मंगलवार, दिसंबर 01, 2009

संतुलित सोच से सशक्तिकरण संभव-जूली

जब हम अपने विचारों के विरोध में कुछ पढ़ते-सुनते हैं तो चित्त आंदोलित हो जाता है. आंदोलित चित्त के साथ किसी की बात को ठीक-ठीक सही संदर्भों में समझना कठिन होता है. ऐसी स्थिति में हम किसी भी तरह प्रतिपक्ष को पटखनी देना चाहते हैं. गीताश्री का ब्लाॅग पर डाला गया और ‘राष्ट्रीय सहारा’ में प्रकाशित ‘क्या पुरुष दाता है और स्त्री याचक? ’- शीर्षक लेख अत्यधिक आवेश में लिखी गयी ऐसी ही प्रतिक्रिया है. आवेश ने उन्हें मेरे लेख पर शांतिपूर्ण ढंग से विचार करने नहीं दिया . आवेश के कारण ही मेरा संतुलित लेख उनकी नजरों से ओझल हो गया और उन्हें लगा कि मेरे माध्यम से एक पुरुष महिला संगठन के खिलाफ बोल रहा है. इसलिए अपने लेख में उन्होंने ‘कौन है’ , ‘कौन है’ की आवेशजन्य अनेक आवृत्तियाँ की हैं- ‘‘ ये कौन बोल रहा है उनकी जुबान से?’ कौन है जो उनके भीतर पुरुष भाव बन कर बैठ गया है ? कौन है जो एक स्त्री को महिला संगठनों को अप्राकृतिक घटना मानने पर विवश कर रहा है और उसकी असफलता के लिए बद्दुआएँ दे रहा है? कोई है तो इसके पीछे ? हम अंदाजा लगा सकते हैं कि कौन छिपकर वार कर रहा है.’’ साफ-साफ कहना था कि मेरे लेख के माध्यम से मटुकनाथजी बोल रहे हैं. इसमें इतना समय और शब्द नष्ट करने की जरूरत क्या थी ! कहीं यह मीडिया में काम करने का ‘साइड इफेक्ट तो नहीं, जहाँ एक ही बात बार-बार दुहराई जाती है?
ऐसा सोचने वाली गीताश्री अकेली स्त्री नहीं. शुरू से ही मेरे विचारों को मटुकनाथजी द्वारा पढ़ाया गया पाठ समझा जाता रहा है. इसकी दो वजहें दिखती हैं. पहली, ये प्रोफेसर हैं और मैं छात्रा. दूसरी, मेरी उम्र कम है. मैं अन्य लोगों की इस समझ पर प्रायः मुस्कुरा दिया करती थी, क्योंकि उनका कथन मेरे जवाब के ठोस और परिपक्व होने की स्वीकारोक्ति थी. साथ ही, मुझे साफ दिख जाता था कि ऐसी दृष्टि रखने वालों की मानसिक उम्र कम है ; इसलिए मेरी मानसिक उम्र का अंदाजा लगाना उनके लिए मुश्किल होता है. गीताश्री ने आक्रमण करते हुए मेरी विवशता का चित्र यों खींचा है- ‘‘ अभी ये जिस फंतासी में जी रही हैं, वहाँ पुरुषों का महिमा गान अनिवार्य है. इनके पास उपाय क्या है. कहाँ जाएँगी.....क्या करेंगी.’’ गीताश्री की इस सोच के पीछे उनकी देखी-सुनी-भोगी दुनिया का अनुभव ही बोल रहा है. उसे मुझ पर आरोपित करने में उन्हें संकोच करना चाहिए था. कम से कम अखबार में लिखने से पहले मुझे जानने का प्रयत्न करना चाहिए था. दरअसल बैठे-बैठे ही मीडिया की सतही खबरों के आधार पर मुझे और मेरी मजबूरियों को मेरे सिवा हर कोई जान लेता है ! ऐसे अन्तर्यामी लोगों को मैं नमन ही कर सकती हूँ .
परंपरा, परिवार, समाज और रुढ़ियों के घोर दमनकारी रूप का इस उम्र में आनंद से सामना कर सकने वाली जूली के विचार आपके चिंतन के दायरे में कैसे आ पायंेगे जो अपने और अपने जैसे लोगों के अध्ययन के आधार पर पैदा हुआ है. जो स्त्री हर मोर्चे पर लड़कर अपने अनुसार जिंदगी जीने का हौसला रखती है, वह स्त्री आपको दूसरों की विचार वाहिका मालूम पड़ती है ? आप मुझे नहीं जानती, क्योंकि आप प्रेम के बारे में नहीं जानती हैं. अगर जानती तो ऐसा कभी नहीं लिखतीं- ‘‘दूसरी महिला का हक छीनने वाली स्त्रियाँ हमेशा पुरुषों की भाषा बोलती हुईं पाई गई हैं.’ कैसी विडंबना है कि स्त्री को वस्तु समझने वाली दृष्टि का विरोध करने वाली स्त्री पुरुषों के मामले में स्वयं उसी दृष्टि का शिकार हो गयी है ! क्या मटुकजी कोई वस्तु हैं जिसे मैंने उनकी पत्नी से छीन लिया ? कौन-सा हक छीना मैंने बताएँगी जरा ? मैंने न पत्नीत्व छीना, न मातृत्व, न धन-संपत्ति छीनी, न कोई कानूनी-सामाजिक अधिकार ? फिर भी मैंने हक छीन लिया? किसी को प्यार देना और पाना क्या किसी का हक छीनना होता है ? प्यार भी अगर छीना जाता हो तब तो वह भी एक वस्तु हो गया ? जो स्त्री आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान के साथ जीने में असमर्थ है और जो प्रेमरहित है, वही इस प्रकार के हक की बात करती है. ‘हक’ शब्द से दीनता टपकती है, स्त्री का तेज और स्वाभिमान नहीं.
