बात है तो हर उस क्षेत्र में जहां स्त्री के सामने या साथ पुरुष होगा, कम या ज़्यादा, बलात्कार के ख़तरे तो रहेंगे ही। इस तरह तो स्त्री कहीं जाए ही नहीं, घर में बैठे और यदा-कदा के ‘स्वैच्छिक’ बलात्कारों को भी झेले। दूसरे मेरा आपसे विनम्र निवेदन है स्त्री-पुरुष के मसलों को लेकर आप जो पारंपरिक भाषा या शब्दावली इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे बचें। एक ओशो-प्रेमी के मुख से ऐसी भाषा की अपेक्षा वे तो नहीं कर सकते जो ओशो को ठीक से जानते-समझते हैं। हो सकता आपको इस समाज नें कुछ कड़वे अनुभव या असहनीय ज़ख्म दिए हों पर उसका प्रत्युत्तर आप उसी समाज जैसी भाषा और मानसिकता में शामिल होकर तो न दें। और स्त्री-पुरुष मामलों में प्रकृति को भी इस तरह निर्णायक तत्व मत बनाईए। लैंगिक भिन्नता और गर्भधारण क्षमता को छोड़ दें तो कौन से गुण-दोष-स्वभाव वास्तव में स्त्री के हैं और से वास्तव में पुरुष के, इसे तय करने में इतनी जल्दबाज़ी न करें। आगे भी बात करेंगे।''