प्रेम के बारे में कुछ और भी विचित्र बातें आपने लिखी हैं- ‘‘ यही तो पुरुषों की चाल है. वह प्रेम करता है स्त्री को पाने के लिए, उस पर आधिपत्य जमाने के लिए.....स्त्री सदियों से उसकी चाल नहीं समझ पा रही है और शिकार हो रही है.’ इस युग में जब आप जैसी स्त्रियों ने जन्म ले ही लिया है तो पुरुषों की सब चालें समझ ही ली होंगी. उनके आधिपत्य से बाहर हो जाइये, आपको कौन रोकता है ? पुरुषों ने आपके जीवन में जो अनुभव दिये हैं, वह पुरुष मात्र पर लागू नहंीं हो सकते. राजकमल और मटुकनाथ अलग-अलग पुरुष हैं. राजकमल को पढ़कर सभी पुरुषों के बारे में धारणा बनाना अवैज्ञानिक और अनुभवहीनता है.
स्त्री और पुरुष की पूरकता की बात में भी गीताश्री को मर्दवाद दिखता है- ‘ये सब स्त्री को गुलाम बनाये रखने वाली अवधारणाएँ हैं.’ सच्चाई यह है कि पूरकता की बात स्त्री और पुरुष को समान धरातल पर खड़ा करती है. स्त्री और पुरुष पूरक कैसे हैं, इसके ही कुछ पक्षों को मैंने अपने लेख में बताया था, पर घोर स्त्रीवादी चश्मे के कारण उन्हें सब स्त्री-विरोधी लग गया ! स्त्री होने मात्र से नारी सर्वथा दोषमुक्त हो जाती है और पुरुष पुरुष होने के कारण हमेशा दोषी, ऐसा नारीवाद आपको मुबारक ! मैं न नारीवादी हूँ , न पुरुषवादी क्योंकि मैं हर मामले को विशिष्टता में देखती हूँ. स्त्री और पुरुष अकेले शौक से अपनी दुनिया बना सकते हैं. यह उनकी स्वतंत्रता है. इसके लिए पुरुष मात्र का विरोध करने की क्या जरूरत है ?
अब उस बात पर आते हैं जिस पर सर्वाधिक बावेला मचा है. मैंने लिखा था- ‘‘ पुरुष वीर्यदान करता है और स्त्री उसे ग्रहण करती है.’ मेरी इस बात को 18 नवंबर के ‘राष्ट्रीय सहारा’ में इस रूप में प्रचारित किया गया- ‘‘ पुरुष ‘दाता’ है और स्त्री ‘याचक’ ! जबकि अपने पूरे लेख में मैंने ‘याचक’ शब्द का प्रयोग कहीं नहीं किया है. ‘याचक’ शब्द गीताश्री का आविष्कार है. दान का मतलब न थोपना होता है और न ग्रहण का मतलब याचना. फिर भी गीताश्री ने यही अर्थ क्यों ले लिया ? वे लिखती हैं- ‘ये कैसी आत्मस्वीकारोक्ति है. क्या कोई स्वाभिमानी स्त्री इनकी इस स्थापना को स्वीकार करेगी ’’. क्या यह स्थापना है ? प्राकृतिक जगत का सत्य नहीं ? स्वाभिमानी स्त्री क्या अंधी होती है जो एक सामान्य प्राकृतिक तथ्य को न देख पाए ? मेरा प्रश्न यह है कि क्यों ‘दान’ को ऊँचा समझा जा रहा है और ‘ग्रहण’ को नीचा ? ऐसा सोचने का सीधा अर्थ है कि न दान की महिमा समझी जा रही है, न ग्रहण की गरिमा. स्वाति नक्षत्र में बूँद सीपी में गिरती है और मोती बन जाता है. मेघ दान करता है, सीपी ग्रहण करती है. तो क्या सीपी छोटी हो गयी ? दरअसल गीताश्री ने इस पूरी प्रक्रिया को जय-पराजय के खेल से जोड़ दिया है ! उन्होंने इसे स्त्री को दमित करने, परास्त करने का उपक्रम माना है. विचित्र विडंबना है कि मनुष्य जिस प्रक्रिया से पैदा हुआ है, उसके अद्भुत सौन्दर्य और रहस्य को न समझकर वे उसी से घृणा करती हैं ! दरअसल इस सौन्दर्य को महसूसने के लिए निर्मल हृदय और संबंधों की गहराई का अन,ुभव चाहिए. पुरुषों के प्रति अपार क्रोध से भरा हुआ मन प्रेमपूर्ण क्रिया-व्यापार को भी बलात्कार से जोड़ देता है !
पुरुषों ने बहुत प्रकारों से स्त्रियों को दबाया है. इसलिए स्त्रियों का प्रतिक्रिया में आ जाना स्वाभाविक है. किंतु लड़ाई पुरुष की दमनकारी मानसिकता से है, पुरुष से नहीं. अनेक महिला संगठनों की स्त्रियाँ पुरुष होने के कारण मटुकनाथजी को बिना जाने-समझे गलत मानकर पीटने की बात कह रही थीं. क्या यही महिलाओं का वास्तविक संघर्ष है ? संघर्ष और प्रतिक्रिया में फर्क होता है, उतना ही जितना क्रंातिकारियों और हुड़दंगियों में. पुरुषों ने महिलाओं को दबा कर अपनी सत्ता कायम की. अब महिलाएँ किसी भी तरह उन्हें दबाकर अपनी सत्ता कायम करने की इच्छुक दिख रही हैं, यह स्वस्थ रूप कदापि नहीं है. इससे तनाव और अशांति पैदा होती है. इसलिए मैंने अपने लेख में लिखा था- सबसे सुन्दर और संतुलित स्थिति वह है कि जो भी प्रताड़ित हैं, उनका संगठन हो. सभी प्रताड़ित व्यक्तियों का संगठन हो, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष. ऐसा संगठन ही संतुलित, सार्थक और सफल हो सकता है. संतुलन का सौन्दर्य सुंदरियों का स्वभाव है. इसे खोकर वे अशक्त होंगी और पराजित भी.