मित्रवर
आपके सुझाव के छिलके में सँजोये अपनत्व-रस का पान किया.
आपने तीन मुद्दे उठाये हैं- तुलसीदास, बलात्कार और स्त्री-पुरुष स्वभाव. इन तीनों पर मैं अपने विचार रख रहा हूँ.
ओशो तुलसीदास के विचारों से असहमत थे. उन्होंने तुलसीदास को लकीर का फकीर कहा है. ओशो के इस विचार से मैं सहमत हूँ. लेकिन ओशो ने तुलसीदास को बहुत बड़ा कवि माना है और शेक्सपीयर से उनकी तुलना की है. वे कबीर के बड़े प्रशंसक हैं, लेकिन कवित्व की दृष्टि से तुलसी को वे कबीर से बड़ा मानते हैं.
तुलसीदास का कवित्व जिन-जिन बातों में चमका है उनमें सर्वप्रमुख है उनका चरित्र-चित्रण-कौशल. उन्होंने पुरुषों के साथ स्त्रियों के शील, स्वभाव और तेज का ऐसा चित्रण किया है, जिसको पार करना आज तक किसी भी हिन्दी कवि के लिए संभव नहीं हुआ है. कौसल्या, सुमित्रा, सीता, मंदोदरी, शबरी, ग्राम-वधुएँ आदि स्त्रियों के प्रति जो ऊँचाई और सम्मान छलका है, वह बेमिसाल है. मैं तुलसीदास के द्वारा चित्रित इन स्त्रियों के सामने नतमस्तक हूँ.
आधुनिक युग के सबसे बड़े कवि माने जाने वाले निराला तुलसीदास से अभिभूत थे और इसकी अभिव्यक्ति उन्होंने अपने महाकाव्य ‘तुलसीदास’ में की है. आधुनिक युग की सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली उनकी कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ में उन्होंने ‘रामचरितमानस’ से कुछ शब्द और भाव लिये हैं. आधुनिक युग के एक बड़े कवि त्रिलोचन तुलसीदास पर अपना प्रेमाधिकार समझते हैं और बड़े गर्व के साथ उनके शब्द लेते हैं. उन्हीं तुलसीदास से आप मुझे वंचित करना चाहते हैं ? क्षमा करें, तुलसीदास मेरे सर्वप्रिय कवि हैं, उनके बहुत सारे पुराने विचारों से असहमत होने के बावजूद उनको मैं कभी नकार नहीं पाया हूँ. यह बात जरूर है कि ओशो की संगति के कारण कबीर, रैदास, पलटू, मीरा आदि के वे आयाम हमारे सामने उद्घाटित हुए जो अब तक अनुद्घाटित थे.
तुलसीदास सर्वाधिक जनप्रिय कवि हैं. उनके शब्दों का सहारा लेने में आपका क्षोभ मेरी समझ से परे है. आप एक प्रौढ़ और परिपक्व व्यक्ति हैं. निश्चय ही आप ओशो को ठीक से जानते-समझते होंगे. लेकिन मुझे अपने पर कभी भरोसा नहीं हुआ कि मैं ओशो को ठीक से जानता-समझता हूँ . मैं ओशो से आप्लावित हूँ और इतना जानता हूँ कि ज्यों-ज्यों मेरे जीवन अनुभव बढ़ेंगे त्यों-त्यों ओशो-साहित्य के नये-नये सौन्दर्य-आयाम मेरे सामने उद्घाटित होते जायेंगे. अभी तो मैं ओशो साहित्य के सिंह-द्वार के पास ठिठका स्तब्ध खड़ा हूँ . विस्मय-विमूढ़ हूँ ! आह, क्या है, कैसा है उसका अलौकिक सौन्दर्य ! उनके साहित्य में मुझे अपनी आत्मा मिलती है.
बलात्कार-प्रसंग को स्पष्ट कर दूँ . मैं स्त्री-पुरुष की परम स्वतंत्रता का प्रबल पक्षधर हूँ . स्त्री जिसमें खुश रहे , वह करे . मेरी आपत्ति का प्रश्न नहीं है . जैसे आपने मुझे सावधान किया, सलाह दी , लेकिन आपने रोक तो नहीं लगायी ? वैसे ही मेरा सुझाव है कि स्त्री अपने स्वभाव को पहचाने और तद्नुसार आचरण कर सुखी भवेत् .
मैंने तो यह कभी नहीं कहा कि स्त्री कहीं न जाय और घर में बैठी रहे. मैं तो सेना में भरती होने , न होने पर विचार कर रहा हूँ . सेना में बलात्कार के खतरे ज्यादा हैं ,उसी तरह जैसे दिन की तुलना में रात में खतरे ज्यादा हैं . यह जानकर भी कोई सुनसान रात में निकलती है , तो जरूर निकले. अगर कोई स्त्री सेना में यह सोचकर जाती है कि वहाँ मेरा बलात्कार भी हो, तो भी मैं भरती होऊँगी , तो मैं कौन होता हूँ रोकने वाला ? जिसका तन, उसका मन . दाल भात में क्यों बने कोई मूसलचंद !
55 वर्ष पार कर चुका हूँ . स्त्री--पुरुष के ‘ गुण-दोष-स्वभाव’ के बारे में इतने वर्षों के अनुभव को रखूँ तो भी जल्दबाजी है ? इसी उम्र में प्रेमचंद सारी बातें कहकर चले गये . 35 वर्ष में ही सब कुछ कहकर भारतेन्दु विदा हो गये . 24 वर्ष में भगतसिंह सब कहकर चले गये. आपने उनके लिए क्या कभी ‘ जल्दबाजी’ शब्द का प्रयोग किया ? यह शब्द उपयुक्त नहीं है . मेरे विचार गलत हो सकते हैं . अब तक स्त्री-पुरुष स्वभाव को जैसा मैंने जाना, उसमें धोखा हो सकता है. लेकिन जल्दबाजी?
फिर से कहता हूँ, स्त्री विशेष के लिए सेना में भरती होना स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन स्त्री जाति के लिए नहीं. आज तक का मानव इतिहास इसका साक्षी है. लक्ष्मीबाई अपवाद हैं , नियम नहीं. योद्धा पुरुष ही हो सकते हैं . अगर कोई स्त्री भी योद्धा होगी तो पुरुष योद्धा के सामने टिक नहीं पायेगी . पहलवान होना पुरुष का स्वभाव है . स्त्री भी हो सकती है . लेकिन कोई भी स्त्री पहलवान पुरुष को पराजित नहीं कर सकती है. क्रिकेट, फुटबाॅल आदि खेलों में लड़कियों की टीम हो सकती है, लेकिन पुरुष टीम से कभी मुकाबला नहीं कर सकती. हाँ, खेलकूद के वे हिस्से जिनका संबंध शरीर के लचीलेपन से है स्त्रियाँ पुरुषों से होड़ ले सकती हैं और उन्हें पराजित भी कर सकती हैं . वह उनके शारीरिक स्वभाव का हिस्सा है .
घर में स्त्री रसोई का काम करे , स्वाभाविक है . पुरुष भी कर सकता है , करता भी है . लेकिन स्त्रियों के लिए ज्यादा सहज है . मगर बड़े पैमाने पर भोज हो या बड़े होटल में रसोइये का काम हो तो वह पुरुष के अनुकूल बैठता है . छोटे-बड़े का प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि जीवन एक सहयोग है . जीवन रथ के दो चक्के स्त्री और पुरुष हैं . व्यक्ति विशेष एक चक्के पर भी चल सकता है .
अत्यंत निकट से मैंने माँ को देखा है , बहन को देखा है , फुआ को देखा है , पत्नी को देखा है और जूली को देखा है. इन सबों में एक बात सबमें पायी है कि येेे बाँटकर खाती हैं या दूसरे को खिलाकर खाने में खुशी महसूस करती हैं. स्वयं हड़प लें , ऐसा मैंने किसी में नहीं पाया है. इतने लोगों के साक्ष्य पर मैं कह सकता हूँ कि समभाव और त्याग स्त्री का स्वभाव है. ये गुण इन्हें पुरुषों से ज्यादा महत्वपूर्ण बनाते हैं . पुरुषों में भी ये गुण हैं , लेकिन ज्यादा स्त्रियों में हैं .
इस तरह से दोनों के अनंत स्वभावगत भेद गिनाये जा सकते हैं . कभी उन पर अलग से विचार किया जा सकता है.
मित्र संजय ग्रोवर के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ कि उनकी टिप्पणी के उत्तर के बहाने मुझे अपनी बात रखने का अवसर मिला. अंत में इतना जरूर कहँूगा कि अपनी बात लिखना आसान है , दूसरे के लिखे को समझना सदा कठिन होता है , क्योंकि हम उसका अर्थ उसके अनुभव के आधार पर नहीं करके अपने अनुभव के आधार पर करते हैं .
एक बात तो भूल ही गया था. समाज ने कौन-सा कड़वा अनुभव मुझे दिया है , याद नहीं पड़ता . कोई ऐसा जख्म मुझे नहीं मिला है जो असहनीय हो . सब सहनीय है और मीठा भी ,क्योंकि वह देने वालों पर नहीं लेनेवालों पर निर्भर करता है. आप गाली दें और मैं वापस कर दूँ या न लूँ तो उसका कड़वापन मुझे पता कैसे चलेगा ? दुनिया में काँटे और फूल दोनों हैं , मैं तो धरती पर केवल फूल चुनने आया े हूँ . हाँ , काँटे भी मैं वहाँ तक लेता हूँ , जहाँ तक फूल के अनुभव का एहसास दिलाने में वह सहायक होता है.

3 टिप्‍पणियां:

  1. एक ओशो के विचारों की सुगंध से सराबोर व्यक्ति ही ऐसा सोच सकता है. साधू!

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  2. तकनीकी कारणों से यह मटुकजूली ब्लाग पर पोस्ट नहीं हो पा रही है। (ho sakta hai shabd-seema ka mamla ho!)अपने और दूसरे ब्लाग पर डालनी पड़ेगी।

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  3. मटूक जी !

    नमन ! आप बधाई के पात्र हैं ।

    ओशो को पढ़ना और इसे अंत:स्थल से समझना बिल्कुल दूसरी बात है । बहुत से लोग ओशो को केवल अपनी तर्क-शक्ति प्रबल करने के लिए पढ़ते हैं, न कि स्व की खोज के लिए । ऐसे लोगों की खोपड़ी बढ़ती है, ह्रदय नहीं बदलता ।

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