13 टिप्‍पणियां:

  1. सामाजिक व साहित्यिक परिपेक्ष्य में संगठनों की क्या भूमिका है, हम अच्छी तरह से जानते-समझते हैं। सभी संगठनों में केवल राजनीति होती है सामाजिक सरोकार नहीं।

    स्त्रियों पर हर रोज होने वाले अत्याचारों पर ये संगठन मौन साधे रहते हैं। रसूख के हिसाब से संगठन काम करते हैं।

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  2. मैं कह सकता हूं कि इन्हीं जूली को मैं दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों पर देखता-सुनता था और कायल होता था। कुछ असहमतियां हैं। बतौर सहमति मैं यह कहना चाहूंगा कि महिलाओं को इतना ज़रुर ध्यान में रखना चाहिए कि हां, अत्याचार हुए, हो रहे हैं, और उसमें आज का पुरुष भी शामिल है लेकिन यह स्त्री-विरोधी व्यवस्था आज के पुरुष ने नहीं बनायी। उसको भी यह मानसिकता ठीक उसी तरह विरासत में मिली है जैसे स्त्रियों को खुद अपना ही दमन या विरोध करने की मानसिकता। इस लिए हर पुरुष या पुरुष मात्र के साथ एक ही भाषा या एक ही सोच के साथ बात करना तर्कसंगत नहीं है। हां, यह भी सच है कि जिसको जिस व्यवस्था से फायदा होता है उसे बनाए रखने के लिए तरह-तरह के तर्क और तरकीबें ढूंढता है। हिंदुस्तान में ब्राहमणवाद या वर्णवाद इसका बहुत बड़ा उदाहरण है।

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  3. प्रभावित करता है आपका यह चिंतनपरक मौलिक लेखन -सच है प्रेम की उदात्तता की अनुभूति से श्याद कुछ लोगों को प्रकृति ने ही वंचित कर रखा है !
    मटुक -जूली उदात्त प्रेम के पर्याय बन चुके हैं -मगर समाज के कई समकालीन 'सुनहले 'नियम कायदे होते हैं -जीने वह टूटने पर आक्रामक हो उठता है ~ 'आप अपनी 'अभिव्यक्ति जरूर देती रहें, तब भी तदापिभी ! शुभकामनाएँ !

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  4. अंशुमालजी, सही कहा. बढ़िया निरीक्षण.

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  5. संजय ग्रोवर जी
    लिखते वक्त कई बार सामान्यीकरण करना पड़ता है , लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आँखें मूँदकर पुरुष या स्त्री मात्र के बारे में कुछ कहा जा रहा है. अंततः हर मामले को देखकर ही कोई निर्णय लेना पड़ता है.
    आपने असहमतियाँ नहीं लिखी. उतना लिखना कठिन होता है खासकर टिप्पणी में , मैं समझती हूँ . जितना भी लिखा गया है, विचारोत्तेजक है. जिंदगी बहुत बड़ी है , उसके अनंत पक्ष हैं. इसलिए कुछ न कुछ सच सबकी बात में होता है. आपकी बात में भी आंशिक सत्य है. मनुष्य मात्र को विरासत में बहुत सा कूड़ा मिला है. लेकिन विरासत को ही दोषी मानकर मुक्त नहीं हुआ जा सकता. सबको अपना परिष्कार स्वयं करना ही पड़ता है.

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  6. अरविन्द मिश्राजी को आभार
    समाज के नियम कितने सुनहले हैं , इसी पर तो विचार करना है. हमारा प्रेम अभी उदात्त हुआ नहीं , वह उस मार्ग पर अवश्य है. हम इस अस्तित्व के आभारी हैं जिन्होंने हमें इसे जीने का मौका दिया.

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  7. संतुलन का सौन्दर्य सुंदरियों का स्वभाव है. इसे खोकर वे अशक्त होंगी और पराजित भी. हम 36 गढी मे कहते हैं।
    "जेखर काम उही ला साजै, नइ होय त ठेंगा बाजे"
    जिस कार्य के लिए जो बना है उसे वही कार्य करना चाहिए,अन्यथा परिणाम विपरीत ही होता है।

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  8. mayuk ji.............../juli ji...........

    aap dono ne bhut hi dileri ka kam kiya hai. lik se hatkar chalne me tamam tarah ki dikkte aati hai. unse ghabarana nahi chahiye. ak sher hai-----hamne bana liya hai ak aur aashiyan, jao yh bat fir kisi tufan se kah do..

    matuk aur juli ji aap ka kabhi chandigarh aana ho to swagat hai. mai patrkar hu. himachal pradesh ghum aaiye bhut achchhi jagah hai....



    mukund,

    mobail number 09646046021

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  9. "सबसे सुन्दर और संतुलित स्थिति वह है कि जो भी प्रताड़ित हैं, उनका संगठन हो. सभी प्रताड़ित व्यक्तियों का संगठन हो, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष. ऐसा संगठन ही संतुलित, सार्थक और सफल हो सकता है"

    सार्थक लेख

    प्रणाम स्वीकार करें

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  10. ललित शर्माजी, आभार.. दिक्कत सिर्फ यही है कि कोई काम या तरीका जबर्दस्ती स्त्रियों पर थोप दिया जाता है. उनकी स्वतंत्रता और समझ को बाधित किया जाता है. इससे प्रतिक्रिया हो जाती है. किन्तु प्रतिक्रिया संतुलित मनुष्य का रास्ता नहीं.

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  11. देखिए मटुकजूलीजी, आपने तो हमें प्रौढ़ और परिपक्व बता दिया। अब आप ही बताईए एक 20-25 बरस के बच्चे को इस तरह डराना ठीक है क्या ;-) ? दोस्त होकर भी आप हमारे रास्ते बंद किए दे रहे हैं। अभी तो हमें बहुत कुछ करना है।
    BAHARHAL HASYA VINOD APNI JAGAH HAI, LEKIN AAPNE JO KAHAA KI "आप ऐसे ही बनें रहें", और प्रगति करें BAHUT HI ARTHAPURN, MULYAWAN AUR VICHARNIYE BAT HAI. BAHUT-BAHUT AABHAR.

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